मिथिला समाजक गरीबी-दरिद्रीक एहनो रूपः वृद्ध माय-बाप प्रति असंवेदनशीलता

गरीबी-दरिद्रीक एहनो स्वरूप अपन मिथिला समाज मे
 
खाली साधनक कमी होयब गरीबी नहि, गोटेक साधनसंपन्न लोक सेहो गरीबी-दरिद्रीक शिकार होएत अछि। एहेन किछु उदाहरण वर्तमान मिथिला मे खूब नीक सँ भेटैत अछि। अछैत अक्खा सम्पत्ति, पुत्र-पुत्री-पौत्रादिक रहैत घर सून्न पड़ल अछि। अपने जबानी मे चरम सुख आ आनन्द भोगलहुँ, धियापुता केँ पढेबाक लेल जमीन-आकाश एक कय देलहुँ, अक्खा सम्पत्ति अर्जन लेल छक्कल-बक्कल धूम मचेलहुँ…. मुदा आखिरी मे हाथ लागल शून्य – एहेन उदाहरण तकबाक लेल बेसी मेहनतियो नहि करय पड़ैछ, बस कोनो गामक सीमा मे प्रवेश करिते एहेन विरान हवेली सब देखाय लगैछ। कोनो घर पर पीपरक गाछ, त कतहु बरक गाछ जनैम गेल। हँ, तखन पता लगायब जे एहि घरक स्वामी सब कतय छथि – त पता लागत जे एहि घरक मालिक सब बहुत पढलखिन-लिखलखिन, बड पैघ लोक सब बनलखिन, फल्लाँ बाबू एना, चिल्लाँ बाबू एना, फल्लाँ बाबू बेटा एना, चिल्लाँ बाबूक बेटा त विदेश मे मोटोरोला कंपनीक सीईओ बनिकय बियाहो फोर्ड मोटर्स केर मैनेजर विलियम चार्ल्स केर बेटी सँ कय ओम्हरहि कतहु बसि गेलाह। आदि-आदि। घरक एकटा रूम आ किचन मे खरबर-खरबर आवाज आयत आ कनी भीतरका बात पता करब त दूइये गो बात पता लागत, या त मूस-साँप-बिज्जी-सनगोहि आदिक निवासस्थल बनि गेलाक कारण भीतर सँ खरबराहटक आवाज अबैत अछि; या फेर घरक भीतर जीबिते भूत दुइ प्राणी वृद्ध-वृद्धा रहि रहला अछि, काहि कटैत जीवन जीबि रहला अछि।
 
किछु दूर आरो आगू जायब जतय पिछड़ा वर्गक किछु परिवारक वस्ती स्थित अछि त हालत आरो कारुण्य लागत। जखन कि शिक्षा-दीक्षा मे आब पिछड़ावर्ग सेहो काफी सजग भेल, धिया-पुता केँ पढेबाक-लिखेबाक लेल घरक मुखिया काफी सजग अछि। बहुत परिश्रम सँ प्रवासक नगर अथवा उपलब्ध रोजगार सँ आमदनी करैत ओकरा केवल अपन धिया-पुता केँ सुशिक्षित आ सुसंस्कृत बनेबाक एकमात्र उद्देश्य रहैत छैक। धरि अधिकांश परिवारक दलान पर या अंगना मे माछी भिनकैत वृद्ध बीमार मृत्यु केर प्रतीक्षा मे धँसल आँखि, चोटकल गाल, बैसल शरीर, उगल हड्डी आ सालों-साल सँ नहि धोल गेल बिछाउन केथरी मे काहि काटि रहल अछि। नियति केहेन क्रूर छैक जे ओकरा अपना बुत्ते उठिकय कइयो नहि कयल पार लगैत छैक, पैखाना-पेशाब सेहो कोहुना कय पबैत अछि… अपन घरक लोक देखनिहारो नहि जे कने डेन पकड़ि एहि जीर्ण शरीर केँ सहारा दय मृत्युवरण धरि पार लगा देतैक, समाजहि केर कोनो दयावान सेवादारक भरोसे ओहो अपन जीवन कोहुना घसीट रहल अछि।
 
आब कतेक गरीबी-दरिद्रीक ई कारुण्य दृश्य सब देखब… कर्मशील स्त्रिगण समाज हो या पुरुष समाज हो – ओ एखनहु अपन दिनचर्या मिथिलत्व सँ ओत-प्रोत रखने अछि। हमरा बेसी खुशहाल वैह नजरि अबैत अछि। भोरे खेत-गाछी जाएत गृहस्थी सँ जुड़ल कार्य मे व्यस्त अछि। आइयो चिपरी पथाएत छैक। पात आइयो खरराएत छैक। बथुआ साग हो आ कि मौसम अनुरूपक साग, सब्जी – सब किछु अपनहि उपजायल लोक केँ खाय लेल नसीब होएत छैक। व्यवसाय करैत अछि त भोरका चाहक बाद दोकान पर बैसल, दुपहरिया नहाय-खाय लेल बन्द केलक, कनेकाल आराम केलक, फेर बेरहट केलाक बाद दोकान खोललक आर साँझ मन्दिर-मस्जिद जाय धरि व्यस्त रहल, खुश अछ अपन यथासंभव आमदनी सँ। बड़का गोला चलेनिहार हो आ कि लटखेना चलेनिहार – सभक व्यवसायक अपन गति छैक। अपन मूल भूमि पर माय-बापक सेवा करैत खुशहाल परिवार आ अनुशासित व्यवस्थाक संग बढि रहल अछि। धिया-पुता जे आब रोजगार करय जोग भेल, ओ बाहरो गेल त अपन सुन्दर संस्कार सँ घर-परिवार प्रति मास्चर्ज कथमपि नहि बिसरैत अछि। एकरा सभक परिवार मे कुटमैती करयवलाक सेहो कमी नहि, मुदा बाहरे फूटानी चौक परका सेठ बनि गेला पर गोटेक-आधेक दिन घर वापसी कय गामहु मे फूटानी झाड़ि लेला सऽ कुटमैती करय घटक आबि जायत एकर संभावना न्यूनो सँ न्यूनतम बुझू। गामक चमक-दमक जे किछु बाँचल अछि सेहो यैह किछु दमकैत-विहुँसैत परिवारक कारण, मुदा राजनीतिक घूर-पेंच मे जातीय विखंडनक गरीबी-दरिद्री फेर ओतबे कष्टदायक। राज्यक व्यवस्था तेहने अछि, हम-अहाँ कि कय सकब।
 
हरिः हरः!!