आत्मसमीक्षा
एखनहि मैथिली तथा हिन्दी साहित्यक प्रसिद्ध व्यक्तित्व आर हमरा लोकनिक आदर्श श्री प्रदीप बिहारी द्वारा लिखल गेल किछु मर्मस्पर्शी बात पढबाक अवसर भेटल। इच्छा भेल जे हुनकर ओ बात अहाँ सबकेँ सेहो पढाबी आर तखन शुरु करी एकटा आत्मसमीक्षा।
विषय शीर्षक मे लिखल अछि। मिथिलाक लोकसंस्कृति पर खतरा सुस्पष्ट ढंग सँ देखल जा रहल अछि। कतेको रास परिवर्तन देखब हमरा लोकनिक भाग्य-दुर्भाग्य जे कहू मुदा देखय लेल भेटि रहल अछि। एहि मे एकटा अछि विवाहक अवसर पर बरियाती आब दु-सांझ सँ एक-सांझ मे परिवर्तित भऽ गेल अछि। ई परिवर्तन अनबाक लेल पंचायत वा गाम स्तर पर जुर्माना व्यवस्था करैत लोक सब पर थोपल गेल, वा एना कही जे बरियातीक स्वागत मे आडंबर केँ दूर करबाक लेल ई क्रान्ति आनल गेल। कहैत छैक न ‘फतवा’ – बिल्कुल ताहि तर्ज पर फरमान जारी करैत समाजक हर व्यक्ति सँ कहल गेल जे विवाह पर बरियातीक स्वागत एक सांझ सँ दोसर सांझ नहि कय सकैत छी, एहि सँ समाजिक व्यवहार मे कूरीतिक प्रसार आ अपव्यय सँ पूँजीक नोकसानी भऽ रहल अछि। जाहि परिवार मे वैवाहिक संबंध बनि रहल अछि ताहि ठाम आब समांगक संख्या घटि गेल अछि, लोक बहरिया बनि गेल अछि, छुट्टीक अभाव, आदि अनेक कारण देखायल गेल। स्वागत एक सांझ मे हो, भले बरियातीक संख्या पहिने जेकाँ ११-२१ नहि बल्कि १००-२००-५०० जतेक भी हो। बरियातीक संग-संग सरियातीक भोज सेहो आब शुरु भऽ गेल अछि। विवाहक आनन्द आब एक्कहि दिन मे समाप्त भऽ जाएत अछि। दोसर दिन बियाहक घर मे मरहन्ना सन बुझाइत अछि। नीक-बेजाय – सब बातक समीक्षा हम सब अपन निजी अनुभव सँ कय सकैत छी। तऽ आउ, देखी जे प्रदीप बिहारी अपन भावना सँ कि संवाद देबय लेल चाहैत छथि। एकरा ऊपर अपन प्रतिक्रिया हम अहाँ कोना देबः
“अंतरगक अगिला अंक लेल मिथिलाक लोक संस्कृति पर जीवकान्तक इंटरव्यूक प्रूफ देखैत छलहुँ । माइक सँ डहकनक स्वर कानमे आयल । ताहि क्रममे कतोक गीत सभ। …समधि अयला बनि-ठनि क’, धोती-कुरता पहीरि क’, अयला ….बेटा के बियाह मे…। फेर, स्वागत मे गाली सुनाओ, सुनाओ मेरी सखिया ….। आदि आदि ।
मोन पड़ल बरियात । पहिने बरियात जाइ, तँ मरजाद (भतखै) मे एहिना स्त्रीगण सभ गीत सुनबैत रहैत छलीह। घंटोक घंटा धरि भोजन होइत रहैत छल । भाँति-भाँतिक गारि समधि कें पढल जाइत छल । खूब विनोद होअय । आइ सभटा मोन पड़’ लागल ।
हमर दुनू पुत्रक बियाह भ’ गेलनि अछि । मुदा एकहु बेर एहन गीत सुनबाक अवसर नहि भेटि सकल । जहिया सँ एकसंझाक चलनसारि भेलैए, बरियातक आनन्दे चौपट भ’ गेलैए ।
हमर जेठ पुत्रक बियाह मिथिले मे भेल छनि । आइ सोचैत छी जे ई “एकसंझा” हमरा माथ पर किएक सवार भ’ गेल रहय? छोट पुत्रक बियाह मिथिला मे नहि छनि।
जानि नहि किएक, समधिक रूपमे आइ बेर-बेर ई गीत सभ सुनबाक मोन होइए।
भातिज, बटुक, एखनि सतमे कक्षा मे छथि। हुनक बियाह धरि समय कते ससरि गेल रहतैक, से के जानय?
