स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
लङ्काकाण्ड – सातम अध्याय
रूपमालीक कथा, हनुमानद्वारा कालनेमि राक्षसक संहार
।चौपाइ।
ललकि उठल रावण खिसिआय । कालनेमि-मुह गेल सुखाय ॥१॥
रामचन्द्र मे तोहरा प्रीति । के न कहत थिक बहुत अनीति ॥२॥
अभिप्राय हमरा किछु आन । ई शिखबय लगला अछि ज्ञान ॥३॥
करह करह गय कहल उपाय । नहि तौँ यमघर देबहु पठाय ॥४॥
कालनेमि मन कहि चललाह । उचित कहल लागल अधलाह ॥५॥
तुहिनाचल पर तपवन कयल । मुनिसम स्वाङ्ग सकल से धयल ॥६॥
योजन-मित एक आश्रम नीक । बुझि पड़ जनु मुनिजनहिक थीक ॥७॥
शिव शिव कहथि सुवेष विवेक । कालनेमि मुनि शिष्य अनेक ॥८॥
से आश्रम देखल हनुमान । लगला करय हृदय अनुमान ॥९॥
कि भोथिआय गेल अछि पन्थ । कहता सभटा निकट महन्थ ॥१०॥
बाट सोझ हुनका सौँ जानि । जायब तखन पीबि लेब पानि ॥११॥
आश्रम मध्य गेला हनुमान । ऐन्द्रयोग मुनि कर सविधान ॥१२॥
देखल शिव-पूजन-विधि वेश । मानल चित्त पुण्यमय देश ॥१३॥
मारुतनन्दन कयल प्रणाम । हनूमान सभ जन कह नाम ॥१४॥
रामकाज सौँ क्षीर-समुद्र । जाइत छी पालक छथि रुद्र ॥१५॥
हमरा सहज त्रिकाल-ज्ञान । भाग्यहिँ भेट भेल हनुमान ॥१६॥
रामक दिव्य विलोचन गर्व्व । बचला लक्ष्मण वानर सर्व्व ॥१७॥
छोट कमण्डलु वारि न पूर्त्ति । तृष्णा होइति अद्भुत मूर्त्ति ॥१८॥
कतय जलाशय से दिय देखाय । सुख सौँ पान करब जल जाय ॥१९॥
मुनि-आज्ञा शुनि भेल बटु आगु । मारुतसुत तनि पाछाँ लागु ॥२०॥
आँखि मूनि अहँ कय जलपान । सत्वर आउ निकट हनुमान ॥२१॥
मन्त्र एक हम देब उपदेश । त्वरितहिँ देखब औषधि वेश ॥२२॥
गेला जलाशय लोचन मूनि । पिबयित पानि शब्द भेल शूनि ॥२३॥
महती मकरी पयरे धयल । पवनक पुत्र पराक्रम कयल ॥२४॥
तनिकर मुह देल हाथेँ फाड़ि । अन्तरिक्ष गेलि से तन छाड़ि ॥२५॥
भावार्थः
रावण खिसियाकय ललकि उठल । कालनेमिक मुँह सुखा गेलैक डर सँ । ललकिकय बाजल – “रामचन्द्र सँ तोरा बड प्रीति छौक, के नहि कहत जे ई नीतिक अत्यन्त प्रतिकूल बात भेल । हमर किछु आरे अभिप्राय छल, मुदा तूँ त हमरा ज्ञान सिखबय लगलें । जे करय लेल कहलियौक से करय लेल जो, नहि तँ तोरा यमक घर पहुँचा देबौक ।” ई सुनिकय कालनेमि मनहि-मन कहलक, “हम त उचित बात कहलियनि मुदा हुनका खराब लगलनि ।” फेर ओ विदा भ’ गेल । हिमालय पर्वत पर तपोवन बनेलक आ हूबहू मुनिक स्वाँग रचा लेलक । एक योजनक एकटा सुन्दर आश्रम बनेलक जे लगैत छल जे वास्तव मे मुनियेक हो । सुन्दर वेष बनेलक, मुनिक रूप धारण कएने अनेकों शिष्य सब सँ युक्त कालनेमि शिव-शिव जपय लागल । हनुमानजी ओहि आश्रम केँ देखलनि आ मन मे अनुमान करय लगलाह – “कहीं हम रस्ता भटैक त नहि गेलहुँ ? एहि आश्रमक प्रधान सही बात बतेता । हुनका सँ सीधा रास्ता पता कय केँ आर एतय पानि पीबिकय आगू बढ़ब ।” एना सोचिकय हनुमानजी आश्रम मे