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मिथिलाभाषा रामायण – उत्तरकाण्ड पहिल अध्यायः रावणक जन्म केर कथा

616 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अथ उत्तरकाण्ड

उत्तरकाण्ड – प्रथम अध्याय

रावणक जन्म केर कथा

।दोबय छन्द।

जय रघुवंश-तिलक कौशल्या-नन्दन-दशरथ-बालक ॥१॥
दशमुख-नाशक पङ्कज-लोचन, जय मुनिजन-प्रतिपालक ॥२॥

भावार्थः

रघुवंश केर तिलक (रघुकुल केर श्रेष्ठ), कौशल्या ओ दशरथ केर पुत्र, दशमुख (रावण) केर विनाशकर्ता, ऋषि-मुनि केर प्रतिपालक पंकजलोचन (कमलनयन) राम केर जय हो ॥१-२॥

।चौपाइ।

एक समय गिरिराज-कुमारि । शिव काँ पूछल समय विचारि ॥३॥
रावणादि काँ मारल राम । राजा भेला अयोध्या-धाम ॥४॥
भूतल रहला ओ कति वर्ष । श्री सीता सह बास सहर्ष ॥५॥
से कयलनि महि-मण्डल त्याग । तृप्ति न कथा सुधा-सम लाग ॥६॥
शिव कहलनि शुनु प्रिया महेशि । कथा पुछल अछि अपनैँ बेसि ॥७॥
राम अकण्टक महि सुरराज । मुनिगण अयला आशिष काज ॥८॥

भावार्थः

एक समय उचित अवसर पाबिकय हिमलायक बेटी गिरिजा शिवजी सँ पुछलिह – “रामजी रावण केँ मारलनि । अयोध्या मे राजा भेलाह । सीताक संग आनन्दपूर्वक रहैत धरती पर कतेको वर्ष बितौलनि । फेर ओ पृथ्वी केँ छोड़िकय चलि गेलाह । ई कथा त हमरा अमृत समान नीक लागल । सुनैत-सुनैत मोन तृप्त नहि भेल ।” शिवजी कहलनि – “सुनू हे प्रिये गिरिजा ! अहाँ बहुत सुन्दर कथा-प्रसंग पुछलहुँ अछि । राजा राम निष्कंटक भ’ धरती पर इन्द्र समान राज करैत रहथि । एक दिन हुनका आशीर्वाद देबाक लेल मुनि लोकनिक एकटा मंडली आयल ॥३-८॥

।दोबय छन्द।

विश्वामित्र कण्व दुर्व्वासा, सित भृगु शिष्य अनेक ॥९॥
अत्रि अङ्गिरा वामदेव सभ, निर्मल सकल विवेक ॥१०॥
मुनि-मण्डली शिष्यसौँ परिवृत, अयला तथा अगस्त्य ॥११॥
द्वारपालकाँ कहलनि सभ मुनि, कोमल वचन प्रशस्त्य ॥१२॥

भावार्थः

एहि मंडली मे विश्वामित्र, कण्व, दुर्वासा, सित, भृगु, अत्रि, अंगिरा, वामदेव आदि अपन-अपन शिष्यक संग छलाह । ई सब गोटे अत्यन्त निर्मल (निष्कलुष) आ सम्पूर्ण विवेकी (सर्वज्ञ) रहथि । शिष्य लोकनिक घेरा  मे ओतय अगस्त्य मुनि सेहो पहुँचलाह । ओ लोकनि कोमल (मीठ) वाणी मे द्वारपाल केँ अयबाक प्रयोजन बुझबैत कहलनि – ॥९-१२॥

