स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – पन्द्रहम अध्याय
राम-राज्याभिषेक, देवगन्धर्व आदि द्वारा स्तुति
।चौपाइ।
केकयि-तनय विनय-सम्पन्न । किछु नहि मानस छल प्रच्छन्न ॥१॥
भरत कहल शुनु बड़का भाय । अपनैँ नृपति दुखी वन जाय ॥२॥
चौदह बरष छलहुँ वनवास । अयलहुँ अवधि पुराओल आस ॥३॥
जे कृति कयलनि केकयि माय । से प्रभु नहि मन पाड़ल जाय ॥४॥
प्रभु-आज्ञा मानल सभ गोट । सेवक थिकहुँ भाय हम छोट ॥५॥
राज्य-भार करु अपन अधीन । रविकुल शुद्ध रीति प्राचीन ॥६॥
ई कहि चरण पड़ल लपटाय । देल जाय प्रभु आधि घटाय ॥७॥
केकयि कहल सहल उपहास । हरल हमहिँ प्रभु राज्य-विलास ॥८॥
कहल नीक नहि विश्वक लोक । चौदह बरष सहल मन शोक ॥९॥
भेल से भेल गेल दिन बीति । एखनहुँ राखक थिक कुलरीति ॥१०॥
हमहुँ अशक्य अहाँ काँ माय । देल कुमतिवश विपिन पठाय ॥११॥
आज्ञा हमर यहन लिय मानि । रीति सनातन करु जनु हानि ॥१२॥
कहल वसिष्ठ कहै छथि माय । भरतक कथा कयल प्रभु जाय ॥१३॥
राम कयल राज्यक स्वीकार । भेल सकल थल जय-जयकार ॥१४॥
परमात्मा की करता राज । सभटा होइछ माया-व्याज ॥१५॥
समय जानि लक्ष्मण लघु भाय । नापित निपुण देल बजबाय ॥१६॥
तनिकर कृत्य भेल सम्पन्न । सकल लोक मन होथि प्रसन्न ॥१७॥
अभिषेकक आयल सम्भार । रघुवर हेतु वृत्त सभ द्वार ॥१८॥
प्रथमहिँ कयल भरत असनान । लक्ष्मण तखना स्नान-विधान ॥१९॥
सविधि स्नान कयल कपिराज । तथा विभीषण सभ्यसमाज ॥२०॥
भरतक जटा केश फुटकाब । चित्र-माल्य अनुलेप लगाब ॥२१॥
वसन महोत्तम पहिरल भरत । छवि-तुलना त्रिभुवन के करत ॥२२॥
भरत कराओल प्रभु प्रतिकर्म्म । मन मे मानल सेवक-धर्म्म ॥२३॥
रुचिशुचिमय-युत शोभाधाम । दिव्य-अलङ्कति-धृत प्रभुराम ॥२४॥
भावार्थः
कैकेयि केर पुत्र भरत, जे अत्यन्त विनीत छथि आ जिनक मोन मे किछुओ छुपल नहि रहैछ, ओ रामजी सँ कहलनि – “हे जेठ भैया, सुनू । अहाँ दुःख उठाकय वन मे गेलहुँ । चौदर वर्ष धरि वनवास करैत रहलहुँ आ अवधि केर अन्त होइते आबिकय हमरा सभक आशा केँ पूर्ण कयलहुँ । हे प्रभु, माता कैकेयि जे किछु करनी कयलिह ओकरा आब एकदम नहि याद करब । हम अहाँक सब आज्ञाक पालन करब । हम छोट भाइ अहाँक सेवक छी । आब राज्यक भार अपना हाथ मे लेल जाउ । यैह सूर्यवंशी लोकनिक शुद्ध परम्परागत रीति थिक ।” एतेक कहिकय भरत रामजीक चरण मे लिपटि गेलाह आ कहलाह – “हे राम, हमर मनक व्यथा केँ दूर कयल जाउ ।” कैकेयि कहलनि – “हम बहुते बदनामी झेललहुँ । अहाँक राज्य-सुख केर अपहरण करयवाली हमहीं छी । दुनिया भरिक लोक हमर निन्दा कयलक । चौदर वर्ष धरि हम मन मे दुःख सहैत रहलहुँ । जे भेल से भेल । ओ दिन आब बीति गेल । आबहु सूर्यवंशक परम्परा केँ बचेबाक अछि । हमर कोनो वश नहि चलल । अहाँ केँ ई माय दुर्बुद्धिक