ऐतिहासिक महापुरुषः विद्यापति, एक महान क्रान्तिपुरुष 

विचार

– प्रवीण नारायण चौधरी

क्रान्तिपुरुष विद्यापति

पूर्वकाल मे मिथिलाक विभिन्न श्रमजीवी जाति-समुदायक बीच अगुआ वर्ग मे ब्राह्मण एवम् अन्य सुशिक्षित समुदायक उपस्थिति रहल छल। ताहि समय शिक्षा ग्रहण करबाक एकमात्र उपाय संस्कृत भाषा मे उपलब्ध शास्त्र आदि उपलब्ध होयबाक यथार्थ सँ सेहो हम सब परिचिते छी। विद्वान् लोकनिक संचारभाषा सेहो संस्कृत रहल। भगवत्भजन आ बौद्धिक चिन्तन लेल युगों-युगों सँ सुशिक्षित आ सुसंस्कृत ब्राह्मण समुदायक भाषा सेहो संस्कृते रहल। परञ्च सामाजिक व्यवहार मे प्रयुक्त भाषा सदा-सदा सँ मातृभाषा मैथिली होयबाक बात आर विभिन्न साहित्यिक क्रियाकलाप मे सेहो ई मैथिली रहबाक बात इतिहास सँ ज्ञात होएत अछि। चूँकि विद्यापति सेहो अपन रचना आमजन केँ बुझय योग्य भाषा मे कयलनि, जाहि कारण शिक्षा आ संस्कार ग्रहण करय मे उच्च-वर्गक अलावे आम जनमानस आ खास कय निम्न-वर्गीय जन-समुदाय मे सहुलियत भेल, यैह कारण विद्यापति केँ युग-पुरुष आ क्रान्ति-पुरुष केर रूप मे देखल जाएछ।
 
‘देसिल वयना सब जन मिट्ठा’ – अर्थात् अपन मातृभाषा सब केँ नीक लगैत छैक। नीक लगबाक वैज्ञानिक कारण सेहो छैक, अन्य कोनो भाषाक तुलना मे सदिखन प्रयोग कयल जायवला मातृभाषा मे अत्यन्त सहजता सँ बुझबाक सामर्थ्य बनैत छैक। भाषा वास्तव मे अभिव्यक्तिक माध्यम केँ कहल जाएछ आर जाहि माध्यम सँ कोनो अभिव्यक्ति केँ सुरुचिपूर्वक बुझल आ बाजल जाएछ से स्वाभाविके केकरो नीक लगतैक। विद्यापति केर जीवनी सँ ज्ञात होएछ जे हुनका द्वारा गूढ शास्त्र सभक मैथिली मे लेखन ताहि समयक कतेको विद्वान् केँ नीक नहि लगलैन, कारण छलैक जे उच्च-वर्गक शिक्षा व संस्कार पर एकाधिकार टूटि जेबाक खतरा बढि गेलैक। विद्यापति केर आलोचना – हुनक विद्वता केँ चुनौती देबाक आर हुनका ओछ सिद्ध करबाक विभिन्न गाथा सब सुनबा मे अबैछ। पंडित केशव मिश्र नामक उद्भट्ट विद्वान् केँ मुख्य प्रतिद्वंदीक रूप मे रामबृक्ष बेनीपुरी लिखित विद्यापति जीवनी सँ ज्ञात होएछ। मिश्र द्वारा विद्यापतिक अपमान तक कयल जेबाक वृत्तान्तक चर्चा विद्वत् समाज मे कयल जाएछ। परञ्च विद्यापति संस्कृत भाषा मे बाजब, लिखब, रचना करब केँ सिर्फ सीमित विद्वानहि वर्ग बुझि सकता – जखन कि मातृभाषा मे लिखब-रचना करब त आम जनमानस सेहो बुझत, ई कहि एकटा महान् क्रान्तिक सूत्रपात कयलनि।
 