।जयकरी छन्द।

प्रतीहार बुझि सभ मुनि नाम । कहबनि आयल छथि एहिठाम ॥१३॥
नृप काँ आशीष देबक काज । आगत छी मुनि-मण्डलि आज ॥१४॥
द्वारपाल से बुद्धि-विशाल । गेला जतय राम महिपाल ॥१५॥
बद्धाञ्जलि ओ कयल प्रणाम । मुनि-आगमन कहल तहिठाम ॥१६॥
मुनि अगस्ति छथि बहुत चिन्हार । आशिष देता वृत्त छथि द्वार ॥१७॥
द्वारपाल काँ कहलनि राम । आदर सौँ आनू एहि ठाम ॥१८॥
नानारत्न-विभूषित धाम । पूजित मुनि गेला तहि ठाम ॥१९॥
मुनि-अभिमुख प्रभु जोड़ल हाथ । पूजा सविधि कयल रघुनाथ ॥२०॥
अर्घ्यादिक उत्तर गोदान । पृथक पृथक मुनिजन सन्मान ॥२१॥
सभ काँ कयलनि राम प्रणाम । दिव्यासन देलनि तहि ठाम ॥२२॥
सभ काँ कुशल पुछल रघुवीर । दिनमणि-वंश-शिरोमणि धीर ॥२३॥
सभ मुनि कहल कुशल सभ ठाम । रावणादि मारल सङ्ग्राम ॥२४॥
नहि आश्चर्य धनुष धय हाथ । सकल-लोक-जित श्री रघुनाथ ॥२५॥
अति अद्भुत घननादक मरण । तनिक विजय रण साहस करण ॥२६॥
शुनि मुनि-वचन कहल श्रीराम । मेघनाद छल की बलधाम ॥२७॥
कुम्भकर्ण रावण अति वीर । कालहु काँ मन जतय न थीर ॥२८॥
काँपथि थर थर निकट न जाथि । देखयित तनिकाँ गमहि पड़ाथि ॥२९॥
मेघनाद तनिकहुँ सौँ शूर । कहल जाइ अछि नहि किछु फूर ॥३०॥

भावार्थः

“हे द्वारपाल, हम समस्त मुनिजनक नाम जानिकय अहाँ राजा सँ कहियौन जे आइ राजा केँ आशीर्वाद देबाक लेल मुनि लोकनिक ई दल एतय आयल छथि ।” ओ बुझयवला द्वारपाल ओतय गेल जाहिठाम राम रहथि । ओ हाथ जोड़िकय प्रणाम कयलक आ मुनि लोकनिक अयबाक बात सुनेलक । फेर द्वारपाल कहलक – “अगस्त्य मुनि जे अपनेक परम परिचित छथि सेहो आशीर्वाद देबाक लेल द्वार पर उपस्थित छथि ।” रामजी द्वारपाल सँ कहलनि – “हुनका सब गोटे केँ आदरक संग एतय आनि लियौन ।” राजभवन भाँति-भाँतिक रत्न सब सँ सजल छल । सत्कारक संग मुनि लोकनि ओतय अयलाह । राम मुनि लोकनिक सोझाँ हाथ जोड़ने ठाढ़ भेलाह आ उचित रीति सँ हुनका लोकनिक पूजा कयलनि । अलग-अलग हरेक मुनि केँ पहिने आदरपूर्वक अर्घ्य आदि देलनि, आर अन्त मे गोदान देलनि । फेर सब गोटे केँ प्रणाम कयकेँ ओहिठाम हुनका सब केँ बैसबाक लेल दिव्य आसन देलनि । तखन सूर्यवंशी मे श्रेष्ठ धीर राम सब गोटे सँ कुशल पुछलनि । सब मुनि लोकनि कहलनि – “सब ठाम कुशल अछि । अपने युद्ध मे रावण आदि राक्षस सभक संहार कयलहुँ, एहि मे कोनो आश्चर्य नहि जे अपने अपन हाथ मे धनुष्य लय केँ तीनू भुवन केँ जितलहुँ । मेघनाद समान अत्यन्त अद्भुत शक्तिशाली राक्षस मारल गेल, से एकटा अद्भुत घटना भेल । युद्ध मे ओकरा जितनाय साहसक बात थिक ।” मुनि लोकनिक ई बात सुनिकय रामजी कहलनि – “मेघनाद अद्भुत बलवान रहय । कुम्भकर्ण आ रावण सेहो अद्भुत वीर छल । ओकर सोझाँ काल सेहो घबरा जाइत छल । डर सँ काँपैत रहैत छल । ओकरा लगो नहि जा सकैत छल । ओकरा देखिते चुपेचाप भागि जाइत छल । मुदा मेघनात त ओकरो सँ बेसी बहादुर कहल जाइत छल, से यथार्थ बात अछि ।” ॥१३-३०॥

।दोहा।

कहलनि तखन अगस्ति मुनि, शुनु ईश्वर रघुनाथ ॥३१॥
जन्म कर्म्म वरदान विधि, जे पाओल दशमाथ ॥३२॥

भावार्थः

तखन अगस्त्य मुनि कहलनि – “हे भगवान राम, सुनल जाउ । हम बतबैत छी जे रावणक जन्म केना भेल, ओ केहेन काज कयलक आ केना वरदान प्राप्त कयलक ॥३१-३२॥