कारण वन मे पठा देलक । आब हमर ई आज्ञा स्वीकार करू आ सदा सँ चलैत आबि रहल परम्परा केँ टूटय जुनि दिय’ ।” गुरु वसिष्ठ कहलनि – “माता अहाँ केँ आज्ञा दैत छथि जे भरत जेना कहलनि तेना कयल जाउ ।” राम राज्य लेनाय स्वीकार कय लेलनि । सब जगह जय-जयकार होबय लागल । राम तँ परमात्मा छथि, ओ राज्य लय केँ कि करताह ! ई सबटा मायाक खेल भ’ रहल अछि । अवसर देखिकय छोट भाइ लक्ष्मणजी एकटा कुशल नौआ (नापित) केँ बजा लेलनि । ओ अपन काज पूरा कयलक । सब गोटे खूब प्रसन्न भेलाह । तखन राज्यतिलक केर सामग्री सब जुटायल जाय लागल । रामक लेल सब साधन मौजूद छल । पहिने भरत स्नान कयलनि । तखन लक्ष्मण विधिपूर्वक नहेलनि । तखन सुग्रीव सेहो यथाविधि स्नान कयलनि । फेर विभीषण आदि रामक मण्डलीक लोक सब नहेलनि । रामजी भरतजीक जटावला केश केँ कटबौलनि, रंग-बिरंगक फूल केर माला पहिरौलनि तथा चन्दन लगौलनि । फेर भरत उत्तम सँ उत्तम वस्त्र पहिरलनि । हुनकर शोभाक तुलना तीनू लोक मे के कय सकत ! एहि तरहें सब कर्म भरतजी रामजी सँ करबौलनि । मोन मे सोचलनि जे सेवक केर यैह धर्म अछि । एहि तरहें सफाइ आ प्रसाधन कयकेँ तथा अपूर्व अलंकरण लगाकय प्रभु रामजी शोभाक खान भेल गेलाह ॥१-२४॥
।कवित्त।
कौशल्या कुशलमति हरषि शृङ्गार कर, ॥२५॥
अपनहि कर सौँ पुतोहु विधुवदना ॥२६॥
वदन निहार ओ उचार शिवगौरीगीत, ॥२७॥
हृदय लगाब बारबार शोभासदना ॥२८॥
सकल शाशुक सीता करथि प्रणाम आशु, ॥२९॥
आशिष ओ देथि कहि कहि कुन्दरदना ॥३०॥
जनकक कन्यका कनीनिका मे राखै योगि, ॥३१॥
अयोध्या-मिथिलालोक आधिक निकन्दना ॥३२॥
भावार्थः
सद्बुद्धिवाली माता कौशल्या हर्षक संग अपन पुतोहु चन्द्रमुखी सीता केँ अपना हाथ सँ सजौलनि-सँवारलनि । ओ सीताक रूप (चेहरा) केँ देखथि, शिव आ गौरीक गीत नचारी गाबथि, आर शोभाक खान अपन पुतोहु केँ बेर-बेर छाती सँ लगाबथि । सीता एहि तरहें बनि-ठनिकय सब सासु केँ प्रणाम कयलिह आ सासु लोकनि हुनका कुन्द केर कली जेहेन दाँतवाली अर्थात् बुच्ची कहि-कहिकय आशीर्वाद देलन्हि । राजा जनक केर ई बेटी तँ आँखिक पुतली मे राखय लायक अछि आर अयोध्या एवं मिथिला दुनू देशक लोक केर दुःख केँ दूर करयवला अछि ॥२५-३२॥
।सोरठा।
सभ रानी सीताक, कय शिंगार आनन्द कह ॥३३॥
शिरोरत्न वनिताक, त्रिभुवन मे सीता अहाँ ॥३४॥
भावार्थः
सब रानी लोकनि सीता केँ श्रृंगार-पेटार कय केँ सजौलनि आ कहलनि – “हे सीता, अहाँ तीनू लोक मे नारी सभक सिरक रत्न छी ।” ॥३३-३४॥
।दोबय छन्द।
आगत छली जते उत्सव मे, वानर-लोकक दारा ॥३५॥
सभक शिंगार कयल कौशल्या, धृतशोभा विस्तारा ॥३६॥
कहलनि धर्म्म-पुतोहु थिकहुँ अहाँ, हमरा प्राणाधारा ॥३७॥
लक्ष्मण रामचन्द्र हत युवती, लोचनतारा तारा ॥३८॥
भावार्थः
