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मिथिलाभाषा रामायणः लङ्काकाण्ड तेसर अध्याय – विभीषणक रामक शरण मे आयब आ अभिषेक पायब

764 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

लङ्काकाण्ड तेसर अध्याय

विभीषणक रामक शरण मे आयब आ अभिषेक पायब

।हरिपद छन्द।

नाम विभीषण जन कहइत छथि, दशमुख-सोदर-भाय ॥१॥
चरण-शरण मे राखु दयानिधि, अयलहुँ विकल पड़ाय ॥२॥
बहुत कहल हम नीति सभा मे, नहि मानल दशभाल ॥३॥
मेघनाद रावण-सुत मन्त्री, रावण-मत वाचाल ॥४॥
विश्वजननि वैदेही देवी, रामचन्द्र भगवान ॥५॥
तनिक विरोध कुशल नहि ककरहु, ककरो बचत न प्राण ॥६॥
वचन हमर शुनितहिँ तहँ रावण, हाथ धयल तरुआरि ॥७॥
भयसौँ झटिति तनिक तट त्यागल, सहि नहि सकलहुँ मारि ॥८॥
मन्त्री हमर चारि जन सङ्गी, हिनकर उत्तम कर्म्म ॥९॥
विदित सकल विभु परमेश्वर काँ, सकल शुभाशुभ मर्म्म ॥१०॥

भावार्थः

विभीषणजी बजलाह – हमरा लोक विभीषण कहैत अछि । हम रावणक सहोदर भाय छी । हे दयासागर, हमरा अपन चरणक शरण मे राखि ली । हम दुःखी भ’ भागिकय अयलहुँ अछि । रावणक दरबार मे हुनका नीतिसम्मत उपदेश देलहुँ, लेकिन रावण नहि मानलनि । रावणक बेटा मेघनाद, जे हुनकर सलाहकार छन्हि, हुनकहि समान मुँहजोर अछि । हम हुनका बुझेलियनि, सीता जगज्जननी थिकी, आ रामचन्द्र ईश्वर थिकाह । हुनकर विरोध कयला सँ केकरो कल्याण नहि होयत; केकरहु प्राण नहि बचत, त हमर ई बात सुनितहि रावण तलवार उठा लेलनि । हम डराकय हुनका लग सँ भागि गेलहुँ । हुनकर मारि बर्दाश्त नहि कय सकलहुँ । हुनक चारि गोट मंत्री, जे हमरा संगहि आयल छथि, बड नीक आचरणवला छथि । अपने व्यापक परमेश्वर थिकहुँ, अपने केँ सब बात बुझले रहैत अछि आ सबटा हित आ अहितक तत्त्व सेहो ज्ञाते रहैत अछि ।” ॥१-१०॥

।चौपाइ।

के थिक के थिक भय गेल सोर । पकड़ पकड़ लङ्कापुर-चोर ॥११॥
कह सुग्रीव राम सौँ जाय । हिनकर विश्वासे अन्याय ॥१२॥
रावण काँ लघु सोदर भाय । शान्त वेष की कारण पाय ॥१३॥
आयल छथि मन्त्री सङ्ग चारि । कपट करत देत अहँ काँ मारि ॥१४॥
धरु धरु बाँधि कहय किछु आन । राक्षस-गोलक बोल प्रमाण ॥१५॥
हिनका सभ जन मारि खलाउ । शुभ संग्रामक सगुन बनाउ ॥१६॥
शुनु कपि-वीर कहल हँसि राम । के हमरा जीतत संग्राम ॥१७॥
उतपति पालन लय सामर्थ्य । हमरा ककरो भय से व्यर्थ ॥१८॥
हम देल अभय लाउ अरिआति । बड़ सज्जन छथि राक्षस जाति ॥१९॥
हम छी अहंक शरण कहि धयल । सकृत प्रपन्न अभय जन कयल ॥२०॥
कहितथि रावण अपनहुँ आय । काल-कवल सौँ लितहुँ बचाय ॥२१॥
ई व्रत दृढतर हमरा मित्र । शतदोषी मन रहै पवित्र ॥२२॥
शुनि सुग्रीव गूढ़तर भाव । प्रभु-वचनक नहि उत्तर आव ॥२३॥
बड़ आनन्द ततय पुन जाय । निकट विभीषण देल बजाय ॥२४॥
कपिपति सङ्ग प्रभुक शुभ वास । अयला अचल-भक्ति निस्त्रास ॥२५॥
नयन सजल साष्टाङ्ग प्रणाम । कयल विभीषण कहि निज नाम ॥२६॥
धनुर्ब्बाणधर शोभाधाम । देखल सानुज प्रभु घनश्याम ॥२७॥
परमेश्वर करता प्रतिपाल । स्मित-सुन्दर मुख नयन विशाल ॥२८॥

