स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
– लङ्काकाण्ड चारिम अध्याय
रामेश्वर शिव केर स्थापना, गुप्तचर शुक केर मुँह सँ रामजीक सेनाक वर्णन
।सवैया छन्द।
बाँधल भेल बाँध वारिधि मे, दशवदनक विजयक मन काज ॥१॥
शिवरामेश्वर तत संस्थापन, कयल सविधि प्रभु श्रीरघुराज ॥२॥
रामेश्वरक करथि जे दर्शन, सेतुबन्ध काँ करथि प्रणाम ॥३॥
ब्रह्मघात-आदिक पातक सौँ, छूटथि से कहलनि श्रीराम ॥४॥
वाराणसी जाय गङ्गाजल, लय रामेश्वर कर अभिषेक ॥५॥
सेतुबन्ध-सागर कर मज्जन, ब्रह्म होथि सम्प्राप्त-विवेक ॥६॥
महिमा हिनक अनन्त कहब कत, सकल मनोरथ-दायक रुद्र ॥७॥
शङ्कर-ध्यान निरन्तर जे कर, कि करत तनिका पापक क्षुद्र ॥८॥
भावार्थः
रावण पर विजय हासिल करबाक उद्देश्य सँ समुद्र मे बाँध (पुल) बनायल गेल । ओतय रामजी द्वारा ‘रामेश्वर शिव’ केर विधिपूर्वक स्थापना कयल गेल । राम कहलनि – “जे कियो रामेश्वरजीक दर्शन करत आ सेतुबन्ध केँ प्रणाम करत, से ब्रह्महत्या आदि पाप सब सँ मुक्त भ’ जायत । जे वाराणसी जा ओतय सँ गंगाजल आनिकय रामेश्वर केर अभिषेक करत तथा सेतुबन्ध लग समुद्र मे स्नान करत, ओ ज्ञान प्राप्त कय ब्रह्म मे लीन भ’ जायत । रामेश्वर केर महिमाक अन्त नहि अछि, कतेक वर्णन कयल जाय । ई रुद्र सब मनोकामना पूरा करयवला छथि । जे सतत शंकर केर ध्यान करैत रहत, ओकरा पापक क्षुद्रता किछु नहि बिगाड़त ॥१-८॥
।षट्पद छन्द।
एक दिन मे लेल सेतु बाँधि, चौदह योजन धरि ॥९॥
योजन बीश प्रमाण, दुसर दिन बाँधल नल हरि ॥१०॥
एकइस योजन सेतु, दिवस तेसर से कयलनि ॥११॥
बाइस योजन सेतु, चारि वासर निर्म्मयलनि ॥१२॥
योजन तैस प्रमाण पुन, पाँचम दिन बाँधल अचल ॥१३॥
बाँधल बाँधल जलधिकाँ, जय रघुनन्दन धुनि मचल ॥१४॥
थल सन नल-कृत सेतु, चढ़ल भल चलल सकल दल ॥१५॥
दलमल मेदिनि डोल, कोल कक्षप अहि हलचल ॥१६॥
चल भेल बड़ बड़ अचल, प्रबल कपि मन घन कड़कल ॥१७॥
कल कल कय कपि उड़ल, व्योम रवि-बाजी भड़कल ॥१८॥
विकल-लोक लङ्कापुरी, तङ्काकुल डङ्का शुनल ॥१९॥
नल बाँधल अछि उदधिकाँ, वानर-दल अबइछ अनल ॥२०॥
भावार्थः