यदि अहाँ आम जनसमुदायक हित मे सोचब त स्वाभाविके रूप सँ ओहि वर्गक आँखिक तारा बनब। कोनो सामाजिक सत्संग मे या बैसार मे अहाँ लेल सभक दृष्टि मे विशेष इज्जत रहत। ताहि पर सँ जे विद्यापति तत्कालीन राजाक प्रिय पात्र सेहो छलाह, हुनकर प्रजा प्रेम त आरो कतेक प्रभाव छोड़ने होयत ई हम सब कल्पना कय सकैत छी। महाकवि अपन सुमधुर रचना आम जनमानस मे कहाँ दिना अपनहि स्वर मे परसैथ। हुनक आवाज (स्वर) सेहो लोक केँ बड प्रिय छलैक। जतहि बैसैथ – ओतहि चारूकातक सर्वहारा समाज भीड़ लगाकय हुनकर रचना सब सुनय। महिला, पुरुष, युवा, धिया-पुता, वृद्ध – सब विद्यापतिक रचना आ स्वर केर दिवानगी मे मस्त रहैत छल। तखन न बाट-घाट चलैतो विद्यापतिक रचना गबैत ‘बटगबनी’क रूप मे प्रसिद्धि पेलक। जेकरा-तेकरा मुंह सँ विद्यापतिक रचना सुनि आम जनमानस मे झंकार जगैत छल। हुनकर रचनाक यैह शक्ति जे केकरो हृदय केर तार केँ झंकृत कय दैत छलैक, आर नायक केर भूमिका मे विद्यापति सभक हृदय मे विराजय लगलाह – किछु एहि अपूर्व प्रतिभा आ प्रेम सँ लोकमानस केँ अभिभूत होएत देखि भगवान् शिव सेहो अपना केँ नहि रोकि सकलाह। ओहो आमजन केर विद्यापति प्रति समर्पण आ सेवा-भाव देखि मंत्रमुग्ध भऽ अपनो हुनकर सेवकक रूप मे प्रस्तुत कय एक सँ बढिकय एक महेसवाणी आ नचारीक आनन्द मे डूबकी लगबय लगलाह।
 
उगना स्वयं महादेव छलाह ई बात कनीकाल लेल हम विश्वास नहि करैत छी। हम हुनका साधारण सेवक मात्र मानैत छी। आइयो हमरा लोकनिक मिथिला समाज मे एहेन सहृदयी कवि अथवा जनहित मे सोच रखनिहार सम्पन्न लोक केँ समाज मे सब वर्गक लोक ओतबे इज्जत आ स्नेह दैत छैक जेना विद्यापति केँ भेटलैन। यदि हम-अहाँ सभक हित लेल सोचब, अपन जातीय अभिमान सँ नितान्त दूर रहब आर कोन तरहें समाज आगू बढत, केना सभक बच्चा मे शिक्षा ओ संस्कार केर संचरण होयत – सब रोजी-रोजगार सम्पन्न भऽ अपन भरण-पोषण करैत समाजहु केर हित लेल सामर्थ्यवान जेकाँ भूमिका निर्वाह करत – एहि सब तरहक सोच जँ हम-अहाँ अपन समाज आ देश लेल रखैत छी त निश्चिते विद्यापति जेकाँ सभक आँखिक तारा बनिते टा छी। मनुष्यक लोकप्रियता ‘सर्वभूतहिते रताः’ सँ होएत छैक – ई बात शास्त्र आ पुराण सेहो सिद्ध कयने अछि। तैँ हम ई मानैत छी जे उगना बस एकटा प्रिय सेवक केर रूप मे वैह निम्न वर्गक जनसमुदाय सँ विद्यापतिक सेवा मे हाजिर भेल छल। ओकर सेवा आ स्वामी प्रति समर्पण सँ विद्यापति बहुत गद्गद् छलाह। हुनकर धर्मपत्नी जहिया ओहि उगना पर खोरनाठ सँ मारय दौड़लीह – अथवा ओकर तिरस्कार कयलीह, तहिया सँ उगना विद्यापति केँ छोड़ि तेना विलोपित भऽ गेल जे महाकवि हाक्रोश पारि कानैत रहि गेलाह – लेकिन ओ घुरिकय नहि आयल। आब विद्यापतिक हाक्रोश पारि कानब हमर कल्पना केँ गलत सिद्ध कय रहल अछि। जखन हम स्वयं विद्यापति प्रति पूर्ण आस्था आ विश्वास सँ भरल छी त हम अपन कल्पना जे उगना मात्र एकटा साधारण सेवक छल ई गलत मानि विद्यापतिक हाक्रोश पारि कानबाक संग-संग हमोढकार भऽ कानय लागल छी, हमहूँ ताकय लागल छी….
 
