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तिला संक्रान्तिमे चौर संग तिल-गुड़ बांटै केर विशेष रेवाज अछि

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लेख विचार
प्रेषित: आभा झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय :- तिला संक्रांति: समयक फेर आ परंपराक निरंतरता

मिथिलाक लोक-जीवन मे “तिला संक्रांति” मात्र एकटा तिथि नहि, बल्कि ई ऋतु परिवर्तन आ नव उमंगक उद्घोष थिक। सूर्यक उत्तरायण होयब जतय खगोल शास्त्रीय घटना अछि, ओतय मिथिलाक घर-आँगन मे एकर सामाजिक आ सांस्कृतिक महत्व अछि। मुदा, बीतल किछु दशक मे वैश्वीकरण आ शहरीकरणक कारणे एहि पाबनि क’ “पहिने” आ “आब” वाला स्वरूप मे एकटा पैघ अंतर देखल जा रहल अछि।

पहिनेक स्वरूप: गाम, गाछ आ अपनत्व
पहिने तिला संक्रांति गामक सामूहिकताक पाबनि छल। ओहि समय मे हाट – बजारक हस्तक्षेप नगण्य छल।

तैयारी आ परिश्रम: संक्रांति सँ सप्ताह भरि पहिने घरक कोना-कोना साफ कएल जाइत छल। महिला सब ढेकी मे चाउर कुटैत छलीह, सूप सँ तिल साफ करैत छलीह। गुड़ आ तिलबाक गंध सँ पूरा टोल गमगम करैत छल। ओहि समय मे ई ‘होममेड’ संस्कृति पाबनिक असली आनंद छल।

प्रकृति सँ सीधा संवाद: लोक भोर मे कड़ुआ तेल लगा कऽ नदी मे डुबकी लगबैत छलाह। सूर्य देव केँ अर्घ्य देबाक काल जे मंत्रोच्चार होइत छल, ओ प्रकृति केँ धन्यवाद देबाक तरीका छल। जाड़ मे आगिक घेरा मे बैसि कऽ “तिल-खिचड़ि” खायब आ संगे लोकगीत गायब, संक्रांति केँ जीवंत बना दैत छल।

दानक शुद्ध भाव: ओहि समय दान मे “अन्न” आ “तिल” कें महत्ता छल। गामक हर गरीबक घर मे चूड़ा-दही पहुँचे, ई संपन्न लोकक उत्तरदायित्व मानल जाइत छल।

आबक स्वरूप: शहर, सुविधा आ सिमटैत आंगन
आब संक्रांति मे सुविधा बढ़ल अछि, मुदा सुकून किछु कम भऽ गेल अछि।

बाजारक निर्भरता: आब लोक लग समयक अभाव अछि। बजार सँ पैक बंद तिलकुट आ चूड़ा आबि जाइत अछि। पहिने जे श्रम मे सुख छल, ओ आब ‘रेडीमेड’ सुविधा मे बदलि गेल अछि। शहर मे रहनिहार मिथिलाक लोक गामक पोखरि तँ नहि खोजि सकैत छथि, मुदा बाथरुम मे गरम पइन मे “गंगाजल” मिला कऽ सांकेतिक स्नान कऽ लैत छथि।

डिजिटल उत्सव: आब संक्रांतिक शुभकामना “दही-चूड़ा” सँ पहिने “व्हाट्सऐप” पर आबि जाइत अछि। सामूहिक अगियासीक जगह आब हीटर आ ए.सी. लऽ लेलक अछि। आपसी भेट-घाट कम भऽ कऽ “वीडियो कॉल” तक सीमित भऽ गेल अछि।

नूतन उत्साह (पतंगबाजी): आधुनिक समय मे एकटा सकारात्मक बदलाव ई भेल अछि जे शहर मे पतंगबाजीक क्रेज बढ़ल अछि। छत पर बच्चा आ युवा सभक भीड़ ई संदेश दैत अछि जे उत्सव एखनहुं अपन रंंग बदलि कऽ जीवित अछि।

तिला संक्रांति हमरा सभ केँ किछु गूढ़ संदेश दैत अछि, जे पहिने सेहो प्रासंगिक छल आ आब सेहो अछि –

स्वच्छता आ त्याग: तिल केँ पाग मे दऽ कऽ ओकरा मीठ बनेबाक अर्थ अछि जे अपन भीतरक कड़वाहट केँ त्यागि कऽ मिठास अपनाउ।

सहिष्णुता: तिल आ गुड़ जेना एक दोसर सँ मिलि कऽ लड्डू बनि जाइत अछि, ओहिना समाज मे सेहो लोक केँ आपसी मतभेद बिसरि कऽ एक भऽ कऽ रहबाक चाही।

आध्यात्मिक ऊर्जा: सूर्यक उत्तरायण भेनाइ अंधकार सँ प्रकाशक दिस बढ़बाक प्रतीक अछि। ई हमरा सभ केँ जड़ता त्यागि कऽ क्रियाशील बनबाक प्रेरणा दैत अछि।

स्वस्थ जीवन: तिल मे ओमेगा-6 आ गुड़ मे आयरन होइत अछि। ई पाबनि हमरा सभ केँ ऋतु अनुकूल खान-पान अपनाबय लेल प्रेरित करैत अछि।

“पहिने” आ “आब” मे अंतर तँ अछि, मुदा भावना वैह अछि। तिला संक्रांति हमरा सभ केँ अपन जड़ि सँ जुड़बाक अवसर दैत अछि। आधुनिकताक दौड़ मे हमरा सभ केँ ई ध्यान राखब जरूरी अछि जे हम अपन पारंपरिक स्वाद आ संस्कार केँ सुरक्षित राखी। चूड़ा-दहीक ओ स्वाद आ दानक ओ परंपरा मात्र पाबनि नहि, बल्कि हमर मिथिलाक पहचान थिक।

परिवर्तन संसारक नियम अछि, मुदा जे परंपरा हमरा लोकनि केँ मानवता आ प्रकृति सँ जोड़ैत अछि, ओकरा संजो कऽ राखब हमर कर्तव्य अछि। जय मिथिला, जय मैथिली।

 

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