स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
– लङ्काकाण्ड – नवम अध्याय
मेघनादक तान्त्रिक साधना मे बाधा तथा ओकर वध
।जयकरी छन्द।
कहल विभीषण समय-विचार । प्रभु सर्व्वज्ञ कयल स्वीकार ॥१॥
लक्ष्मण काँ कहलनि अहँ जाउ । खल बधि समर अमर बनि आउ ॥२॥
हनुमदादि यूथप सङ्ग रहथि । सन्मुख तनिक प्रहार जे सहथि ॥३॥
जाम्बवान् सङ्ग रहता बूढ़ । तनिकहि डरय डराइछ मूढ़ ॥४॥
सङ्ग विभीषण मन्त्री लेथु । सकल देखाय बाट ओ देथु ॥५॥
पर्व्वत कतय विवर कोन ठाम । बुझल विभीषण काँ निज गाम ॥६॥
कपिदल कति अर्व्वुद सङ्ग्राम । चलल सङ्ग कहि जय जय राम ॥७॥
शुनि लक्ष्मण रघुवरक निदेश । प्रभु-प्रसाद कहलनि से वेश ॥८॥
कयल राम काँ जाय प्रणाम । सुरपति-अरि-मारण मनकाम ॥९॥
जौँ मोर रघुवर-किङ्कर नाम । तौँ घननाद जितब सङ्ग्राम ॥१०॥
आज समर शर अरि काँ मारि । स्नान करब भोगावति-वारि ॥११॥
सहित विभीषण कर शर चाप । चलल महाबल विजय प्रताप ॥१२॥
भावार्थः
विभीषण जे समयानुकूल सुझाव देलनि, से सर्वज्ञ राम स्वीकार कयलनि । ओ लक्ष्मण सँ कहलनि – “अहाँ जाउ, ओहि दुष्ट केँ लड़ाइ मे मारिकय अमर भ’ कय वापस आउ । हनुमान आदि दलपति संग रहता जे ओकरा सोझाँ अस्त्र-प्रहार केँ रोकि सकथि । वृद्ध जाम्बवान संग जाइथ, कियैक तँ ओ मूर्ख हुनके सँ डराइत अछि । मंत्री विभीषण केँ संग कय लिय’ जे सही रास्ता देखेता-बतेता । विभीषण केर ओ अपन गाम थिकन्हि, तेँ हुनका बुझल छन्हि जे कतय पहाड़ अछि आ कतय खोह ।” लड़बाक लेल कतेको अरब वानर सभक दल ‘जय जय राम’ कहैत अहाँक संग चलत ।” रामक ई निर्देश सुनिकय लक्ष्मणजी कहलनि – “ठीक छैक, प्रभुक जेहेन कृपा हो ।” एना कहिकय ओ इन्द्रजित् केँ मारबाक कामना सँ राम केँ प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “यदि हम वास्तव मे रामक सेवक कहाइत छी त लड़ाइ मे मेघनाद केँ अवश्य जीतब ।” एतेक कहिकय विभीषणक संग हाथ मे धनुष-बाण लेने महाबली लक्ष्मण विजय-कीर्ति करय चलि पड़लाह ॥१-१२॥
।भुजङ्गप्रयान छन्द।
विदा भेलि आबैछ लङ्केश-सेना । चतुर्दिक्षु देखू घटाटोप जेना ॥१३॥
करू यत्न सौमित्रि छत्री अहाँ छी । सुरारीन्द्र-संहारकर्त्ता जहाँ छी ॥१४॥
सुरेशारि ई क्षेत्र मे वीरगुप्त । करैये महामोह से होय लुप्त ॥१५॥
दशग्रीव-भ्राताक से शूनि वानी । कहै छी समीचीन ई लेल मानी ॥१६॥
धनुर्व्वाण सन्धानि सौमित्रि मारै । चटाचट्ट दैत्येन्द्र-सेना-कपारै ॥१७॥
हनूमान ऋक्षेश यूथेश पक्का । महाशैल ओ वृक्ष लै मार धक्का ॥१८॥
तथा शत्रु-सेना महाअस्त्र मारै । महायुद्ध संघट्ट केओ न हारै ॥१९॥
हनूमान छी कौशलाधीश-दासे । महानन्द सौँ भाषि विद्वेषि नाशै ॥२०॥
महावीर सद्वीरता मध्य पूरा । कते शत्रु सेना मिलायेल धूरा ॥२१॥
कहाँ सौँ चलैयै महाधूम-धारे । त्वरा जाय देखी करू से विचारे ॥२२॥
भावार्थः
विभीषण कहलनि – “रावणक सेना प्रस्थान करैत चलि आबि रहल अछि । लगैत अछि जेना चारू दिश मेघ पसैर गेल हो । हे लक्ष्मण, अहाँ सतर्क रहब । अहाँ क्षत्रिय छी आर इन्द्रक शत्रु मेघनाद केँ संहार करयवला छी । एहि क्षेत्र मे जेतय अहाँ एखन छी, इन्द्रजित आ मेघनाद गुप्त रूप सँ महाहोम कय रहल अछि । एहेन प्रयास कयल जाउ जे ई यज्ञ ध्वंस भ’ जाय ।” रावणक भाइ विभीषण केर ई बात सुनिकय लक्ष्मण कहलनि – “अहाँ ठीक कहैत छी । हम ई स्वीकार करैत छी ।” फेर लक्ष्मण निशाना साधिकय तीर चलबय लगलाह, जे रावणक सेना सभक माथा मे चटाचट लगैत छल । पकिया दलपति हनुमान आ जाम्बवन्त पाथरक बड़का-बड़का चट्टान सब सँ तथा गाछ सब सँ धक्का मारय लगलाह । ओम्हर शत्रुक सेना सब सेहो बड़का-बड़का अस्त्र चलबैत अछि, घमासान लड़ाइ होइत अछि आ कोनो पक्ष टस सँ मस नहि होइत अछि । “हम राम केर दास हनुमान छी’ एहि तरहें परम आनन्द सँ घोषणा करैत हनुमान शत्रुक संहार करय लगलाह । वीरता मे अद्वितीय महाबली हनुमान बहुते रास शत्रु-सेना केँ धूल मे मिला देलनि । विभीषण कहलनि – “धुआँक ई विशाल गुब्बारा कतय सँ निकलि रहल अछि से तुरन्त जाकय देखी तेहेन विचार करय जाउ ॥१३-२२॥
।नाराच छन्द।
चलू चलू महागुहा कि होम ओ करैछ की ॥२३॥
लगैछ आबि दुष्टगन्धि आगि मे धरैछ की ॥२४॥
तहाङ्गादादि जोर सोर मार आँखि कान मे ॥२५॥
लड़ाए सौँ पड़ाय इन्द्रजीत ठक्क ध्यान मे ॥२६॥
भावार्थः
चलू, चलय चलू । लगैत अछि जे एहि बड़का गुफा मे हवन कय रहल अछि । ओ नहि जानि आइग मे कि झोंकि रहल अछि, दुर्गन्ध आबि रहल अछि । आब ओकर आँखि आ कान मे तीर, गदा आदि जोर-जोर सँ मारय जाउ । लड़ाइक मैदान सँ भागिकय ओ मेघनाद एतय बक-ध्यान लगौने बैसल अछि ॥२३-२६॥
।चामर छन्द।
छोड़ छोड़ ठक्क बक्क-ध्यान होम गाढ़ रे ॥२७॥
चापबाण हाथ लै अनन्द द्वार ठाढ़ रे ॥२८॥
आज वीरताक बेरि मेघनाद तोर रे ॥२९॥
बाप काँ बँधाय के पड़ाय पाप चोर रे ॥३०॥
भावार्थः
अरे रे वंचक, ई झूठक गहींर समाधि आ एहि होम केँ छोड़ । धनुष-बाण हाथ मे लेने शेषावतार लक्ष्मण तोहर दरबाजा पर ठाढ़ छथुन । अरे मेघनाद, आइ तोरा अपन वीरता देखेबाक समय आबि गेल छौक । बाप केँ बँधाकय कोन पापी चोर एहि तरहें भागैत अछि ?” ॥२७-३०॥
।चौपाइ।
मेघनाद गञ्जन सह ढेर । इन्द्रादिक काँ जे नहि टेर ॥३१॥
सहि धिक्कार गारि ओ मारि । छोड़ल होम चलल शक्रारि ॥३२॥
धर धर धर्क्कट मर्क्कट गोल । आयल पशु बिनु कौड़िक मोल ॥३३॥
होम विघ्न कय वानर लोक । हँसि बहरायल एकहि झोँक ॥३४॥
मेघनाद देखल बहराय । जय-जय-कार ध्वजा फहराय ॥३५॥
देखल निज दल अर्दित रङ्ग । वानर भालुक कटक अभङ्ग ॥३६॥
रथपर चढ़ल धनुष शर हाथ । कहल कतय आबथु रघुनाथ ॥३७॥
क्षुद्र कीश थिक रह तोर भाग । वानर पर शर हमर न लाग ॥३८॥
सुरपति-वारण-कुम्भ विदार । लज्जावश न करय सञ्चार ॥३९॥
रे सौमित्रि हमर विष रोष । नहि देखल छौ की भरि पोष ॥४०॥
मेघनाद थिक हमरे नाम । जयबह कतय विषम सङ्ग्राम ॥४१॥