बन्धुलोकनि! जँ अपनेलोकनि कें एहन अवसर बाँचल अछि, तँ तकर आनन्द लेबा मे हुसि ने जायब।
स्त्रीगण द्वारा गाओल जा रहल डहकनक सामूहिक स्वर एखनो हमरा कानमे आबि रहल अछि ।”
उपरोक्त कथन पर अपन विचार अपना केँ तऽ सुनेबे करब, कृपया कमेन्ट बक्सा मे सेहो लिखब। जाहि सँ मिथिलाक लोकसंस्कृतिक नीक व बेजाय केर ज्ञान चौतरफा प्रसार होय।
अपन विचार हम संछेप मे एतबे कहब जे जाहि सँ मानवताक महत्व कायम रहय से काज करू। समाज मे एहेन नियम नहि बनाउ जे मानवीय मूल्यक अवमूल्यन हो। पुरखा द्वारा बनायल नियम केर महत्व केँ समुचित आत्मसमीक्षाक संग आत्मसात केने बिना कोनो नव नियम जबरदस्ती थोपब उचित बात नहि।
पहिने बरियातीक संख्या कम होएत छल। सवारी-साधन सेहो कम छल। दूर सँ बरियाती अबैत छल। रहबाक यानि आराम करबाक समुचित जोगारक आवश्यकता छल। किछु सांस्कृतिक व्यवहार जेना सोहाग देनाय, नव दूलहिनक मुंह देखनाइ, मर्जादक भोजन केनाय, स्त्रीगण समाज सँ गारि सुनैत नवनिर्मित संबंध केँ मिठास सँ भरनाय – सब बात केर अपन औचित्य छल। कालान्तर मे एहि सब मे परिवर्तन आयल। विवाह दूर-दूर केर कुटुम्ब केर अपेक्षा नजदीके मे होमय लागल। शहरी परिवेश मे कार्य संपन्न होमय लागल। प्रवासक मारि पड़ल। बहुत कारण सँ एक-संझू बनाओल गेल। एकरो अपन औचित्य छैक। मुदा किनको यदि इच्छा ई छन्हि जे हम दू-संझू करैत कनेक समारोह केँ आरो रंगीन बनाबी, तिनका रोकबाक नियम उचित नहि बुझैछ।
एहि सन्दर्भ मे हमरा लोकनिक समकालीन आसुकवि विजय झा जेट एयरवेज एकटा मर्मस्पर्शी संदेश लिखैत छथिः
“अहि बेरका दरभंगा आ मधुबनी भ्रमण बहुत किछु देखा रहल अछि धरातलक आधुनिक मिथिला अपन नव स्वरुप लय तैयार अछि, चाहे विद्यापति समारोह हुए वा की बर बरियाती हो, जतय विद्यापति समारोह दरभंगा मे विशिष्ट दर्शक दीर्घा सँ नशा मे मतल किछु अधवयसु केँ अभद्रताक सब सीमा नाँघइत देखलहुँ, प्रतिभागी महिला नृत्यांगना पर दुर्गन्धित अभद्र भाषाक प्रहार देखलहुँ, ओतहि बरियाती मे मिथिलाक कौलिक परंपरा पर पंजाबक सांस्कृतिक वर्चस्य देखलहुँ, दहीक जगह रायताक प्रयोग, बदामक दालि केर जगह राजमा, तरुआ केर स्थान पर मटन सिक कबाब केर अतिक्रमण देखलहुँ।
सोच नकारात्मक नहि थीक, समय परिवर्तनशील अछि। परिवर्तन हेबे टा करत। लेकिन दिशाविहीन यद्यपि अपना पर दोसर संस्कृति हावी हुअय ई चिंतनीय!
प्रशंशाक पात्र ओ गायक सब छलाह जे अपन सुमधुर कंठ मे एखनहु माँ मैथिली केँ जियेने छथि।
बाराती मे ओ ३१ टा पारम्परिक संस्कार केर पक्षधर पाग आ धोती दोपटा केर मान रखने रहथि। संख्या निसंदेह पहिले सँ बढियां, किछु बुझायल, मोन पडल शाब्दिक मोनक दशा व्यक्त करैत अछिः
१. पाइन मे पनबट्टा हेलैत अछि चोर सब तकैत अछि
२. खंड खंड करू तरुआरी तैयो न काटल जाय सुपारी
३. अस्सी कोसक पोखरी अस्सी लोक नहाथि !
४. बज्जर खसे ओहि पोखैर सँ पंछी पियासल जाइथ”
उपरोक्त दुइ व्यक्तित्वक विचारक संग अपन संछिप्त भावना पाठक वर्ग लेल रखने छी। समीक्षा सब कियो करय जाउ। फोटो टटके-टटकी दरिभंगा सँ राजेश झा – मिथिला राज्य निर्माण सेनाक पूर्व अध्यक्षीय पीठ सदस्य पठौने छथि। हुनकर विचार सेहो आयल अछि। एकरा पुनः दोसर समाद मे संप्रेषण करब।
– संपादक
हरिः हरः!!

