Search

मिथिलाभाषा रामायण – उत्तरकाण्ड – आठम अध्यायः रामचन्द्रजीक समस्त बन्धु-बान्धव, प्रजाजन-सहित स्वर्ग प्रस्थान, रामायणक माहात्म्य

520 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायणक स्वाध्यायक आइ आखिरी अध्यायक पाठ थिक । हमरा बुझने पहिल बेरुक पाठ मे आधा सँ बेसी बात आ वर्णन बुझय मे आबि गेल । परञ्च आगामी समय मे एकर मैथिली अनुवादक प्रकाशन सेहो अपना लेल आ अपन पाठक लेल राखब, ताहि वचनबद्धताक संग, ई अन्तिम अध्याय यथारूप मे राखि रहल छी ।

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

उत्तरकाण्ड – आठम अध्याय

रामचन्द्रजीक समस्त बन्धु-बान्धव, प्रजाजन-सहित स्वर्ग प्रस्थान, रामायणक माहात्म्य

।चौपाइ।

शुनु गिरिनन्दिनि कहल महेश । पालल रघुवर अपन निदेश ॥१॥
लक्ष्मण-रहित पड़य नहि चयन । जनु निर्ज्झर झर पङ्कज-नयन ॥२॥
गुरुमन्त्री केँ कहलनि राम । होथु भरत भूपति एहिठाम ॥३॥
बन्धु-वियोग सहल नहि जाय । आज मिलब हम लक्ष्मण भाय ॥४॥
शुनितहिँ प्रजा विकल खस केहन । छिन्नमूल सौँ तरुवर जेहन ॥५॥
मूर्छित खसल भरत उठि भाख । राज्यभार के माँथा राख ॥६॥
हम नहि करब राज्य-सुख भोग । जन्म अनेकहु छुट नहि रोग ॥७॥
अपनैक चरण शरण मे रहब । स्वर्ग मर्त्य मे दुःख न सहब ॥८॥
कुश लव कुमरक करु अभिषेक । कलकौशल उत्तर सुविवेक ॥९॥
शुनल प्रजाजन मन अति भीति । कहल वसिष्ठ राम सौँ नीति ॥१०॥
विकल प्रजाजन देखक थीक । सेवक सबहिक हो जे नीक ॥११॥
शुनल वसिष्ठ कहल भगवान । राम कयल सभ जन सन्मान ॥१२॥
कनइत सभ जन जोड़ल हाथ । आशापूर करू रघुनाथ ॥१३॥
जाइक इच्छा अछि जे ठाम । जायब सङ्गहिँ सभ से धाम ॥१४॥
पुत्र दार जन एक न त्यागि । नीतिधर्म्म पदयुग अनुरागि ॥१५॥
चलब सङ्ग कहलनि प्रभु बेश । जाइक इच्छा अछि जे देश ॥१६॥
कुश लव कुमरक कय अभिषेक । विदा कयल प्रभु दिव्य-विवेक ॥१७॥
देलनि दिव्य रथ आठ हजार । वन्दि हजार विरुद उच्चार ॥१८॥
साठि हजार सैन्य रण-धीर । एक एक काँ देल रघुवीर ॥१९॥
बहुत वित्त युत जन सङ्ग जाय । कयल प्रणाम चलल दुनु भाय ॥२०॥

