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मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड – सोलहम अध्यायः राज्याभिषेक पर इनाम बाँटब, विभीषण आदि केँ विदा करब, रामायणक माहात्म्य

463 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

लङ्काकाण्ड – सोलहम अध्याय

राज्याभिषेक केर उपलक्ष मे इनाम बाँटब, विभीषण आदि केँ विदा करब, रामायणक माहात्म्य

।चौपाइ।

रामक भेल जखन अभिषेक । महाराज काँ नीति विवेक ॥१॥
सकल लोक काँ अति सुख प्राप्त । सकल शस्य सौँ धरणी व्याप्त ॥२॥
भल भल सुफल महीरुह लाग । राम नृपति प्रकृतिक बड़ भाग ॥३॥
जे छल सुमन गन्ध सौँ रहित । भेल अपूर्व्व सुगन्धिक सहित ॥४॥
घोड़ा दान हजार हजार । धेनु दान कर परमोदार ॥५॥
शत शत वृषभ विप्र काँ देथि । आशिष शिष्टलोक सौँ लेथि ॥६॥
तीस कोटि पाओल भल दान । वर सुवर्ण ब्राह्मण गुणवान ॥७॥
वस्त्राभरण रत्न वसु आन । नित नित ब्राह्मण जन काँ दान ॥८॥
सूर्य्यकान्ति सम रत्न उदार । देल सुग्रीव-गरा मे हार ॥९॥
अङ्गद काँ अङ्गद देल राम । लगला करय सुयश सभ ठाम ॥१०॥
चन्द्रकोटि मणि-रत्न सुहार । वैदेही काँ देल उदार ॥११॥
पहिरि हार निज कर मे धयल । दृष्टि पवन-नन्दन दिश कयल ॥१२॥
प्रभु-मुख वारहिँ वार निहार । हार-दान मे केहन विचार ॥१३॥

भावार्थः

जखन रामक राज्याभिषेक भेलनि, आर नीति एवं विवेक सँ युक्त महाराज भेलाह, तखन सब गोटे सुखी भ’ गेल । धरती उपजा (फसल) सँ परिपूर्ण भ’ गेल । गाछ सब मे नीक-नीक फल लागय लागल । राम राजा छथि । प्रजाक भाग्य जागि गेल अछि । जे फूल सौरभ सँ हीन होइत छल ताहि मे अजीब सुगन्ध आबि गेल । हजार-हजार घोड़ा आ हजार-हजार दुधारू गाय सभक दान उदारताक संग कयल गेल । सौ-सौ गोट बरद ब्राह्मण सब केँ दैत छथि शिष्टजन सब सँ आशीर्वाद लैत छलथि । गुणवान् ब्राह्मण लोकनिक केँ तीस करोड़ स्वर्णमुद्रा भेटलनि । रोज-रोज ब्राह्मण लोकनि केँ वस्त्र, गहना, रत्न आ अन्यान्य धन दान मे देल जाइछ । उदार राम सूर्यकान्त जेहेन दुर्लभ रत्न सभक हार सुग्रीव केर गला मे देलनि । राम अंगद केँ अंगद नामक बाँहि पर गहना देलनि । ओ सर्वत्र अपन यश केर प्रसार करय लगलाह । दानी राम चन्द्रकान्त मणिक एक सुन्दर हार सीता केँ देलनि । सीता ओ हार पहिरलनि आर फेर ओकरा उतारि अपन हाथ मे लय अपन नजरि हनुमानजी पर देलनि । फेर बेर-बेर रामक मुँह जोहय लगलिह जे हुनकर केहेन प्रतिक्रिया होइत छन्हि ॥१-१३॥

।दोहा।

जतय तुष्ट मन अहँक अछि, दिय तनि जन काँ हार ॥१४॥
वैदेही काँ कहल प्रभु, हमरो सैह विचार ॥१५॥
हार देल हनुमान काँ, लेल से कण्ठ लगाय ॥१६॥
बद्धाञ्जलि नत ठाढ़ तहँ, भक्ति कहल की जाय ॥१७॥

भावार्थः

रामजी कहलनि – “जेतय अहाँक मन चाहय, हुनका अहाँ हार दय सकैत छी । हमरहु वैह मे सहमति अछि ।” सीता ओ हार हनुमानजी केँ देलिह । हनुमानजी ओकरा गला मे लगा लेलनि । फेर हाथ जोड़ि, माथ झुकाकय ठाढ़ भ’ गेलाह । हुनक भक्तिक वर्णन मे कि कहल जाय ! ॥१४-१७॥

