कुकुरक नाङड़ि
– सियाराम झा सरस
कुकुरक नाङड़ि सोझ करै मे लागल छी
अहाँ बुझइ छी पागल, तँ हम पागल छी
अइ नाङड़ि लै भेल कतेको बुधिबधिया
धिमका भए गेल चौरस, चौरस भेल खधिया
बारह बापुत सोझ करै छी पुछड़ी केँ
जेना अगत्ती नेन्ना गीजए छुछड़ी केँ
नहे सँ जतबा सकैत छी – खोंटै छी
तेल मखाकऽ सकल समाजे सोंटै छी
हीत-मीत केर कहब – समस्या केँ चीन्हू
आत्मा बीकए तऽ बेचू, झंझटि जुनि कीनू
पिता कहै छथि – बूरि छी, परम अभागल छी!
कुकुरक नाङड़ि सोझ करै मे लागल छी!
पहिने कूत-कूत कहिऐ – जुत्ता चाटए
कान पकड़िकए उठबी, तैयो नइ काटए
जतऽ धरि कहिऐ – पाछाँ-पाछाँ आबय
डाँटि दिअइ तँ सोझका नाङड़ि सुटकाबय
खा-पीकए समरथ-सकरथ बलमंत भेलै
नमहर-नोंकगर-चोखगर सब नख-दंत भेलै
आंगन-दरबज्जा टपलै – गामक सीमा
आब गुरड़ि छरपय काटए चाटए भीमा
नाङड़ि भए गेल टेढ कखन से सोचै छी
पैर पटकि, दँतकिच्ची, माथा नोचै छी
निसोदंड गाँऽ यैह चारि – जन जागल छी!
अहाँ बुझै छी पागल, तँ हम पागल छी!
(अति मननीय आ ठोकल-ठेसायल भाव – सरस केर सरसताक पूर्ण परिचायक)
हरि: हर:!!

1 Comment
Your poem is so incoregius for maithili language.and I have no more words for pay thanks to you