तहाँ विभीषण काँ देखि ठाढ़ । निष्ठुर वचन कोप मन बाढ़ ॥४२॥
उचिती पिती कहू कत आज । कुलघातक पातक नहि लाज ॥४३॥
लङ्का जन्म ततहि सब कर्म । छाड़ि देल निज वंशक धर्म ॥४४॥
लङ्केश्वर सन छोड़ल भाय । की छी आनक भृत्य कहाय ॥४५॥
पुत्रक विषय विषम विद्रोह । केहन हृदय भेल नहि मन मोह ॥४६॥
अहाँ कयल निज वंश-विनाश । राजा बनब एहन मन आश ॥४७॥
करयित छलहुँ अजय हम याग । अहाँ देखाओल गत-अनुराग ॥४८॥
ई कहि लक्ष्मण देखल वीर । हनुमत्पृष्ठ चढ़ल रण-धीर ॥४९॥
रथ-वर चढ़ल कुपित घननाद । उद्यत-अस्त्र कहल दुर्व्वाद ॥५०॥
वानर तोर रुधिर-पय-पान । करत हमर शर सर्प्पसमान ॥५१॥
लक्ष्मण धनुष-बाण कर सज्ज । वृथा तोर बल रे निर्लज्ज ॥५२॥
लक्ष्मण बाण मर्म्म मे मार । भेल घननाद रहित सञ्चार ॥५३॥
जागल एक मुहूर्त्त बिताय । मन-वैकल्य कहल की जाय ॥५४॥
लक्ष्मण काँ देखल छथि ठाढ़ । कहि कटु कथा कोप मन बाढ़ ॥५५॥
हमर शूरता पहिला बेरि । बुझि नहि पड़लहु तोहरा फेरि ॥५६॥
समर-विभव हम देबहु देखाय । शपथ थिकौ नहि जाह पड़ाय ॥५७॥
कहि लक्ष्मण काँ शर से सात । कयल प्रहार ससरि किछु कात ॥५८॥
उग्र बाण हनुमानक काय । सात लगौलक मर्म तकाय ॥५९॥
द्विगुण विभीषण पर कय कोप । कत शर मारल जिब आरोप ॥६०॥
भावार्थः
जे मेघनाद इन्द्र आदिक पर्यन्त परवाह नहि करैत छल ओ आइ एहि तरहें गंजन सुनि रहल छल । धिक्कार, गाइर आ माइर सहैत-सहैत अन्त मे ओ मेघनाद होम केँ छोड़ि लड़बाक लेल विदा भेल । ओ कहलक – “पकड़, एहि निर्लज्ज बन्दर सभक दल केँ पकड़ ! ई हमर आहार केर पशु बिना दाम देने आबि गेल अछि ।” बन्दर होम मे विघ्न दय केँ एक्के जत्था मे निकलि भागल । मेघनाद बाहर आबिकय देखलक, राम केर जय-जयकार भ’ रहल अछि आ ध्वजा सब फहरा रहल अछि । ओ देखलक जे ओकर अपन सेनाक हाल बेहाल छैक आ बन्दर-भालु सभक दल डटल अछि । ओ रथ पर सवार भ’ हाथ मे तीर-धनुष लेने निकलल आ बाज – “कतय अछि, आबय राम आब हमर सोझाँ ? अरे, बन्दर त क्षुद्र जन्तु थिक । तूँ सब रहे । तूँ सब भाग्यवान छँ, कियैक तँ बन्दर पर हमर तीर नहि चलैत अछि । जे इन्द्रक हाथी ऐरावत केर मस्तक चिरलक से हमर तीर तोरा सब चलैत लजाइत अछि । हे लक्ष्मण, तूँ हमर जहर-समान क्रोध पूरा-पूरी देखलें नहि की ? हमरहि नाम मेघनाद छी । तूँ जएबें कतय ? आब देख दाँत खट्टा करयवला लड़ाइ ।” ॥३१-४१॥
फेर ओतय विभीषण केँ ठाढ़ देखिकय ओकर मन मे तामश आर बढ़ि गेलैक आ ओ निष्ठुर वचन कहल लागल – “काका, आइ हम कि सत्कार केर विनय-वचन कहू ? अहाँ अपनहिं कुल केँ नाश करबाक पाप कय रहल छी । लाज नहि अबैत अछि ? लंका मे जन्म लेलहुँ आ ओतहि सब कर्म कयलहुँ, तैयो अहाँ अपन कुल-धर्म केँ त्यागि देलहुँ । लंकेश्वर रावण जेहेन भाइ केँ छोड़ि देलहुँ । दोसरक नौकर कहाकय कि जी रहल छी ? अहाँ अपन बेटा-भतीजा सँ बदतर ढंग सँ विद्रोह कयलहुँ अछि । केहेन अछि अहाँक कलेजा ? मन मे कनिको मोह-ममता नहि भेल ? अहाँ अपनहिं कुल केर नाश कयलहुँ । एहि मे राजा बननाइये टा अहाँक मंशा छल । हम अजय-यज्ञ कय रहल छलहुँ (जे पूरा भेलापर हमरा कियो जीति नहि सकैत छल); मुदा अहाँ स्नेह केँ तिलाँजलि दय केँ राम केँ देखा देलियैक ।” एतेक कहलाक बाद मेघनाद देखलक जे वीर आ रणधीर लक्ष्मण हनुमानजीक पीठ पर सवार अछि । मेघनाद क्रोधित भ’ एक बढियाँ रथ पर सवार भेल । हथियार उठेने ललकारय लागल – “अरे बन्दर सब, साँपक समान हमर तीर तोरा सभक रक्तरूपी दूध पियत ।” लक्ष्मण धनुष पर तीर चढ़बैत कहलनि – अरे निर्लज्ज, तूँ बेकारे अपन ताकत देखबैत छँ ।” लक्ष्मण मेघनादक मर्मस्थल पर ओ तीर मारलनि । लगिते मेघनाद बेहोश भ’ गेल । फेर एक घड़ीक बाद जागल । ओकर मोनक विकलता कहल नहि जा सकैछ । सोझाँ मे लक्ष्मण केँ ठाढ़ देखलक । मन मे क्रोध आर तेज भ’ गेलैक आ कटु वचन बाजय लागल – “अरे, पहिल बेरुक लड़ाइ मे तोरा हमर वीरता बुझय मे नहि अयलौक । एहि बेर हम देखा देबौक जे लड़ाइ मे हमरा कतेक ताकत अछि । तोरा शपथ छौक, मैदान छोड़िकय भगिहें टा नहि ।” एतेक कहिकय ओ कनेक बगल घुसकिकय सात तीर मारलक । फेर सात तेज तीर हनुमानजीक मर्मस्थल मे लगलनि । फेर दून्ना तामश सँ जी-जान लगाकय विभीषण केँ अनगिनत तीर लागल ॥४२-६०॥
।घनाक्षरी छन्द।
लक्ष्मण कहल ललकि मेघनाद तोर,
थोड़ अछि आयु की समर मे समट्टबैँ ॥६१॥
दशमुख-बाल बड़ गोट अछि गाल तोर,
थोड़ काल मध्य महाकाल-गाल अट्टबैँ ॥६२॥
हट्टबैँ न युद्ध सौँ विरुद्ध अस्त्र कट्टबैँ जौँ,
चट्टबैँ महासुरा कतेक गप्प छट्टबैँ ॥६३॥
ठठ्ठबैँ कुठाठ तौँ समर भूमि लट्टबैँ तौँ,
बाण ओ कृपाण सौँ काँकड़ि जकाँ फट्टबैँ ॥६४॥
भावार्थः
लक्ष्मण ललकारिकय कहलनि – “अरे मेघनाद, आब तोहर आयु थोड़बे रहि गेल छौक । युद्ध मे कि सामना कय सकबें ? अरे रावणक बेटा, तूँ बात बड बनबैत छँ । कनिकबे काल मे तूँ काल केर गाल मे समा जेबें । अर लड़ाईक मैदान सँ भगमें नहि, हथियारक जवाब हथियारे सँ देमें, बहुत बेसी दारू पीमें, डींग हँकमें, आर बदमाशी करमें तँ लड़ाईक मैदान मे सुता देल जेबें तथा वाण एवं तलवारक प्रहार सँ ककड़ी जेकाँ फाटि जेबें ।” ॥६१-६४॥
।चौपाइ।
मेघनाद शर कयल प्रहार । लक्ष्मण पर बड़ कोप हजार ॥६५॥
भेल कवच-बिनु लक्ष्मण अङ्ग । लक्ष्मण कयल हुनक से रङ्ग ॥६६॥
युद्ध परस्पर केओ नहि हार । तन शोणित बह निर्झर धार ॥६७॥
लक्ष्मण तखन हनल शर पाँच । सारथि रथ न तुरग एक बाँच ॥६८॥
धनुष आन से आनल हारि । लक्ष्मण काटल तिनि शर मारि ॥६९॥
मेघनाद काँ रहल न चाप । शर सँ जर्ज्जर थर थर काप ॥७०॥
बड़ साहस सँ धनु पुन आनि । लक्ष्मण काँ शर मारय तानि ॥७१॥
रवि-सन्निभ शर लाख हजार । वानर भालु गोल मे मार ॥७२॥
भावार्थः
