मैथिली कथा: भीखमंग

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यथार्थ कथा

– प्रवीण नारायण चौधरी

981देखय-सुनयमें ओ केकरो सऽ खराब नहि कहल जा सकैत छल आ नहिये खराब छलैक विचार, सदा-सदा लेल अपन भागक खेनाय सेहो दोसरे बच्चाकेँ खुवाबय के इच्छा रखनिहार गुलटेनमा गाम भरि प्रसिद्ध छल आ सब कियो ओकरा दुलार करैत छलैक, स्नेह भरल दृष्टिसँ देखैत छलैक आ ओकर माय-बापकेँ कहैत छलैक जे गुलटेनमा पैढ-लिख बडका लोक बनत कारण एकरामें कुशाग्रताक संग मानव-प्रेम छलैक रहल छैक। गुलटेनमा विद्यालयमे सेहो सभ मास्टरसाहेब लोकनिक दुलरुआ छात्र छल। एक गिलास पाइन धरि ओ सभकेँ पियेबे टा करैत छल। ‘गुलटेन आइ हमरा नजैरो नहि पडलें’ – कहितो गुलटेन-सेवावञ्चित मास्टरसाहेब मसका मारैतो गुलटेनमाक ओ जीवन्त मुस्कान देखिये साइकिल चलबैत मने-मन गुलटेनमाक ओजकेँ स्मृतिमे रखैत गुनधुनाइत कखन गाम पहुँचि जाइत छलाह सेहो धरि पता नहि चलैत छलन्हि। सेवा तऽ जे-से पढाइमे देल किनको गृहकार्य सेहो नहि छोडैत छल गुलटेन आ कक्षामे नीक स्थान सेहो छलैक ओकर। हर तरहें मानू जे गुलटेनमा गामक हीरो छल।

मैट्रीक फर्स्ट डिविजन सऽ पास केलक आ तेकर बाद बाप लग पूँजी नहि रहबाक चलते ओ बडका काका के जेठका बेटा खुरचनमा संगे फरीदाबाद चैल गेल। खुरचनमा एगो प्राइवेट कंपनीमे पहिले तऽ पाइन पियेनाय आ फाइल सरियेनाय के काज करैत छल – मुदा मिथिलाक माइट-पाइन कहाँ केकरो फोर्थ ग्रेडमें बेसी दिन रहय दैत छैक, से ओकरो कुशाग्रताक कारणे आब ओ डेटाबेस मेन्टेनर बनि गेल छल। मालिक डीबिए (डेटाबेस एसोशियेट) के छूट्री करैत अपने साहेबक कुर्सीपर खुरचनमाके नौकरी दऽ देलकैक मुदा पाइ (तनखा) में कोनो खास बढोत्तरी नहि केने छलैक से कोहुना-कोहुना खुरचनमा अपन आ परिवारक रोजी-रोटी चलबैत छल आ फरीदाबादक कोनो झुग्गी एरियामें गुजारा करैत छल। गुलटेनमा सऽ खुरचनमा कहलकैक जे ‘बौआ चले! तोरो कोनो काज अपने कंपनीमे लगा दैत छियौक मालिक सऽ कहि कय। किछु पाइ देतौक तही सऽ खेनाय-पढनाय-रहनाय आ काकाकेँ गाम पठेनाय सबटा भऽ जेतौक।’ गुलटेनमा कहलकैक ठीक आ गेलापर गुलटेनमाकेँ सेहो नया गौँवाँ-गँवार बुझि हाकिम साहेब खुरचनमावाला काज दऽ देलकैक। बाहर कोना काज भेटैत छैक आ केना-केना लोक गुजर करैत अछि एहि सभ लेल गुलटेनमाक गामवला बुद्धि एखन ठीक सऽ टुनिंग नहि पकडने रहैक, मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी… ओ काज धऽ लेलक लेकिन ओकरा भीतर सऽ नीक नहि लगैत रहैक।