।चौपाइ।

मुनि पुलस्त्य विधि-तनय महान । मेरु निकट तप कर विद्वान ॥३३॥
तृणविन्दुक आश्रम मे जाय । कृतयुग मे एक धर्म्म सहाय ॥३४॥
सुर-गन्धर्व्व-कन्यका आब । अति रमणीयक आश्रम पाब ॥३५॥
गाबय नाचय वाद्य बजाय । हसय बहुत नहि एक लजाय ॥३६॥
बड़ि निरहटि सटि मुनि लग जाय । अतिशय उनमति युवता पाय ॥३७॥
मुनि मन बाढ़ल अतिशय कोप । करति तपोविधि जनु ई लोप ॥३८॥
हमर दृष्टिपथ अयोती नारि । गर्भवती हयतीह कुमारि ॥३९॥
बड़ दुःप्रथा कथा जे शून । केओ हुनि मुनि लग आब न पून ॥४०॥
तृणविन्दुक कन्या अज्ञात । मुनि-दृग-गोचर भेली प्रात ॥४१॥
भेलि गर्भिणी मन सन्ताप । गेलि तहाँ जहाँ छलथिनि बाप ॥४२॥
से राजर्षि बुझल वृत्तान्त । ज्ञान-नयन सौँ मुनिक नितान्त ॥४३॥
कन्या लय तृणविन्दु उदार । मुनि पुलस्त्य काँ कयल सदार ॥४४॥
मुनिसेवा मे लागलि रहथि । करथि टहल से मुनि जे कहथि ॥४५॥
सेवा-तुष्ट देल वरदान । कन्या काँ से मुनि भगवान ॥४६॥
उभयवंश-वर्द्धन एक तनय । हयतौ सदाचार सद्विनय ॥४७॥
विश्रुत-लोक विश्रवा नाम । तनिकाँ पुत्र भेला गुणधाम ॥४८॥
पिता-तुल्य तप ब्रह्मज्ञान । ख्यात महामुनि तपोनिधान ॥४९॥
देखल शीलादिक समुदाय । भरद्वाज तनि कयल जमाय ॥५०॥
तहि कन्या मे तनय धनेश । जनिकाँ अति प्रिय मित्र महेश ॥५१॥
विदित विरञ्चिक बहुत दुलार । पितातुल्य तप कयल अपार ॥५२॥
तनिकाँ विधि देलनि वरदान । वित्त अखण्डित वर विज्ञान ॥५३॥