एहि उत्सव मे बन्दर सभक संग जे-जे बन्दरिया सब मनुष्यक रूप धारण कएने आयल छल, कौशल्या तेकरा सब केँ सेहो श्रृंगार-पेटार कय केँ सजा देलिह, हुनका सभक शोभा बढ़ि गेल । कौशल्या कहलनि – “अहाँ सब हमर धर्मपुतोहु भेलहुँ आ हमरा प्राणो सँ बेसी प्रिय छी । लक्ष्मण आर रामक लेल युवती तारा त मानू आँखिक तारा छथि ।” ॥३५-३८॥
।जयकरी छन्द।
आज्ञा शत्रुघ्नक शुनि कान । रथ सुमन्त रवि-रुचि शुचि आन ॥३९॥
तेहिपर चढ़ला राम नरेश । देखितहिँ सभ जन विगत-कलेश ॥४०॥
कपिपति अङ्गद ओ हनुमान । तथा विभीषण वरमति-मान ॥४१॥
कयलनि स्नान अलङ्कृत अङ्ग । गज बाजी चढ़ि चल प्रभु सङ्ग ॥४२॥
कपिपति वनिता काँ अतिमान । सीतासङ्ग चललि चढ़ि यान ॥४३॥
जेहन हरित-हय-रथ त्रिदशेश । चलल महत्पुर प्रभु रुचिवेश ॥४४॥
रत्नदण्ड-कर सारथि भरत । छविमय के समता जग करत ॥४५॥
शत्रुघ्नक कर छत्र सुन्धबल । पंखा लक्ष्मण कर लस नवल ॥४६॥
एक चामर शत्रुघ्नक हाथ । दोसर कर धर असुरक नाथ ॥४७॥
सिद्धसंघ कर जय-जय-कार । मधुर मनोहर वचन उचार ॥४८॥
वानर सुन्दर मनुज-स्वरूप । गजवर चढ़ल चढ़ल जनु भूप ॥४९॥
बाजन नानातरहक बाज । रामचन्द्र पाओल निज राज ॥५०॥
पुरवासी जन सकल निहार । दुर्व्वादल-श्यामल सुकुमार ॥५१॥
रत्नकिरीटालङ्कृत अङ्ग । शोणकमलदल लोचन रङ्ग ॥५२॥
पीताम्बर वरमुक्ता-हार । भाग्य अपन मन प्रजा विचार ॥५३॥
सुग्रीवादिक कपि-प्रधान । सभ सौँ सेवित श्री भगवान ॥५४॥
कस्तूरी चन्दन घनसार । कल्पमहीरुह-सुमनक हार ॥५५॥
उच्च अटापर चढ़ि वरनारि । एकटक रघुवर-रूप निहारि ॥५६॥
निज गृहकाज देल परित्यागि । शान्ति कयल मन आधिक आगि ॥५७॥
हसि हसि करथि प्रसूनक वृष्टि । गेल पुरी सौँ शोकक सृष्टि ॥५८॥
इषत-हसित-मुख राम निहार । प्रजाचित्त छूटल दुखभार ॥५९॥
भावार्थः
शत्रुघ्नक आज्ञा सुनिकय सुमन्त्रजी सूरज-समान चमकीला एक गोट पवित्र रथ आनि देलनि । ओहि राजा राम चढ़लाह । देखिते देरी सभक दुःख दूर भ’ गेलनि । सुग्रीव, अंगद, हनुमान आ परम बुद्धिमान विभीषण – सब गोटे स्नान कयलनि, अलंकरण लगौलनि तथा हाथी आ घोड़ा पर सवार भ’ रामक संग चललाह । सुग्रीवक स्त्री लोकनि केँ खूब सम्मान भेटलनि । ओहो सब रथ पर चढ़िकय सीताक संग चललिह । जेना हरियर रंगक घोड़ावला रथ पर देवता सभक राजा इन्द्र चलैत छथि तहिना राम सुन्दर वेश बनौने अयोध्यापुरी चललाह । सारथिक काज करैत भरत रत्न सब सँ बनल राजदंड हाथ मे लेने छथि । हुनकर शोभाक बराबरी दुनिया मे के कय सकत ? शत्रुघ्नक हाथ मे श्वेत छत्र अछि आ लक्ष्मणक हाथ मे नव पंखा शोभा पाबि रहल अछि । एक गोट चँवर शत्रुघ्नक हाथ मे अछि आ दोसर असुरराज विभीषण अपना हाथ मे लेने छथि । सिद्ध लोकनिक दल जय-जयकार कय रहल छथि आ मीठ स्वर मे गुणकीर्तन कय रहल छथि । कपि लोकनि मनुष्यक कमनीय रूप धारण कय बढ़ियाँ हाथी पर चढ़लाह, लगैत अछि जेना राजा होइथ । तरह-तरह केर बाजा सब बाजि रहल अछि । राम अपन राज पओलनि । नगरक सब लोक दूभिक पत्ता जेकाँ साँवला सुकुमार राम केँ देखि रहल अछि, जिनकर अंग रत्नमय किरीट सँ भूषित छन्हि; आँखिक रंग लाल कमलक पंखुड़ि समान छन्हि; जे पियर वस्त्र आ उत्कृष्ट मोती सभक हार पहिरने छथि । रामक ई झाँकी देखि प्रजा अपना केँ भाग्यवान् बुझय लागल । सुग्रीव आदि कपि लोकनि समस्त दलपति रामक सेवा कय रहल छथि । राम कस्तूरी, चन्दन आ कर्पूर लगौने छथि तथा पारिजात फूलक हार पहिरने छथि । ऊँच-ऊँच अटारी सब पर चढ़ि-चढ़िकय ललना लोकनि अपलक आँखि सँ रामक रूप केँ देख रहलि अछि । ओ लोकनि एहि चलते अपन घरक काज सब केँ छोड़ि देलनि अछि । एहि प्रकारे रामक दर्शन कय केँ ओ सब अपन मोनक व्यथा केँ दूर कय लेलिह । ओ सब हर्ष सँ हँसि-हँसिकय पुष्पवृष्टि कय रहलि अछि । नगर मे मातमी वातावरण खत्म भ’ गेल । मन्द-मन्द मुस्कुराइत राम सब किछु देख रहला अछि । प्रजाक मन सँ सबटा दुःख-दर्द दूर भ’ गेल ॥३९-५९॥
।रूपमाला।
अमरपति-पुर तुल्य शोभा, लसित दशरथ-धाम ॥६०॥
सकल लोक कृतार्थ करयित, पहुँचला श्रीराम ॥६१॥
देवतामति मातृलोकक, कयल चरण प्रणाम ॥६२॥
प्रभु-चुमाओन विविध उत्सव, भेल विधि तहिठाम ॥६३॥
भरत काँ रघुनाथ कहलनि, हमर जे छल धाम ॥६४॥
सर्व्वसम्पति-युक्त समुचित, वास हो ओहिठाम ॥६५॥
मित्र कपिपति ओ विभीषण, राक्षसेन्द्रक नीक ॥६६॥
सुख-निवास कपि-प्रधानक, आज देवक थीक ॥६७॥
भावार्थः
राजा दशरथक राजधानी मे, जेकर शोभा इन्द्रपुरी समान अछि, रामजी पहुँचलाह । ओ देवी मानिकय माता लोकनिक चरण मे प्रणाम कयलनि । ओतय भाँति-भाँतिक उत्सवक संग राम केँ ‘चुमाओन’ नामक विध कयल गेल । राम भरत सँ कहलनि – “हमर मित्र कपि लोकनिक राजा सुग्रीव आ राक्षस लोकनिक राजा विभीषण केँ एतहि आवास देनाय ठीक रहत जेतय हम रहैत छलहुँ; आर अन्यान्य कपि सभक दलपति लोकनि केँ सेहो आइ सुखद आवास भेटबाक चाही ।” ॥६०-६७॥
।सोरठा।
सभक देल सुख-वास, भरत जेहन आज्ञा प्रभुक ॥६८॥
भेल चित्त निस्त्रास, दिन जाइत जानथि न से ॥६९॥
थिक विचार इत एक, भरत कहल कपिनाथ सौँ ॥७०॥
करब प्रभुक अभिषेक, आबय सात-समुद्र-जल ॥७१॥
भावार्थः
रामक आज्ञा अनुसार भरत सब गोटे केँ सुखद आवास देलनि । मन निःशंक भेल । दिना केना बितैत गेल, सेहो भरत केँ लक्षित नहि बेलनि । एक दिन भरतजी सुग्रीव सँ कहलनि – “एतय एकटा विचार करबाक अछि । आब रामजीक राज्याभिषेक करी । सातो समुद्र सँ जल एबाक चाही ।” ॥६८-७१॥
।कवित्त।
कहल कनक-घट सातहु समुद्र-जल ॥७२॥
आनु गय झट दय कपीन्द्र प्रधान काँ ॥७३॥
अङ्गद सुषेण शुनि बहुत हर्षित चित्त ॥७४॥
प्रभुक निमित्त वेग मारुतसमान काँ ॥७५॥
आनल सकल जन जल सातो समुद्रक ॥७६॥