कपिवर नल एक दिन मे चौदह योजन पुल बना लेलनि, दोसर दिन ओ बीस योजन बाँध बनौलनि । तेसर दिन एक्कैस योजन बनौलनि । चारिम दिन बाइस योजन बनौलनि । पाँचम दिन तेइस योजन बाँध बनल । एहि प्रकार सँ बाँध पूरा होइते शोर मचि गेल – समुद्र बँधा गेल, बँधा गेल, रघुनन्दन राम केर जय ! जखन नल स्थल जेकाँ सेतु बना देलनि तखन ओहि देने सारा सेना चलि पड़ल । धरती डगमग डोलय लागल । शूकर, कच्छप आ शेषनाग घबरा गेलाह । बड़का-बड़का अचल (पर्वत) चल भ’ गेल । कपि सभक मनरूपी बादल कड़कय लागल । कपिगण किलकारी भरैत आकाश मे उड़ि चलल । सूर्यक घोड़ा हरकय लागल । लंकापुरीक निवासी रणभेरीक आवाज सुनितहि आतंकित आओर विकल भ’ गेल । ओ सब सुनलक जे नल समुद्र केँ बाँधि देलक आर आगिक लपट जेकाँ लहराइत वानर दल लंकापुरी आबि रहल अछि ॥९-२०॥
।रूपमाला।
पवन-नन्दन तथा अङ्गद काँध चढ़ि दुहु भाय ॥२१॥
देखल लङ्का दुर्ग्ग वेलाचल-शिखर पर जाय ॥२२॥
ध्वज प्रसाद सुवर्ण तोरण स्वर्णमय प्राकार ॥२३॥
किला परिखा ओ शतघ्नी बनल सभ हथिआर ॥२४॥
भवन एक विचित्र विस्तृत स्थित जतय दशभाल ॥२५॥
दश किरीट अपूर्व्व चमकय दशो मोलि विशाल ॥२६॥
काल-मेघ समान कान्तिक कज्जलाद्रि समान ॥२७॥
रत्नदण्ड सितात पत्रेँ लसित अति अभिमान ॥२८॥
सचिव सह लङ्केश करइत छला जतय विचार ॥२९॥
राम देल छोड़ाय शुक काँ गेला निज दरबार ॥३०॥
पुछल रावण कहू शुक बुध की ततय वृत्तान्त ॥३१॥
रङ्ग अर्दित सन कहू की कहल सीताकान्त ॥३२॥
भावार्थः
राम आ लक्ष्मण दुनू भाइ क्रमशः हनुमानजी व अंगदजीक कंधा पर सवार भ’ किनारहि स्थित पर्वतक चोटी पर चढ़िकय लंका-दुर्ग केँ देखलनि । ओतय सोनाक पताका सब छल, सोनाक महल आ द्वार-भवन छल तथा सोनाक चहारदिवारी छल । गढ़ केर चारूकात बाहा (खधा) छल तथा तोप आदि सब हथियार लागल छल । ओतय एकटा बड पैघ सन अपूर्व भवन छल । दशमुख रावण विराजमान छल । ओकर दसो मस्तक पर दसो किरीट सँ दसो दिशा मे अद्भुत चमक पसैर रहल छल । रावण कारी बादल समान या कालिख केर पहाड़क समान देखाय दैत छल । रत्नमय डंडी वला सफेद छाता ओकर शोभा बढ़ा रहल छलैक तथा ओ अभिमान सँ फूलल भरल छल । रामजीक कैद कयल दूत शुक केँ छोड़ि देलनि । ओ अपन दरबार मे पहुँचल आ ओतय लंकापति रावण अपन मंत्री सब संग विचार-विमर्श कय रहल छल । रावण शुक सँ पुछलक – “हे पंडित शुक, कहू, ओतुका कि हाल अछि ? चेहरा बड उतरल देखैत छी । बताउ, राम कि कहलनि ?” ॥२१-३२॥
।चौपाइ।
दशमुख वचन शुनल शुक कान । कहलनि ईश्वर राखल प्राण ॥३३॥
गेलहुँ सागर-उत्तर तीर । संस्थित जत सानुज रघुवीर ॥३४॥
शोभित पुरुष मुख्यतम् चारि । मान न कालहु सौँ से हारि ॥३५॥
सानुज राम नवल लङ्केश । कपिनायक देखल ओहि देश ॥३६॥
हम गगनस्थ कहल संवाद । कपि उड़ि धयलक कय हरिनाद ॥३७॥
कपि-कृत कत कहु की उतपात । सहल बहुत हम मूका लात ॥३८॥