प्रवेश कयलनि आ देखलनि जे मुनि विधि-विधानपूर्वक ऐन्द्रयोग कय रहल छथि । शिव-पूजाक सुन्दर विधान देखलनि आर देखिकय मोन मे विश्वास भ’ गेलनि जे ई धर्म-स्थान थिक । हनुमानजी ओहि छद्म मुनि केँ प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “हमर नाम हनुमान थिक । रामजीक काज सँ क्षीर समुद्र जा रहल छी । भगवान रुद्र हमर रक्षा करयवला छथि ।” कालनेमि कहलकनि – “हमरा सहजहि वर्तमान, भूत आ भविष्य तीनू काल केर ज्ञान भ’ जाइत अछि ।” रामक अलौकिक-दृष्टिक महिमा सँ सब वानर समेत लक्ष्मण बचि गेलाह । कमंडल छोट अछि । एहि पानि से पूरा-पूरा भरल नहि अछि । प्यास बड जोर सँ लागल होयत ।” ई सुनिकय हनुमानजी कहलनि, “ताहि लेल चिन्ता जुनि करू । जलाशय कतय अछि से हमरा कहि दिअ’, हम ओतहि सुविधापूर्वक जल पीबि लेब ।” मुनिक आज्ञा सुनिकय एकटा ब्रह्मचारी बटुक केँ रस्ता देखाबय लेल आगू कय केँ हनुमान हुनकर पाछाँ-पाछाँ चलि पड़लाह । फेर कालनेमि बाजल, “हे हनुमान ! अहाँ जल्दी जाउ, आँखि मुँदिकय पानि पीबू आ घुरिकय हमरा लग आउ । हम एकटा मंत्रक उपदेश देब जेकर प्रभाव सँ अहाँ संजीवनी बुटी केँ चिन्हि जायब ।” हनुमान आँखि मुँदिकय जलाशय गेलाह आ जेनाही पानि पिबय लगलाह कि एकटा आवाज सुनाय देलकनि । एकटा भारी पकरी (मादा मगरमच्छ) हुनकर पैर पकड़ि लेलकनि । हनुमान छोड़ाबय लेल पराक्रम करय लगलाह । हाथ सँ ओकर मुँह केँ फाड़ि देलनि । ओ मगर रूपी शरीर केँ छोड़िकय आसमान मे चलि गेल ॥१-२५॥
।रूपमाला छन्द।
दिव्यरूप-धराङ्गना से रूपमाली नाम ॥२६॥
कहल सभ हनुमान काँ जे कपट छल तहिठाम ॥२७॥
हे कपीश्वर अहँक चरणक परशँ छूटल शाप ॥२८॥
मुनि न थिक ओ विकट राक्षस कालनेमि सपाप ॥२९॥
ओकर जनु विश्वास करु मन मारु तनिकाँ जाय ॥३०॥
जाउ द्रोणाचल त्वरित अहँ बाट विघ्न मेटाय ॥३१॥
ब्रह्म-जनपद हम चलै छी कयल पद-सय्योँग ॥३२॥
तकर फल निष्पापिनी हम छुटल शापज भोग ॥३३॥
भावार्थः
फेर अपन दिव्य रूप मे प्रकट भ’ गेल । ओ यथार्थ मे रूपमाली नामक दिव्यांगना छल । ओ हनुमान केँ ओ सबटा हाल बतेलक जे ओतय केना कपट रचल गेल छल । आगाँ ओ कहल – “हे हनुमान, अहाँक चरण केँ स्पर्श सँ हमर शाप समाप्त भेल । ओ मुनि नहि छी, ओ त भयानक पापी राक्षस कालनेमि थिक । ओकरा उपर विश्वास जुनि करब । जाकय ओकरा मारि दिय’ । फेर रस्ताक विघ्न सब केँ दूर करैत द्रोण नामक पर्वत पर जाउ । हम आब ब्रह्मलोक जा रहल छी । हम अहाँक चरणक स्पर्श पाबि चुकल छी । ओकर फल सँ हम पापरहित भ’ गेलहुँ । हमर शापक भोग केर अन्त भेल ।” ॥२६-३३॥
।चौपाइ।
शुनल देखल कपिवर से चरित । रुष्ट फिरल आश्रम मे त्वरित ॥३४॥
कालनेमि कह दहिना कान । लाउ निकट झट दय हनुमान ॥३५॥
उचित दक्षिणा जे अहँ देब । हम सन्तुष्ट पुष्ट भय लेब ॥३६॥
मुक्का एक मारल हनुमान । ग्रहण करू दक्षिणा विधान ॥३७॥