ई सुनिकय मेघनाद कुपित भ’ कय लक्ष्मणजी पर हजारों तीर चलबैत प्रहार कयलक । लक्ष्मणजीक शरीर कवचविहीन भ’ गेलनि । लक्ष्मणजी सेहो ओकर वैह हाल कय देलनि । दुनू गोटे मे घमासान युद्ध भेल, कियो हारय के नाम नहि लैत छथि । दुनू गोटेक शरीर सँ झरना जेकाँ लहूक धारा बहय लागल। तखन लक्ष्मणजी पाँच टा तीर चलौलनि । तीर लगिते न सारथि रहल, न रथ आ न एकहु टा घोड़ा । तखन मेघनाद दोसर धनुष लय अनलक आ लक्ष्मणजी तीने टा तीर सँ ओहो धनुष केँ काटि देलनि । आब मेघनाद लग कोनो धनुष नहि रहि गेल । तीर सँ ओकर शरीर जर्जर भ’ गेलैक आर थर-थर काँपय लागल । फेर ओ बहुत हिम्मत कय केँ दोसर धनुष लेलक आ खींचि-खींचिकय लक्ष्मणजी पर तीर चलाबय लागल । ओ बन्दर आ भालु सब पर हजारों नहि लाखों तीर बौछार करय लागल ॥६५-७२॥
।सोरठा।
जय रघुनाथ उचार, ध्यान राम पद कमल मे ॥७३॥
मेघनाद काँ मार, कहि कहि लक्ष्मण ऐन्द्रशर ॥७४॥
धर्म्मात्मा रघुवीर, सत्यसन्ध दशरथ-तनय ॥७५॥
रण मे एकहि तीर, तौँ घननादक हो मरण ॥७६॥
भावार्थः
रामजीक चरणकमल मे ध्यान लगा तथा ‘रामजीक जय’ नारा लगबैत लक्ष्मण मेघनाद केँ ऐन्द्र-शर लगौलनि । सत्यव्रती राजा दशरथक पुत्र धर्मात्मा रघुवीरक एक्कहि बाण सँ मेघनाद मरि सकैत छल ॥७३-७६॥
।चौपाइ।
इन्द्रक शत्रु लड़ल भरि पोष । लगलनि लक्ष्मण शर से चोष ॥७७॥
रोकि न शकला से उतपात । धर सौँ शिर भय गेलनि कात ॥७८॥
रवि-मण्डल-रुचि कुण्डल कान । समर शयित से दैव प्रधान ॥७९॥
कत कह जिबतहि अछि घननाद । कत कह मरि गेल विविध विवाद ॥८०॥
अमर सकल नभ कर गुण-गान । जय रघुनाथ देव भगवान ॥८१॥
स्तुति कर बहुत वृष्टि कर फुल । देखल सृष्टि इष्ट अनुकूल ॥८२॥
दुन्दुभि शब्द भेल आकाश । इन्द्रादिक मन छुटि गेल त्रास ॥८३॥
जिबितहिँ दशमुख शम उतपात । जनि सापक टूटल विषदाँत ॥८४॥
स्थिरा धरा निर्म्मल भेल गगन । जय जय शब्द करथि जन मगन ॥८५॥
लक्ष्मण वीर जखन श्रम रहित । बालि तनय मारुत सुत सहित ॥८६॥
शंखक धुनि धनुषक टङ्कार । लक्ष्मण कयल विजय व्यवहार ॥८७॥
शुनि शुनि हर्षक नाद विशाल । मूर्छित उठल हटल श्रम-जाल ॥८८॥
अतिशय हर्षित कपि-दल सर्व्व । मारल मेघनाद बड़ गर्व्व ॥८९॥
जय जय लक्ष्मण जय रणधीर । कालहु जित सित अपनैँक तीर ॥९०॥
हनुमदादि सेनाधिप-सहित । तथा विभीषण दूषण-रहित ॥९१॥
रामचन्द्र काँ कयल प्रणाम । कुशल सकल जीतल सङ्ग्राम ॥९२॥
अपनैँ चरणक मुख्य प्रसाद । रण मे शयित अहित घननाद ॥९३॥
लड़ल निरन्तर भरि भरि राति । अतिमायाबल राक्षस जाति ॥९४॥
मारल खल काँ लक्ष्मण वीर । हृदय लगाओल कहि रघुवीर ॥९५॥
मेघनाद छल बड़ा लड़ाक । तनिकाँ मारल अहाँ तड़ाक ॥९६॥
हिनकहि धरि छल अछि सङ्ग्राम । हिनि जितलय जीतल सभ ठाम ॥९७॥
शर-जर्ज्जर सब सेना-गात्र । जिति अयलहुँ अहाँ विगत त्रिरात्र ॥९८॥
पुत्र-शोक सौँ दशमुख दीन । कि कर पौरुष जल बिनु मीन ॥९९॥
रावण मन मानल सुत-मरण । अतिशय आकुल अन्तष्करण ॥१००॥
झट झट अट्ट-शिखर चढ़ि ताक । चढ़ल विकल चित्त चिन्ता-चाक ॥१०१॥
भावार्थः
इन्द्रक शत्रु मेघनाद खूब लड़ल । अन्त मे लक्ष्मणजीक तेज बाण ओकरा लागि गेलैक । ओ एहि बाण रूपी आफद केँ रोकि नहि सकल । ओकर सिर धड़ सँ अलग भ’ गेलैक । ओकर कानक कुंडल सूर्य-मंडल जेकाँ चमैक रहल छलैक । ओ युद्ध-भूमि मे सुइत रहल । विधाता सब किछु कय सकैत छथि । कियो कहैछ, मेघनाद जिबिते अछि आ कियो कहैछ जे मरि गेल । एहि पर तरह-तरह केर विवाद होबय लागल । आकाश मे देवता सब गुणगान करय लगलाह – भगवान रामचन्द्र की जय । स्तुति करैत फूल बरसाबैत देवता सब देखलनि जे दुनि मे इच्छानुरूप चैन भेट गेल अछि । आकाश मे हर्षक नगाड़ा (ढोल) सब बाजयल लागल । इन्द्र आदि देवता लोकनिक मन मे त्रासक अन्त भ’ गेलनि । रावणक जिबिते सबटा उपद्रव शान्त भ’ गेल, मानू साँपक जहरवला दाँत तोड़ि देल गेलैक । पृथ्वी स्थिर भ’ गेल, आकाश स्वच्छ भ’ गेल, लोक आनन्द मे मग्न भ’ कय जय-जयकार करय लागल । जखन किछु बेर मे अंगद आ हनुमान सहित वीर लक्ष्मण केर थकावट दूर भेलनि, तखन विजय केर रीति अनुसार लक्ष्मण एक बेर शंख बजौलनि आ धनुषक टंकार कयलनि । विजयोल्लास केर ई आवाज सुनि-सुनिकय ओहो सब उठि गेल जे बेहोश पड़ल छल आ सभक थकान दूर भ’ गेलैक । समस्त कपि-दल मे हर्ष छा गेल । मेघनाद केँ मारलनि ई बड पैघ गौरव केर बात छल । ‘जय हो, युद्ध मे अडिग वीर लक्ष्मण केर जय हो । अहाँक तीख तीर कालहु केँ जीत सकैत अछि ।’ एहि तरहें बड़ाइ करैत हनुमान आदि दलपति सभक संग निष्कलुष (दोषरहित) विभीषण राम केँ प्रणाम कयलनि आ हुनका खुशखबरी सुनौलनि – “हम सब कुशलपूर्वक लड़ाइ मे विजयी भेलहुँ । मुख्यतः अपनहिक चरणक प्रसाद सँ हमरा सभक दुश्मन मेघनाद युद्ध मे मारल गेल । ओ राति-राति भरि लगातार लड़ैत रहल । राक्षस सब लग मायाक भारी शक्ति रहैत छैक । ओहि दुष्ट केँ लक्ष्मणजी मारि देलनि ।” ई सुनिकय रामजी लक्ष्मणजी केँ हृदय सँ लगा लेलनि आ कहलनि – मेघनाद बहुत भारी लड़ाकू छल । तेकरा अहाँ चटपट मारि देलहुँ । मानू लड़ाइ एतहि धरि छल । एकरा जीति लेलहुँ त सब जीति लेलहुँ । सब योद्धा सभक शरीर तीर सँ क्षत-विक्षत भ’ गेल अछि । अहाँ तीने राति मे जीति अयलहुँ । रावण त पुत्रक शोक सँ विह्वल भ’ गेल अछि । बिना जल केर मछरी समान ओ आब कि करामात कय सकत !” ओम्हर रावण केँ विश्वास भ’ गेलैक जे बेटा मेघनाद मारल गेल । ओकर हृदय अत्यन्त व्याकुल भ’ गेलैक । ओ झटपट ऊँच अटारी पर चढ़िकय देखय लागल । ओकर दिमाग चिन्ता सँ चकराय लगलैक ॥७७-१०१॥
।घनाक्षरी छन्द।
जय-जय-कार धुनि अमर उचार कर,
शुनि पड़ कान हनुमान-हर्ष-हाक रे ॥१०२॥
ध्वज फहरायल बहराय कैँ शिखर चढ़ि,
यन्त्र मे लगाय दृष्टि दूरही सौँ ताक रे ॥१०३॥
आज मेघनादक समाद न शुनल शुभ,
जैह सूर्प्पनखाक काटल कान नाक रे ॥१०४॥
सैह राम-भाय हाय कैलक अन्याय जनु,
अनुमान होइछ देलक शिर डाक रे ॥१०५॥
भावार्थः