भावार्थः

एम्हर ई शोर मचि गेल जे ई के छी, ई के छी । पकड़े-पकड़े । ई त लंका के चोर छी । सुग्रीव रामजी लग जाकय हुनका सँ निवेदन कयलाह – “एकरा पर विश्वास कयनाय अनुचित होयत । कि कारण छैक जे रावणक सहोदर छोट भाइ शान्तिपूर्ण वेष तथा भावनाक संग चारि टा मंत्री सहित आयल अछि । लगैत अछि, ई कोनो प्रपंच करत आ अहाँ केँ मारि देत ।” किछु आरो लोक सब कहलक – “एकरा पकड़िकय बान्हिकय राखू । पक्का ई राक्षस दल केर छी । सब गोटे मिलिकय एकरा मारि खसाउ, आगूक लड़ाइ लेल शुभ सगुन बनाउ ।” रामजी हँसिकय कहलनि – “लड़ाइ मे हमरा सँ के जीतत ? सृजन, पालन आ संहार – तीनू शक्ति हमरा प्राप्त अछि; फेर हमरा केकरो सँ डर अछि, से बुझनाय निरर्थक अछि । हम ओकरा अभय दैत छी, अरियाइत कय ओकरा लेने आउ । राक्षस होइतहु ओ बहुते सज्जन अछि । ‘हम अहाँक शरण मे अयलहुँ अछि’ ई कहिकय ओ हमर शरण गहलक अछि । जे एकहु बेर शरणापन्न भ’ जाइत अछि, ओकरा हम अभय दय दैत छी । यदि रावण अपनहुँ आबिकय एहि तरहें कहैत तँ हम ओकरो कालक गाल सँ उबारि दितहुँ । हे मित्र, हमर ई दृढ़ प्रतिज्ञा अछि । सौ टा अपराध कयलो पर जँ मोन पवित्र रहय त ओकरा पवित्रे बुझू ।” सुग्रीव रामक बात सुनलनि आर ताहि भितरक भाव केँ बुझलनि; फेर हुनका कोनो जवाब नहि सुझेलनि, ओ भावविभोर प्रशंसक भ’ गेलाह । फेर बहुत प्रसन्नता सँ ओतय गेलाह आ विभीषण केँ अपना लग बजा लेलनि । दृढ़ भक्ति सँ भरल आ त्रास सँ रहित विभीषण सुग्रीवक संग रामक कल्याणकारी आवास मे अयलाह । विभीषणक आँखि आनन्दाश्रु सँ भरि गेल छलन्हि । ओ अपन नाम कहिकय बेर-बेर साष्टांग प्रणाम कयलनि । हुनका रामक दर्शन भेलनि; धनुष-बाण धारण कएने छथि, मेघ-जेहेन श्याम वर्ण छन्हि, शोभा अपार छन्हि, संग मे लक्ष्मण विराजमान छथि, मुँह मे मुस्कान छन्हि आ पैघ-पैघ आँखि छन्हि । हुनका विश्वास भेलनि जे प्रभु राम हुनकर रक्षा करता ॥११-२८॥

।पादाकुल।

महाराज सीता-मनरञ्जन, चण्ड चाप धर भक्त-दयानिधि ॥२९॥
शान्त अनन्त राम परमेश्वर, सुग्रीवक प्रभु मित्र स्वयंनिधि ॥३०॥
जगदुत्पत्ति पालना लय कर, तीनि-लोक-गुरु आदि सनातन ॥३१॥
स्वेच्छाचार चराचर-संस्थित, बाहर भीतर भीति-रहित-मन ॥३२॥
व्यापक व्याप्य विश्वमे भासित, देव जगन्मय सभटा अनुमत ॥३३॥
अपनैँक मायासौँ जग मोहित, पुण्य-पाप-वश सकल गतागत ॥३४॥
तावत्सत्य विश्व भासित हो, रजत-भ्रान्ति शुक्ति मे जेहन ॥३५॥
अपनैँ क दया ज्ञानसौँ छूटय, प्रभु-पद-भक्त धन्य जे तेहन ॥३६॥

