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गाम मोन पड़ैयऽ

167 भ्यूज

कविता

– डा. धनाकर ठाकुर

ranchi9

सुग्गा, मैना, गीदड़, गदहा, सपनौर
सांप, खिखिर, चील, घोरन, चुट्टी
पर लिखैत चलू जीवन भरि
कहियो ने होयत बाबू कैलाश छुट्टी
छोडि देलक जे समाज सामा पौतीके
आबहुँ समय निकालू कैलाश
दिय संभारि पोथीमे पोती के
मैथिलीपुत्र कैलाश जागू
लिय कलम बिना मोसि के
अधुना कियो नहि बुझथि
मर्म दादीक ठेकी के
की छल हमर मिथिला क
बाडी झाडी घास पथार
नीलकंठ स यात्रा शुभ होइत
जुआयल युवकक नरहिया शिकार
हत्था, खरहोडि किछु ने बांचल
सीसबोनी गेल सुखाय
हम मैथिल परदेशी पेटक मारल
की आब पायब सुपकगोपी सिन्दुरिया
सुग्गा क मारल लोल
ओ लताम भीतर स लाल,
कांटहु ने बांटहुं भेल जिलेबिया

बकैन दूध व खिरसा की बुझत
बोतलिया पिंकी, रिंकी
कैलाश जागू अहाँ बताउ बुच्चीकेँ
केहेन मखान क काँट
लावा फूटय मोनेमन जखन
करू ओढहाक ब्यौंत
गर्मी छुट्टी गाम जाई त
खाइत छलहुँ हम खेरही क सन्ना
सन्नाटा आब पसरि गेल अछि
काकी कियो बचलीह, भौजी करथि आश
बौआ औताह, कुम्हरौडी ल जेताह
तारक कदीमा, खेतर परोड की हम आब पायब
गाछी बिरथी विसरि गेल छी
विसरलहुँ अप्पन खरही
बिसरल विदेसर, बिसरल कुशेशर
टूर हम खूब करैत छी
नेना भुटका शहरी बच्चा
दादी के नहि बुझैत अछि
खिस्सा पिहानी ओ नहि सुनत
जे हम सुनने छी
यौ कैलाश हमहुँ बाहरी
लेकिन गाम मोन पडैया
पोखरि झाखरि, बाध बोनि सब याद पडैया
विकसित भेलहुँ हमसब की
हुनकासभके विसरय लै
जे पेट काटि हमरह्ं  बापहिंके
शहर पठा बाबू बनौलथि
हुनकहि की हम बिसरि जाइ
कय अन्तिम प्रणाम माँ मिथिलहिकें

 

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