दूर पथ कत जाम्बवान हनुमान काँ ॥७७॥
आयल सकल तीर्थ-जल से कहल जाय ॥७८॥
मन्त्रिसङ्ग शत्रुघ्न वसिष्ठ वर-ज्ञान काँ ॥७९॥
भावार्थः
सुग्रीव दलपति लोकनि सँ कहलनि – “सोनाक घैल (घड़ा) लय-लय केँ सातो समुद्र सँ शीघ्र लेने आउ ।” ई सुनिकय अंगद आ सुषेण केँ खूब प्रसन्नता भेलनि । रामक काज लेल त हुनक तेजी वायुक समान भ’ जाइत अछि । सब गोटे सातो समुद्रक जल लय अनलनि । जाम्बवान आ हनुमानक लेल रास्ता कोनो दूर नहि छल । तखन मंत्री लोकनिक संग शत्रुघ्न ज्ञानी सब मे श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठ सँ जाकय कहलनि – “सब तीर्थ-जल आबि गेल ।” ॥७२-७९॥
।सवैया चकोर छन्द।
रत्न-सिंहासन शुद्ध मनोहर, संस्थित जानकि-संयुत राम ॥८०॥
उत्सव-मध्य त्रिलोकिक लोक, प्रधान प्रधान छला तहिठाम ॥८१॥
रावण-गर्व्व-विनाशन सर्व्व, स्वरूपसौँ निर्ज्जित कोटिक काम ॥८२॥
स्वस्ति समस्त प्रशस्त विलक्षण, गाब विरञ्चि मनोहर साम ॥८३॥
भावार्थः
रत्नमय शुद्ध आ सुन्दर सिंहासन पर राम आ सीता दुनू गोटे बैसायल गेलथि । तीनू लोक केर सब प्रधान-प्रधान लोक सब ओतय ओहि उत्सव मे उपस्थित भेलाह । ब्रह्मा स्वयं रामक प्रशंसा मे सुन्दर साम गाबय लगलाह – “रावणक तमाम घमण्ड केँ चूर करयवला, रूप सँ करोड़ों कामदेव केँ जितयवला, पूर्ण रूप सँ मंगलमय, विलक्षण प्रशस्ति सब सँ युक्त राम केर जय हो ।” ॥८०-८३॥
।कवित्त।
गौतम जावालि ओ वसिष्ठ वाल्मीकि वृद्ध, ॥८४॥
ब्राह्मण बहूत वेद-विद्या-निधान सौँ ॥८५॥
ऋत्विज अनेक ओ कुमारी तथा मन्त्रिगण, ॥८६॥
औषधि समस्त रस देब सन्मान सौँ ॥८७॥
लोकप सगण मन मगन समस्त लोक, ॥८८॥
पाओल अभीष्ट फल राम भगवान सौँ ॥८९॥
तुलसी गन्ध पुष्प जल कोमल कुशाग्र-हस्त, ॥९०॥
राम-अभिषेक भेल वेदक विधान सौँ ॥९१॥
भावार्थः
गौतम, जाबालि, वसिष्ठ तथा अन्यान्य बहुतो रास वृद्ध ब्राह्मण उपस्थित रहथि जे वेद-शास्त्र मे पारंगत छलथि । अनेक ऋत्विक्, कुमारी तथा मंत्री उपस्थित रहथि, जे राम आ सीता केँ सम्मानक संग यथाविहित औषधि आ रस देलनि । सदल-बल समस्त दिक्पाल आ सब लोक बहुते प्रसन्न रहथि । सब गोटे भगवान् राम सँ वांछित फल पओलनि । तुलसी, चन्दन, फूल, जल आ कुश – ई सब कियो हाथ मे लय केँ वेद मे बतायल गेल रीति सँ रामक राज्याभिषेक कयल गेलनि ॥८४-९१॥
।चौपाइ।
तत शत्रुघ्न छत्र कर धयल । श्वेतरङ्ग प्रभु-सेवा कयल ॥९२॥
चामर धयल धवल तहँ हाथ । वानरेन्द्र ओ राक्षस-नाथ ॥९३॥
स्तुति कर सकल देव तहिठाम । जय-जय वैदेहीपति राम ॥९४॥
जगत्प्राण देल हेमक माल । इन्द्रक अनुमति कान्ति विशाल ॥९५॥
सर्व्व-रत्न मणि कञ्चन हार । इन्द्र देल भक्तिक व्यवहार ॥९६॥
स्तुति कर पुन पुन सुरगन्धर्व्व । नाचथि किन्नर अप्सर-सर्व्व ॥९७॥
देव दुन्दुभी गगन बजाब । पुष्प-वृष्टि नभ सौँ भल आब ॥९८॥