भावार्थः

ब्रह्माक पुत्र पुलस्त्य नामक एक मुनि रहथि, जे बहुत पैघ विद्वान् छलथि, मेरु पर्वत लग तृणविन्दुक आश्रम मे जाकय तपस्या करय लगलाह, कियैक तँ कलियुग मे त धर्म मात्र सहारा अछि । देवता आ गन्धर्व लोकनिक कन्या लोकनि ओहि आश्रम केँ परम आकर्षक देखि ओहिठाम अबैत छलिह, बाजा बजा-बजाकय नाचैत, गबैत आ खिलखिला-खिलखिलाकय हँसय जाइत छलिह । कियो लजाइतो तक नहि छलिह । ओ सब बहुते ढीठ जेकाँ मुनिक एकदम नजदीक चलि गेल करैत छलिह । ओ सब यौवनावस्था मे एकदम उन्मत्त जेकाँ भ’ गेल छलिह । मुनि पुलस्त्य केर मन मे बहुते क्रोध भेलनि । हुनका बुझेलनि जे लड़की सब हुनकर तपस्या केँ भंग कय देतिह । ओ शाप देलनि – “जे लड़की हमर नजरि केर सामने आयत ओ कुमारिये मे गर्भवती भ’ जायत ।” जाहि-जाहि लड़कीक कान मे ई कुरीतिक बात पड़लैक, ओ सब फेर ओहि मुनिक सोझाँ कहियो नहि गेल । मुदा ऋषि तृणविन्दुक बेटी, जे ई बात नहि जनैत छलथि, भोरहि भोर मुनि पुलस्त्यक नजरिक सोझाँ आबि गेलथि । ओ गर्भवती भ’ गेलिह, ई जानिकय बड़ा चिन्तित भेलिह आर ओ ओतय गेलिह जेतय हुनक पिता छलथि । राजर्षि तृणविन्दु अपन सर्वज्ञ दृष्टि सँ मुनि पुलस्त्यक सारा हाल जानि गेलथि । फेर उदार विचारवला ऋषि तृणविन्दु अपन कन्या केँ लय जाकय मुनि पुलस्त्यक हाथ सौंपि देलनि । पुलस्त्य हुनका सँ विवाह कय लेलनि । तहिया सँ ओ लड़की मुनि पुलस्त्यक सेवा मे लागि गेलिह, आर मुनि पुलस्त्य हुनका वरदान देलन्हि – “अहाँक एकटा पुत्र होयत जे माता आ पिता दुनू गोटेक वंश बढ़ायत, बहुत नीक आचरणवला आ विनीत होयत । ओहि कन्या सँ विश्रवा नामक पुत्र भेलनि । ओ तीनू भुवन मे विख्यात आ परम गुणवान भेलाह । ओ अपन पितेक समान तपस्वी आ ब्रह्मज्ञानी निकललाह । ओ अपन तप केर कारण महामुनिक रूप मे विख्यात भ’ गेलाह । भरद्वाज मुनि ओहि विश्रवा मे शील आदि सब वांछित गुण देखिकय हुनका अपन जमाइ बना लेलनि । विश्रवा केँ ओहि कन्या सँ एकटा पुत्र धनेश भेलथि, जिनकर शिव अत्यन्त प्रिय मित्र छलथि । हुनका ब्रह्माक स्नेह सेहो खूब भेटल करन्हि । ओहो अपन पिताक समान भारी तपस्या कयलनि । तपस्या सँ प्रसन्न भ’ ब्रह्मा हुनका वर देलखिन्ह – “अहाँ अक्षय सम्पत्तिवला होयब, आर अहाँ केँ उत्तम ज्ञान प्राप्त  होयत ।” ॥३३-५३॥

।सोरठा।

वर विरञ्चि सौँ पाबि, ब्रह्म-दत्त पुष्पक चढ़ल ॥५४॥
विश्रवाक लग आबि, कहल तपस्या-फल सकल ॥५५॥

भावार्थः

ब्रह्मा सँ ई वर पाबिकय ओ लड़का ब्रह्माक देल पुष्पक रथ पर चढ़िकय अपन पिता विश्रवा लग गेलाह आ अपन तपस्याक परिणाम हुनका बतौलनि ॥५४-५५॥

