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मिथिलाभाषा रामायण – उत्तरकाण्ड – तेसर अध्यायः बालि ओ सुग्रीवक जन्मक कथा, सनत्कुमार द्वारा रावण केँ उपदेश

525 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

उत्तरकाण्ड – तेसर अध्याय

बालि ओ सुग्रीवक जन्मक कथा, सनत्कुमार द्वारा रावण केँ उपदेश

।चौपाइ।

कह सानुज बालिक उतपत्ति । जनिका छल अति बल सम्पत्ति ॥१॥
रावण तनि तट तृणक समान । बालिक सदृश शूर के आन ॥२॥
राम-प्रश्न मुनि शुनल अगस्त्य । चरित कहय लगलाह प्रशस्त्य ॥३॥
कनक-सुमेरु-शिखर बड़ गोट । शतयोजन मणिमय मध्य कोट ॥४॥
योगारूढ़ शारदानाथ । आनन्दाश्रु बहल लेल हाथ ॥५॥
से कर धयलहि धयलनि ध्यान । त्याग कयल पुन चरित के जान ॥६॥
तहि सौँ जनमल भल कपिराज । कहल विधाता बसह समाज ॥७॥
किछु दिन बितलय हयतौ नीक । सुखित रहह किछु दिन निर्भीक ॥८॥
यहिगत गत भेल बहुतो वर्ष । ऋक्षाधिप रह सतत सहर्ष ॥९॥
भ्रमयित गिरिवर फल-मूलार्थ । विधि-निवास मे सकल पदार्थ ॥१०॥
वापी एक पड़ल तनि दृष्टि । मणिमय तत जल अमृतक सृष्टि ॥११॥
करय ततय गेला जलपान । दृष्टि पड़ल प्रतिबिम्ब समान ॥१२॥
भ्रम अन्तर अछि के ई आन । कुदि पड़ला जल कपि अज्ञान ॥१३॥
बहरयला पुन जल सौँ फानि । स्त्री बनला पुरुषत्वक हानि ॥१४॥
अति विसम्य मन होइनि लाज । कि कहब ककरा रहित समाज ॥१५॥
पूजि चतुर्मुख काँ अमरेश । दूइ पहर दिन चलला देश ॥१६॥

भावार्थः

रामजी पुछलनि – “आब अपने अनुज सुग्रीव सहित बालिक जन्म केर कथा सुनाउ, जे परम शक्तिशाली रहथि । बालिक सोझाँ रावण तँ तिनका बराबर छल । बालिक समान शूर आर कियो नहि भेल ।” रामक ई प्रश्न सुनिकय अगस्त्य मुनि बालिक प्रशंसनीय चरित्र सुनबय लगलाह । सोनाक सुमेरु पर्वत अछि, जेकर चोटी बहुत ऊँच छैक । एकर मध्यक्षेत्र रत्नमय छैक तथा ई एक सौ योजन मे पसरल अछि । एतय सरस्वतीक पति ब्रह्मा योग केर समाधि लगौने छथि । हुनकर आँखि सँ आनन्दक नोर बहल । ताहि नोर केँ ओ हाथ मे लय लेलनि । ओ से हाथ मे लेनहिये फेर ध्यान मे डूबि गेलाह आर ओहि नोर केँ छोड़ि देलनि । हुनका लोकनिक आचरणक अर्थ भला के जानि सकैत अछि ! वैह नोर सँ एक गोट श्रेष्ठ बन्दर केर जन्म भेल अछि । ब्रह्मा ओकरा सँ कहलनि – “बन्दर सभक दल मे तूँ एतहि रहह । किछु दिन बितला पर तोहर अभ्युदय हेतह । किछु दिन धरि निर्भय भ’ आनन्द सँ एतहि रहह ।” एहि प्रकारे बहुते वर्ष बीति गेल । ओ बन्दर केर दलक प्रधान भ’ कय आनन्द सँ रहैत छल । पर्वत सब पर घुमि-घुमिकय फल-फूल खाइत छल । ब्रह्माक ओहि आलय (निवासस्थान) मे सब वस्तु सुलभ (उपलब्ध) छल । एक दिन ओतय ओकरा एक गोट कुंड (वापी) देखाय पड़लैक । जे (कुंड) रत्न सँ बनल रहैक आर ओहि मे अमृत-समान जल भरल छलैक । ओ ओहिमे पानि पीबय गेल कि ओकरा किछु परछाई जेकाँ नजरि एलैक । ओ सोचलक – चित्त मे भ्रम त नहि भ’ रहल अछि ? ई दोसर के अछि ? फेर ओ नासमझ बन्दर ओहि पानि मे कूदि पड़ल । फाँग मारिकय पानि सँ निकलल त ओ एक स्त्री बनि गेल । ओकर पुरुषत्व हानि भ’ गेलैक । ओकरा मन मे भारी विस्मय होबय लगलैक आर ओ लजाय लागल । ओ सोचलक, केकरा कि कहू, एतय तँ समाजक कियो नहि अछि । ओम्हर देवता लोकनिक राजा इन्द्र ब्रह्माक पूजा करबाक लेल ओतय अयलाह आ पूजा समाप्त कय दुपहर मे अपन घर विदाह भेलाह ॥१-१६॥