एक दिन एगो चौराहा पर गाडीक लंबा लाइन देखलक आ किछु लोक ट्राफिक बत्ती लाल होइते गाडी रुकला पर ओम्हर दौडैत छल आ विभिन्न तरहक कार्य करैत लोक सब सँ पैसा पबैत छल। ओकरा समझमें नहि एलैक पूरा बात, एगो छौडा सऽ पूछलकै तऽ कहलकै “अरे बहनके ….! (दिल्लीक प्रसिद्ध जनवाणी) चल तू भी ले ये गुलाब के फूल और दौड जा उन गाडियोंमें जहाँ जोडे बैठे हों। रेड रोजकी फ्लावर्सका ही आजकल ज्यादा माँग है।” गुलटेनमा कुशाग्र बुद्धिक छल, ओ बात बुझि गेलैक जे जेना गाममे कुकूर-कुकूरनीक मौसम अबैत छैक तहिना दिल्ली आ महानगरमे जोडा-जोडी सभक मौसम छैक से ई रेड रोज इम्प्रेसन लेल डिमान्डमऽ हेतैक। ओकरा निर्णय करैत कनिको देरी नहि भेलैक, पूछलकैक “बोल कितनेका एक सलटाना है भाई?” “चल यार, मेरे को ५ का हिसाब दे देना बाकी तू जान – तेरे को कमाना है ना! चल कमा बहनके …..!” जबाब सुनिते गुलटेनमा अपन मिथिलावाला कुशाग्रताक प्रयोग करैत पहिले दिन ५०० टाका कमेलक, लगभग ५० गो रेड-रोज दिल्ली महानगरक कुकू-कुकीकेँ बेच देलक। खुरचनमाकेँ कहलकैक, “भैया हौ! हमर पढल-लिखल लोक छी। हमरा तोहर अफिसमें जे पाइन पियेनाय आ फाइल एम्हर-ओम्हर सरियाबयके नोकरी दियेलह से नीक नहि लगैत अछि।” खुरचनमा तमशाइत दमसलकैक, “चुप सार! हमहुँ जहिया आयल रही तऽ वयह काज देने छल साहेब। आब देखही जे डिबिए बनि गेल छी अनुभवपर। काज करैत रहे। जोगार नीक अपने फीट भऽ जेतौ।” लेकिन गुलटेनमाकेँ चस्का ५०० टकिया आ सेहो मात्र १ घंटामे कमेबाक अनुभूति भेट गेल छलैक आ फेर ओहो मिथिलाक माइट-पाइन आ गामक दुलरुआ हिरो बनि के आब दिल्ली आयल छल… फरीदाबादमे भैयाक पास… ओ चट दिना कहलकैक, “तोहर जमाना आब नहि छैक। हमरा सब पढल-लिखल लोक छी।” खुरचनमा सोचलक जे काल्हि ई छौंडा दिल्ली प्रवेश केलक अछि आ हमरे सिखबय लागल… लेकिन ओ कनेक थीर मोन करैत पूछलकैक, “रौ! तखन तों आर कोन काज करमें? कोनो सीए पास छहीन जे कतहु एकाउन्टेन्टके नोकरी हेतौक? मैट्रीक पास लेल…” ओकरा बीच्चेमें कटैत गुलटेनमा कहलकैक, “आब हम कोन काज करब से तूँ चिन्ता नहि करह। ई तऽ महासागर थिकैक, कतेको तरहक काज छैक। बस एक महीनामें तोरा हम एक लाख सऽ कम नहि कमेबह।” खुरचनमा शान्त भऽ गेल।