भावार्थः

शिवजी कहलनि – “हे गिरिजा, राम अपन प्रतिज्ञाक पालन कयलनि । मुदा, लक्ष्मण बिना हुनका चैन (आराम) नहि भेटलनि । हुनक कमल-समान आँखि झरना जेकाँ झहरैत रहल । राम गुरु आ मंत्री सब सँ कहलनि – “आब भरत अयोध्याक राजा होइथ । लक्ष्मणक बिछोह आब हमरा सहल नहि जा रहल अछि । आब हम भाइ लक्ष्मण सँ जाकय भेटब ।” रामक ई बात सुनितहि प्रजाजन ओहि तरहें खसि पड़ल जेना जैड़ कटि गेला पर गाछ खसैत अछि । भरत बेहोश भ’ कय खसि पड़लाह, फेर उठिकय बजलाह – “एहि राज्यक भार के अपन माथ पर राखत ? हम राज्य-सुख नहि भोगब । हमरा ई रोग जन्म-जन्मान्तर धरि नहि छूटत । हम हमेशा अपनहिंक चरण केर छत्रच्छाया मे रहब । अपनेक बिना मर्त्यलोक कि, स्वर्गलोकहु केँ हम दुःखभोग बुझैत छी । कुश आ लव केँ आनिकय एतय हुनका लोकनिक अभिषेक कयल जाउ ।” भरत शान्तिपूर्वक ई विवेकपूर्ण उत्तर देलनि । प्रजाजन लोकनि केँ ई सुनिकर मोन मे बहुते भय होबय लगलैक । तखन वसिष्ठ राम सँ नीति केर बात कहलनि – “दुःख सँ व्याकुल प्रजा केँ देखनाय अहाँक कर्तव्य थिक । अहाँ केँ एना करबाक अछि जाहि सँ सेवक सभक भलाइ हो ।” वसिष्ठ जे कहलनि तेकरा राम मानि लेलनि । राम सभक मान रखलनि । सब प्रजाजन कनैते हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे रघुनाथ ! हमरा सभक कामना केँ पूरा करू । अहाँ केँ जेतय जेबाक इच्छा होइत अछि, हमरो सब संग भ’ कय ओहि स्थान पर जायब । पुत्र, स्त्री, सेवक आ चरण मे अनुरक्त लोक सभक त्याग कयनाय कखनहुँ नीति वा धर्मक अनुकूल नहि अछि ।” राम कहलनि – “अच्छा हमरा जाहि देश जेबाक अछि ओतय अहाँ सब सेहो संग चलब ।” राम कुमार कुश आ लव केर राज्याभिषेक कय केँ अपूर्व विवेकक संग हुनका विदा कय देलनि । राम हुनका आठ हजार दिव्य रथ देलनि । एक हजार भाट हुनकर गुणगान करैत चलल । युद्ध मे डटयवला साठि हजार सैनिक देलनि । राम एतबे-एतबे हरेक पुत्र केँ देलनि । स्वर्णमुद्रा लादिकय बहुते रास कुली संग लगा देलनि । दुनू भ्राता प्रणाम कय केँ प्रस्थान कयलनि ॥१-२०॥

।दोहा।

बहुत दूत शत्रुघ्न केँ, चलल बजाबय काज ॥२१॥
जाय कहल वृत्तान्त से, जे रघुवीर समाज ॥२२॥

भावार्थः

शत्रुघ्न केँ बजाबय लेल बहुते-रास दूत चलल, जे रामक संग छल, आर ओ सब शत्रुघ्न सँ सारा वृत्तान्त कहि सुनौलक जे – ॥२१-२२॥