।सोरठा।

देखल से वर नारि, काम-विवश सुरपति ततय ॥१७॥
नहि शकलाह सम्भारि, वीज-पतन हुनि बाल पर ॥१८॥
जन्म लेल एक बाल, बालहिँ सौँ संज्ञा तनिक ॥१९॥
बालि भेल तत्काल, स्वर्णमाल दय हरि चलल ॥२०॥
रविहुक तेहने हाल, वीज तनिक ग्रीवा खसल ॥२१॥
जनमल बाल विशाल, ग्रीवा सौँ सुग्रीव तैँ ॥२२॥
देलनि तनि रक्षार्थ, हनूमान काँ भानु तत ॥२३॥
वन-फलादि भक्ष्यार्थ, बहुत देखि रवि नभ चलल ॥२४॥

भावार्थः

सुरपति इन्द्र ओहि सुन्दरी नारी केँ देखि काम-विवश भ’ गेलाह । ओ स्वयं केँ सम्हारि नहि सकलाह । ओहि सुन्दरीक केश (बाल) पर हुनक वीर्य पतन भ’ गेलन्हि । ताहि एकटा बच्चाक जन्म भेल । तेँ ओकर नाम ‘बालि’ पड़ल । इन्द्र ओहि स्त्री केँ सोनाक हार दय केँ चलि गेलाह । सूर्य केर सेहो वैह हाल भेलन्हि । हुनकर वीर्य ओहि सुन्दरीक ग्रीवा (बाँहि) पर खसलन्हि । ताहि सँ एक गोट विशाल बच्चाक जन्म भेलैक, तेँ ओकर नाम ‘सुग्रीव’ पड़लैक । ओहि बच्चाक रक्षा हेतु सूर्य हनुमान केँ नियुक्त कयलन्हि आर वन मे फल-फूल आदि खाद्य-पदार्थ प्रचुर देखिकय सूर्य आकाश मे चलि गेलाह ॥१७-२४॥

