विदेहराज जनक केर सर्वोत्तम शिक्षाः शुकदेवजी केँ तत्त्वोपदेश

नवरात्रक छठम् दिनः आजुक प्रसाद विदेहराज जनकजीक तत्त्वोपदेश
 
विदित हो जे व्यासपुत्र शुकदेवजीक जन्म विशेष परिस्थिति मे भेलनि आर ओ गार्हस्थ जीवन सँ अलग पूर्ण संन्यास जीवन मे रहबाक मानसिकता शुरुहे सँ बनौने छलाह। सुविज्ञ पिता द्वारा बहुतो समझेला-बुझेलापर ओ गार्हस्थ जीवन सँ जुड़ल शिक्षा लेबाक लेल तत्कालीन महान सिद्ध-प्रसिद्ध शिक्षक विदेहराज जनक समीप पठौलनि आर जनकजी हुनका जाहि तरहें तत्त्वोपदेश देलखिन ताहि सँ सन्तुष्ट भऽ शुकदेवजी गार्हस्थ जीवन मे प्रवेश करैत छथि आर समय एला पर संन्यास धर्म सेहो पालन करैत छथि। आइ मनन करैत छी जे ओहि तत्त्वोपदेश मे कतेक रास गूढ बात सब छैकः
 
इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद।
अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकशः॥
 
हे मानद (शुकदेवजी)! इन्द्रिय बहुत बलवान् होएत छैक, ओ वश मे नहि रहैत छैक। ओ अपरिपक्व बुद्धिवाला मनुष्यक मोन मे नाना प्रकार विकार उत्पन्न कय दैत अछि।
 
भोजनेच्छा सुखेच्छां च शय्येच्छामात्मजस्य च।
यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥
 
जँ मनुष्यक मोन मे भोजनक, शयनक, सुखक आ पुत्रक इच्छा बनल रहय त ओ संन्यासी भइयो कय एहि विकार सभक उपस्थित भेलापर कि कय पाओत?
 
दुर्जरं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।
अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत॥
 
वासनाक जाल बड कठिन होएत छैक, ओ अहिना (बड जल्दी) मेटाइत नहि छैक। तैँ ओकर शान्तिक लेल मनुष्य केँ क्रम सँ ओकर त्याग करबाक चाही।
 
ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।
परिव्रज्य परिभ्रष्टो न मार्गं लभते पुनः॥
 
ऊँच स्थान पर सुतयवाला मनुक्खे नीचाँ खसैत अछि, नीचाँ सुतयवाला कहियो खसैछ। जँ संन्यास-ग्रहण कय लेलाक बाद कियो भ्रष्ट भऽ जाय त फेरो ओ कोनो दोसर मार्ग नहि प्राप्त कय सकैत अछि।
 
मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।
अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥
 
मोन बहुत प्रबल अछि; ई अजितेन्द्रिय पुरुष लोकनि द्वारा सर्वथा अजेय अछि। ताहि हेतु आश्रमक अनुक्रम सँ टा क्रमशः एकरा जीतबाक प्रयन्त करबाक चाही।
 
गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।
न च हृष्येन्न च तपोल्लाभालाभे समो भवेत्॥
 
गृहस्थ आश्रम मे रहितो जे शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होएत अछि, ओ नहि त प्रसन्न होएत अछि आ नहिये खेद करैत अछि। ओ हानि-लाभ मे समान भाव रखैत अछि।
 
विहतं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।
आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संश्यः॥
 
जे पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करैत सब प्रकारक चिन्ता आदि सँ मुक्त रहैत आत्मचिन्तन सँ सन्तुष्ट रहैत अछि, ओ निःसन्देह मुक्त भऽ जाएत अछि।
 
आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन।
स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निञ्जनः॥
 
आत्मा अनुमानगम्य अछि आर कहियो प्रत्यक्ष नहि होएत अछि। एहेन स्थिति मे हे ब्रह्मन्! ओ निरंजन आ निर्विकार आत्मा भले बन्धन मे कोना पड़ि सकैत अछि?
 
मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारण द्विज।
जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम्॥
 
हे द्विज! मनहि टा महान् सुख-दुःखक कारण थिक, एकरे निर्मल भेला सऽ सब किछु निर्मल भऽ जाएत अछि।
 
भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः।
निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम्॥
 
सब तीर्थ आदि मे घुमैत ओतय बेर-बेर स्नान केलाक बादो जँ मोन निर्मल नहि भेल त ओ सब व्यर्थ भऽ जाएत अछि।
 
न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः॥
 
हे परन्तप! बन्धन तथा मोक्ष कारण नहि ई देह थिक, नहिये जीवात्मा थिक आर नहिये ई इन्द्रिय सब थिक। अपितु ई मोन मात्र मनुष्यक बन्धन आ मुक्तिक कारण थिक।
 
शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित्।
बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति॥
 
आत्मा तऽ सदिखन शुद्ध आ मुक्त अछि, ई कखनहि बन्धन मे नहि पड़ैत अछि। अतः बन्धन आ मोक्ष तऽ मोनक भीत मे अछि, मोनहि केर शान्ति सँ शान्ति होएछ।
 
शत्रुर्मित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः।
एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात्॥
 
शत्रुता, मित्रता या उदासीनताक सब भेद-भाव सेहो मनहि टा मे रहैत अछि। ताहि सँ एकात्मभाव भेलापर ई भेद-भाव नहि रहैछ; ई केवल द्वैतभाव सँ मात्र उत्पन्न होएत छैक।
 
जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा।
भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते॥
 
“हम जीव सदिखन ब्रह्म टा थिकहुँ’ – एहि विषय मे आरो विचार करबाक जरुरते नहि छैक। भेदबुद्धि त संसार मे आसक्त रहले टा पर होएत छैक।
 
अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम्।
विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः॥
 
हे महाभाग! बन्धन केर मुख्य कारण अविद्या टा छी। एहि अविद्या केँ दूर करयवाली विद्या थिक। ताहि सँ ज्ञानी पुरुष केँ चाही जे ओ सदिखन विद्या तथा अविद्याक अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन कयल करैय।
 
धर्मनाशे विनष्टः स्याद्वर्णाचारोऽतिवर्तितः।
अतो वेदप्रदिष्टेन मार्गेण गच्छतां शुभम्॥
 
धर्मक नष्टा भऽ गेलापर सब किछु नष्ट भऽ जाएत छैक आर सब वर्ण सभक आचार-परम्पराक उल्लंघन भऽ जेतैक। ताहि सँ वेदोपदिष्ट मार्गपर चलनिहारक कल्याण होएत छैक।
 
– श्रीमद्देवीभागवत
 
हमरा बाजय लेल किछु नहि रहि गेल अछि। हम मिथिलाक ओहि स्थल पर वर्तमान जीवन मे छी जतय जनक समान अत्यन्त उच्च मूल्यक तत्त्वोपदेश सँ हमरा सब केँ पूर्वहि जन्म सँ सिद्ध कयने छथि। तेकर बादो यदि कतहु तत्त्व सँ बिपरीत – वेदोपदिष्ट मार्ग सँ हँटिकय चलैत छी तऽ बुझू जे ‘मोनरूपी मालिक केर गुलाम’ छी। 🙂
 
Here I want to recall – even the western poet John Bunyan – just remember his famous poem ‘He That Is Down Needs Fear No Fall’.
 
He that is down needs fear no fall,
He that is low no pride;
He that is humble ever shall
Have God to be his guide.
 
I am content with what I have,
Little be it or much;
And, Lord, contentment still I crave
Because Thou savest such.
 
Fulness to such a burden is
That go in pilgrimage;
Here little and hereafter bliss
Is best from all to age.
 
John Bunyan
 
Ponder O Pravin! Contemplate on great teachings! Salutation to all our teachers – elders and of course our own parents who teach us lessons to learn and live life successfully.
 
हरिः हरः!!