।चौपाइ।

कालपुरुष-आगमनक भीति । अत्रिपुत्र अयला जे रीति ॥२३॥
राम-प्रतिज्ञा बन्धु-वियोग । कुशी-लवक अभिषेक प्रयोग ॥२४॥
प्रजा सहित कहु की हम आन । करता राम महाप्रस्थान ॥२५॥
शुनि शत्रुघ्न व्यथित मन त्रास । धैर्य्य धयल नहि दुःख प्रकाश ॥२६॥
पुत्र दुहूक कयल अभिषेक । मथुरा विदिश नगर एक एक ॥२७॥
तनय सुवाहु प्रजा-सुख-हेतु । यूपकेतु पालक श्रुति-सेतु ॥२८॥
गेला अयोध्या अपनैँ शूर । रामचन्द्र देखि आशा पूर ॥२९॥
देखल रघुवर दिनकर-कान्त । मुनिजन-परिवृत सुन्दर शान्त ॥३०॥
कयल प्रणाम कहल कल जोड़ि । चलब नाथ नहि हमरा छोड़ि ॥३१॥
बालक दुहुजन काँ दय राज । सावधान हम अयलहुँ आज ॥३२॥
राम बूझि भाइक दृढ़ भाव । कहल सज्ज रहु दुपहर आब ॥३३॥
दिन दुपहर भल दिन प्रस्थान । सभ सौँ कालपुरुष बलवान ॥३४॥
वानर भालु देव-अवतार । समर-सहायक बल-विस्तार ॥३५॥
शुनि अयला सुग्रीवक सङ्ग । रामचन्द्र-पद-प्रीति अभङ्ग ॥३६॥
पहुँचलाह सत्वर हनुमान । प्रभु-आज्ञाकर वीर-प्रधान ॥३७॥
भक्त विभीषण पहुँचि सबेरि । एक हरिजन क्षण कयल न देरि ॥३८॥
सभ काँ सँग चलइक मन थीर । जानल करुणाकर रघुवीर ॥३९॥
तहँ सुग्रीव कहल कर जोड़ि । रहब न हम प्रभु मैत्री तोड़ि ॥४०॥
अङ्गद काँ राजा हम कयल । अपनैँक सङ्ग अचल-मति धयल ॥४१॥
कहल विभीषण काँ रघुनाथ । सुखित रहब करइत गुण-गाथ ॥४२॥
राक्षस-राज्य करू गय जाय । यावत धरा प्रजा सुख पाय ॥४३॥
हमर शपथ थिक करु स्वीकार । हठ उत्तरक त्यागु व्यवहार ॥४४॥
शुनु शुनु मारुतसुत हनुमान । रहु चिरंजीवि कहब की आन ॥४५॥
आज्ञा हमर यहन लिअ मानि । एक तरह नहि होयत हानि ॥४६॥
जाम्बवान द्वापर परयन्त । रहु गय अकथ कतौ वृत्तान्त ॥४७॥
सभजन काँ कहलनि पुन राम । चलु चलु सभ जन हमरा धाम ॥४८॥
प्रातहिँ कमल-नयन भगवान । गुरु वसिष्ठ काँ कहल विधान ॥४९॥
अग्निहोत्र चल हमरहि सङ्ग । तुष्ट वसिष्ठ कयल से रङ्ग ॥५०॥
रघुवर धौताम्बर कुशहस्त । महा-प्रयाणक बुद्धि प्रशस्त ॥५१॥
चलला छोड़ि नगर ओ धाम । कोटि कलाकर-छवि-जित राम ॥५२॥
कञ्ज-करा कमला चलु सङ्ग । सुषमा सुषमा-सिन्धु-तरङ्ग ॥५३॥
अस्त्रशस्त्र सङ्ग चलु धनु तीर । आगु भेल भल धयल शरीर ॥५४॥
धयल शरीर वेद सभ गोट । चलल महामुनि महिमा मोट ॥५५॥
श्रुति-माता प्रणवक सँग मेलि । व्याहृति मिलि रघुवर मिलि गेलि ॥५६॥
पुत्रदार परिवृत चल सङ्ग । प्रजालोक मन प्रीति अभङ्ग ॥५७॥
अतःपुर अनुचर सह नारि । चलल भरत शत्रुघ्न विचारि ॥५८॥
चलला राम चलल सुरलोक । बाल वृद्ध ककरा के रोक ॥५९॥
चारू वर्ण शरण भल पाब । शान्त तपस्वी जन अगुआब ॥६०॥
चल सुग्रीव सदल सदभाव । श्रीअनन्त रघुवर गुण गाब ॥६१॥
सभ आनन्द गमन-उत्साह । विषय मनोरथ अस्त प्रवाह ॥६२॥
स्थावर जङ्गम रहल न एक । सभ विरक्त बनि शुद्ध विवेक ॥६३॥
शून्य अयोध्या जनसौँ तखन । पुरसौँ चलल महाप्रभु जखन ॥६४॥
सरयूनदी देखल रघुवीर । अति प्रसन्न मन धर्म-शरीर ॥६५॥
अयला ततय विरञ्चि महान । सकल देव ऋषि सिद्ध सुमान ॥६६॥
गगन विराजय कोटि विमान । अतिथि काज रवि-कोटि समान ॥६७॥
अतिशय सुरभि पवन बह बेश । सुमन-वृष्टि-संकुल से देश ॥६८॥
विद्याधर किन्नर गण गाब । नानायन्त्र मृदंग बजाब ॥६९॥
परश कयल सरयू-जल राम । पयरहि सर्वशक्ति गुणधाम ॥७०॥
विधि तहिठाम जोड़ि दुहु हाथ । कहल समक्ष ठाढ़ रघुनाथ ॥७१॥
अपने परब्रह्म परमेश । सदानन्द विभु विष्णु रमेश ॥७२॥
जनता-पालक जगन्निवास । कहब तथापि थिकहुँ हम दास ॥७३॥
भ्राता सहित मिलल जत जाय । आदि देह निज इच्छा पाय ॥७४॥
अथवा निजरुचि उत्तम देह । करिय प्रवेश भक्त-पर-नेह ॥७५॥
देव-देव वर-पुरुष पुराण । चरण प्रणाम कोटि कल्याण ॥७६॥
विनत-विरञ्चि-वचन बुझि राम । देव सकल देखइत घनश्याम ॥७७॥
महा-प्रकाश सुलक्षण सहित । भेला चतुर्भुज चिन्ता-रहित ॥७८॥
लक्ष्मण शेष-नाग-तन सैह । धयल धराधर छल छथि जैह ॥७९॥
शङ्ख चक्र शोभा विस्तार । भरत भेलाह तथा लवणारि ॥८०॥
सीता रमा रमेश्वर राम । तन प्राचीन सुछवि गुणधाम ॥८१॥
बलाराति-गण विष्णु विलोक । परमेश्वर-गति जन के रोक ॥८२॥