नव – दूर्व्वादल – सुन्दर श्याम । पङ्कजलोचन श्रीयुत राम ॥९९॥
कोटि – प्रभाकर – छवियुत – अङ्ग । नव-किरीटि छवि-विजित-अनङ्ग ॥१००॥
पीताम्बर धर दिव्याभरण । सकल-लोक आनन्दित करण ॥१०१॥
सीता शोभित वामा भाग । श्री देवी काँ अति-श्री लाग ॥१०२॥
अतिशय शोभा धृत-कर-कमल । सर्व्वाभरण-विभूषित बनल ॥१०३॥
उमा-सहित सम्प्राप्त महेश । स्तुति कर अति आनन्दित देश ॥१०४॥
भावार्थः
एहि अभिषेकोत्सव मे शत्रुघ्न श्वेत रंगक छत्र अपना हाथ मे लेने रामक सेवा कयलनि । सुग्रीव आ विभीषण अपन हाथ मे चँवर लेने रहथि । सब देवता लोकनि ओतय उपस्थित भ’ गुणगान कय रहल छलथि – “सीतापति राम केर जय हो !” वायु सोनाक हार उपहार देलनि । इन्द्र उज्ज्वल कान्ति देलनि । फेर अपन भक्तिक अनुरूप इन्द्र सब रत्न व मणि सँ खचित सोनाक हार देलनि । देवता लोकनि तथा गन्धर्व लोकनि बेर-बेर स्तुति करैत छथि । किन्नर लोकनि आ सब अप्सरा लोकनि सब नाचैत छथि । देवता सब आकाश मे नगाड़ा बजबैत छथि । आकाश सँ फूल बरसाबैत छथि । रामजीक शरीरक रंग नव दुभिक पत्ता समान साँवला-सुहावना अछि । हुनक आँखि कमल-समान अछि । हुनक अंग मे करोड़ों सूरज केर चमक अछि । ओ नव किरीट भूषण पहिरने छथि आर अपन सौन्दर्य सँ कामदेवहु केँ जितने छथि । पियर वस्त्र पहिरने छथि, दिव्य भूषण लगौने छथि । सब लोक केँ प्रसन्न करयवला छथि । बाम भाग मे सीता विराजमान छथि । महारानी सीताक शोभा लक्ष्मीक शोभा सँ सेहो बढ़ल-चढ़ल अछि । हाथ मे कमल लेने छथि, सब गहना लगौने अतिशय शोभामयी बनल छथि । पार्वती-सहित महेश पहुँचि गेल छथि आ आनन्द केर अवसर पर हुनक स्तुति कय रहल छथि – ॥९२-१०४॥
।घनाक्षरी छन्द।
नमो नमो रामाय सशक्तिकाय निर्गुणाय, ॥१०५॥
नीलोत्पलसुप्रभातिकोमलाय विष्णवे ॥१०६॥
मीनकमठादिरूपधारिणे धरित्रीधृजे, ॥१०७॥
देव-महि-कण्टक-समस्त-खल – जिष्णवे ॥१०८॥
किरिट – हाराङ्गदविभूषण – विभूषिताय, ॥१०९॥
सिंहासनस्थाय रामचन्द्र-भूप-वेधसे ॥११०॥
लीलारूपधारकाय सर्व्वविश्वकारकाय ॥१११॥
सकलमहसामपि देवपूर्णतेजसे ॥११२॥
भावार्थः
“नमस्कार अछि, ओहि राम केँ नमस्कार अछि जे शक्ति सँ युक्त होइतहु निर्गुण छथि । नीलकमल केर समान छविवला छथि आर अत्यन्त कोमल हृदय विष्णुस्वरूप छथि । मत्स्य, कच्छप आदिक रूप मे अवतार लय केँ धरतीक रक्षा करयवला छथि । देवता एवं मानव सब केँ सतेनिहार समस्त दुष्ट केँ हरबयवला छथि । किरीट, हार, अंगद आदि आभूषण सब सँ अलंकृत छथि । सिंहासन पर विराजमान छथि । एहेन राजा रामचन्द्र ब्रह्मस्वरूप छथि । ओ लीलावश सगुण रूप धारण करैत छथि, समस्त जगत केर रचना करैत छथि, सब तेजहु सँ बेसी तेज देवता छथि ।” इन्द्र हाथ जोड़ने स्तुति करैत राम सँ कहलनि – ॥१०५-११२॥
।सोरठा।