देवता सब जय-जयकार नारा लगा रहल छथि । जीतक हर्षोल्लास मे लगायल गेल हनुमानजीक किलकारी सुनाय पड़ि रहल अछि । विजय-ध्वजा सब फहरा रहल अछि । रावण पहाड़क चोटी पर चढ़िकय दूर-दर्शी यन्त्र मे आँखि लगाकय दूरहि सँ देख रहल अछि आ सोचि रहल अछि – “आइ मेघनादक शुभ समाचार नहि भेटि रहल अछि । जे शूर्पणखाक नाक-कान कटने छल वैह रामक भाइ लक्ष्मण शायद अनर्थ कय देलक । लगैत अछि जे ओ हमर सर्वनाश कय देलक ।” ॥१०२-१०५॥
।जयकरी छन्द।
पक्ष-हीन जनु पड़ल पहाड़ । रावण महा-विपट पतझाड़ ॥१०६॥
दुष्ट विभीषण खूनल मूल । सोदर भाय हाय प्रतिकूल ॥१०७॥
विधि भेल वाम इष्ट भेल ठक्क । कालपुरुष नहि ककरो शक्क ॥१०८॥
जोर नोर बह वोणहु आँखि । खग भेल लोथ कतरलय पाँखि ॥१०९॥
कि कहब मन्दोदरी-विषाद । जिबयित मरण शरण घननाद ॥११०॥
निर्भय भेल देवगण आज । ऋषि मुनि जन मन बनि गेल काज ॥१११॥
धिक थिक हमरहु शत्रु कलङ्क । पड़ल गजेन्द्र विषम थल पङ्क ॥११२॥
तापस से पुन दैत्य संहार । जिबयित रावण कपि-सञ्चार ॥११३॥
धिक धिक मेघनाद बल तोर । उठि की कुम्भकर्ण भेल जोर ॥११४॥
भावार्थः
रावण ओहेन पहाड़ जेकाँ पड़ल अछि जेकर पाँखि काटि देल गेल होइक । मानू विशाल वृक्ष मे पतझड़ लागि गेल हो । दुष्ट विभीषण ओकर जैड़ खुइन देलक । अपन सहोदर भाइ दुश्मन भ’ गेल । विधाता बाम भ’ गेलाह । जे हित छल से वंचक भ’ गेल । मन्दोदरी केँ जे विषाद भेलनि से कि कहल जाय । हुनका जीवन मरण समान लगैत छलन्हि, कियैक तँ मेघनादे टा हुनकर प्राणाधार छलन्हि । आइ देवता लोकनि केँ सबटा भय दूर भ’ गेलनि । ऋषि-मुनि सभक कामना पूर्ण भेलनि । रावण सोचैत अछि – धिक्कार अछि हमरा जे कलंक लगाबयवला शत्रु भेटि गेल । मानू गजराज गहींर थाल (पाँक) मे फँसि गेल । आर ओ शत्रु सेहो एकटा मामूली तापस छी । एतबे नहि, ओ त राक्षस सब केँ संहार करैत जा रहल अछि । तैयो रावण जिन्दा अछि, आर वानरदल सक्रिय अछि । हे मेघनाद ! तोरो ताकत केँ धिक्कार छौक । हे कुम्भकर्ण, तोरा जगेले सँ कि भेल ? ॥१०६-११४॥
।मत्तगजेन्द्र छन्द।
वास सदा मणिमन्दिर मे, तहँ खाट मनोहर सन्मणि-पाबा ॥११५॥
गेलि विलास-कला सकला, उत धान धरी मुह होइछ लाबा ॥११६॥
कोटि विलाप करै वनिता, कहि भेलहुँ आज-उपाय अभाबा ॥११७॥
की लिखि देल ललाटक पट्ट मे, बूझि न से बुढ़वा विधि बाबा ॥११८॥
भावार्थः
मन्दोदरी विलाप करैत छथि – “हम सदिखन रत्नमय भवन मे रहैत छलहुँ आ कीमती पैरवला पलंग लागल रहैत छल । से हमर सबटा विलासिता खत्म भ’ गेल । एतेक सन्तप्त छी जे मुँह मे धान राखब त ओ फूटिकय लावा बनि जायत ।” रावणक स्त्री मन्दोदरी अपार विलाप कय रहल अछि – “आइ हम सब साधन सँ हीन भ’ गेलहुँ । बूढ़ बाबा विधाता ललाट मे नहि जानि कि लिखि देलनि अछि ।” ॥११५-११८॥
।चकोर छन्द।
लै कहु खड्ग दशानन दौड़ल रामप्रिया हम मारब आज ॥११९॥
मन्त्रि सुपार्श्व बुझाब विपत्तिमे हे प्रभु ई नहि भूपति काज ॥१२०॥
वीर अहाँ रणधीर महाशय तुल्य अहाँक कहाँ महराज ॥१२१॥
ई शुनि देखि कहू ककरा नहि स्त्रीबध उत्सव हो मन लाज ॥१२२॥
भावार्थः
रावण क्रोधित भ’ तलवार लय केँ ई कहैत दौड़ल जे आइ सीता केँ मारि देबैक । सुपार्श्व नामक ओकर मंत्री ओकरा बुझेलक – ‘हे प्रभु ! विपत्तिक समय अहाँ केँ एहेन काज नहि करबाक चाही । अहाँ वीर छी, रणधीर छी तथा महाशय (महान विचारवला) छी, तेँ एना करब अहाँ केँ शोभा नहि दैत अछि । ई बात सुनिकय आ सोचि-बुझिकय कहू जे स्त्री-वध कय केँ उछाह मानब केकरा लेल लज्जाक बात नहि होयत ? ॥११९-१२२॥
।सोरठा।
सभ जन मिलि तत जाय, मारब लक्ष्मण राम काँ ॥१२३॥
अहँ पौलस्त्य कहाय, स्त्रीबध अनुचित सर्व्वथा ॥१२४॥
लज्जित भवन प्रवेश, कयल दशानन विकल-मन ॥१२५॥
पुछल सकल दनुजेश, प्रात सभा मे आबि पुन ॥१२६॥
भावार्थः
हम सब गोटे मिलिकय ओतय जायब आ लक्ष्मण व राम केँ मारब । अहाँ पुलस्तिक नागि कहाइत छी, तेँ अहाँक लेल स्त्री-वध केनाय एकदम अनुचित अछि ।” ई सुनिकय रावण लज्जित भ’ गेल आ खूनक घूँट पीबिकय अपन भवन मे चलि गेल । फेर भोर भेला पर रावण दरबार लगौलक आ सब सँ पूछलक – ॥१२३-१२६॥
।चौपाइ।
मानव वानर दानव मार । आनब बल हम कोन अपार ॥१२७॥
शलभ नाम मन्त्री बल बनल । चलल समर रघुवर शर-अनल ॥१२८॥
जत राक्षस आबथि सङ्ग्राम । सभ काँ लोटपोट कर राम ॥१२९॥
अपनहुँ बहुत दशानन लड़ल । रघुवर-शर-जर्ज्जर भय पड़ल ॥१३०॥
दृदय-मध्य बेधित एक बाण । लङ्का अयला मुर्छित प्राण ॥१३१॥
भावार्थः
“मनुष्य आ वानर राक्षस सब केँ मारैत जा रहल अछि । आब हम एतेक सेना कतय सँ आनब ? हे मंत्री लोकनि, युद्ध मे रामक तीर रूपी आइग मे हमर सेना कीट-पतंग जेकाँ जरैत जा रहल अछि ।” लड़ाइक मैदान मे जेहो राक्षस जाइछ सब केँ राम मृत्युक घाट उतारि दैत छथि । स्वयं रावण सेहो बहुते लड़ाइ कयलक आ अन्त मे रामक तीर सँ क्षत-विक्षत भ’ धराशायी भ’ गेल । ओकर छाती मे एकटा तीर वेधा गेल आ ओ बेहोश भ’ लंका आनि लेल गेल ॥१२७-१३१॥
सुलोचनाक विलाप आ सती होयब
।दोहा।
लङ्का सती सुलोचना, पति घननाद समाप्त ॥१३२॥
लक्ष्मण-शर-प्रेरित सुभुज, तनि आङ्गन सम्प्राप्त ॥१३३॥
भावार्थः
लंका मे मारल गेल मेघनादक पत्नी सुलोचना रनिवास मे छलथि । लक्ष्मण केर तीरक सहारे मेघनादक एकटा कटल बाँहि ओकर अँगना मे आबि खसल ॥१३२-१३३॥
।चौपाइ।
दासी एक देखल से नयन । स्वामिनि सौँ कहलनि दुख अयन ॥१३४॥
आङ्गन मध्य गगन सौँ बाँहि । खसल वाणयुत भेलहुँ बताहि ॥१३५॥
स्वामिनि चलु चलु देखू आज । आपत की मर्य्यादा लाज ॥१३६॥
पन्नगेश-तनया तत गेलि । भुज काँ देखि विकल-मन भेलि ॥१३७॥
फरकै छल अछि दक्षिण अङ्ग । परिणत फल की लगइ रङ्ग ॥१३८॥
करु करुणा अरुणायतनयन । भुज-जित-विश्व समर-महि शयन ॥१३९॥
लवणोदधि हो अमृत समान । कनकाचल त्यागथि स्वस्थान ॥१४०॥
सुरगुरु मूक मूक वाचाल । झपटि सिंह काँ मार शृगाल ॥१४१॥
अद्भुत नहि विस्तर संसार । वानर नर सुरवर-जित मार ॥१४२॥