भावार्थः

केना भयानक कालपुरुष आयल, कोन तरहें दुर्वासा अयलाह; राम केहेन प्रतिज्ञा कयलनि; भाइ लक्ष्मण सँ बिछोह भेलनि; कुश आ लव केर राज्याभिषेक भेलनि – ई सारा वृत्तान्त सुनाकय कहलनि – “आर बेसी बात कि कहू, राम प्रजा-सहित महा-प्रस्थान करयवला छथि ।” ई सुनिकय शत्रुघ्नक मन मे भारी व्यथा आ आतंक भेलनि । मुदा ओ ढाढस बान्हलनि; अपन व्यथा केँ प्रकट नहि होबय देलनि । शत्रुघ्न सेहो अपन दुनू पुत्र लोकनिक राज्याभिषेक कयलनि । एक केँ मथुरा मे आ दोसर केँ विदिसा मे । सुबाहु नामक पुत्र प्रजाक भलाइ मे लागि गेलाह आ यूपकेतु नामक पुत्र वैदिक धर्मक पालन मे । तखन शत्रुघ्न स्वयं अयोध्या गेलाह आ ओतय राम केँ देखि हुनकर आशा पुरा भेलनि ।ओ देखलनि जे राम सूरज जेकाँ चमकि रहल छथि, शान्त आ सुन्दर देखाय पड़ैत छथि । चारू दिश सँ हुनका मुनि लोकनि घेरने छथि । शत्रुघ्न आबि प्रणाम कयलनि आ हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे प्रभु, अपने हमरा छोड़िकय नहि जायब । अपन दुनू पुत्र केँ राज्य दय केँ हमहुँ आइ तैयार भ’ कय आयल छी ।” ॥२१-३२॥

रामजी भाइ शत्रुघ्न केर दृढ़ इच्छा देखिकय कहला – “आब मध्याह्न भ’ गेल । तैयार भ’ जाउ । मध्याह्न मे यात्रा करब नीक अछि । कालपुरुष सब बेसी बलवान होइत छथि ।” महाप्रस्थान केर ई समाचार सुनिकय ओ सब बन्दर आ भालू, जे लड़ाइ मे सहायताक लेल देवता लोकनिक अवतार भ’ विस्तृत सेना मे छलथि, सुग्रीवक संग ओहो सब आबि गेलथि, कियैक तँ रामक चरण मे सभक अटूट भक्ति छलन्हि । रामक आज्ञाक पालन करयवला महावी हनुमानजी सेहो झटपट पहुँचि गेलाह । भक्त विभीषण सेहो शीघ्रहि आबि गेलथि । रामक कोनो सेवक क्षणहु भरिक देरी नहि कयलनि । कृपालु राम केँ पता चलि गेलनि जे सब गोटे संगे चलबाक लेल डटि गेल छथि । ओतय सुग्रीव हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे राम! हम मित्रता तोड़िकय एतय नहि रहब । हम अंगद केँ राजा बना देलहुँ अछि । आब अहाँक संग चलबाक वास्ते दृढ़ संकल्प कय लेने छी ।” रामजी विभीषण सँ कहलनि – “हमर गुणगान करैत अहाँ सुख सँ रहब । अहाँ जाउ आ राक्षस सभक राजा भ’ कय राज करू । जाबत धरि धरती रहत, ताबत धरि अहाँ प्रजा सुख सँ रहत । हम अपन शपथ दैत छी, हमर बात स्वीकार कयल जाउ । जिद सँ कोनो उत्तर देबाक चेष्टा जुनि करू । हे पवनसुत, सुनू । अहाँ चिरंजीव होउ । आर कि कहू ! हमर ई आज्ञा मानि जाउ; अहाँक कोनो तरहक खराबी नहि होयत । हे जाम्बवान्, अहाँ द्वापर धरि रहब । बहुते-रास वृत्तान्त कहय लायक नहि अछि ।” एकर बाद राम आर सब सँ कहलनि – “चलू, सब गोटे हमर धाम चलू ।” ॥३३-४८॥