।चौपाइ।

ब्रह्मा देल अखण्डित वित्त । वासस्थान न हमर निमित्त ॥५६॥
हिंसा-शून्य रही जत जाय । देल जाय सुखवास देखाय ॥५७॥
अछि सुत थल भल अहँइक योग । लङ्का बसू करू धन भोग ॥५८॥
विश्वकर्म्म-निर्म्मित ओ वास । परक कदापि परत नहि त्रास ॥५९॥
कहइत छी लङ्का-वृत्तान्त । भेल सुरासुर-समर नितान्त ॥६०॥
विष्णुक त्रासित असुर पड़ाय । रहल रसातल जाय नुकाय ॥६१॥
सागरमध्य पुरी मे वास । कयल धनद सुखमय निस्त्रास ॥६२॥
छला बहुत दिन ततहि धनेश । दिन दिन उज्वल भेल सुदेश ॥६३॥
राक्षस एक सुमाली नाम । अयला एक समय तहिठाम ॥६४॥
युवती कन्या तनिकाँ सङ्ग । जनु तनु प्रथम निवास अनङ्ग ॥६५॥
श्रीदेवी सम तनिकर रूप । चिन्तातुर राक्षस चुपचूप ॥६६॥
पुष्पक चढ़ल धनेश निहारि । राक्षस अपना चित्त विचारि ॥६७॥
कन्या काँ राक्षस से कहल । तोहरा समय कहय किछु रहल ॥६८॥
कन्या कहल कहू हे तात । करब न वचनक प्रत्याख्यात ॥६९॥
ब्रह्म-कुलोद्भव वर करु वरण । तनय हयत सभ सङ्कट-हरण ॥७०॥
धनदक सदृश रूप-सम्पन्न । करु गय पुत्रि पुत्र उत्पन्न ॥७१॥
विश्रवाक से आश्रम जाय । ठाढ़ि भाल चिर समय लजाय ॥७२॥
धरणी लिखथि चरण सौँ ठाढ़ि । चिन्ता एकाकिनि मन बाढ़ि ॥७३॥
अये के अहँ मुनि पुछल कि काज । कर जोड़ि कहल रहल नहि ब्याज ॥७४॥
ध्यानहिँ विदित होयत वृत्तान्त । आइलि छी एकसरि एकान्त ॥७५॥
मुनि कहलनि कयलह उत्पात । पुत्रार्थिनि मानस हो ज्ञात ॥७६॥
अयिलिह आश्रम दारुण काल । दारुण दुइ सुत लाभ विशाल ॥७७॥
कहल केकसी अति अन्याय । लोह सुवर्ण परशमणि पाय ॥७८॥
अपनहुँ सौँ जौँ एहने हयत । मर्य्यादा धर्म्मक उठि जयत ॥७९॥
मुनि पुन कहलनि सभहिक छोट । महा-भागवत से सुत गोट ॥८०॥
करथि केकसी निज निर्व्वाह । बितल कतो दिन चलल प्रवाह ॥८१॥
रावण लेल प्रथम अवतार । बीश बाहु दश गोट कपार ॥८२॥
धरणी-कम्प बहुत उतपात । कुम्भकर्ण दोसर सुत जात ॥८३॥
पर्व्वत सन तन कहल न जाय । देखितहिँ के नहि लोक डराय ॥८४॥
सूर्प्पनखा भेली उतपन्नि । जेहने भाय तेहनि अनमन्नि ॥८५॥
लेल विभीषण वर अवतार । अतिसुन्दर सुन्दर व्यवहार ॥८६॥
कर्म्म-परायण नियताहार । स्वाध्यायी से परमोदार ॥८७॥
जन – भय – कर रावण तन बाढ़ । कुम्भकर्ण पर्वत सन ठाढ़ ॥८८॥
सञ्चर ऋषिगण काँ धय खाथि । कुम्भकर्ण नहि कतहु अघाथि ॥८९॥
कहल राम काँ गत वृत्तान्त । कि कहब अपनैँ लक्ष्मीकान्त ॥९०॥
साक्षी सर्व्व हृदय मे वास । नित्योदित निर्म्मल निस्त्रास ॥९१॥
प्रभु सर्वज्ञ कहल किछु आबि । अपनैँक दयादृष्टि केँ पाबि ॥९२॥