पतिभुज तन्त्रा करु परित्याग । हयब सती हम पूरण भाग ॥१४३॥
जौँ हम सत्य सती मन साँच । लिखि प्रमाण कहु सब जन बाँच ॥१४४॥
भावार्थः
ओहि पर एक गोट दासीक नजरि पड़ल । ओ अपन मालिकिन सुलोचना केँ सूचित कयलक – “हे स्वामिनी! अँगना मे तीर-लागल एक टा बाँहि आकाश सँ खसल हँ । हम त ओ देखि पागल भ’ गेल छी । हे स्वामिनी, अहाँ चलिकय देखू । संकट केर समय लाज की आ मर्यादा की !” सुलोचना ओतय गेलिह आ बाँहि देखिते व्याकुल भ’ गेलिह । ओ कहलनि – “हमर दाहिना आँखि फड़कि रहल छल । लगैत अछि, ई तेकरे खराब फल छी । हे लाल आ पैघ-पैघ आँखिवला हमर प्रिय, दया करू । हाय, जे अपन बाहुबल सँ समूचा दुनिया केँ जीतयवला छलहुँ, वैह आइ लड़ाइक मैदान मे सुतल छी । खारा समुद्र अमृत समान भ’ सकैत अछि । सुमेरु अपन जगह छोड़ि सकैत अछि । देवता लोकनिक गुरु वृहस्पति गूँगा वक्ता बनि सकैत छथि । सियार झपटिकय सिंह केँ मारि सकैत अछि । संसार मे अचरज सभक अन्त नहि छैक । ई सेहो आश्चर्य अछि जे बन्दर आ मनुष्य सब इन्द्र केँ जीतयवला मेघनाद केँ मारि देलक । हे हमर पतिक बाँहि, अहाँ आलस छोड़ू । हम सौभाग्यवश आब सती होयब । यदि हम सचमुच मे सती छी आ हमर हृदय पवित्र अछि, त हे बाँहि, अहाँ लिखिकय प्रमाणित करू ताकि सब पढ़ि लियए ।” ॥१३४-१४४॥
।सोरठा।
भुज देल हाथ पसारि, देखल सती सुलोचना ॥१४५॥
सुमती चित्त विचारि, खड़ी धरायोल हाथ मे ॥१४६॥
भावार्थः
एतेक कहिकय सती सुलोचना देखलनि बाँहि हाथ पसारि देलक अछि । फेर बुद्धिमती सुलोचना सोचि-विचारिकय ओहि हाथ मे खरी धरा देलिह ॥१४५-१४६॥
।चौपाइ।
मणिमय आँगन लिखलनि हाथ । परमेश्वर जानू रघुनाथ ॥१४७॥
धरा-भार-धर पन्नग जैह । जानय थिक लक्ष्मण काँ सैह ॥१४८॥
तनिकहि हाथ हमर भेल मरण । सुखमय अभय स्वर्ग भेल शरण ॥१४९॥
निद्राहार विहार विराग । मनस्पस्यहु नहि दूषण लाग ॥१५०॥
सति शुभमति चिन्ता नहि करिय । सङ्ग हमर सुरपुर सञ्चरिय ॥१५१॥
राम समक्ष माँथ अछि धयल । लय आनू लिखि सूचित कयल ॥१५२॥
निरुपद्रव रघुनाथ-समीप । श्वशुर विभीषण छथि कुल-दीप ॥१५३॥
की सुख राज्यभोग अवसान । उत्तम गति देलनि भगवान ॥१५४॥
सुरपति-जित-गृहिणी निज गेह । तन धन जन मन सौँ तजि नेह ॥१५५॥
सकल अनित्य विश्व मन मानि । चललि दशानन-तट गुरु जानि ॥१५६॥
मणिमय यान पतिक भुज धयल । अपनहुँ चढ़लि शोक नहि कयल ॥१५७॥
अमरेश्वर-जित-अबला सङ्ग । चलल पदाति महीपति-रङ्ग ॥१५८॥
दासी सकल विकल भय कान । आज अभाग्य देल भगवान ॥१५९॥
वैतालिक आगाँ एक जाय । विकल दशानन कहल बुझाय ॥१६०॥
भावार्थः
ओ हाथ रत्न सँ बनल फर्श पर खरी सँ लिखि देलक – “राम केँ परमेश्वर बुझू । धरतीक भार केँ उतारयवला जे शेषनाग छथि लक्ष्मण केँ तिनकर अवतार बुझू । हमर मृत्यु हुनकहि हाथ सँ भेल अछि । मरला पर हमरा सब सुख सँ युक्त भय सँ मुक्त स्वर्ग भेटल अछि । सुतनाय, खेनाय-पीनाय आ घुमनाय-फिरनाय सब किछु सँ अहाँ केँ विराग रहल (एकमात्र हमरहि टा मे अनुराग रहल) । अहाँक मनक रस्तो तक केँ कोनो पाप नहि छुबि सकल । हे सुन्दर विचारवाली सती, अहाँ चिन्ता जुनि करू । हमरा संग स्वर्ग मे विहार करू । हमर सिर राम केर आगाँ राखल अछि”, हाथ ई लिखिकय जनौलक – “ओ लय जाउ । अहाँ केँ रामक सोझाँ कोनो असुविधा नहि होयत । कुल केँ उजागर करयवला अहाँक ससुर विभीषण ओतहिये छथि । राजसुख भोगलाक बाद हमरा ई स्वर्गसुख प्राप्त भेल अछि । भगवान हमरा उत्तम गति देलनि अछि ।” एतेक जनलाक बाद इन्द्रजित मेघनादक पत्नी सुलोचना तन, धन आ जन – सब सँ सम्बन्ध तोड़ि लेलिह; संसारक सब वस्तु नाशवान् अछि से बुझि गेलिह, आर ससुर बुझिकय रावण लग गेलिह । पतिक बाँहि केँ रत्न सँ रचित रथ पर रखलनि आ शोक केँ दबाकय अपनों वैह रथ पर चढ़ि गेलिह । इन्द्रजितक पत्नीक संग पैदल सेना ओहि तरहें चलल जाहि तरहें राजाक संग चलैत अछि । सब दासी सब फुटि-फुटिकय कनैत अछि – हाय, आइ भगवान हमरा सब केँ भाग्यहीन बना देलनि । एकटा हरकारा आगू गेल आ शोकाकुल रावण केँ सूचना देलक – ॥१४७-१६०॥
।सोरठा।
सती पुतोहु अहाँक, आइलि छथि कहतीह किछु ॥१६१॥
हुनि शिर पड़ि गेल डाक, मेघनाद-शिर समर अछि ॥१६२॥
देखल आँखि उघारि, लय आनू तट पालकी ॥१६३॥
बिश लोचन बह वारि, कहल विकल दशकण्ठ तहं ॥१६४॥
पति भुज देल उघारि, सती धरणि मूर्छित खसलि ॥१६५॥
पुन उठि समय विचारि, श्वशुर-चरण लपटाय कह ॥१६६॥
भावार्थः
“अपनेक सती पुत्रवधू सुलोचना आयल छथि । ओ अपने सँ किछु निवेदन करय चाहैत छथि । हुनकर सर्वनाश भ’ गेलनि । मेघनादक सिर लड़ाइक मैदान मे खसल पड़ल अछि ।” रावण आँखि खोलिकय हुनका दिश तकलक आ कहलक – “पालकी हमरा लग लेने आउ ।” शोकवश ओकर बीसो आँखि सँ नोर बहि रहल छलैक । सती सुलोचना अपन पतिक बाँहि उघारिकय राखि देलिह आ स्वयं बेहोश भ’ कय खसि पड़लिह । फेर होश मे अयलिह आ अवसर देखि सम्हरिकय ससुरक चरण मे लिपटिकय कहय लगलिह – ॥१६१-१६६॥
।गीत।
।वियोगि-मालव छन्द।
से पहु हमर गेला रे, रे परलोक ।
हमरहि हृदय असह शोक ॥१६७॥
जरब न पहु सङ्ग रे, रे यावत ।
विरह-दहन-दुख तावत ॥१६८॥
सकल-भुवन-राज रे, रे सम सुख ।
जखन देखब इन्द्रजित मुख ॥१६९॥
आब हमर मन रे, रे निरभय ।
सुमति युगुति सति जीव दय ॥१७०॥
भावार्थः
हमर प्रिय पति परलोक सिधारि गेलाह । हमर हृदय मे असह्य शोक दय गेलाह । जाबत धरि हम पतिक संग जरि नहि जायब, ताबत धरि हुनकर विरह केर सन्ताप दूर नहि होयत । जखन हम इन्द्र केँ जीतयवला मेघनादक मुँह देखब तखन हमरा ओ सब सुख भेटि जायत जे तीनू भुवन केर राज्य भेटला पर होइत अछि । आब हमर मन मे कोनो डर नहि रहल कियैक तँ सब किछु सोचि-बुझिकय हम सती हेबाक लेल अपन प्राण दय देब ॥१६७-१७०॥
।त्रिभङ्गी छन्द।
पतिसङ्ग हम जायब अनल समायब
घुरि नहि आयब पुन धरणी ॥१७१॥
शुनु गुरु दशकन्धर दनुज-पुरन्दर
