गोपाल मोहन मिश्रक एक कविता “अहाँ सिखा दियs”
दुख होअय वा कि सुख, सदा उत्सव मनेनाई, अहाँ सिखा दियs..
दोसर के पीड़ा पर सभ किछु लुटेनाई, अहाँ सिखा दियs..
मुस्कुरेनाई अहाँ सिखा दियs..
जनैत छी, सैकड़ों बादल रखने छी, हँसैत आँखि में छिपा कs
तृप्त कs लैत छी अप्पन मन, अकेले में भिजा कs
आ कहि दैत छी हमरा – “सुख तs एहि अवसाद में छै” !!
आह ! केहन सुख कि अप्पन घर जरा कs ,
नीड़ आन के बसा कs स्वयं के मिटेनाई, अहाँ सिखा दियs..
मुस्कुरेनाई अहाँ सिखा दियs..
हम कहाँ कनलौं कि जखन कोई बात गड़ैत छै हृदय में
कखन बता पयलौं कि अहीं मार्गदर्शक छी सभ विजय में
आ अहाँ.. आकाश के निर्लिप्त पंछी के जेकाँ
मौन के विस्तार करैत सेहो, बाँन्हैत छी एक लय में
अश्रु केर लय गूथि कs गुनगुनेनाई, अहाँ सिखा दियs..
मुस्कुरेनाई अहाँ सिखा दियs..
गोपाल मोहन मिश्रक एक कविता “अहाँ सिखा दियs”
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