भावार्थः

ओ कहलनि – “ब्रह्माजी हमरा अक्षय सम्पत्ति तँ दय देलनि, मुदा हमरा लेल कोनो वासस्थान नहि देलनि । जेतय जाकय हम निष्कंटक रही, एहेन सुखद वासस्थान कृपया बता देल जाउ ।” विश्रवा कहलखिन – “हे पुत्र, अहाँ योग्य एकटा सुन्दर स्थान अछि लंका । ओतय जाकय बसि जाउ आ वर मे भेटल सम्पत्तिक भोग करू । ओ नगर विश्वकर्माक बनायल छन्हि । ओतय कखनहुँ शत्रु सँ डर नहि अछि ।” (अगस्त्य मुनि आगू कहैत छथि – ) सुनू, हम लंकाक इतिहास बतबैत छी । एक समय देवता आ दानव मे भारी लड़ाइ भेल । विष्णु सँ डराकय दानव सब भागि गेल आर रसातल मे जाकय नुका गेल । कुबेर समुद्र मे एकटा वासस्थल बनौलक जे सुखद सेहो छल आ निरापद सेहो । कुबेर बहुते दिन धरि ओतहि रहल । ओ स्थान दिनानुदिन उजागर होइत गेल । एक दिन सुमाली नामक एकटा राक्षस ओतय आयल । ओकरा पास एकटा सियान (युवती) कन्या छलैक । ओ बड सुन्दर छलैक, मानू कामदेव पहिल-पहिल ओकरहि शरीर मे वास केने होइथ । ओकर रूप भगवती लक्ष्मीक समान छलैक । आर ओ सुमाली राक्षस चिन्ता मे मग्न गुमसुम ओतय बैसल छल । ओ पुष्पक विमान पर कुबेर केँ देखलक आ अपना मन मे किछु विचारिकय अपन लड़की सँ कहलक – “हम तोरा सँ किछु कहय चाहैत छी ।” लड़की कहलक – “हे पिताजी, जे कहय चाही, कहू । अहाँक बात हम कखनहुँ नहि टारब ।” पिता कहलक – “ब्रह्माक कुल मे उत्पन्न भेल महानुभाव केँ तूँ अपन पति बना आ ओकरा सँ तोरा सब संकट दूर करयवला बेटा हेतौक । हे बेटी, तूँ एहि धनेश केर समान रूपवान् पुत्र केँ जन्म दे ।” ई सुनिकय ओ लड़की विश्रवाक आश्रम मे गेल आ बहुतेकाल धरि ठाढ़ रहल । ओ अपन पैरक नह सँ धरती पर लकीर सब बनबैत अछि । अकेले मे ओकर मोन मे चिन्ताक बाढ़ि आबि गेल छलैक । मुनि विश्रवा पुछलखिन – “अरे, अहाँ के थिकहुँ ? अहाँ केँ कोन काज अछि ?” लड़की हाथ जोड़िकय खुलिकय सब बात कहि देलिह – “अपने केँ तँ सबटा हाल योगबल सँ पते होयत । हम एतय असगर एकान्त मे आयल छी ।” मुनि कहलनि – “अहाँ त झंझट पैदा कय देलहुँ । लगैत अछि जे अहाँक मन मे पुत्र प्राप्तिक कामना अछि । अहाँ दारुण समय मे आश्रम मे आयल छी, तेँ अहाँ केँ दुइ गोट दारुण पुत्र होयत ।” ओ लड़की ‘केकसी’ कहलक – “अजीब बात छैक । पारस पाबिकय लोहा सेहो सोना नहि होयत ? यदि अहाँ संग कयलो सँ एना होयत त धर्मक प्रतिष्ठा कि रहि जायत ?” ई सुनिकय मुनि आगू कहलखिन – “हाँ, जे सब सँ छोट लड़का होयत ओ परम भागवत (भगवद्भक्त) होयत ।” एकर बाद ओ केकसी अपन गुजर करय लगलिह । किछु दिन बितल । फेर सन्तान होयब शुरू भ’ गेल । सब सँ पहिने रावण जन्म लेलक आ जेकर दस टा माथ आ बीस टा बाँहि छलैक । ओकरा जन्म लैत देरी धरती काँपि उठल तथा आरो बहुत रास अपशकुन भेल । दोसर बेटा कुम्भकर्ण भेल । ओकर शरीर पर्वत-जेकाँ विशाल छलैक; के एहेन होयत जे देखिते डरा नहि जाय । तेकर बाद सूर्पनखा जन्म लेलक, जे भयंकरता मे हू-ब-हू ओहने छल जेहेन ओकर भाइ । तेकर बाद विभीषण जन्म लेलक जे देखय मे परम सुन्दर छलथि आर व्यवहार मे सेहो । ओ धर्म मे रत रहल करथि, आहार-विहार मे संयम राखल करथि, शास्त्र सभक अध्ययन करैत रहैत छलथि तथा बहुत उदार हृदयक रहथि । लोक केँ देखिते डरा दयवला रावणक शरीर बढ़ैत गेलैक आ कुम्भकर्ण पहाड़क समान ठाढ़ भ’ गेल । जहाँ-तहाँ घुमल करय आ ऋषि लोकनि केँ पकड़ि-पकड़ि खा गेल करय । कुम्भकर्ण कतहु अघाइत नहि छल ।” अगस्ति रावणक एतबा पूर्वकथा सुनाकय बजलाह – “कि सुनाउ, अपने तँ भगवान विष्णुक अवतार छी । सभक हृदय मे साक्षीक रूप मे वास करैत छी । सदा प्रकट रहैत छी, निष्कलुष छी, आर निर्भय छी । हे प्रभु, अहाँ तँ सर्वज्ञ छी । तैयो अहाँ दयादृष्टि पाबिकय हम आबिकय किछु कहलहुँ ।” ॥५६-९२॥

।सोरठा।

अति प्रसन्न-मन राम, कुम्भज मुनि सौँ से कहल ॥९३॥
अपनहुँ छी निष्काम, हमर कृपा निर्भय सदा ॥९४॥

भावार्थः

अगस्ति मुनि सँ ई सब सुनिकय राम परम प्रसन्न भेलथि आ कहलथि – “अपनहुँ तँ साधना द्वारा कामना सँ रहित भ’ गेल छी । अहाँ सदा हमर कृपा सँ निःशंक रहब ।” ॥९३-९४॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे उत्तरकाण्डे प्रथमोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे उत्तरकाण्डक प्रथम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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