सुन्दर पातिव्रत-सरणी ॥१७२॥
पति-शिर दिय आनी अपनैँ ज्ञानी
शोक न मानी विधि-करणी ॥१७३॥
अयलहुँ यहि आशा हत-जगदाशा
गत-पशुपाशा सुत-घरणी ॥१७४॥
भावार्थः
हम पतिक संग जायब, चिता मे प्रवेश करब, फेर घुरिकय धरती पर नहि आयब । हे हमर गुरुजन राक्षसराज रावण ! सुनू, पातिव्रत केर बाट बड नीक होइत छैक । अपने हमर पतिक सिर आनिकय दिय’ । अपने ज्ञानवान् छी; एकरा विधिक विधान बुझिकय शोक नहि करब । संसारक आशा केँ छोड़ि आ जीवनक बन्धन केँ तोड़ि हम अपनेक पुत्रवधू एहि आशा सँ अपने लग अयलहुँ अछि ।” ॥१७१-१७४॥
।सोरठा।
शुनि सुतवधू-विलाप, रावण बहुत भरोस दय ॥१७५॥
कहल हृदय-सन्ताप, सुमति विलम्ब दिनैक करू ॥१७६॥
भावार्थः
पुतोहुक विलाप सुनिकय रावण हुनका बहुते सान्त्वना देलक आ सन्तप्त हृदय सँ कहलक – “हे बुद्धिमती ! एक दिन रुकि जाउ ॥१७५-१७६॥
।चौपाइ।
उपगत विपति हयत की कानि । मारब शत्रु भेल मन आनि ॥१७७॥
रामादिक शिर प्रथमहि काटि । देवि देब दिक्पति बलि बाँटि ॥१७८॥
पति-शिर समर सहज अहँ लेब । अरि-शिर वाम चरण अहँ देब ॥१७९॥
शुनि दशकन्धर-वचन कठोर । क्षण चुप रहलि नयन भर नोर ॥१८०॥
पुन कहलनि गुरु आगाँ ठाढ़ि । सभ सौँ आशा काँ अछि बाढ़ि ॥१८१॥
जौँ कदाच अरि काँ लेब जीति । करब राज्य अरि-रहित सुनीति ॥१८२॥
अपनैँ काँ भेटत जन सर्व्व । एखनहुँ धरि मन मे अछि गर्व्व ॥१८३॥
श्वशुर-समाज मुख्य नृप-द्वार । रहल न आज लाज व्यवहार ॥१८४॥
यावत गगन भानु रह चन्द । तावत सुयश रहत स्वच्छन्द ॥१८५॥
छल छथि दशमुख काँ एक पूत । जीतल अमर समर पुरहूत ॥१८६॥
हमरहु नहि मन मे किछु शोक । हर्षित अमर रहथु निज लोक ॥१८७॥
पहु बिनु जीवन सुख की राज । बरु भल रौरब नरक समाज ॥१८८॥
चलब आब गुरु-अनुमति पाय । विधिक रेख के शकत मेटाय ॥१८९॥
शुनलनि वचन पुतोहुक कान । कि करथु दशमुख विधि बलवान ॥१९०॥
आशु शाशु-घर कनयित जाय । कहल सकल तनि पद लपटाय ॥१९१॥
कहलनि श्वशुरक वचन विचार । दैव ज्ञान हर अस्त्र न मार ॥१९२॥
हम कटु कहल न बड़ गुरु जानि । कालाधीन गुणल नहि हानि ॥१९३॥
मन्दोदरी कहल वृत्तान्त । नारद जे कहलनि एकान्त ॥१९४॥
समर-विमुख दशमुख नहि हयत । सकुल सदल कालक घर जयत ॥१९५॥
सभ सौँ हुनका अछि अरि-भाव । दशकन्धर नहि बचता आब ॥१९६॥
लङ्का लूटत वानर आबि । मुनि वृत्तान्त गेला कहि भावि ॥१९७॥
एतय विभीषण नृपति कहाय । करता भोग वस्तु-समुदाय ॥१९८॥
परमात्मा परमेश्वर राम । ज्ञाते छथि लक्ष्मण गुणधाम ॥१९९॥
हनूमान रुद्रक अवतार । मुख्य सकल दल रहित-विकार ॥२००॥
ततय विभीषण श्वशुर प्रधान । समदर्शी लग सकल समान ॥२०१॥
जाउ जाउ थिक मुख्य विचार । ओतय न लेश असत व्यवहार ॥२०२॥
उप-लक्ष्मण गति समुचित पूर । सती आगु स्वर्गे कत दूर ॥२०३॥
भावार्थः
जखन विपत्ति आबिये गेल त आब कानिकय कि होयत ! मोन मे आन आइन जागि गेल अछि । शत्रु केँ मारिकय रहब । पहिने राम आदि दुश्मन सभक सिर काटिकय, हे देवी, दिक्पति लोकनि (इन्द्र आदि देवता सब केँ) बलि चढ़ायब । तखन अहाँ सहजहि अपन पतिक सिर लय लेब आ दुश्मन सभक सिर पर अपन बायाँ पैर राखब ।” रावणक ई कठोर वाणी सुनिकय सुलोचना क्षण भरि लेल चुप रहि गेलिह आर हुनकर आँखि सँ नोर बहैत रहलनि । फेर गुरुजन रावणक आगाँ ठाढ़ भ’ कहय लगलिह – “आशा सब सँ प्रबल होइत अछि । यदि कदाचित् अपने शत्रु केँ जीति लेब त निष्कंटक भ’ न्यायपूर्वक राज्य करब । अपने केँ सबटा लोक भेटि जायत । एखन धरि अपनेक मन मे अभिमान रहिये गेल अछि । ससुरक सोझाँ प्रधान दरबार मे आइ हमरा लेहाज (लाज) करबाक अवसर नहि रहल । जाबत धरि आसमान मे सूरज आ चाँद रहत ताबत धरि अनुपम यश छायल रहत जे रावण केर एकटा पुत्र रहनि जे युद्ध मे देवराज इन्द्र तक केँ पराजित कयलकनि । हमर मन मे कनिकबो शोक नहि अछि । देवता सब अपन लोक स्वर्ग मे हर्षक संग रहथि । पतिक बिना जीवन मे राजसुख कोन काजक होयत ! एहि सँ त पतिक संग नरक मे रहनाइये नीक होयत । आब हम गुरुजन सँ आज्ञा लय कय विदाह होयब । विधाताक लिखल के मेटा सकैत अछि ?” रावण पुतोहुक बात सुनलक । ओ कइये कि सकैत छल ? भाग्य बलवान् होइत छैक । (सुलोचना) झटपट कनैते सासुक घर गेलिह । हुनकर पैर सँ लिटपिकय सब हाल सुनौलिह । ससुर जे विचार देलखिन सेहो सुनौलिह । विधाता अस्त्र सँ नहि मारैत छथि, ओ त सीधा ज्ञान हरण कय लैत छथि । सुलोचना कहलिह – “हम गुरुजन बुझिकय हुनका कटु वचन नहि कयलियनि । काल केर दोष बुझिकय हम अपन हानिक परवाह नहि कयलहुँ ।” फेर मन्दोदरी ओ सब खिस्सा सुनौलिह जे नारद एकान्त मे हुनका सुनौने रहथि । मन्दोदरी कहलिह – “रावण युद्ध केनाय नहि छोड़ता । अपन कुल केर आर अपन दलक सब लोकक संग ओ कालक गाल मे समा जेताह । हुनका हरेक संग दुश्मनी छन्हि । आब रावण बचयवला नहि छथि । बन्दर आबिकय लंका मे लूटपाट करत । नारद मुनि ई भावी घटना बता गेल छथि । एतय लंका मे विभीषण राजा हेताह आ सब वस्तुक भोग करताह । राम परमेश्वर परमात्मा थिकाह । लक्ष्मणक गुण तँ सब केँ पते अछि । हनुमान रुद्रक अवतार थिकाह । अन्यान्य सब दलपति सब निष्कलुष छथि । ओतय विभीषण छथि जे अहाँक श्रेष्ठ ससुर छथि । समदर्शी लग त सब बराबर अछि । जाउ-जाउ । ई नीक विचार अछि । ओतय कनिकबो खराब व्यवहारक डर नहि अछि । ई कहावत खूब नीक सँ चरितार्थ होयत जे सतीक आगाँ स्वर्ग दूरे कतेक होइछ ॥१७७-२०३॥
।रूपमाला छन्द।
चललि पति-भुज पालकी धय, रामचन्द्र समाज ॥२०४॥
कहल दल वनिता-सबारी, अबै अछि की आज ॥२०५॥
जनु दशानन हारि मानल, मेघनादक नाश ॥२०६॥
जनकजा पठबाय देलनि, मानि रघुवर-त्रास ॥२०७॥
चिन्हल दासी भृत्यजन काँ, तट विभीषण जाय ॥२०८॥
उतरि शीघ्र सुलोचना, गुरुचरण गेलि लपटाय ॥२०९॥
कहल अपनैँक कयल से नहि, कयल अति अपमान ॥२१०॥
तकर फल परिणत अचिर अछि, भेल आनक आन ॥२११॥
भावार्थः