प्रकट भेल खल मरइक काल । लड़ल भिड़ल कय मायाजाल ॥३८॥
कतय कमण्डलु मायाजाल । कालनेमि काँ धयलक काल ॥३९॥
गेल महाबल गिरिवर द्रोण । चिन्हल न पर सञ्जीवन कोन ॥४०॥
गिरि समस्त काँ लेल उठाय । पवनक पुत्र पवन जकँ जाय ॥४१॥
उत रघुनन्दन सकरुण चित्त । करथि विलाप इ लोक निमित्त ॥४२॥
लक्ष्मण काँ लेल हृदय लगाय । कियक न प्राण प्रथम विधि जाय ॥४३॥
मसक-पक्ष-पवनक आघात । उड़ि बरु जाथि धराधर सात ॥४४॥
पन्नगेश काँ भेको खाय । चीटी-उदर करीन्द्र समाय ॥४५॥
मेषी देखि सिंह बन त्याग । सुधा-अधिक मधु हो कटु साग ॥४६॥
ई बरु होय कथा थिक अल्प । मिथ्या नहि रघुकुल-सङ्कल्प ॥४७॥
रहल मनोरथ ठामहिँ ठाम । अस्त भेल रघुवंशक नाम ॥४८॥
लक्ष्मण सन नहि भेटता भाय । विधिहुक घर अतिशय अन्याय ॥४९॥
रावण जिबइत रहबे कयल । कथि लय बाण धनुष कर धयल ॥५०॥
चौदह वर्षक अछि अवसान । समय कयल विधि आनक आन ॥५१॥
जायब की घर बनल सशोक । शुनि शुनि कि कहत ओतयक लोक ॥५२॥
शिव शिव जीवन हमरो व्यर्थ । रमणी-कारण मरण अनर्थ ॥५३॥
वैदेही ई शुनतिह कान । मरती विलपि होइछ अनुमान ॥५४॥
माता तकयित हयती बाट । नोरक लेल धरणि धुर पाट ॥५५॥
धिक धिक जीवन एहि संसार । कुलकलङ्क बिगड़ल व्यवहार ॥५६॥
दुष्ट दैव काँ कि कहब आज । भल जन बस नहि तनिक समाज ॥५७॥
उठु उठु सत्वर लक्ष्मण भाय । दिनमणि-कुलक कलङ्क मेटाय ॥५८॥
शिव शिव कतय गेला हनुमान । जनि कर अर्पल तन ओ प्राण ॥५९॥
देखि पड़इछ सभटा प्रत्यक्ष । ककरो केओ नहि दैव विपक्ष ॥६०॥
की राक्षस हनुमान सौँ युद्ध । कयलक पथ मे हमर विरुद्ध ॥६१॥
महावीर काँ कयलक आँट । राक्षस-संघ कि रोकल बाट ॥६२॥
जौँ जौँ बीतलि रजनी जाथि । रामचन्द्र तौँ तौँ अकुलाथि ॥६३॥
केओ सेनाधिप प्रश्न विचारि । चढ़ि तरु भूधर उपर निहार ॥६४॥
औषधि सञ्जीवनक समीप । रविसम कान्ति अखण्डित दीप ॥६५॥
नभ मे शुनि पड़ धुनि बड़ गोट । हर्ष विषाद हृदय नहि छोट ॥६६॥
रविशशि बिनु की गगन प्रकाश । क्षण मन हर्ष क्षणहिँ मन त्रास ॥६७॥
भावार्थः
हनुमान ओहि राक्षस कालनेमिक ई हाल सुनलनि आ देखलनि । फेर रोषक संग तुरन्त आश्रम घुरलाह । कालनेमि कहलक, “हे हनुमान, आब अहाँ तुरन्त अपन दाहिना कान हमरा लग आनू, हम मंत्र दैत छी । अहाँ जे किछु दक्षिणा देब, हम सन्तोषपूर्वक स्वीकार कय लेब ।” हनुमानजी एक मुक्का लगा देलनि आ कहलनि – “ई विधिवत दक्षिणा स्वीकार कयल जाउ ।” तखन ओ कपट मुनि मरैत समय अपन वास्तविक रूप मे प्रकट भेल । मायाजाल पसारिकय लड़ाइ ठानि देलक । क्षणहि मे कतय ओ कमंडल चलि गेल आ कतय ओ मायाजाल ! कालनेमि केँ हनुमानरूपी काल ग्रसित कय लेलनि । तखन महाबली हनुमान द्रोणाचल पर पहुँचलाह, मुदा ओ चिन्हि नहि सकलाह जे संजीवनी कोन अछि । तेँ समूचा द्रोणाचल केँ उठाकय पवनसुत हनुमान पवनक भाँति तेज गति सँ चलि पड़लाह । ओम्हर करुण हृदय राम लौकिक