संकलन
– ब्रजेश मिश्र
अपन विद्वता आओर रचना सँ मिथिलाक गरिमा चारि चान लगौलैन कवि चूड़ामणि काशीकांत मिश्र “मधुप” । पं.कविचूड़ामणि कशिकांत मिश्र ‘मधुप’, कोर्थू, दरभंगा, जीवनकालः १९०७ -१९८७। बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन
शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि!
सविषाद हासमे चन्द्रमाक
ओ घसल अठन्नी बाजि उठल:
हम कत’ जाउ
अवलम्ब पाउ
के शरण?
घसल जनिकर अदृष्टि!
*२. छुतहर*
अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप ?
मृत्तिका एक एके कुम्हार,
ओ दण्ड चक्र चीवर सम्हार।
आकार एक क्यों मंगल घट,
गौबरौड़ बनल हम सही ताप।।
जाहि मृगनयनिक कटि माथ उपर,
घुमलहुँ कतेक दिन रसनिर्झर।
से देखि दूर कहि दूर जाथि,
नहि जानि देल के एहन शाप ?
जे कुकुरौं कैं सुतधि पलंग,
पी मद्य विलोचन करथि रंग।
से देखि हमर मुख करथि घृणा;
दुर्भाग्यक पड़ि गेल केहन छाप ?
चढ़ि चाक प्रदक्षिण हरिक कएल,
आवामे तनकें हवन कएल।
फल तकर केहन विपरीत भेल,
झूठे थिक सबटा योग-जाप।।
घट-घटमे वासी ब्रह्म एक,
हो भान अविद्यासँ अनेक।
बुझितहुँ वेदान्ती हमर वारि।
अपवित्र कहथि क’ क’ प्रलाप।।
हो सदिखन संसारक सुधार,
पतितौक बनथि क्यो कर्णधार।
धैर्य निधिकेँ, हरिणीकेँ आँखि, कल्पना सहृदय कवि केँ देल
भाव भंगी रमणीकेँ, शान्ति मन्त्र गान्धीजीकेँ दए देल
मातृभूमिक नामेँ मरिजाइ मदनमोहन ओ भगत, गणेश-
लाजपति रौशन रामप्रसाद वीर बटुकेश्वर केँ आदेश
देल अपने जपि क्रान्तित्क मन्त्र, पैरकेँ पटकि करथि भूकम्प
उठा कौखन दारुण तूफान जलधिमे मचा देल हड़कम्प
गरजि कौरखन कए बिजुलिक व्याज मूसलाधार बारि बरिसाय
भसाबथि देशक देश अनन्त सुनाबथि हाय पिता! हा माय!
दृश्य चीनीक गढ़क अछि पस्त, देखावथि जे कयलक जापान
जारशाही अछि मटियामेट करै छल जे मनुष्य बलिदान
दिवाला अवसेनियाँक भेल जकर ठोकै छल बहुतो पीठ
घमण्डे सदिखन-जे छल चूर देखाबाथि, से देखबइ अछि पीठ
कोन गनती ई सब, ब्रह्माण्ड अखण्डक छथि करैत ई नाश
सृजन पालन लय हिनके हाथ, सुरासुर नर हिनके अछि दास
हिनक चरणाम्बुजकेँ हम वन्दि मङइ छी हाथ दुहूकेँ जोड़ि
तते माँ! शक्ति दिअऽ जे पारतन्त्र्य बेड़ीकेँ दी हम तोड़ि
विजय हो क्रान्तिक भारतमाँक, विजय हो साम्यवाद हो घोष
विजय हो उच्च हिमालयगिरिक उग्र हो हिन्द निवासिक रोष
अरब निधिमे बीचीक मृदंग हर्षसँ बाजओ, उठओ तुफान
हिन्द सागरमे खाड़ी बंग सुनाबथु निज कल्लोलक गान
शस्य सम्पन्न हमर हो देश, होइ हम रणदीक्षा निष्णात
देखि मम ज्ञान तथा विज्ञान, विपक्षिक काँपय थरथर गात
विश्व पुनि हिन्दक सुनिकेँ नाम, करए स्वप्नहु मे हाहाकार
आत्मबल देखि अचिन्त्य अनन्त पैरपर नमवय शिर संसार
चरणध्वनिसँ डगमग हो भूमि, त्यागसँ विश्व विपिन छकिजाथु
एक सत्याग्रह देखि अपूर्व मुग्ध भय रिपुओतक झुकिजाथु
करी स्वातन्त्र्यक निशिदिन गान अन्तमे ‘मधुप’ रहल छथि माङि
विजय सूचक भारत केर ध्वजा हिमालय गिरिपर दी हम टाङि।

3 Comments
अंत में —-
शिशु संगहि बुचनिक मुक्त सृष्टि !
सविषाद हास मे चन्द्रमाक
ओ घसल अठन्नी बाजि उठल
हम कतय जाउ, अवलम्ब पाउ
के शरण घसल जनिकर अदृष्ट ?
बहुत सुन्दर
ई कविता हम जखन मैट्रिक में पढ़ैत छलहुँ तखने पढ़ने छलहुँ..ई सन 70 ई.गप्प..एतेक दिनक बाद कवि शिरोमणि “मधुप जी”क कविता पढ़ि मन गदगद भs गेल।अखनहुँ ई कविता प्रासंगिक अछि।