।चौपाइ।

युगल पुत्र लेल सङ्ग लगाय । सुति रहली कहुँ से अलसाय ॥२५॥
भेल प्रात जौँ निद्रा भङ्ग । पुन बनि गेला पूर्व्वक रङ्ग ॥२६॥
युगल बाल सङ्ग बहु फल मूल । प्राप्त ततय जत विधि अनुकूल ॥२७॥
दल विधाता बड़ आश्वास । कीशराज काँ भेल विश्वास ॥२८॥
विधि एक अमर दूत बजबाय । कहलनि किष्किन्धा मे जाय ॥२९॥
कपिपति होथि तहाँ महाराज । सत्वर करु गय ई गोट काज ॥३०॥
सकल द्वीप जे वानर लोक । हिन कपिपति-वश-वर्त्ति विशोक ॥३१॥
रामक जखन हयत अवतार । असुर-विनाश हरण महि-भार ॥३२॥
तनिकर सभ कपि करब सहाय । देवदूत देल कथा बुझाय ॥३३॥
विधि सौँ जेहन बुझल ओ दूत । कपिपति ततक कयल पुरहूत ॥३४॥
तेहि दिन सौँ किष्किन्धा वास । बालि प्रभृति छल छथि निस्त्रास ॥३५॥
विधि-प्रार्थित अपनैँ परमेश । भूमि-भार टारल अकलेश ॥३६॥
ब्रह्म अखण्डानन्द-स्वरूप । कोन पराक्रम नरवर भूप ॥३७॥
तदपि भक्तजन वर्णन करथि । गुणगण गाबि दुःख सौँ तरथि ॥३८॥
जे कीर्त्तन कर कपिपति-जनन । कथा तनिक हो पातक-हनन ॥३९॥
अथ हम कथा कहै छी आन । श्रीरघुनन्दन शुनु दय कान ॥४०॥
रावण कयलनि सीता-हरण । प्रकट तकर फल दुर्ग्गति मरण ॥४१॥
सनत्कुमार प्रजापति-तनय । कृतयुग रावण कयलनि विनय ॥४२॥
कयल प्रणाम जोड़ि विश हाथ । प्रभु सर्व्वज्ञ कहल हे नाथ ॥४३॥
जनिकर जनम मरण नहि एक । भर्त्ता विश्वक विशद विवेक ॥४४॥
जनिकर बल सौँ सुर-समुदाय । शत्रु जितै छथि अमर कहाय ॥४५॥
यजन करै छथि द्विजगण ककर । योगी ध्यान करै छथि जकर ॥४६॥
ई सभ संशय सनत्कुमार । कहल जाय प्रभु परमोदार ॥४७॥

भावार्थः

दुनू पुत्र केँ संग लय केँ माता अलसाकय कतहु सुति रहलिह । भोरे जखन आँखि खुजल त ओ फेर पहिने जेकाँ बन्दर बनि गेलिह । दुनू बच्चा संगहि मे छल । प्रचुर कन्द, मूल, फल – सब किछु सुलभ छल । जाहिठाम विधि (विधाता) अनुकूल रहथि ताहिठाम कथी (कोन वस्तु) नहि सुलभ होयत ! ब्रह्मा बड पैघ आश्वासन देने रहथि, तेँ ओकरा ई विश्वास छलैक जे अभ्युदय अवश्य होयत । ब्रह्मा एक गोट देव-दूत केँ बजौलनि आ हुनका आज्ञा देलनि – “किष्किन्धा जाउ आर तुरत एहेन काज करू जाहि सँ ई कपिवर ओहिठामक महाराज बनि जाइथ । सब द्वीप पर जतेको बन्दर अछि ओ सब एहि कपिक वश मे आबि जाय आ सुख सँ रहय । जखन राम असुर सभक नाश करय आ धरतीक भार दूर करय लेल अवतार लेताह, तखन कपि सब मिलिकय हुनकर सहयोग करथि ।” एहि तरहें ब्रह्मा देवदूत केँ सब बुझा देलनि । ब्रह्मा जेना बुझौलनि ताहि अनुसार कपिपति केँ किष्किन्धाक सम्राट बनाय देल गेल । ताहि दिन सँ बालि आदि कपि किष्किन्धा मे निःशंक वास करैत आबि रहल छथि । हे परमेश्वर, अपने ब्रह्माक प्रार्थना सँ पृथ्वीक भार केँ अनायास दूर कयलहुँ । अपने अखंड आनन्दस्वरूप ब्रह्म थिकहुँ । पुरुषश्रेष्ठ राजा भ’ कय अपने जे पराक्रम कयलहुँ से कोन पैघ थिक ! तैयो भक्त लोकनि अपनेक एहि पराक्रमक वर्णन करैत छथि आ अपनेक गुण सब केँ गाबि-गाबिकय दुःख सँ छुटकारा पबैत छथि । जे सुग्रीवक जन्म केर कथा आदिक कीर्तन करता, हुनक सब पाप दूर भ’ जायत । आब हम दोसर कथा सुनबैत छी । हे राम, अपने ध्यान दय केँ सुनल जाउ । रावण सीताक हरण कयलक । तेकर ओकरा प्रत्यक्ष कुपरिणाम भेटलैक । ओकर दुर्दशा भेलैक आर अन्त मे ओ मारल गेल । सत्ययुग मे रावण ब्रह्माक पुत्र सनत्कुमार सँ प्रार्थना कयलक । ओ बीसो हाथ जोड़िकय प्रणाम कयलक आ कहलक – “हे प्रभु, अपने सब किछु जानयवला थिकहुँ । हे नाथ, कहू जे ओ के छथि, जिनकर न कहियो जन्म होइत अछि आ न मरण; जे विश्व भरिक भरण (पोषण) करैत छथि, आर जे असन्दिग्ध रूप सँ ज्ञानी छथि; जिनक बल सँ देवता लोकनि सदा अपन दुश्मन सब सँ जितैत छथि आर अमर कहाइत छथि; द्विज लोकनि जिनक यज्ञ करैत छथि आर योगी लोकनि जिनकर ध्यान करैत छथि ? हे प्रभु, परम उदार सनत्कुमार जी, एहि संशय सब केँ अपने कृपा कय केँ दूर कयल जाउ ।” ॥२५-४७॥