लीलाक रूप मे विलाप करय लगलाह । लक्ष्मण केँ छाती सँ लगा लेलनि आ चिन्ता करय लगलाह – “हा विधाता! पहिने हमरहि प्राण कियैक न चलि गेल ? मच्छरक पाँखिक हवा केर झोंका सँ सातो कुलाचल भले उड़ि जाय, गरुड़ केँ भले छोट-सन बेंग खा लियए; चुट्टीक पेट मे भले हाथी समा जाय; भेंड़ केँ देखि सिंह भले जंगल सँ भागि जाए; कड़ू साग भले अमृत समान मीठ भ’ जाय, एहि सब केँ भ’ गेनाय कोनो पैघ अचरज नहि अछि, मुदा रघुवंशीक मोने मे जे भावना अबैत अछि ओ कहियो झूठ नहि भ’ सकैत अछि । हमर योजना जहिनाक तहिना रहि गेल । रघुवंशक नाम जाइत रहल । लक्ष्मण जेहेन भाइ फेर नहि भेटत । विधाताक घर मे सेहो भारी अन्याय होइत अछि । आब रावण जिबैत रहि गेल । व्यर्थ हम धनुष-बाण धारण कयलहुँ । चौदह वर्षक अवधि बीतयवला अछि । ऐन मौका पर विधाता कि सँ कि कय देलनि । शोक मे डूबिकय कोना घर जायब ? ओतुका लोक सब सुनि-सुनिकय कि कहत ! हाय-हार ! हमरहु जिनगी बेकार अछि । यदि हम स्त्रीक खातिर मरि जायब त अनर्थ भ’ जायत । हमर मरबाक समाचार जहिना सीताक कान मे पड़तनि त लगैत अछि ओ कनैत-कनैत मरि जेती । माता सेहो बाट तकैत हेती । हुनकर नोर सँ धरतीक धुरा सेहो थाल बनि गेल होयत । एहि संसार मे धिक्कार अछि हमर जीवन केँ । हम कुल केँ कलंकित कयलहुँ । कुल केर परम्परा केँ हम बिगाड़ि देलहुँ । आइ दुष्ट विधाता केँ हम कि कहियनि ? हुनका लग कोनो भलमानुष रहियो नहि सकैछ । हे लक्ष्मण ! उठू-उठू अहाँ जाहि सँ सूर्यवंश केँ कलंक नहि लागय । हाय-हाय ! ई हनुमान कतय चलि गेलाह जिनकर हात मे हम तन आ प्राण सौंपि देने छी । सारा हाल हम प्रत्यक्ष देखि रहल छी । यदि विधाता बाम होइथ त केकरो कियो बचबयवला नहि रहत । कि हमर दुश्मनी मे कोनो राक्षस बाट मे युद्ध त नहि करय लगलनि ? कहीं राक्षस सभक दल हनुमान केँ हराकय रस्ते मे त नहि रोकि देलनि ?” जेना-जेना राति बितैत जाइछ, तेना-तेना राम घबराइत छथि । कोनो सेनापति शकुन उचारथि, त कियो पहाड़क चोटी उपर चढ़िकय हनुमानक बाट ताकथि । संजीवन बूटीक पास चमक देखाय देलकनि, जेना अखंड दीप जरैत होइ । आकाश मे बड़ा तेज आवाज सुनाय पड़लनि । हुनकर मोन मे बड़ा भारी हर्ष आ विषाद दुनू संगे-संग होबय लगलनि । न सूरज अछि न चाँद, फेर आकाश मे प्रकाश केहेन ? क्षणहि मे ओकरा संजीवनी बुझिकय हर्ष भेलनि आ क्षणि मे कोनो उत्पात बुझिकय त्रास सेहो भेलनि ॥३४-६७॥
।सोरठा।
गिरि समेत हनुमान, प्रभु-सन्निधि आयल मुदित ॥६८॥
शुनु रघुपति भगवान, गिरि आनल औषधि सहित ॥६९॥
हर्ष कहल नहि जाय, करुण गमन वीरागमन ॥७०॥
प्रभु लेल हृदय लगाय, जगत्प्राण-नन्दन बली ॥७१॥
भावार्थः
हनुमानजी पर्वत केँ उठेने खुशीक संग रामजी लग अयलाह आ कहलाह – “हे भगवान राम, हम संजीवनी सहित पर्वते केँ उठाकय आनि लेलहुँ अछि ।” राम केँ जे हर्ष भेलनि तेकर वर्णन नहि कयल जा सकैत अछि । करुण रस केर अन्त भेल आ वीर रस फेर सँ घुरि आयल । राम पवनसुत बजरंगबली हनुमान केँ हृदय सँ लगा लेलनि ॥६८-७१॥