उगना रे मोर कतय गेलाह…. कतय गेला सिव किदहु भेलाह…
भांग नहि बटुआ रुसि बैसलाह…. जोहि हेरि आनि देल हँसि उठलाह….
जे मोरा कहता उगना उदेस…. ताहि देबओं कर कंगना ओ भेस
नन्दन वन बीच भेटला महेस…. गौरी मन हरखित मेटला कलेस
भन विद्यापति उगना सौं काज…. नहि हितकर मोरा त्रिभुवन राज
 
हम एक-एक पाँति केँ तेना मगन भऽ मनन करल लागल छी – मानू जेना हमर अभीष्ट महादेव सच मे हेरा गेल छथि। देखू न! भांग नहि भेटल तैँ ओ रुसि रहलाह… कतहु सँ ताकि कय व्यवस्था कय देल त हँसय लगलाह। आह! केहेन दृश्य छैक। महाकवि अपन सेवक केर सेवा मे लागल छथि। अन्तर्ज्ञान सँ भरल छथि। कतय उगना सेवक, विद्यापति स्वामी – मुदा स्वामी केर भीतर केहेन सोच छल सेवक उगना प्रति जे भांग नहि भेटल त उगना मन्हुआयल अछि, जतय-ततय सँ ताकिकय आनि देल आ कहल कि ले उगना, रगड़, अपनो ले, हमरो दे! कविक छटपटाहट आ विलाप केर विलक्षण स्वरूप त देखू – जे मोरा कहता… कियो कहू जे हमर उगना कतय अछि, हमरा पास जे अछि से अहाँ केँ दय देब। ताकि रहला अछि विद्यापति अपन ओहि सेवक केँ साक्षात् महादेव केर रूप मे। तकैत-तकैत मोन पाड़ैत कहैत छथि जे उगना हुनका बाबा बैद्यनाथक निवास-स्थल नन्दन वन मे भेटलखिन, स्वयं गौरी प्रसन्न छलीह ताहि सँ हुनका ओ भेटल छलखिन आर भेटिते हुनकर जतेक कलेस छलन्हि सभ हरण भऽ गेल छलन्हि। आर आखिर मे विलाप करिते दुनियादारी सँ कोनो काज नहि, राजपाट सेहो कोनो काजक नहि, सिर्फ उगना टा सँ काज अछि। हे जनमानस! बताउ, कतय छथि ओ! हम क्रान्तिपुरुष विद्यापतिक एहि असीम भक्तिभावना मे तेना डूबि जाएत छी जे एतय स्वामी-सेवक केर तादात्म्य सेहो बिसरा जाएत अछि। हमरा विद्यापति आ उगना एकाकार भाव मे दर्शन दय कृतार्थ करैत छथि। हम आब विद्यापति-उगना केँ एक्के संग ताकि रहल छी, तकैत रहब, देखैत रहब, ओ भेटैत रहता, हृदय मे विराजैत रहता। ॐ तत्सत्!!
 
हरिः हरः!!