।चौपाइ।

वर अभिलाषित माँगु हनुमान । कहलनि रघुनन्दन भगवान ॥१८॥
त्रिभुवन सुर-दुर्लभ वरदान । देब अहाँक समान न आन ॥१९॥
कहि नहि हो हनुमानक हर्ष । गद गद कण्ठ नयन जल वर्ष ॥२०॥
यावत अपनैँक रह जन नाम । तावत हमहुँ रही तहि ठाम ॥२१॥
रहय निरन्तर नामस्मरण । प्रभुक चरण-वश अन्तष्करण ॥२२॥
ई वर छोड़ि न माँगब आन । छल सौँ रहित कहल हनुमान ॥२३॥
राम तथास्तु कहल तहि ठाम । जीवन्मुक्त अहाँ गुणधाम ॥२४॥
कल्पान्तहु हमरे सायुज्य । सतत सुखी रहु तन नैरुज्य ॥२५॥
वैदेही देलनि वरदान । जतय ततय बसु गय हनुमान ॥२६॥
ततहि मनोभिलाषित फल पयब । आशिष हमर न चिन्तित हयब ॥२७॥

भावार्थः

भगवान राम कहलनि – “हे हनुमान, अहाँ केँ जे किछु अभिलाषा हो, से वर माँगू । अहाँ केँ एहेन वरदान देब जे तीनू लोक मे देवताओ लेल दुर्लभ अछि । हमरा अहाँक समान आर कियो नहि अछि ।” हनुमानजी केँ असीम आनन्द भेलनि । गदगदी सँ गला भरि गेलनि, आँखि सँ नोर बरसय लगलनि । हनुमानजी कहलनि – “जेतय कतहु अपनेक नाम लेल जाइत रहय, ताबत धरि हम ओतहि रही । हमरा सदिखन अपनेक नामक स्मरण होइत रहय । हमर चित्त सदा अपनहिंक चरणक वश मे रहय । ई छोड़िकय आर कोनो वर नहि माँगब ।” हनुमानजी शुद्ध हृदय सँ एना कहलनि । रामजी ओतहि कहलनि – “तथास्तु ! एहिना होयत । हे परम गुणवान हनुमान, अहाँ जिबिते मोक्ष पाबि गेलहुँ । चारू युग केर कल्प जित गेलाक बाद हमरा मे पूर्णतः लीन भ’ जायब । अहाँ सदा सुखी रहू आ अहाँ शरीर निरोग रहय ।” सीता वरदान देलिह – “हे हनुमान, अहाँ जेतय कतहु रहब, अहाँक मोनक हरेक अभिलाषा पूर्ण होइत रहत । हमर आशीर्वाद अछि । अहाँ केँ कतहु कोनो चिन्ता नहि होयत ।” ॥१८-२७॥

।सोरठा।

धरणी धय निज माथ, कयल प्रणाम समीर-सुत ॥२८॥
वैदेही रघुनाथ, सानुकूल रहु की कहब ॥२९॥

भावार्थः

हनुमानजी धरती पर माथा टेकिकय प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “हे सीता, हे राम, अपने हमरा पर अनुग्रह बनेने राखब; आर कि कहू । ॥२८-२९॥

।किरीट छन्द।

वृक्षक पत्र जकाँ रघुनायक, जाय कहूँ अपनैँक कहायब ॥३०॥
वानर छी वन मे बास केँ, झरना-जल पान ततै फल खायब ॥३१॥
जीवन मुक्त निरन्तर ध्यान, विदह-सुता प्रभु-गान शुनायब ॥३२॥
जाइतछी हिमवान मँ हे प्रभु, इ सुख-पुञ्ज कतै हम पायब ॥३३॥

भावार्थः

हे रघुनाथ, गाछक पत्ता जेकाँ जेतय कतहु जायब, अपनहिंक कहायब । हम बन्दर छी, वन मे रहिकय झरनाक जल पियब आ फल खायब । हम जिबिते मुक्त भ’ चुकल छी । सदिखन अपनेक ध्यान करैत रहब आ सीताराम केर गुण गबैत रहब । हे प्रभु, हम आब हिमालयक जंजर मे जाइत छी । ई सुख आर कतय पायब ?” ॥३०-३३॥