आब गुलटेनमा ओहि ५०० टाका सऽ सब सऽ पहिने बाप-पुरखावाला धंधाक सब समान कीन लेलक आ नित्य २-२ घंटा मेट्रो स्टेशनके नीचाँ फूटपाथपर बैसि जुत्ता-पालिशक काज करय लागल। कहियो २०० तऽ कहियो ५०० ओतहु कमाय लागल। खूब खुश छल। गाममें ई मौज कतय? दरभंगा-मधुबनी वा मिथिलाक कोनो जिलामे ई मौज कतय? खूब तिरपित! आब आमदनी १००० टाका नित्य भऽ गेल छलैक। खुरचनमा पूछबो करैक, “रौ सार! ई जुत्ता पालिशवाला बाप-पुरखाक काज तोरा केना फुरेलौक आ पढि-लिखि तूँ यैह सब करमें?” गुलटेनमा कहलकैक, “पाइये कमाय लेल जखन पढाइ करय छैक लोक तखन कि जुत्ता साफ केनाय आ कि फूल बेचनाय!” दुनू भैयारी हँसैत गाम कतेक पाइ पठेबाक छौक से आ डेराक हिसाब कि भेलौक से हिसाब करैत आब पैसाक गर्मीकेँ दिल्लीक ठंढा बियरसँ शीतलता प्रदान करैत बीच-बीचमें गोल्ड-फ्लेकक कश सँ गर्मीक धूआँ-झोंकारी देबय लागल।

किछुवे दिनमें गुलटेनमाक नजरि पडलैक एक भीखमंगपर। ओ भीखमंगाक समूचा देहपर गुदडी-चेथडी, मैल-कुचैल कपडा आ सभ सऽ बेसी समस्या जे दुनू हाथक आँगूर कुष्ठिरोग सँ सडल, बेकाजक लोक, भीखक अलावे दोसर कोनो सहारा नहि… लोक देखैत देरी ओकरा भगाबय लेल जल्दीसँ १०-२०-५० जे भेटैक से नोट फेक दैत छलैक… आरौ तोरी के! मिथिलाक माइट-पाइनमे भीजल गुलटेनमा हिसाब जोडलक… एक बेर मे १० के नोट, दिन भैर में कते??? आ मुंगेरीलाल जेकाँ ओकर आँखि मिचमिचाइत ओ देखय लागल जे रंगल कपडा सऽ आंगूर सभ सडेनाय आ कुष्ठिरोगके नाटक बड पैघ बात नहि छलैक…. आ बेसी नहि २ घंटा धरि ओ ई काज करत तऽ लक्ष्य दूर नहि छैक। यानि भीखमंगाक भेष बनबैत ओ मात्र २ घंटा कोनो अन्जान चौकपर भीख माँगत, जरुर १००० टाकाक आमदनी एबे करतैक। निस्सन्देह ओ सही भेल। शुरु केलक भीख माँगय के काज आ नित्य कम स कम १००० कमाय लागल। भीखमंग बनबाक लेल छद्म भेषक एक झोरा, मोचीक काज लेल एक पेटी-बाकस समान आ फूल (रेड रोज) बेचबाक लेल एक झोरा फूल – यैह टा पूँजी आ मूल पूँजी मिथिलाक माइट-पाइनिक ओ कुशाग्र संस्कार, गामक हिरो-दुलरुआ गुलटेनमा भले दिल्लीमें भीखमंग तक बनि गेल लेकिन ओकर शेखी आइ के नहि जनैत अछि। खुरचनमा डीबीए सँ कहिया प्रोमोशन लेत से भाग्य कियो नहि जनैत अछि, लेकिन गुलटेनमा धरि आब लाख रुपैयाक पहिल लक्ष्य ३ महीनाक भीतर पाबि गेल अछि आ आगामी समयमे ओकर कुशाग्रता चुप रहयवाला नहि छैक। यदि कोनो यासीन भटकल भेट जेतैक तऽ ओ दरभंगा मोड्युल आ मधुबनी मोड्युल आ किछु खतरनाक सेहो कय सकैत अछि, लेकिन पाइ चाही। पढाइ लोक पाइ कमेबाक लेल करैत अछि, यैह संस्कार आइ भेट रहल छैक सब के। मिथिलाक माइट-पाइन भले बड उपजाऊ हो, लेकिन निज मिथिलामें केकरो लेल ओ जोगार नहि जे गुलटेनमाकेँ दिल्ली जाय के भेटल।

हरि: हर:!!