।सोरठा।

शुनि पुन सनत्कुमार, योगिदृष्ट सौँ मौन क्षण ॥४८॥
प्रश्नोत्तर उच्चार, समुचित कयल दशास्य-हित ॥४९॥
शुनु शुनु सुत लङ्केश, अव्यय नारायण थिकथि ॥५०॥
जतय दुःखक लेश, विश्वम्भर तनि जन्म नहि ॥५१॥
तनि बल सौँ सङ्ग्राम, अमर जितै छथि योगि पुन ॥५२॥
ध्यान निरन्तर नाम, करथि जपथि संसृति तरथि ॥५३॥
पुन पुछलनि दशभाल, दैत्यादिक जे विष्णु सौँ ॥५४॥
निहर समर वश काल, जाइत छथि कहु कोन गति ॥५५॥
असुर मरथि सुर-हाथ, से जाइत छथि स्वर्ग्ग-पद ॥५६॥
शुनु रावण दशमाथ, रहित-पुण्य सौँ महि-पतन ॥५७॥
विष्णुक हाथ विनाश, जनिकर से हरिगति पहुँच ॥५८॥
जेहन शुद्धाकाश, निर्म्मल मन नहि वासना ॥५९॥

भावार्थः

सन्तकुमार ई सुनिकय क्षण भरि लेल मौन भ’ समाधि लगाकय देखलनि, फेर रावणक हितार्थ ओकरा समुचित उत्तर देलनि – “हे वत्स लंकापति रावण, सुनू । ओ छथि अव्यय (विकारहीन) नारायण; जिनका मे नाममात्रक दुःख नहि अछि । ओ सारा विश्व केर भरण करयवला छथि । हुनक जन्म नहि होइत अछि । हुनकहि बल सँ देवगण युद्ध मे विजय पबैत छथि, आर योगी सब सतत हुनकहि ध्यान करैत आर नाम जपैत संसार-सागर केँ पार करैत छथि ।” फेर रावण पुछलक – “जे राक्षस आदि विष्णुक हाथ सँ लड़ाइ मे मरिकय काल केर वश होइत अछि ओकर कि गति होइत छैक ?” सनत्कुमार उत्तर देलनि – “हे दशमुख रावण, सुनू । जे कियो राक्षस देवताक हाथ सँ मरैत छथि से स्वर्ग जाइत छथि; पुण्य समाप्त भेला उपरान्त फेर धरती पर खसैत छथि । जे विष्णुक हाथ सँ मरैत छथि, ओ विष्णुलोक पहुँचैत छथि । हुनकर मन ओहिना निर्मल आ वासनाहीन भ’ जाइत छन्हि, जेना बिना मेघ-धुराक स्वच्छ आकाश ।” ॥४८-५९॥