बाँधल छलहुँ मनहुँ बड़ शोच । दाँत काट केओ नख सौँ नोच ॥३९॥
हम देखल बल कयल विचार । वानर-मात्र दनुज संहार ॥४०॥
राम समाद कहल श्रीमान । हम अयलहुँ शुनि अपनहि कान ॥४१॥
जे बल सीता कयलह हरण । समर देखाबह वीराचरण ॥४२॥
आब विजय मे नहि अछि देरि । भोरहि लङ्का हम लेब घेरि ॥४३॥
हमरहु हृदय भेल अछि रोष । बाण एक तोहर बल शोष ॥४४॥
अनकर कथा कहू की आज । अपनैक निन्दा बजितहिँ लाज ॥४५॥
भावार्थः
रावणक बात सुनिकय शुक कहलक – “यैह पैघ बात बुझू जे ईश्वर हमर प्राण बचा लेलाह । हम समुद्रक उत्तरी किनार पर गेलहुँ जेतय लक्ष्मण-सहित राम रुकल छलथि । ओतय सब सँ प्रमुख चारि गोटे रहथि जे कालहु सँ हारि मानयवला नहि छथि – प्रथम राम, द्वितीय लक्ष्मण, तृतीय नव लंकापति विभीषण आर चारिम सुग्रीव । एहि चारू केँ हम ओतय देखलियनि । हम आकाशहि सँ अपनेक संवाद सुनेलियनि, ताबत कपि सब सिंह-गर्जन करैत उड़िकय हमरा पकड़ि लेलक । कपि सब हमर केना-केना दुर्दशा कयल, से कतेक सुनाउ । हमरा बहुते लात आ मुक्का सहय पड़ल । हम बँधा गेल रही, मोन मे भारी व्यथा छल । कोनो वानर दाँत सँ काटैत छल त कियो नह सँ नोंचैत छल । हम ओकरा सभक ताकत देखलहुँ । हम एहि नतीजा पर पहुँचलहुँ जे राक्षस सभक अन्त ई वानरी सेना टा कय सकैत अछि । हे प्रभु ! राम जे संवाद कहलनि अछि से सुनिकय हम एतय आयल छी । हुनकर संवाद अछि जे ‘जाहि ताकत सँ तूँ सीताक हरण कयलें से वीरता तूँ आब लड़ाइ मे देखा । आब विजय मे देरी नहि अछि । भोर होइते हम लंका केँ घेर लेबौक । हमर हृदय मे सेहो क्रोध अछि । हमर एकटा बाण तोहर सेना केँ समाप्त कय देतौक ।” आइ आर केकरो बात कि कहू ! अहाँक निन्दा कहइयो मे हमरा लाज लगैत अछि ॥३३-४५॥
।चौबेल छन्द।
कपि-मेला वेलाचल ऊपर, तरु तोड़ै अछि लटकि-लटकि ॥४६॥
लोचन-पथ लङ्काक लोक जौँ, तनिका मारय पटकि-पटकि ॥४७॥
शुनु दशभाल काल दल जानू, चल अबइत अछि झटकि-झटकि ॥४८॥
एको जन राक्षस नहि तेहन, करत युद्ध रण अटकि-अटकि॥४९॥
सम्यक कयल उमेशाराधन, तथा चतुष्टय साधन ॥५०॥
तप-प्रताप लङ्का गढ़ पाओल, सभ सौँ भेलहुँ महाधन ॥५१॥
जगदम्बा वन सौँ हरि आनल, कुल-मर्य्यादा बोरल ॥५२॥
मति विपरीति अनर्थ समय हो, पोखरिहि माहुर घोरल ॥५३॥
भावार्थः
