भोज मे आगू, रण मे पाछू मैथिल जनमानस

‘भोज में आगू , रण में पाछू’ रहब

– बी एन झा, वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी, मधुबनी, मिथिला

bn jhaभोज में आगू, रण में पाछू रहब, एकर भावार्थ भेल ‘लाभ में आगाँ, संघर्ष में पाछाँ’ रहब । कहल जैत अछि जे जाति या समुदाय जेहन दर्शन में विश्वास राखैत अछि ओहने ओकर स्वभाव बनि जैत छैक । आचरण के संग-संग साहित्य सेहो तेहने बनि जैत छैक । मैथिल समुदाय में पीढ़ी दर पीढ़ी स आबि रहल ई विनाशकारी शिक्षा तेहन भयावह स्थिति उत्पन्न क देने अछि जे आइ तक मैथिल अस्मिताक ओहेन निर्माण नहिं भऽ सकल जेहेन बंगाली, असमिया, गुजराती सिन्धी आ उड़िया आदि केर भेलैक अछि । आजादी के लगभग 70 वर्षक बादो जे मिथिला क्षेत्रक एहन दीन – हीन अवस्था बनल अछि ताहि में बहुत अधिक योगदान एहि महामंत्र केर छैक ।

….आखिर हमरा सब के रणसँ एतेक परहेज कियैक ? की हमरा लोकनि जैनी समाज जकाँ अहिंसक समाज छी ? आ की बौद्ध जकाँ ‘अहिंसा परमो धर्मः’ केर बाट पर चलनिहार समाज ? हम सब त काली, दुर्गा, राम, कृष्णक उपासक छी जे ओ लोकनि रण में अपन पराक्रम सं विपक्षी केँ समूल नष्ट कऽ देलनि, तखन हम सब कुन स्तर के भक्त छी जे अपन इष्ट देव केर देखायल गेल बाट पर चलय सँ डेरायत छी | की ! आब सिर्फ कहै लेल रहि गेल अछि ‘महाजनो गतः येन सः पन्था’ व्यवहार लेल नहिं……..??

मैथिल अस्मिताक रक्षार्थ, पुरुषार्थ देखाबय के समय आबि गेल अछि …. जय हो!!