भोर होइते कमलनयन राम गुरु वसिष्ठ सँ कहलनि जे कि-कि हेबाक चाही । ओ कहलनि – “अग्निहोत्र हमरा संग चलत ।” प्रसन्न भ’ वसिष्ठ ओहिना कयलनि । राम धौत वस्त्र पहिरलनि, कुश हाथ मे लेलनि आ महाप्रयाणक लेल उद्यत भ’ गेलाह । करोड़ चन्द्रमाक शोभा केँ जितयवला राम नगर आ घर-वार छोड़िकय चलि पड़लाह । कमल केर फूल हाथ मे लेने कमला हुनकर संग चललिह । तरंगक अपार शोभावाली सुषमा नदी सेहो संग चललिह । रामजीक सबटा अस्त्र-शस्त्र तथा तीर-धनुष सेहो शरीर धारण कयकेँ आगाँ-आगाँ चलल । चारू वेद सेहो शरीर धारण कय केँ चलल । अपार महिमा वला महामुनि सब सेहो चललाह । पुत्र आ स्त्री समेत प्रजाजन सेहो अटूट प्रेम सँ भरिकय संग चलल । रनिवासक सेवक सब तथा महिला सहित भरत आर शत्रुघ्न सेहो चललाह । राम चललाह । हुनका पाछाँ सब देवता सब चललथि । बच्चा, बूढ़, केकरा के रोकैत अछि ! चारू वर्णक लोक केँ रामक सुन्दर शरण भेटलैक । शान्त-तपस्वी लोक सब आगाँ-आगाँ चललाह । अपन दल केर संग शुद्ध हृदय सँ सुग्रीव सेहो चललाह । आर ओ अनन्तविभूषित रामक गुण गाबैत चललाह । सब गोटे उत्साह आ आनन्द मे मगन छथि । विषय-भोग केर लालसा सभक ताँता टुटि गेल । कि स्थावर या जंगम, एक-एक कय सब विरागी भ’ कय शुद्ध विवेकवला भ’ गेल । तखन राम धर्मस्वरूपा सरयू नदी केर दर्शनकयलनि । देखिकय हुनकर मन परम प्रसन्न भ’ गेलनि । आकाश मे हजारों विमान छा गेल । ओ विमान सब अतिथि सभक काजक लेल छल आ करोड़ों सूरज समान चमकि रहल छल । सुगन्ध सँ भरल हवा बहि रहल छल । फूलक बरखा सँ सारा इलाका फूले-फूल भ’ गेल छल । विद्याधर आर किन्नर सब भाँति-भाँतिक बाजा आ मृदंग बजबैत गायन कय रहल छलथि । सब शक्ति आ गुणक आगार राम चरण सँ सरयूक जल केँ स्पर्श कयलनि । हाथ जोड़िकय सामने ठाढ़ भ’ ब्रह्मा ओतय रामक स्तुति कयलनि – ॥४९-७१॥

“अपने परब्रह्म परमेश्वर थिकहुँ । अपने सदैव आनन्दस्वरूप छी, व्यापक छी, लक्ष्मीपति विष्णुरूप छी । अपने जन-समुदायक पालन करयवला छी । अपनेक निवास ई सारा जगत अछि । तैयो हम एतबे कहब जे हम अहाँक दास छी । भ्राता सभक संग ओतय जाकय मिलन होयत, ओतय अपना इच्छा सँ आदि देह अर्थात् ईश्वरीय रूप प्राप्त कयल जाउ । अथवा यदि भक्त सब पर अनुग्रह करबाक हो तँ दोसर उत्तम शरीर मे अपन इच्छाक मुताबिक प्रवेश कयल जाउ । हे देवहु केर देव, पुरातन पुरुषश्रेष्ठ, अपनेक कल्याणकारी चरण मे हम कोटिशः प्रणाम करैत छी ।” ॥७२-७६॥