2 Comments
मिथिलाक लोककला मे उपर वर्णित विषयक अतिरिक्त बहुत किछु छैक जे लुप्त भs गेल अथवा तेहनाहे सन अछि।
अभद्र व्यवहारक प्रसंग हमरा किछु नहि कहबाक अछि, लोक ताड़ी दाड़ू पहिनहु पीबैत छल आ अभद्र व्यवहार करैत छल। पिहकारी पहिनहु मारैत छलैक लोक, आब तथाकथित ‘नीक’ लोक सेहो करैत छथि। निन्दनीय, मुदा एकर निराकरण की से नहि बूझल अछि।
बरियातीक सम्बन्ध मे किछु कहि रहल छी। समाज मे परिवर्तन होइते रहैत छैक। हमर पिताजी जाहि बरियातीक वर्णन करैत छलाह ताहि मे भोर मे लोक कें जलपान लेल केरा केसौर भेटैत छलैक। हम सब जे बरियाती पहिने देखने छी ताहि मे जलपानो बेजा भोजने होइत छलैक, आ स्वजन भोजन रातिए मे, मांसक संग।
आब एकदिना मे सब किछु मिज्झर रहैत छैक। आब लॊक बरियाती नहि जाइत अछि, भोज खाइ लेल जाइत अछि। हम किछु मास पूर्व एकटा एहने बरियाती गेलहु, जाहि कुर्सी पर बैसलहु, ताही पर बैसल बैसल, फल, ठंढा पेय, गरम पेय, बिगची (दू तीन किलोक पैकेट), आ अन्त मे भोजन सेहो केलहु। एको क्षणक लेल उठबाक अवसर नहि भेटल। विवाह कतए भेलैक सेहो बुझबाक अवसर नहि आएल। कन्या सेहो नहि देखल। भोजनक बाद कियो ककरो पुछबो नहि केलकै, सब अपन अपन गाड़ीक खोज मे लागल जे कतेक जल्दी गाम आपस चलि जाइ। कतेक बरियाती दही बिनु खेनहि उठि गेलाह। कोनो अनुशासन नहि।
डहकन सूनब जरूर नीक लगैत छलैक मुदा आब दुइयो दिन रहबैक तs डहकन के सुनाओत ? हॅं, यदि कैसेट बनल होइ तs दोसर बात।
यदि एक सौ बरियाती दू दिन रहबैक तs कि अपन अपन टेन्ट आ होल्डौल सेहो संगहि लेने जेबैक ? तैयो यदि कन्यागत कें दू चारि कट्ठा खाली चौमास नहि होन्हि तs की करताह बेचारे ? कतए खसाएब टेन्ट ?
लोक कला ल्कोक संस्क्रिति कें बचा लए राखब जरूरी मुदा समय पाछू नहि जेतैक। ओहइ लेल नव उपाय करए पड़त। सब देश मे सब समाज मे प्रथा बदलितहि रहलैक अछि, पुरना बात कें म्यूजियमे मे राखल जाएत, कैसेट/सीडी मे राखल जाएत, फिल्म मे राखल जाएत। ततबे।
दोसर उपाय अछि यदि नवतुरिया कें जगाओल जाए, तs फेर ओएह सब रीति कें बदलि सकत। पचास साठिक उपर हमरा सब मात्र भूत कें सोचि दुखित भs सकैत छी, परिवर्तन आनल पार नहि लागत।
ककरा कहबैक बौआ, सूट नहि पहिर, धोती पहिरि कए चल विवाह करए ? आ से एके बेर बियाह दिन ? पहिने कहियो धोती पहिरेलियैक नहि, आ बियाहक दिन धोती पहिरत कोना हेतै से ? हॅं होइत छैक जे सूट पहिर कए जाइत अछि वर, वेदी पर मात्र कहुना धोती लपेटने रहल आ कर्म समाप्त होइतहि फेर सूत पहिर लेलक।
बहुत किछु छैक जे हम सब बिनु सोचने बुझने छोड़ैत गेलियैक अछि, जह्खन परिवर्तन बहुत देखार भs गेल तखन खराप लागि रहल अछि।
हमरा सब कें दिल्लीक सभ्यता सेहो खूब आतंकित केलक अछि आ फेर सिनेमक सीन सब। नवतुरिया जएह देखतैक सएह ने सिखतैक।
ई हमर निजी विचार अछि।
आभार श्रीमान्! यैह विचार सब हम सब निरंतर पबैत रही। बहुत नीक लागल अपनेक ठोकल-ठठायल बात पढिकय। बहुत रास धन्यवाद।