।चौपाइ।

हाथ जोड़ि कहि कयल विदाय । गुह निषाद काँ हृदय लगाय ॥३४॥
घर थिक अपन निरन्तर आउ । मित्र अपन पुर सम्प्रति जाउ ॥३५॥
चिन्ता हमर चित्त स धरब । विपुल भोग-सुख सुख सौँ करब ॥३६॥
मित्र हमर सारूप्ये पयब । अन्त समय नहि दुर्गति जयब ॥३७॥
दिव्याभरण राज्य कय दश । देल मित्र काँ राम नरेश ॥३८॥
नयन सजल मिलि मिलि चललाह । राम-वियोग न किछ बजलाह ॥३९॥
सुग्रीवादिक सकल प्रधान । सभ जन पाओल वर सन्मान ॥४०॥
वानर-निकरक कय सन्मान । वसनाभरण अमूल्य अमान ॥४१॥
सन्मानित सभ भेल विदाय । गदगद कण्ठ नयन जल जाय ॥४२॥
सभजन अपन अपन गेल गेह । अचल रहल रामक पद नेह ॥४३॥
किष्किन्धा कपि-पति सह-दार । चलल सैन्य सह भरिया भार ॥४४॥
लङ्का गेला निज जन सहित । भक्त विभीषण कण्टक-रहित ॥४५॥
रघुवर कयल बहुत सत्कार । जे पवित्र मित्रक व्यवहार ॥४६॥
लक्ष्मण काँ बल सौँ युवराज । कयल रघूत्तम सहित समाज ॥४७॥
कर्म्माध्यक्ष तदपि नहि बन्ध । परमात्मा मन सौँ निद्धन्ध ॥४८॥
स्वात्मानन्दहिँ प्रभु सन्तुष्ट । जन उपदेश करथि मन तुष्ट ॥४९॥
हयमेधादिक यज्ञ अनेक । कयल यथाविधि विमल-विवेक ॥५०॥
विपुल दक्षिणा जन सन्तुष्ट । त्रिभुवन जन मन रहल न रुष्ट ॥५१॥
प्राप्त ततय नहि विधवा योग । नहि सर्प्पादिक भय नहि रोग ॥५२॥
तस्करादि नास्तिक नहि लोक । प्राप्त न ककरहु पुत्रक शोक ॥५३॥
रामाचरित प्रजा समस्त । वस्तु प्रशस्त सतत सभ सस्त ॥५४॥
सकल प्रजाकेँ धर्म्महिँ प्रीति । बड़ मन धृति नहि ईतिक भीति ॥५५॥
बरष वलाहक समय सुबेरि । ब्रीहि ब्रीहि मय महि मे ढेरि ॥५६॥
वर्णाश्रम-गुणयुत जन सर्व्व । ककरो नहि मन अङ्कुर गर्व्व ॥५७॥
प्रजा पुत्र सम कर प्रतिपाल । रामचन्द्र उत्तम महिपाल ॥५८॥
दशसहस्र वर्षावधि राज । कयल राम बसि अवनि-समाज ॥५९॥
चिरतर जीवन तन आरोग्य । धन धान्यादिक उत्तम भोग्य ॥६०॥
अतिपुण्यद श्रीरघुवर-चरित । श्रवण पठन धन-करण पवित्र ॥६१॥
श्रीरामक अभिषेक चरित्र । श्रवण पठन धन-करण पवित्र ॥६२॥
पढ़थि रामायण शुनथि समग्न । प्राप्ति सुपुत्र न मनो हो व्यग्र ॥६३॥
समय-शूर रण निकट न आब । रामचरित काँ सहज स्वभाब ॥६४॥
बन्ध्या रामायण मन लाब । रजस्वला उत्तम सुत पाब ॥६५॥
रामायण जे पढ़थि विचारि । सुलभ तनिक कर-गत फल चारि ॥६६॥
रोग न रहय पाप क्षय जाय । ग्रह-विघ्नादिक दूर पड़ाय ॥६७॥
श्रद्धायुत जे पढ़ इ पुराण । ईश्वर तनिकाँ देथिनि ज्ञान ॥६८॥
करथि उमेश तनिक प्रतिपाल । निकट न आबै तनिका काल ॥६९॥