।मत्तगजेन्द्र छन्द।
वैद्य सुषेणक सम्मति सौँ, रघुनन्दन दिव्य महौषधि लैकैँ ॥७२॥
लक्ष्मण वीरक प्राण बचाओल, जे अनुपान यथाविधि दैकैँ ॥७३॥
सूतल जागल-रीति जकाँ, उठि ठाढ़ तहाँ रण-हर्षित भैकैँ ॥७४॥
गेल कहाँ रणसौँ खल रावण, मारब आज धनुर्द्धर धैकैँ ॥७५॥
भावार्थः
वैद्य सुषेण केर राय सँ राम दिव्य महौषधि संजीवन कहल गेल रीति अनुसार अनुपान (योग) केर संग पियाकय वीर लक्ष्मणक प्राण बचौलनि । लक्ष्मण प्रसन्न भ’ ओहिना उठि बैसलाह जेना सुतल लोक जगला पर बैसैत अछि तथा लड़बाक लेल ठाढ़ भ’ गेलाह आ कहलनि – “अरे ओ दुष्ट रावण रणभूमि सँ कतय भागि गेल ? आइ हम तीर-धनुष सँ ओकर प्राण लय लेब ।”॥७२-७५॥
।जयकरी छन्द।
ई कहयित लक्ष्मण लय अङ्क । लागल नहि रघुवंश कलङ्क ॥७६॥
महावीर रुद्रक अवतार । कष्ट-महोदधि कयलहुँ पार ॥७७॥
देखल निरामय लक्ष्मण वीर । अहँक प्रसाद भेल मन थीर ॥७८॥
कष्ट नष्ट कयलहुँ हनुमान । ई उपकार-दक्ष के आन ॥७९॥
भावार्थः
एना कहैत लक्ष्मण केँ राम अपना छाती सँ लगा लेलनि आ कहलनि – “खैर, रघुकुल मे कलंक नहि लागल । हे महावीर, अहाँ रुद्रक अवतार छी । अहाँ राक्षस सभक छलरूपी समुद्र केँ पार कयलहुँ । वीर लक्ष्मण केँ रोग-मुक्त देखलहुँ । अहाँक कृपा सँ हमर मन प्रसन्न भेल । हे हनुमान ! अहाँ हमरा भारी संकट सँ उबारलहुँ अछि । एहेन अलौकिक उपकार करय मे अहाँ समान आर के (दोसर) समर्थ अछि ?” ॥७६-७९॥
।रूपक।
।दण्डक छन्द।
जय जय अतिबल रघुवर सानुज, कहि कपि कयल तयारी, बड़ भारी ॥८०॥
रण-बाजा सभ बाजय लागल, गिरि चढ़ि देखथि मारी, त्रिपुरारी ॥८१॥
चलल सकल दल लङ्कागढ़ पर, तरुवर लेल उखारी, गिरिधारी ॥८२॥
कपि सुग्रीव विभीषण अनुमति, रोकल चारू द्वारी, रिपुहारी ॥८३॥
भावार्थः
तखन लक्ष्मण सहित महाबली रामचन्द्र केर जय – एहि प्रकारक जयघोष कय केँ कपि सभक दल लड़ाइ लेल पूरा तैयारी कयलक । लड़ाइ केर सबटा बाजा बाजय लागल । भगवान शिव हिमगिरि पर चढ़िकय युद्ध देखय लगलाह । सारा सेना लंका गढ़ पर चढ़ाइ कय देलक । किछु बन्दर गाछ उखाड़िकय हाथ मे लेने छल त किछु पर्वत लेने छल । कपिगण सुग्रीव आ विभीषण केर आज्ञाक अनुसार शत्रुक संहार करैत चारू द्वार (फाटक) केँ घेर (रोकि) लेने छल ॥८०-८३॥
युद्ध सँ घबराकय रावण द्वारा कुम्भकर्ण केँ जगायल गेनाय
।जयकारी छन्द।
रामक शर सौँ जर्ज्जर काय । बैसल निज सिंहासन जाय ॥८४॥
सिंहक त्रासित जनु गजराज । पराभूत फणि गरुड़-समाज ॥८५॥
कहल दशानन जन सौँ खेद । शरपीड़ित तन मन निर्व्वेद ॥८६॥
मरण कहल विधि मानुष-हाथ । सैह उपस्थित छथि रघुनाथ ॥८७॥
अनरण्यक हमरा अछि शाप । से दिन निकट हृदय बड़ काँप ॥८८॥