।चौपाइ।

रावण शुनल मुनिक मुख वचन । मन मन करय लगल भल रचन ॥६०॥
समर करब हम विष्णुक सङ्ग । रावण-मन सङ्कल्प अभङ्ग ॥६१॥
मुनि जानल रावण मन-वृत्ति । कहलनि भल थल चित्त-प्रवृत्ति ॥६२॥
सिद्ध अभीष्ट विगत किछु काल । चिन्ता करु जनु मन दशभाल ॥६३॥
तनिक स्वरूप कहै छी आज । स्थावर जङ्गम सभ सम्राज ॥६४॥
एक वस्तु नहि हुनि सौँ हीन । अन्तर अन्तर सभ मे लीन ॥६५॥
नद ओ नदी जलधि जत नीर । पर्व्वत पृथिवी गगन शरीर ॥६६॥
ओ सावित्री ओ ओङ्कार । ओ पुन सत्य समस्ताधार ॥६७॥
कच्छप शेष धरणिधर जतेक । अनल आदि जत ओ प्रभु एक ॥६८॥
जे जे पड़यिछ अहँ काँ दृष्टि । से सभटा थिक से प्रभु सृष्टि ॥६९॥
ओ प्रभु सकल चराचर व्याप्त । हुनकहि मे पुन अन्त समाप्त ॥७०॥
नीलोत्पलदल-सुन्दरश्याम । चपला-वर्णाम्बर अभिराम ॥७१॥
जम्बूनद-रुचि श्री तन वाम । प्रेम परस्पर प्रभु गुणधाम ॥७२॥
हिनका देखि शकथि नहि आन । ओ प्रभु अपनहि अपन समान ॥७३॥
हुनकर भक्त ततहि रत-प्राण । ततहि निरन्तर मन सज्ञान ॥७४॥
मननादिक सौँ निर्मल नयन । तनिका हृदय करथि प्रभु शयन ॥७५॥
जौँ अछि हुनकर दर्शन काज । त्रेता मे हयता रघुराज ॥७६॥
दशरथ-सुत तनि आज्ञा पाबि । माया-लीला करता आबि ॥७७॥
निजमाया काँ लयोता सङ्ग । दण्डक-वन मुनिजन दुखभङ्ग ॥७८॥
अनुज-सहित वन वन सञ्चरत । कहु कत नरवर लीला करत ॥७९॥
अहुँ हुनि प्रभु मे भक्ति बढ़ाउ । सभ जनितहिँ छी कते पढ़ाउ ॥८०॥