श्रद्धा सँ झुकल ब्रह्माक बात बुझिकय मेघ सन साँवला राम सब देवता लोकनिक समक्ष सब लक्षण-सहित एवं चिन्ता सँ रहित चतुर्भुज विष्णु भ’ गेलाह । लक्ष्मण वैह शेषनाग भ’ गेलाह जे धरती केँ धारण कएने छथि । भरत आ शत्रुघ्न दुनू शंंख-चक्रधारी भ’ गेलथि । सीता लक्ष्मी भ’ गेलिह । राम नारायण भ’ गेलाह । एहि प्राचीन रूप मे दुनू गोटेक शोभा अत्यन्त निराला छलन्हि आर दुनू गुणक भंडार छलथि । इन्द्र, विष्णु आदि देवता लोकनि तमाशा देखि रहल छलथि । ईश्वर केर गति केँ साधारण मनुष्य केना रोकि सकैछ ! ॥७७-८२॥

।गीतिका छन्द।

आनन्द लोचन नीर निर्झर, निरख निर्जर रूप से ॥८३॥
जन यक्ष देव समक्ष लक्षण-युक्त सुन्दर भूप से ॥८४॥
मुनि पितर प्रभृति प्रशंस गुण-गण, तितल आनन्द-नोर सौँ ॥८५॥
तन पुलक-निचय उचार जन जन, देखु लोचन-कोर सौँ ॥८६॥

भावार्थः

देवता सभक आँखि सँ आनन्दक नोर झहरि रहल अछि आर ओ सब हुनकर रूप केर दर्शन कय रहल छथि । मनुष्य, यक्ष, देवता आदि सभक सामने सर्वलक्षणयुक्त राजा ईश्वर केर रूप मे देखाय पड़ैत छथि । मुनि, पितर, आदि सब कियो आनन्दक नोर सँ भिजल हुनकर गुण सभक कीर्तन कय रहल छथि । सब गोटेक शरीर पुलकित छन्हि । ओ सब जय-जयकार कय रहल छथि आर आँखि सँ प्रभु सीताराम केर झाँकी देखि रहल छथि ॥८३-८६॥

।सोरठा।

देखल द्रुहिण-समाज, कहल दयामय समय शुभ ॥८७॥
सेवक जन सभ आज, जयता हमरहि सङ्ग सुख ॥८८॥
जत वानर जत भालु, जत राक्षस सेवक सुखद ॥८९॥
कहलनि दीन-दयाल, हमर धाम सङ्गहिँ चलथि ॥९०॥

भावार्थः

दयालु राम देवता सभक मंडली दिश देखलनि आ कहलनि – “ई अत्यन्त शुभ समय अछि । हमर समस्त सेवक लोकनि आइ हमरा संग सुखपूर्वक स्वर्ग चलताह । हमर सेवा करयवला आ हमरा मदति पहुँचाबयवला जतेक बन्दर, भालु आ राक्षस छथि ओ सब गोटे हमरहि संग हमर धाम चलताह ।” ॥८७-९०॥

।रूपमाला।

कहल विधि शुनु विष्णु गुण-निधि, बुझल शासन नीक ॥९१॥
नाम जपि भवसिन्धु तर नर, इ तौँ समुचित थीक ॥९२॥
वन्द्य वानर-वृन्द वर-गुण, भालु भाग्य-उदार ॥९३॥
भक्ति-महिमा देख सुर-गण, केहन करुणागार ॥९४॥

भावार्थः

ब्रह्माजी कहलनि – “हे गुणक खान भगवान् नारायण, सुनू । अपने जे आदेश करब से नीक अछि । अपनेक नाम जपि-जपिकय लोक भवसागर पार करत, ई त बढियें बात भेल ।” गुणवान् वानर सब सेहो आइ पूजनीय भ’ गेलाह । भालू सब सेहो परम भाग्यवान् भ’ गेलाह । देवता लोकनि भक्तिक महिमा देखि रहल छथि आ कहैत छथि – “राम कतेक करुणामय छथि !” ॥९१-९४॥