कहयित छी अनरण्यक उक्ति । से दिन लगिचायल सभ युक्ति ॥८९॥
परमात्मा हमरा कुल आबि । लेता जन्म समय अछि भावि ॥९०॥
तोहरा पुत्रादिक जे हयत । राम-हाथ मृति पर-पुर जयत ॥९१॥
कहि अनरण्य गेला परलोक । तकरे कारण उपगत शोक ॥९२॥
रामक हाथ हमर अछि मरण । त्यागब हम नहि वीराचरण ॥९३॥
सभजन मिलि केँ तहँ अहँ जाउ । कुम्भकर्ण काँ जाय जगाउ ॥९४॥
कहबनि हमर दशा सभ गोट । बड़ गोट काय कर्म्म की छोट ॥९५॥
रावण काँ प्राणान्तिक कष्ट । अहँ की शयन-सुखी धिक भ्रष्ट ॥९६॥
सभ जन कयलनि बहुत उपाय । कुम्भकर्ण लग ढोल बजाय ॥९७॥
बहुत उपाय करय लगलाह । कुम्भकर्ण तैँ नहि जगलाह ॥९८॥
हुनकर वनिता देल उपदेश । लय आनू गायिनि जनि वेश ॥९९॥
उठता शुनि शुनि वनिता-गान । जे कहनीय कहब से कान ॥१००॥
एक दिश कानन एक दिश नाँच । भोग रहल लङ्का दिन पाँच ॥१०१॥
कुम्भकर्ण उठला निज सेज । लय पहुँचल राक्षस गण भेज ॥१०२॥
गिरिसम मासुक ढेरी कयल । तीव्र सुरा अगणित घट धयल ॥१०३॥
मदिरा मासु गेला पिबि खाय । कहल बजौलनि बड़का भाय ॥१०४॥
जाय भूप काँ कयल प्रणाम । दीन वचन कह दशमुख नाम ॥१०५॥
कुम्भकर्ण हम पड़लहुँ कष्ट । लङ्का-विभव-निवह हत नष्ट ॥१०६॥
पुत्र पौत्र बान्धव हत समर । वानर कुशल बनल अछि अमर ॥१०७॥
वानर राक्षस-भट संहार । समुचित की कर्त्तव्य विचार ॥१०८॥
रामचन्द्र सुग्रीव-सहाय । लङ्का पहुँचल उदधि बँधाय ॥१०९॥
हमरो दशा देखै छी नयन । अहँ चिर काल करै छी शयन ॥११०॥
सकल सुभट सौँ लङ्का हीन । बचि रहलहुँ अछि गनती तीन ॥१११॥
वानर मरय करू से काज । काज जगाय मँगाओल आज ॥११२॥
भावार्थः
युद्ध मे राम केर तीर सँ रावणक शरीर जर्जर भ’ गेलैक । ओ भागिकय अपन सिंहासन पर जा बैसल । जेना सिंहक डर सँ हाथी आ गरुड़क सामने साँप हारि कय बैसि जाइत अछि । रावण अपन व्यथा अपन लोक सब सँ कहय लागल, “तीरक घाव सँ हमरा शरीर मे दर्द भ’ रहल अछि आ मन मे ग्लानि भ’ रहल अचि । ब्रह्मा कहने छथि जे हमर मृत्यु मनुष्यक हाथ सँ होयत । वैह मनुष्यक रूप मे आइ राम उपस्थित छथि । हमरा पर अनरण्यक नामक ऋषिक एकटा शाप अछि । से दिन नजदीक आबि गेल अछि । एहि तरहें ओ दिन आइ लग आबि गेल अछि । ओ कहने रहथि ‘एहेन समय आबयवला अछि जखन परमात्मा हमर वंश मे आबिकय अवतार लेता । तोरा जे पुत्र-पौत्रादि हेतौक से रामक हाथे मरि-मरिकय परलोक जेतौक ।’ एतेक कहिकय अनरण्यक ऋषि स्वयं चलि गेलाह । वैह शापक कारण ई शोक आइ हमरा उपर आबि गेल अछि । रामक हाथ सँ हमर मृत्यु निश्चित अछि; तैयो हम वीरोचित कर्म नहि छोड़ब । अहाँ सब गोटे मिलिकय ओतय जाउ जेतय कुम्भकर्ण अछि आ ओकरा जगाउ । हमर जे हाल अछि से पूरा-पूरा ओकरा कहबैक जे रावण केँ प्राणान्तक पीड़ा भ’ रहल छैक आ अहाँ आराम सँ सुतल छी । अहाँ भ्रष्ट भ’ गेलहुँ । धिक्कार अछि अहाँ केँ ।” सब गोटे कुम्भकर्ण लग गेलाह आ ढोल पीटि-पीटिकय हुनका जगेबाक कोशिश करय