भावार्थः

रावण ऋषि सनत्कुमार केर मुँह सँ ई बात सुनिकय मनहि-मन सोचल लागल जे विष्णुक संग लड़ाइ कयल जाय । ओ मन मे दृढ़ता सँ ठानि लेलक । मुनि सनत्कुमार रावणक मोनक बात ताड़ि गेलाह आ कहला – “अहाँक मन मे जे बात आयल अचि से ठीक अछि । किछु दिनक बाद अहाँक ई कामना पूरा होयत । हे रावण, अहाँ चिन्ता जुनि करब । आइ हम ओहि परमेश्वरक वर्णन करैत छी । चल या अचल सब वस्तु पर हुनकहि प्रभुत्व अछि । एकहु टा चीज नहि जाहि मे ओ नहि होइथ । ओ हरेक अन्तःकरण मे छिपल रहैत छथि । नद, नदी, समुद्र आदि जेहो जलराशि अछि, पर्वत, पृथ्वी आर आकाश सब हुनकहि शरीर थिक । सावित्री वैह छथि, ॐकार वैह अछि । सब वस्तुक आधार व सत्य वैह छथि । धरती केँ धारण करयवला कच्छप, शेषनाग आदि सेहो वैह छथि । अग्नि आदि जे तेज अछि, सेहो एकमात्र वैह छथि । अहाँक नजरि मे जे कोनो चीज अबैत अछि, ओ सब वैह प्रभुक बनायल अछि । ओ चल या अचल हरेक वस्तु मे व्याप्त छथि । हरेक वस्तु प्रलय भेला पर फेर हुनकहि मे लीन भ’ जाइत अछि । राम नीलकमलक पंखुड़ीक समान मनोहर साँवला छथि आर हुनक वस्त्र बिजली-जेकाँ चमकैत मनोहर पियर अछि । बामा मे हुनक अर्धांगिनी सीता सुनहरा वर्णक छथि । दुनू मे आपस मे प्रेम अछि । हमरा सभक प्रभु राम गुण सभक खजाना छथि । हिनका कियो आर नहि देखि सकैत अछि । ओ प्रबु अपना समान अपने असगरे छथि । हुनकर भक्त लोकनिक प्राण सदैव हुनकहि मे रहल रहैत अछि, हुनका सबक मन हुनकहि मे लागल रहैत छन्हि । जे श्रवण, मनन आदि साधना द्वारा अपन दृष्टि केँ निर्मल बना लेने अछि ओकर हृदय मे प्रभु सुतल रहैत छथि । अगर अहाँ हुनकर दर्शन चाहैत छी त देखब, त्रेता मे ओ रघुवंशी राजा दशरथक पुत्र बनिकय जन्म लेताह आ राजा दशरथक आज्ञा पाबिकय एतय आबिकय मायावश अपन लीला करताह । ओ अपन माया (सीता) केँ संग लेने अओता आर दंडकारण्य मे मुनि लोकनिक दुःख दूर करताह । अपन छोट भाइक संग वन-वन मे भटकता आ पुरुषोत्तम केर बहुते रास लीला सब करताह । अहाँ सेहो ओहि प्रभुक भक्ति करू । अहाँ त सब किछु जनिते छी, अहाँ केँ आर कतेक पढ़ाउ ।” ॥६०-८०॥

।सोरठा।

कहलनि सनत्कुमार, रावण कयल विचार मन ॥८१॥
करब विरोध प्रकार, मरब समर कय वीरता ॥८२॥
रावण हर्षित-चित्त, युद्धार्थी सभ लोक फिर ॥८३॥
सीताहरण निमित्त, अपनैँक हाथेँ मरण हो ॥८४॥

भावार्थः

जखन सनत्कुमार एना कहलनि तखन रावण मोन मे ई निर्णय कयलक जे हुनका सँ शत्रुता करब आ लड़ाइ मे वीरता कय केँ हुनकर हाथ सँ मरब । रावण प्रसन्न भ’ कय उठल । ओ लड़ाइ ठनबाक लेल भरि दुनिया भटकय लागल । ओ मनहि-मन बाजय – “हे प्रभु, सीताक हरण केँ कारण बनाकय हम अहाँक हाथ सँ मारल जायब ।” ॥८१-८४॥

।दोहा।

पढ़थि शुनाबथि शुनथि जे, ई चरित्र सभ योग्य ॥८५॥
सुख अनन्त आयुष्य बढ़, बढ़ अनन्त आरोग्य ॥८६॥

भावार्थः

जे कियो ई कथा (चरित्र) केँ पढ़ता, सुनता अथवा सुनेता, हुनका सब केँ अपार सुख भेटतन्हि, आयु लम्बा हेतन्हि तथा आरोग्य सेहो बढ़तन्हि ॥८५-८६॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे तृतीयोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक तेसर अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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