रामायण केर माहात्म्य 

।दोहा।

अज्ञानहुँ जे करय नर, राम नाम उच्चार ॥९५॥
अन्त पाब गति उत्तमा, घुरि न आब संसार ॥९६॥

भावार्थः

जे मनुष्य अनजानहुँ मे राम-नाम केर उच्चारण करत ओ जीवनक अन्त मे उत्तम गति (मोक्ष) पायत आ फेर घुरिकय एहि संसार मे नहि आयत ॥९५-९६॥

।सोरठा।

परसथि सरयू-नीर, हृष्टपुष्ट नहि कष्ट मन ॥९७॥
पाबथि प्रथम शरीर, जय जय धुनि कपि कोटि कर ॥९८॥

भावार्थः

करोड़ों कपि सब सरयू नदीक जल केँ स्पर्श करिते हृष्ट-पुष्ट भ’ गेलथि । मोन मे कनिकबो तकलीफ नहि रहलनि । सब अपन पूर्व शरीर केँ प्राप्त करैत जय-जयकार करय लगलाह ॥९७-९८॥

।चौपाइ।

दिनकर-देह विमल कपिराज । देखथि सुचरित देव-समाज ॥९९॥
सरयूजल नर कर असनान । दिव्यरूप बनि चढ़ल विमान ॥१००॥
स्वर्ग चलल भल कीट पतङ्ग । विष्णुक नगर अमर सन रङ्ग ॥१०१॥
देखय तमासा अयला जैह । तनिकर गति भेल उत्तम सैह ॥१०२॥
उत्तर-राम-चरित गिरिजेश । श्री गिरिजा सौँ कहलनि बेश ॥१०३॥
पढ़थि शुनथि जे चरित उदार । उत्तम गति पाबथि संसार ॥१०४॥
की कर यमकिङ्कर स्वर-रोष । हर गिरिजा रघुवर सन्तोष ॥१०५॥
रामायण पड़ एको चरण । पातक-चय निश्चय हो हरण ॥१०६॥
अतिप्रसन्न रह उमा-महेश । एतय ओतए नहि रहय कलेश ॥१०७॥
आदि-काव्य रामायण थीक । पढ़थि शुनथि जन रह निर्भीक ॥१०८॥
विष्णुसदन पाबथि से अन्त । श्रद्धासहित पढ़थि जे सन्त ॥१०९॥

भावार्थः

दिनकर केर देह कपिराज सुग्रीव पाबि गेलथि । ई सब सुचरित देव-समाज सब देखि रहल छथि । सरयूजल मे लोक स्नान करथि आ दिव्य स्वरूप प्राप्त कय विमान पर चढ़ि जाइथ । एतय तक कि कीड़ा-मकोड़ा सेहो देव-स्वरूप बनिकय विष्णुलोक जाय लागल । जे-जे ई तमाशा देखय अयलाह, हुनको सब केँ यैह उत्तम गति विष्णुलोक भेटि गेलनि । शिवजी गिरिजाजी केँ ई रामजीक उत्तम चरित सुनौलनि । संसार मे जे कियो ई चरित पढ़त या सुनत ओकरा उत्तम गति प्राप्त हेतैक । परम क्रोधी यमदूतो ओकर कि कय सकतैक, जेकरा पर शिव, पार्वती आ रामक कृपा छैक । जे एको चरण रामायण पढ़त, ओकर पापपुंज अवश्य दूर भ’ जेतैक । ओकरा पर पार्वती आ शिव परम प्रसन्न रहथिन । इहलोक आ परलोक मे सेहो ओकरा कोनो कष्ट नहि रहतैक । ई रामायण आदि काव्य थिक । जे एकरा पढ़ैत-सुनैत अछि से सदिखन भय सँ मुक्त रहैत अछि । जे सन्त श्रद्धाक संग एकर पाठ करैत छथि, ओ जीवन केर अन्त मे विष्णुलोक वैकुण्ठ धाम पबैत छथि ॥९९-१०९॥

।इति मैथिल श्रीचन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डेऽष्टमोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक आठम अध्याय समाप्त भेल॥

* । श्रीरामायण समाप्त । *

॥ श्रीरस्तु शुभमस्तु ॥

हरिः हरः!!

Related Articles