लगलाह । बहुत प्रयास कयलाक बादो कुम्भकर्ण नहि जागल । कुम्भकर्णक स्त्री सलाह देलनि, “अहाँ लोकनि नीक-नीक गायिका सब के लय आनू । ओहि सुन्दरी सभक गायन सुनिते ई जागि जेताह, तखन अहाँ सब केँ हुनका सँ जे किछु कहबाक हो से कहबनि ।” एक दिश क्रन्दन आ एक दिश गायन । लंका मे पाँच दिन धरि यैह रंग रहल । तखन जाकय कुम्भकर्ण अपन शय्या सँ उठला आ राक्षस सभक दल सन्देश लय केँ पहुँचल । मांस केर पहाड़-सन ढेरी लगा देलक आ अनगिनत घड़ा तीख मदिरा सोझाँ राखि देलक । जखन कुम्भकर्ण सारा मांस खा गेलथि आ मदिरा पीबि गेलथि तखन राक्षस सब कहलक जे अहाँ केँ जेठ भाइ रावण बजौलनि अछि । कुम्भकर्ण जाकय भाइ केँ प्रणाम कयलनि । रावण बिलखिकय कहलक – “हे कुम्भकर्ण ! हम बड़ा भारी कष्ट मे पड़ि गेल छी । लंकाक सबटा धन-सम्पत्ति नष्ट भ’ गेल । हमर बेटा, पोता आ सम्बन्धी सब लड़ाइ मे मारल गेलाह, मुदा वानर सभक दल कुशले-कुशल अछि जेना ओ सब अमर हो । बन्दर राक्षस सभक सेना केँ मारैत चलि गेल अछि । आब ई विचार करह जे आगू कि करब उचित होयत ? राम सुग्रीव केर सहारे समुद्र मे बाँध बनाकय लंका पहुँच गेला अछि । हमर जे हाल अछि से तोँ अपन आँखि सँ देखिये रहल छह । तूँ त बेसीकाल सुतले रहैत छह । लंका मे जतेक पैघ-पैघ योद्धा सब छल से सब समाप्त भ’ गेल, आब हम मात्र तीन गोटे बचल छी । आब एहेन काज करह जे सब बन्दर मारल जाय । काजे एहेन पड़ि गेल अछि, जे तोरा जगाकय बजेलियह ।” ॥८४-११२॥
।सोरठा।
अट्टहास शुनि कयल, कुम्भकर्ण भ्राता-वचन ॥११३॥
नीति कान नहि धयल, पूर्वहि मन्त्र-विचार मे ॥११४॥
भावार्थः
भ्राता रावणक बात सुनिकय कुम्भकर्ण अट्टहासपूर्वक हँसि देलनि आ कहलनि, “आरम्भ मे मन्त्रणाक समय अपने नीतियुक्त उचित बात केँ अनसुना कय देलहुँ ॥११३-११४॥
।चौपाइ।
उपगत शत शत जत तत पाप । दिन दिन छिन हो प्रबल प्रताप ॥११५॥
पूर्व कहल नारायण राम । सीता आदि प्रकृति श्री-नाम ॥११६॥
नगर विशाला वन गिरि सानु । हम देखल नारद जनु भानु ॥११७॥
कत चललहुँ अछि हे मुनिनाथ । हम पूछल करु एक न लाथ ॥११८॥
सकल देव काँ मन्त्र-विचार । होइछ ततय कयल सञ्चार ॥११९॥
अहँ सौँ रावण सौँ सभ अमर । पीड़ित कय न शकथि केओ समर ॥१२०॥
कहल विष्णु काँ होउ सहाय । रावण काँ मारू महि जाय ॥१२१॥
त्राहि त्राहि हम धयलहुँ चरण । मानुष-कर अछि तनिकर मरण ॥१२२॥
मानुष बनि प्रभु सुख-अवतार । हरण करू अवनिक सभ भार ॥१२३॥
नारायण कयलनि स्वीकार । सैह थिकथि रघुवर अवतार ॥१२४॥
भल भय भय सौँ रहु घर बैशि । नहि तौँ मरण समर-महि पैशि ॥१२५॥
तनिक चरण-पङ्कज करु भक्ति । यावत अछि एतबो तन-शक्ति ॥१२६॥
भक्तिभाव सौँ पायब ज्ञान । भक्ति मुक्तिदा वेद प्रमाण ॥१२७॥
सहज उपाय करब नहि भाय । दुर्म्मति धरब मरब रण जाय ॥१२८॥
नारायणक बहुत अवतार । कहयित कथा बहुत विस्तार ॥१२९॥