वेलाचल उपर मे कपि सभक मेला लागल अछि जे गाछ सब पर लटकि-लटकिकय ठाढ़ि सब तोड़ि रहल अछि । जँ कियो लंकावासी ओकर सोझाँ पड़ैत छैक तँ ओकरा पटकि-पटकि कय मारैत अछि । हे रावण! बुझू जे काल केर दल बड़ा तेजी सँ चलि आबि रहल अछि । एकहु टा राक्षस एहेन नहि अछि जे ओकरा सभक सामने अड़िकय लड़ाइ कय सकय । अहाँ बड नीक सँ शिवजीक आराधना कयलहुँ आ चारू पुरुषार्थ पेलहुँ । तपस्याक बल सँ लंका-जेहेन गढ़ प्राप्त कयलहुँ । सब सँ बेसी धनवानो भेलहुँ । मुदा वन सँ जगज्जननी जानकी केँ हैर अनलहुँ, ई ठीक नहि कयलहुँ । एहि सँ अहाँक कुल केर प्रतिष्ठा खसि पड़ल । जखन खराब होइक रहैछ त बुद्धि उलटि जाइछ । अपने मानू जे पोखरिये मे जहर घोरि देलहुँ ॥४६-५३॥
।सबैया छन्द।
अगणित विकट कटक मर्क्कट भट आयल निकट विरचि बड़व्यूह ॥५४॥
शङ्का-विरहित लङ्का-गढ़ काँ लूटत करता के प्रत्यूह ॥५५॥
नहि प्रमाण प्रत्यक्ष मध्य किछु निज लोचन सौँ देखल जाय ॥५६॥
जे जे तीर प्रधान ततय छथि तनिकाँ दै छी एखन चिन्हाय ॥५७॥
भावार्थः
अनगिनत वानरक विकट सेना नजदीक आबि गेल अछि आ गढ़क आसपास मे बड़-बड़ व्यूह सब रचि रहल अछि । ओ सेना निःशंक भ’ लंका-गढ़ केँ लूटत आर एहि मे कियो रोकि-टोकि नहि सकत । प्रत्यक्ष केर प्रमाण की ? चलू, अपना आँखि सँ देखि लियह । ओतय जे-जे मुख्य वीर सब छथि, हुनकर पहिचान एखनहिं करा दैत छी ॥५४-५७॥
।षट्पद छन्द।
गढ़ पर चाहथि कुदय, राम-आज्ञा नहि पाबथि ॥५८॥
पर-दल-खण्डन-शील नील, कपि नाम कहाबथि ॥५९॥
शत सहस्र संग यूथपाल, अनलक बुझु बालक ॥६०॥
सङ्गर-सुभट अजेय, त्रास हिनका नहि कालक ॥६१॥
सुग्रीवक सेनाधिपति, अव्याहत गति सकल थल ॥६२॥
लङ्कापति परिचय कहल, अचल उखाड़थि रण अचल ॥६३॥
विदित विश्व भरि छला, प्रबल अरिमर्दन बाली ॥६४॥
तनिक पुत्र युवराज नाम, अङ्गद बलशाली ॥६५॥
कान्ति कमल-किञ्जल्क, पर्वताकार सुशोभित ॥६६॥
धरणि पटक लाङ्गूल, शत्रु-कुल कर संक्षोभित ॥६७॥
शुनु लङ्केश्वर हिनक हम, कहब कहाँ धरि बुद्धिबल ॥६८॥
संग्रामक उत्साह मन, रघुपति-सेवक मन विमल ॥६९॥
पवन-पुत्र हनुमान, ललकि लङ्का-पुर जारल ॥७०॥
अछय ज्ञात बल अछय, अछय-दल काँ संहारल ॥७१॥
जे अशोक-वन जाय, स्वामिनी-दर्शन कयलनि ॥७२॥
कयल सकल रघुराज-काज, भल भल फल खयलनि ॥७३॥
सगर नगर घर घर जनिक, नाम शुनय कम्पित रहय ॥७४॥
स्वर्ण शैल-सङ्काश तन, रुद्रमूर्ति बल के कहय ॥७५॥
भावार्थः