पतिक बाँहि केँ पालकी मे लयकय सुलोचना राम लग चलि पड़लिह । दलक वानर सब देखिकय कहलक – “कि आइ महिलाक सवारी आबि रहल अछि ? लगैत अछि, रावण हाइर मानि लेलक कियैक तँ ओकर पुत्र मेघनाद मारल गेल । तेँ राम सँ डराकय ओ सीता केँ पठा देलक अछि । दासी सब विभीषणक सेवक केँ चिन्हि गेलिह । सुलोचना विभीषण लग गेलिह । पालकी सँ उतरिकय ओ विभीषणक पैर सँ लिपटि गेलिह । कहली – “रावण अपनेक कहल नहि कयलनि, अपनेक बहुते अपमान कयलनि । तेकर फल हुनका शीघ्रहि भोगय पड़लन्हि । कि सँ कि भ’ गेल ॥२०४-२११॥
।सोरठा।
से कर्त्तव्य उपाय, पहु-शिर लय जरि जाइ हम ॥२१२॥
दल जाय मङबाय, आज्ञा वैदेही-पतिक ॥२१३॥
कहल विभीषण जाय, श्रीरघुनन्दन सौँ ततय ॥२१४॥
भाय हमर अन्याय, कयल पड़ल साध्वीक शिर ॥२१५॥
भावार्थः
आब एहेन उपाय कयल जाउ जे हम प्राणनाथक सिर लय केँ जइर मरी । रामक आज्ञा लयकय ओ सिर हमरा मँगबा देल जाउ ।” विभीषण ओतय जाकय रामजी सँ कहलनि – “अन्याय कयलनि हमर भाइ आ तेकर खराब फल एहि बेचारी सतीक सिर पर पड़ल ॥२१२-२१५॥
।रूपमाला छन्द।
मेघनादक थिकथि गृहिणी, देव शुनु रघुनाथ ॥२१६॥
सती नाम सुलोचना लिखि, देल स्वामी हाथ ॥२१७॥
शिर एतहि अछि मेघनादक, मुख्य अयबा काज ॥२१८॥
स्वामि मिलि पावक समाइति, शरण आइलि आज ॥२१९॥
भावार्थः
हे राम, सुनू ! ई मेघनादक पत्नी थिकीह । हिनक नाम अछि सती सुलोचना । स्वामीक कटल हाथ हिनका लिखिकय जानकारी देलकनि अछि जे मेघनादक सिर एतय पड़ल अछि । हिनकर एतय अयबाक मुख्य काज यैह अछि ई स्वामीक संग चिता मे प्रवेश कय सती होबय चाहैत छथि । तेँ सिर लेबाक वास्ते अपने लग अयली अछि ।” ॥२१६-२१९॥
।दण्डक छन्द।
जय महेश्वर-चाप-खण्डन, जनक-नगरी-कृत-सुमण्डन,
पालिताखिल-भक्त-सज्जन, दलित-दुर्ज्जन हे ॥२२०॥
सत्य-सन्ध मनोज-सुन्दर, जनक-जननी-सत्य-धृतिकर,
महाराज मही-पुरन्दर, प्राप्त-निर्ज्जन हे ॥२२१॥
जय धनुर्द्धर दनुज-नाशन, सदा-शासित-पाकशासन,
कृत-विहङ्गम-नायकासन, पन्नगासन हे ॥२२२॥
जय महोदधि-सेतु-कारक, दशवदन-कुल, विपुर-मारक,
विहित-मारुततनय-चारक, नुत-विषाशन हे ॥२२३॥
भावार्थः
सुलोचना स्तुति करय लगलिह – “रामजीक जय हो, जय हो, जे शिवक धनुष केँ तोड़लनि, जनकपुरीक शोभा बढ़ौलनि, समस्त भक्त-सज्जन लोकनिक पालन कयलनि आर दुर्जन सभक दलन कयलनि । अपने सत्यव्रती छी, कामदेवक समान सुन्दर छी, पिता आ माता दुनू गोटेक सत्य आ धैर्य केँ बचबयवला छी । अपने महाराज छी, धरतीक इन्द्र छी, अपने एकान्तसेवी छी । अपने धनुष चलबय मे दुर्धर्ष छी, अपने सदैव इन्द्र उपर शासन कयलहुँ, अपन पक्षी सभक राजा गरुड़ केँ वाहन बनेलहुँ तथा शेषनाग केँ आसन बनेलहुँ । समुद्र मे पुल बन्हाबयवला अपनेक जय हो । रावणक विशाल वंश केँ नाश करयवला अपनेक जय हो, हनुमान केँ दूत बनाबयवला तथा शिव केँ प्रणाम करयवला अपनेक जय हो ॥२२०-२२३॥
।गीत।
जय रघुराज ॥२२४॥
मन मति वचनक पहुँ जतय नहि, निर्ग्गुण ब्रह्म देखल आज ॥२२५॥
हम राक्षसी इन्द्रजीत-गृहिणी, विषयविलास सतत काज ॥२२६॥
योगिनि बनि अयलहुँ शरणागत, करिय प्रणाम रहित-लाज ॥२२७॥
प्रभु जगदिष्ट इष्ट-सम्पादक, तुच्छ सकल पुर समाज ॥२२८॥
अन्तर्य्यामी रघुनन्दन अहँ, व्यर्थ वैखरी के बाज ॥२२९॥
अपनैँ कयल दनुज-कुल-भेदन, प्रभु समर्थ बड़ रण-शूर ॥२३०॥
हमरा जन्य बीज-रवि भेदब, करब मनोरथ निज पूर ॥२३१॥
देल जाय मँगबाय पतिक शिर, आज न हो प्रभु सङ्ग्राम ॥२३२॥
जय रघुनन्दन दुर्ग्गति-खण्डन, भव-जलनिधि-तारण नाम ॥२३३॥
भावार्थः
हे रघुराज ! अपनेक जय हो ! जेतय न मन, न बुद्धि आ न वचन पहुँचि सकैत अछि, से निर्गुण ब्रह्म केँ आइ हम देखलहुँ । हम मेघनादक पत्नी राक्षसी छी । सदा विषय-योग मे लागल रहैत छी । लेकिन आइ योगिनी बनिकय अपनेक शरण मे आयल छी आ बिना लाज केँ अपने केँ प्रणाम करैत छी । हे प्रभु ! अपने संसार मे सभक इष्टदेव थिकहुँ । अपने सब कामना पूरा करयवला थिकहुँ । संसारक सब वस्तु तुच्छ अछि, नगर तुच्छ अछि आ सम्राज्य तुच्छ अछि । हे राम ! अपने तँ सभक भितरक बात बुझैत छी, फेर अपनेक स्तुति मे वैखरी ध्वनि (शब्दोच्चारण) करबाक कि प्रयोजन होयत ? अपने राक्षस सभक कुल केर संहार कयलहुँ । अपने सब किछु करय मे समर्थ छी आ लड़ाइ मे बहादुर छी । हमरा वास्ते बीज-रविक भेदन करब आ अपन कामना पूरा करब । हमरा पतिक सिर मँगबा देल जाउ । आइ लड़ाइ बन्द राखब । दुर्गति केँ नाश करयवला रघुनन्दन केर जय हो ! अपनेक नाम भवसागर सँ पार उतारयवला अछि ।” ॥२२४-२३३॥
।चौपाइ।
शुनि सुलोचना साध्वी उक्ति । रघुवर कहलनि वचन सुयुक्ति ॥२३४॥
करु जनु शुभमति चित्त विषाद । मन हो तौँ जीबथि घननाद ॥२३५॥
निर्व्विषाद अपना घर जाउ । युवती सती वियोग न पाउ ॥२३६॥
हाथ जोड़ि कर दण्ड-प्रणाम । कह सुलोचना शुनु गुणधाम ॥२३७॥
एक गुहा मे दुइ मृगराज । समुचित नहि निर्व्वाहक काज ॥२३८॥
पिती नृपति देखता शक्रारि । एक कोस मे दुइ तरुआरि ॥२३९॥
केहि लय योग ज्ञान वैराग्य । सुलभ प्राप्त से हमर सुभाग्य ॥२४०॥
प्रभु-पद देखि छुटल भव-राज । मन नहि कतहु विषय-सुख लाग ॥२४१॥
गगन कहक थिक गगनाकार । जलधि जलधि उपमाक विचार ॥२४२॥
राम-दशानन सम संग्राम । राम-दशानन उपमा ठाम ॥२४३॥
सुरपति-अरि हमरा प्राणेश । कोन वस्तु नहि तनिका देश ॥२४४॥
निर्ग्गुण ब्रह्म सगुण-तन धयल । भूप-रूप बड़ माया कयल ॥२४५॥
जे जे निहत भेल सङ्ग्राम । से से पाओल उत्तम धाम ॥२४६॥
धन्य धन्य थिक अपनेक कोप । पाप-पुञ्ज कर क्षण मे लोप ॥२४७॥
कीर्त्ति-शरीर अचल युग चारि । बनल काज की देब बिगारि ॥२४८॥
प्रभु-रुचि जानि आनि देल मुण्ड । देखयित कौतुक वानर-झुण्ड ॥२४९॥
जेहन परशमणि पाबथि रङ्क । पति-शिर लेल हरषि भरि अङ्क ॥२५०॥
आँचर सौँ मुह धूरा पोछ । भ्रमराली-निभ दाढ़ी-मोछ ॥२५१॥
जीतल समर अमर अमरेश । आज हमर भेल योगिनि-भेश ॥२५२॥