सभ सौँ श्रेष्ठ ज्ञानि अवतार । से आयल छथि लङ्काद्वार ॥१३०॥
नहि उपाय सम्प्रति किछु आन । रामक शरण करण कल्याण ॥१३१॥
भावार्थः
जेना-जेना पाप संचित होइत जाइत अछि, तेना-तेना दिनानुदिन प्रताप घटैत रहैत अछि । हम पहिनहि कहने रही जे राम नारायण केर अवतार छथि आ सीता मूल प्रकृति लक्ष्मी छथि । हम विशाला नाम केर नगरी जंगल बीच पहाड़क चोटी पर नारद केँ जाइत देखलियनि जे सूरज समान चमकि रहल छलथि । हम पुछलियनि जे हे मुनिवर, अहाँ कतय चललहुँ अछि से साफ-साफ हमरा बताउ त ? ओ कहलनि, ‘ओतय सब देवता जुटान कय केँ आपस मे मन्त्रणा कय रहल छथि । हम ओतहि जा रहल छी । सब देवता अहाँ सँ आ रावण सँ पीड़ित छथि आर अहाँ लोकनि सँ लड़बाक ताकत हुनका सब मे नहि छन्हि ।’ देवता सब विष्णु भगवान सँ कहलनि, ‘अपने हमरा सभक सहायक होइ आ पृथ्वी पर जा कय रावणक वध करी । बचाउ, हमरा सब केँ बचाउ । हम सब अपनेक चरण पकड़ैत छी । रावणक मृत्यु मनुष्यक हाथ सँ होयब लिखल छैक । तेँ हे प्रभु ! अपने मनुष्य रूप मे सुखपूर्वक अवतार लियह आ धरतीक सारा भार केँ दूर करू ।’ भगवान विष्णु ई निवेदन स्वीकार कय लेलनि । वैह अवतार पुरुष ई राम थिकाह । भला आदमी बनिकय अहाँ डर सँ घर जा कय बैसू, नहि त रणभूमि मे अहाँ मारल जायब । जाबत धरि एतबो ताकत अछि, रामक चरण केर भक्ति कयल जाउ । भक्तिक सहारे अहाँ ज्ञान पायब । वेद कहैत अछि जे भक्ति सँ मुक्ति भेटैत छैक । हे भ्राता, यदि अहाँ ई सीधा सन उपाय नहि करब आ अपन खराब मति (जिद्द) पर अड़ल रहब त लड़ाइ मे बेमौत मरब । भगवान विष्णुक बहुते रास अवतार छन्हि । से कथा कहब बहुत लम्बा काज होयत । ओहि समस्त अवतार मे सब सँ श्रेष्ठ अछि ज्ञानी रूप मे रामावतार । वैह राम लंकाक द्वार पर आयल छथि । आब आर कोनो उपाय नहि अछि । रामक चरण गहय टा मे कुशल अछि ।” ॥११५-१३१॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे सप्तमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक सातम अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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Aajuk eh prasang jakhan Hanumanjre k Sanjeevan Biti aanai m deri hoit dekhalah t prabhu bahut bilap koro laglah je hom aab jao kichh Laxman k bho gelain t hom kon moohen ghirav. Prabhu ehi san t hamre ant bho jaith se thik. Sange kateko tarhak bilap sab koro laglah. Eh sab paidh mon dravit bho gel. Aa bhavbibhor bho gelao.
ई कहयित लक्ष्मण लय अङ्क । लागल नहि रघुवंश कलङ्क ॥७६॥
महावीर रुद्रक अवतार । कष्ट-महोदधि कयलहुँ पार ॥७७॥
देखल निरामय लक्ष्मण वीर । अहँक प्रसाद भेल मन थीर ॥७८॥
कष्ट नष्ट कयलहुँ हनुमान । ई उपकार-दक्ष के आन ॥७९॥
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