स्तुति करयित अमरेश, बद्धाञ्जलि प्रभु सौँ कहल ॥११३॥
जय-जय राम नरेश, वेश कयल सुरकार्य्य प्रभु ॥११४॥
रावण विधि-वर पाबि, देवताक सुख हरल छल ॥११५॥
मारल खल काँ आबि, पाओल प्रभुक प्रसाद से ॥११६॥
भावार्थः
“हे राजा राम, अपनेक जय हो, जय हो ! अपने देवता लोकनिक बहुत पैघ उपकार कयलहुँ । रावण ब्रह्मा सँ वरदान पाबिकय देवता सभक सारा सुख हैर लेने छल । अपने अवतार लय केँ ओहि दुष्ट केँ मारलहुँ । ई फल हमरा सब केँ अपनहि केर कृपा सँ प्राप्त भेल ।” ॥११३-११६॥
।चौपाइ।
सकल देव कह निज कर जोड़ि । सङ्कट-बन्ध देल प्रभु तोड़ि ॥११७॥
रावण-कृत कि नियत छल वास । गमहि गमहि सहि अतिशय त्रास ॥११८॥
रावण हरि लेल यज्ञक भाग । ब्रह्म-दत्त-वर सौँ के लाग ॥११९॥
रावण काँ मारल प्रभु जाय । सर्वसहापर भेलहुँ सहाय ॥१२०॥
पितरलोक कहलनि कलजोड़ि । शरण न आन चरण ई छोड़ि ॥१२१॥
रावण-वध सौँ सुख बड़ गोट । खायब पिण्ड प्रमोद सँ मोट ॥१२२॥
रावण मख सभ हरि लय जाय । भाग गयादिक अपनहि खाय ॥१२३॥
यज्ञ न रहल सहल बड़ कष्ट । रावण मुइल भेल दुख नष्ट ॥१२४॥
गबइत गीति प्रीति सौँ सर्व्व । कहल राम सौँ गण गन्धर्व्व ॥१२५॥
सहल बहुत दशकन्ध-अनीति । प्रभु-गुणगान छुटल सब भीति ॥१२६॥
तनि गुण गाबि बचाओल प्राण । आज कयल सब सङ्कट त्राण ॥१२७॥
प्राप्त महोरग किन्नर-लोक । स्तुति कर कह हम भेलहुँ अशोक ॥१२८॥
बसु मुनि गुह्यक पक्षी सकल । सहित प्रजापति छल छथि विकल ॥१२९॥
बड़ गोट उत्सव देखल नयन । दुःखैँ रहित सकल मन चयन ॥१३०॥
पृथक पृथक स्तुति सभ जन कयल । रामचरण-पङ्कज मन धयल ॥१३१॥
लक्ष्मण-सीता-सय्युँत राम । विधि-अभिषिक्त बिराज सुधाम ॥१३२॥
ब्रह्मादिक निज पद प्रस्थान । कयल कयल प्रभु बड़ सन्मान ॥१३३॥
भावार्थः
रावण त हमरा लोकनिक घरबारहु केर ठेकान नहि रहय देने छल । हमरा लोकनिक आतंक क्रमशः बढ़िते जा रहल छल । रावण हमरा सभक यज्ञ मे भेटयवला अंश हरण कय लेने छल । ओकरा ब्रह्माक वर प्राप्त छलैक, तेँ ओकर सामना हम सब नहि कय सकैत छलहुँ । हे प्रभु, अपने जाकय रावण केर संहार कयलहुँ । धरतीक उद्धारक भेलहुँ ।” फेर पितर लोकनि हाथ जोड़िकय कहलाह – “हमरा सब केँ अपनेक चरणक अलावे आन कोनो सहारा नहि अछि । रावणक मरला सँ हमरा सब केँ बहुत प्रसन्नता भेटल । आब हम सब खुशी सँ मोट-मोट पिंड खायब । रावण यज्ञ मे भेटयवला हमरा सभक अंश खा जाइत छल । गया आदि मे भेटयवला हमरा लोकनिक अंश सेहो अपने खा जाइत छल । यज्ञक नामोनिशान तक नहि रहि गेल छल । हमरा सब केँ बहुते तकलीफ होबय लागल छल । रावण केर मरला सँ हमरा लोकनिक सबटा तकलीफ दूर भ’ गेल ।” फेर सब गन्धर्व लोकनि खुशी सँ गीत गबैत रामजीक स्तुति करय लगलाह – “हम सब रावणक बहुते दुराचार सहलहुँ । अपनेक स्तुतिक प्रसाद सँ हमरा लोकनिक