लंका गढ़ पर ओ सब एखनहिं टूटि पड़य चाहैत छथि मुदा रामक आज्ञा नहि भेटलनि अछि । शत्रुक सेनाक संहार कयनाय त हिनका सब केँ स्वभावतः अबैत छन्हि । एहि कपिक नाम छन्हि नील । ई सौ हजार सेनाक नायक छथि । ई अग्निक पुत्र छथि । लड़ाइ मे नीक-नीक वीरो हिनका नहि जीति सकैत छन्हि । हिनका कालहु केर डर नहि छन्हि । ई सुग्रीवक सेनाध्यक्ष छथि आर हिनका हर जगह अव्याहत गति छन्हि । हे लंकापति रावण, हम हिनक परिचय बतेलहुँ । ई कतहु डिगयवला नहि छथि । लड़ाइ मे पर्वतहु केँ उखाड़ि सकैत छथि । शत्रुक संहार मे समर्थ बालि नामक जे विश्वविख्यात वीर छल, हुनकर ई बलवान् पुत्र युवराज अंगद छथि । हिनकर देहक वर्ण कमल केर केसर-समान अछि । ओ पर्वत जेना विशालकाय छथि । ई जखन धरती पर अपन पूँछ पटकैत छथि तँ शत्रु सभक दल मे खलबली मचि जाइत अछि । हे लंकापति रावण, सुनू । हिनकर बुद्धि आ बल केर वर्णन हम कतय धरि करू । हिनकर मोन मे सदिखन लड़ाइ केर आश रहैत छन्हि, हिनकर चित्त पवित्र रहैत अछि आर रामक सेवक छथि । ई वायुक पुत्र हनुमान छथि । ई क्रोधित भ’ लंकापुरी जरौलनि । ई ओहि अक्षयकुमारक दल केर संहार कयलनि, जेकर बल अक्षय मानल जाइत अछि । यैह अशोक वाटिका जाकय सीताक दर्शन कयलनि । रामक सारा काज केँ पूरा कयलनि आ नीक-नीक फल खेलनि । सारा लंकापुरी मे घर-घर मे हिनकर नाम सुनि-सुनिकय लोक काँपय लागल । हिनकर शरीर सोनाक पर्वत जेहेन छन्हि । तेज मे रुद्रक समान छथि, हिनकर बल केर बखान के कय सकैत अछि भला ! ॥५८-७५॥
।रूपमाला।
श्वेत राजत-अवनिधर रुचि, प्रबल बुद्धि विशाल ॥७६॥
कपिपतिक तट गतागत कर, चतुरतर सभ काल ॥७७॥
रम्भ नामक अतुल-विक्रम, केसरी-सङ्काश ॥७८॥
बार बार विलोक लङ्का, करय चाहथि नाश ॥७९॥
शरभ नामक कोटि-यूथप, थिकथि नायक वीर ॥८०॥
दृष्टि दय दशभाल देखल जाय, ई बड़ धीर ॥८१॥
देखि रहला पुरी लङ्का, दग्ध जनु करताह ॥८२॥
जखन युद्ध विरुद्ध, उद्यत रोकि के सकताह ॥८३॥
भावार्थः
ई ‘रम्भ’ नामक कपि छथि । हिनकर शरीर चाँदीक पर्वत-समान उज्ज्वल छन्हि । ई भारी बलवान आ बुद्धिमान छथि । ई बहुते चतुर छथि आ सदिखन सुग्रीवक आसपास अबैत-जाइत रहैत छथि । ई सिंहक समान बेजोड़ पराक्रमी छथि । ई बेर-बेर लंका दिश देखि रहल छथि आ चाहैत छथि जे एकरा ध्वस्त कय दी । हिनक नाम ‘शरभ’ छन्हि । ई एक करोड़ सैनिक सभक वीर नायक छथि । हे रावण ! गौर कय केँ देखू । ई बड धीर छथि । लंकापुरी केँ एहि तरहें घूरि (ताकि) रहल छथि जेना जरइये देता । जखन ई सब युद्ध मे ठाढ़ हेता त हिनका के रोकि सकतनि ? ॥७६-८३॥
।सोरठा।
पनस महा-बलवान, मन्द द्विविद वानर तथा ॥८४॥
कपि हनुमान समान, आन आन संख्या-रहित ॥८५॥
भावार्थः
