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माँ के देल साड़ी सँ बतियाईत अछि माँ :: गोपाल मोहन मिश्र

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माँ के देल साड़ी सँ बतियाईत अछि माँ :: गोपाल मोहन मिश्र
सभ संबंधक
सिलवट के खोलि
रौद में देखाबैत अछि,
आँगन में सूखैत अछि ओ
भीजैत अछि माँ I
वृक्षक फुनगी सँ
उतारि कs
घर में रोपैत अछि भोर,
मुदा मन के
अन्हार कोना में
स्वयं बंद भs जाईत अछि माँ I
ईजोतक
एक-एक किरण
सभके उपयोग करैत अछि,
आ साँझ में
आँचल के कोना में
गठिया लैत अछि माँ I
चौखट सँ ड्योढ़ी तक
पसरल रहैत अछि,
सभ इच्छा के
राति अकेले में
अभिलाषा के गठरी
चुपचाप खोलैत अछि माँ I
रिमोट छीनबाक जद्दोजहद
टी वी पर
समाचारक शोर,
तेज संगीतक चकाचौंध
एहि सभ सँ अलग
किचेन में,
लोकगीत गुनगुनबैत अछि माँ I
परिजन सभक ताना
बरसैत रहैत छै,
ओ बेपरवाह भs
ओकर उपेक्षा कs
ओकरा बहा लs जाईत अछि,
सभ सँ छिपा कs
पोछैत अछि अप्पन अश्रु,
आ उठि कs
काज करs लगैत अछि माँ I
होईत छै समय सभ के लsग
मुदा ओकरा लsग नहि,
झुर्री भरल गाल में
अप्पन यौवन तलाशबाक लेल,
खोलैत अछि
अप्पन विवाहवाला बक्सा,
सहलबैत अछि विवाहक साड़ी
माँ के देल साड़ी सँ बतियाईत अछि माँ I

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