भावार्थः

तखन राम निषादराज गुह केँ गला लगौलनि आ हाथ जोड़िकय ई कहैत विदा कयलनि – “ई अहाँ अपन घर छी, हमेशा अबैत रहब । हे मित्र, आब अहाँ अपन नगर जा सकैत छी । हमरा याद राखब । सुख संग खूब भोग करब । हे मित्र, अहाँक जीवनक अन्त भेला उपरान्त हमर सारूप्य पायब, आर नरक नहि जायब ।” अपूर्व भूषण तथा कतेको प्रदेशक राज्य राम अपन मित्र गुह केँ देलनि । हुनकर आँखि मे नोर भरि गेलनि आर ओ राम सँ बेर-बेर गला मिललाह; रामक बिछोह केर दुःख सँ किछु बाजि नहि पेलाह । सुग्रीव आदि जे-जे सेनापति छलाह से सब खूब सम्मान पयलाह । अमूल्य आर अनगिनत वस्त्र व भूषण दय केँ कपि लोकनिक सम्मान कयल गेल । सब सम्मानित भ’ कय विदा भेलाह । सभक गला भरल छलन्हि तथा आँखि मे नोर भरल छलन्हि । सब अपन-अपन घर चलि गेलाह । सभक मोन मे रामक चरण मे अटल भक्ति छलन्हि । कपि लोकनिक राजा सुग्रीव पत्नी तारा सहित किष्किन्धा चललाह आ हुनका पाछाँ हुनकर सेना छल तथा संग मे भरिया लोकनि भार मे सामान लेने छलथि । विभीषण अपन परिजन सभक संग लंका चललाह जेतय हुनकर कोनो प्रतिद्वन्द्वी नहि रहय । राम द्वारा सच्चा मित्रक संग जेहेन व्यवहार हेबाक चाही, अपन मित्र सब केँ खूब सम्मान कयलनि । राम अपन इष्टमित्र सभक संग विचार-विमर्श कय आग्रहपूर्वक लक्ष्मण केँ युवराज बनौलनि । सब राज-काजक प्रधान होइतहु राम कर्मक बन्धन मे नहि रहथि कियैक तँ ओ परमात्मा छलाह आर हुनकर मन मे द्वन्द्व (भेदबोध) नहि छल । ओ आत्मसाक्षात्कार सँ होयबला आनन्द मात्र सँ तृप्त रहैत छलथि आर सेवक सब केँ प्रसन्न मन सँ उपदेश दैत छलथि । ओ शास्त्र मे बतायल गेल रीति सँ शुद्ध भाव सँ अश्वमेध आदि अनेकों यज्ञ कयलनि । प्रचुर दक्षिणा पाबिकय सब सम्बद्ध लोक प्रसन्न भेलथि । तीनू भुवन मे केकरहु मन मे कोनो शिकायत नहि रहलैक । ओतय कोनो महिला विधवा नहि होइत छल । साँप केर कटबाक डर नहि रहैक । रोग केर सेहो डर नहि रहैक । न चोर छल, न नास्तिक । केकरहु पुत्र-शोक नहि होइत छलैक । सारा प्रजा राम केर अर्चना मे लागल रहैत छल । सदिखन उत्तम-उत्तम वस्तु उचित मूल्य मे सुलभ छल । प्रजा मे सब लोक धर्मानुरागी छल । सभक मन मे सन्तोष छलैक । अकाल केर डर नहि रहैक । मेघ अपेक्षानुसार समय पर बरसैत छल । धरती पर अनाजे-अनाज छा जाइत छलैक । सब लोक अपन-अपन वर्ण आर अपन-अपन आश्रमक कर्तव्य मे लागल रहैत छल । केकरहु मन मे अभिमान उत्पन्न नहि होइत छलैक । राजा राम अपन प्रजाक पालन पुत्र समान करैत छलथि । राम धरती पर रहिकय दस हजार वर्ष राज कयलनि । राम केर चरित सुनला सँ दीर्घायु प्राप्त होइत अचि, शरीर रोगहीन रहैत अछि, धन-धान्य आदि सबटा उत्तम वस्तु सब भोगल लेल भेटैत अछि तथा पढ़निहार आ सुननिहार सेहो सबटा पाप सँ मुक्त भ’ जाइत छथि । जे राम केर अभिषेकक कथा सुनत या पढ़त ओ धनवान आ पवित्र होयत । जे समग्र (सौँसे) रामायण पढ़त या सुनत ओकरा सुपुत्र प्राप्त हेतैक, आर मन सदिखन निश्चिन्त रहतैक । युद्ध-भूमि मे ओकरा सामने कोनो वीर आबय के हिम्मत नहि करतैक । रामायण केर ई स्वाभाविक माहात्म्य थिक । जे बाँझ स्त्री रामायण मे चित्त लगायत ओ रजस्वला भ’ कय नीक बेटा प्राप्त करत । जे ध्यानपूर्वक रामायण पढ़त ओकरा धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष चारू फल अनायासे (अपने-आप) प्राप्त हेतैक । ओकरा सँ रोग दूर रहतैक, पाप हँटि जेतैक, ग्रह सभक प्रतिकूलता समाप्त भ’ जेतैक । जे एहि पुराणरूपी रामकथा केँ पढ़त ओकरा भगवान ज्ञान देथिन । शिव ओकर रक्षा करथिन आ काल सेहो ओकरा लग नहि भटकत ॥

॥इति मैथिल श्रीचन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्ड षोडशोऽध्यायः॥

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक सोलहम अध्याय समाप्त भेल॥

॥लङ्काकाण्ड समाप्त॥

हरिः हरः!!

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