‘पनस’, ‘मैन्द’, ‘द्विविद’ आदि आरो बहुते रास बड़का-बड़का बलवान योद्धा सब छथि जे हनुमानक बराबरी करैत छथि । अन्यान्य योद्धा सब केँ तँ गनलो नहि जा सकैत अछि ॥८४-८५॥
।घनाक्षरी।
बाणक प्रताप जलनिधि थर थर काँप ॥८६॥
एको जन आबि न चढ़ल दीर्घ तरणी ॥८७॥
वानर बहुत व्योम विहग समान ऊड़ ॥८८॥
रोकल न रहय कतहु कपि-सरणी ॥८९॥
वीर दशकन्ध नहि चलत प्रबन्ध किछु ॥९०॥
निरधन्ध बुद्धि की वानरमय धरणी ॥९१॥
प्रबल जनिक दल विदित सकल थल ॥९२॥
कलबल नलक समुद्र-सेतु-करणी ॥९३॥
भावार्थः
रामक बाण केर प्रताप सँ समुद्र थर्रा उठल । एकहु टा सैनिक केँ जहाज पर चढ़य नहि पड़लैक । असंख्य कपि पक्षी जेकाँ आकाश सँ उड़ि चलल । कपि लोकनिक रास्ता जल-स्थल-आकाश कतहु रुकल नहि रहैछ । हे वीर रावण ! आब कोनो इन्तजाम सँ काज चलयवला नहि अछि । आब चैन कतय ? सारा धरती वानर सँ छा गेल लगैछ । रामक सेना बड़ा प्रबल अछि । समुद्र मे सेतु बँधबाक लेल नल केर कला हर जगह प्रसिद्ध अछि ॥८६-९३॥
।अनुष्टुप् छन्द।
विधाता सर्व्वलोकानामयं रामो धनुर्द्धारी ॥९४॥
मनोवाचामदृश्योऽसौ प्रभुस्सर्व्वत्र सञ्चारी ॥९५॥
रघोर्व्वंशे समुत्पन्नस्समर्थो भाति संसारी ॥९६॥
घनानां घोरपापानां खलानां गर्व्वसंहारी ॥९७॥
कृतं कार्य्यं त्वया नेष्टं छलान्नीतात्र वैदेही ॥९८॥
शरण्यस्सेव्यतां सम्यक् भव त्वं तत्पदस्नेही ॥९९॥
हृता भ्रान्त्या जगन्माता प्रानत्यातां प्रयच्छास्मै ॥१००॥
असून् संरक्ष तद्वाणैरनीती रोचते कस्मै ॥१०१॥
भावार्थः
ई धनुषधारी राम सब लोक केर सृष्टि करयवला छथि । ओ मन आ वचन सँ पर्यन्त परे (उपर) छथि, सभक मालिक छथि, सर्वत्र जायवला छथि । मायावश रघुक वंश मे अवतार लय सर्वशक्तिमान होइतहु सांसारिक मनुष्य जेहेन लगैत छथि । घनघोर पापी आ दुष्ट सभक घमंड केँ दूर करयवला छथि । अहाँ जे छल सँ सीताक हरण कयलहुँ अछि ओ नीक नहि कयलहुँ । अहाँ शरणागतवत्सल राम केर सेवा करू आ हुनकर चरण-कमल मे प्रीति करू । जगज्जननी जानकीक हरण कय केँ अहाँ नीक नहि कयलहुँ । आब शान्तिक खातिर सीता श्रीराम केँ लौटा दियनु; आर हुनकर तीर सँ अपन जान केँ बचा लिय’ । अन्याय केकरा रुचैत छैक ?” ॥९४-१०१॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे चतुर्थोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक चारिम अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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