रामचन्द्र काँ कयल प्रणाम । जहि मे सकल-विश्व-विश्राम ॥२५३॥
रामाकार सकल थल भास । छुटल राग संसार प्रयास ॥२५४॥
चलयिक समय हँसल से मुण्ड । हलचल माचल वानर-झुण्ड ॥२५५॥
बाहु लिखल लक्ष्मण-गुण पूर । अँसिहि कयल जन-संशय दूर ॥२५६॥
हँसल मुण्ड भुज-लिपि भेल ठीकि । पति-सह-गामिनि धन्या थीकि ॥२५७॥
चललि प्रदक्षिण प्रभु काँ कयल । शिर-भुज पुन पालकि पर धयल ॥२५८॥
बड़ बड़ बाजन चलल निशान । आर्त्तनाद सौँ पूरित कान ॥२५९॥
सञ्चर बहुत निशाचर लोक । प्रभु-आज्ञा सौँ रोक न टोक ॥२६०॥
सिन्धुक सङ्गम थल भल जाय । चिता बहुत विस्तार बनाय ॥२६१॥
श्रीखण्डादिक लागल ढेर । वनिता पुरुष सकल दिश घेर ॥२६२॥
घृत घट बहुत चिता मे ढारि । धय भुज शिर नागेश-दुलारि ॥२६३॥
आहिताग्नि दय देलनि ताहि । मर्य्यादा कुल-युगल निबाहि ॥२६४॥
पति सह सती परमगति गेलि । द्वेषराग सौँ रहिता भेलि ॥२६५॥
सभ वृत्तान्त देखल लङ्केश । मन्दोदरी सहित तहि देश ॥२६६॥
अयला कि करथु मन बड़ शोक । संसारक निन्दा कर लोक ॥२६७॥
एहि संसारक ई व्यवहार । उतपति थिति होइछ संहार ॥२६८॥
सभ जन घुरि लङ्का गढ़ प्राप्त । जय-प्रत्याशा भेल समाप्त ॥२६९॥
अतिशय विकल दशानन कान । कर उपदेश आन काँ ज्ञान ॥२७०॥
एहि संसारक भंगुर भोग । प्रपादेश संयोग वियोग ॥२७१॥
ककरो विभव रहल नहि थीर । जेहन कमल-दल चञ्चल नीर ॥२७२॥
वर्त्तमान कत कत कत जाय । कालपुरुष सभ सुख धय खाय ॥२७३॥
भावार्थः
सती सुलोचनाक बात सुनिकय रामजी युक्तिसंगत बात कहलनि – “हे कल्याणकर विचारवाली, अहाँ अपना मन मे शोक जुनि करू । अहाँ चाही त अहाँक पति मेघनाद जिबि सकैत छथि । अहाँ शोक-विषाद केँ छोड़ि अपन घर जाउ । अहाँ युवती छी आ पतिव्रता छी । विरह मे जुनि पड़ू ।” सुलोचना हाथ जोड़िकय आ दंडवत् प्रणाम करैत कहलनि – “हे गुणवान, एक गुहा मे दुइ गोट सिंह केर रहब ठीक नहि । दुनू मे कहियो नहि बनत । इन्द्रजित मेघनाद अपन पिती (काका) विभीषण केँ राजा बनल देखता । एक म्यान मे दुइ गोट तलवार केना समायत ? जिनका पाबय लेल योग आ वैराग्यक जरूरत होइत छैक, से (राम केर चरणक दर्शन) हमरा सौभाग्यवश भेटि गेल अछि । अपनेक चरण केँ देखिकय दुनियाक प्रति हमर आकर्षण समाप्त भ’ गेल अछि । आब विषयभोग मे कतहु मोन नहि लगैछ । आकाशक समान आकाशे टा कहल जा सकैछ, समुद्रक उपमा समुद्रे टा सम्भव अछि । एहि तरहें राम आ रावणक बीच जे लड़ाइ भेल ओकर उपमा राम-रावण युद्ध मात्र टा देल जा सकैछ । हमर पति इन्द्र केँ जीतयवला छथि, तेँ हुनकर राज्य हमरा लेल कोन वस्तु दुर्लभ अछि ? निर्गुण ब्रह्म सगुण शरीर धारण कयलनि । अपने राजाक रूप धारण कय पैघ लीला कयलहुँ । लड़ाइ मे जे-जे मारल गेल, सब केँ स्वर्ग भेटलैक । अपनेक क्रोधो धन्य अछि, जे पापक राशि केँ क्षणहि भरि मे जरा दैछ । यशरूपी शरीर चारि युग धरि टिकल रहैत अछि । हम अपन बनल काज केँ कियैक बिगाड़ि दी ?” रामक इशारा पाबिकय वानर सब मेघनादक सिर आनि देलक आ कुतूहलपूर्वक देखय लागल । सती सुलोचना बड़ा हर्ष सँ अपन पतिक सिर कोरा मे लय लेलिह, मानू रंक केँ पारसमणि भेटि गेल होइक । ओ अपन आँचर सँ चेहरा पर पड़ल धूलकण साफ कयलिह । ओहि सिर मे दाढ़ी आ मोंछ भौंराक कतार जेकाँ बुझाइत छल । “लड़ाइ मे अमर इन्द्र केँ जीतलहुँ, मुदा आइ हम योगिनी बनि गेल छी ।” ई कहिकयल सुलोचना राम केँ प्रणाम कयलिह, जाहि मे समस्त दुनिया समायल अछि । सब स्थान पर रामहि-राम देखाय लगलाह । संसारक प्रति लगाव खत्म भ’ गेलनि । चलैत समय मेघनादक मुण्ड हँसि उठल । वानर सभक दल मे हलचल मचि गेल । मेघनादक बाँहि मे लक्ष्मणजीक सबटा गुण लिखल छलैक । मुण्ड हँसिकय लोक सभक सन्देह केँ दूर कय देलक । मुँह ई जनेबाक लेल हँसल जे बाँहि मे जे लिखल अछि ओ सच भेल । जे स्त्री पतिक संग जरैत (सती होइत) अछि, ओ धन्य अछि । सुलोचना रामक प्रदक्षिणा कय केँ विदा भेलिह । पतिक सिर आ बाँहि केँ फेर ओ पालकी पर रखलिह । बड़का-बड़का बाजा आ पताका सब चलि पड़ल । हाहाकार सँ कान फारि रहल छल । बहुते रास राक्षस सेहो संग चलि रहल छल । रामक आज्ञा सँ कोनो रोक-टोक नहि छल । सब सिन्धुक संगम पर पहुँचल । ओतय बहुत पैघ चिता रचायल गेल । श्रीखण्ड चन्दन आदि वस्तु सभक अम्बार लागि गेल । चारू दिश सँ स्त्री आ पुरुष सब चिता केँ घेरने रहय । चिता मे कतेको घड़ा घी ढारल गेल । तखन ओहि उपर बाँहि आ सिर केँ शेष-कन्या सुलोचना स्वयं राखि देलनि । फेर ओहि मे अग्निक आधान कयल गेल । एहि तरहें दुनू कुल केर मर्यादाक पालन कय केँ सती सुलोचना पतिक संग जरिकय स्वर्ग चलि गेलिह आ राग-द्वेष आदि सब विकार सँ मुक्त भ’ गेलिह । ओतय मन्दोदरी-सहित रावण ई सबटा तमाशा देखलनि । ओ सब करबो कि करितथि ? मन मे भारी शोक रहनि । लोक सब संसारक परिपाटीक निन्दा करैत छल – “एहि दुनियाक यैह रीति अछि । एहिठाम हरेक वस्तुक उत्पत्ति, स्थिति आ नाश तीनू होइते टा छैक ।” फेर सब लोक घुरिकय लंकागढ़ गेल । जीतबाक उम्मीद खत्म भ’ चुकल छलैक । बहुत खिन्न भ’ रावण कानि रहल छल, मुदा दोसर लोक सब केँ ओ ज्ञानोपदेश दय रहल छल – “एहि संसार मे सुख-दुःख केर भोग क्षण भरिक मात्र होइत छैक । एतय मिलन आ बिछोह ओहि तरहें प्रतिक्षण होइत रहैत छैक, जाहि तरहें प्याउ पर प्यासल लोक परस्पर भेटैछ आ क्षणहि भरि मे एक-दोसर सँ अलग भ’ जाइत अछि । केकरहु विभव सबदिन नहि रहैत छैक । ओ ओहि तरहें चंचल रहैत छैक जेना कमल केर पत्ता पर पानि । कोनो वस्तु सबदिन वर्तमान नहि रहैछ । नहि जाइन ओ कतय-कतय चलि जाइत अछि । हरेक सुख केँ अन्त मे कालपुरुष चिबा जाइत अछि ।” ॥२३४-२७३॥
।इति श्रीचन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे नवमोऽध्यायः।
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्ड केर नवम अध्याय समाप्त भेल॥
हरिः हरः!!

1 Trackback or Pingback