सबटा दुःख दूर भ’ गेल । डर सँ ओहि रावणक गुणगान कय-कयकेँ मात्र हम सब अपन प्राण बचबैत रहल छलहुँ । आइ अपने हमरा सब केँ समस्त संकट सँ छुटकारा दियेलहुँ ।” तखन नाग एवं किन्नर सब अयलाह आ विनती करय लगलाह – “आब हम सब शोक-रहित भेलहुँ । बसु, ऋषि-मुनि, यक्ष, पक्षी आदि सब जीवन आर प्रजापति ब्रह्मा सेहो विकल रहथि । आइ हम सब बहुत पैघ उत्सव अपन आँखि सँ देखलहुँ । सभक दुःख दूर भ’ गेल । सभक मन निश्चिन्त भ’ गेल ।” सब गोटे अलग-अलग स्तुति कयलनि आ रामक चरण केर ध्यान अपन हृदय मे सम्हारिकय धय रखलनि । लक्ष्मण आ सीता-सहित राम विधिवत् अभिषेक पाबिकय सिंहासन पर विराजमान छथि । ब्रह्मा आदि अपन-अपन स्थान पर घुरि गेलाह । राम सभक पूर्ण सत्कार कयलनि ॥११७-१३३॥
।दण्डक छन्द।
नवघन – रङ्ग हे ॥१३४॥
राम भूपति थित-सिंहासन, अवनिगत जनु पाकशासन ॥१३५॥
कान्ति-कोटि-दिनेश-भासन, कृत-दशानन-भङ्ग ॥१३६॥
जानकी-लक्ष्मण-मरुत्सुत, मुनि-निवह हरिगणसँ-संयुत ॥१३७॥
रामचन्द्र-समीप बसि नित, भजन भाव प्रसङ्ग ॥१३८॥
गगन-सङ्कुल त्रिदश बाजन, पुष्प बर्षण कर मुदित मन ॥१३९॥
करथि प्रभु-गुण-गान परसन, विपुल-पुलक सुअङ्ग ॥१४०॥
राम प्रभु गुण-धाम स्मित-सुख, सदा दायक भक्त जन सुख ॥१४१॥
कयल अर्दित दनुज-गण तुख, कान्ति-विजित-अनङ्ग ॥१४२॥
भावार्थः
अहा! राम नव मेघक समान साँवला छथि । राजा राम सिंहासन पर विराजमान छथि जेना इन्द्र धरती पर उतरि आयल होइथ । ओ करोड़ों सूर्यक समान प्रभा सँ देदीप्यमान छथि । ओ रावण केर संहार कयलनि अछि । सीता, लक्ष्मण, हनुमान, मुनिगण तथा कपिगण – ई सब गोटे रामजीक लग मे बैसल नित्य भजन-भाव कय रहल छथि । आकाश मे देवता सभक भीड़ लागल अछि । ओ सब बाजा बजा रहला अछि आर प्रसन्न हृदय सँ फूल बरसा रहल छथि । आनन्दमग्न भ’ रामक गुण गाबि रहल छथि । हुनक अंग अतिशय रोमांचित अछि । प्रभु श्रीरामचन्द्र जी समस्त गुणक धाम छथि, भक्त केँ सदिखन सुख दैत छथि । ओ राक्षस सभक दल केँ भूँसा समान मसैल देलनि । ओ अपन शोभा सँ कामदेवहु केँ जीति लेने छथि ॥१३४-१४२॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे पञ्चदशोऽध्यायः।
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण केर लङ्काकाण्ड मे पन्द्रहम अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

1 Comment
Prabhu sabhak darshan lel byakul sab janta janardan, delta pitar aabi gel chhaith. Bahut harsha k mahaul banal aichh. Jay Jay ho. आगत छली जते उत्सव मे, वानर-लोकक दारा ॥३५॥
सभक शिंगार कयल कौशल्या, धृतशोभा विस्तारा ॥३६॥
कहलनि धर्म्म-पुतोहु थिकहुँ अहाँ, हमरा प्राणाधारा ॥३७॥
लक्ष्मण रामचन्द्र हत युवती, लोचनतारा तारा ॥३८॥
🙏💐🙏
1 Trackback or Pingback