भावार्थः

विभीषण रामक स्तुति करय लगलाह – ‘हे महाराज राम, अपने सीताक मन केँ आनन्दिक करयवला छी, प्रचण्ड धनुष धारण करैत छी, भक्तक लेल दयाक सागर छी; शान्त छी आ अनन्त छी, परमेश्वर छी, सुग्रीवक प्रभु आ मित्र छी, स्वयं विधान छी । अहाँ संसार केर सृष्टि, पालन आ संहार तीनू करयवला थिकहुँ, तीनू लोकक मालिक छी, आदि छी, सनातन छी । अहाँ अपन इच्छानुसार जे किछु चाही, कय सकैत छी । अहाँ चर आ अचर हरेक वस्तु मे बाहर आ भीतर सेहो व्याप्त छी । अहाँक मोन मे भय नहि अछि । अहाँ एहि संसार मे व्यापक आ व्याप्य दुनू रूप मे प्रतीत होइत छी आ अहाँ जगत्स्वरूप सेहो छी, कियैक तँ अहाँ मे सब विरोधक समन्वय अछि । अहीँक माया सँ ई दुनिया मोहित (अज्ञान मे पड़ल) अछि आ पाप व पुण्यक फल भोगबाक लेल जीव बेर-बेर जन्म लैत आ मरैत अछि । मिथ्या होइतहु ई संसार सत्य प्रतीत होइछ; जेना सीप (सितुआ) केँ चाँदी मानि लेल जाइछ । अहीँक दया सँ ज्ञान भेला पर जन्म-मरण केर बन्धन सँ छुटकारा भेटैत अछि । जे अपनेक एहेन भक्त अछि, से धन्य अछि ॥२९-३६॥

।चौपाइ।

अपनहि विधि हरि हर सुर सर्व्व । हरण करिय जग दुष्टक गर्व्व ॥३७॥
अणुसौँ अनु थूलहुँ सौँ थूल । जननी जनक सकल जन मूल ॥३८॥
सभसौँ रहित सहित सन काज । स्तुति हम कि करब होइछ लाज ॥३९॥
सकल अगोचर विभु परमेश । हरण कयल प्रभु हमर कलेश ॥४०॥
हम राक्षस सत्कर्म-विहीन । अयलहुँ चरण-शरण हम दीन ॥४१॥
भासित माया-मानव-रूप । रावणारि जय जय विभु भूप ॥४२॥
जे छल साबित हमरा पाप । से क्षय भेल सेवाक प्रताप ॥४३॥
ज्ञानयोग प्रभु सौँ हो प्राप्त । लङ्का दुर्न्नय-दशा समाप्त ॥४४॥

भावार्थः

अपने ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि समस्त देवता थिकहुँ । अपने संसार मे दुष्ट सभक घमंड केँ दूर कयल जाउ । अपने लघु सँ लघु (छोट सँ छोट) आ महानहु सँ महान (पैघहु सँ पैघ) छी, सब लोकक मूल (जन्मदाता) माता व पिता छी । अपने सब गुण सँ रहित छी, तैयो सगुण-रूप मे काज करैत छी । हम कि स्तुति करू, स्तुति करैत लज्जा होइत अछि । अपने सकल सामान्य लोक सभक समझ केर बाहर छी, व्यापक परमेश्वर छी । हे प्रभु, अपने हमर कष्ट केँ दूर कयल । हम राक्षस छी, सत्यकर्म सब सँ हीन छी, दीन छी, आर अपनेक चरणक शरण मे आयल छी । अपने मायक बल मानव-स्वरूप धारण कएने देखाय दैत छी । हे रावणक शत्रु, विश्वव्यापी राजा, अपनेक जय हो । जे पाप हम बटोरने रही, से अपनेक चरणक सेवाक फलस्वरूप साराक सारा दूर भ’ गेल । आब अपने सँ हमरा ज्ञान भेटय आ लंका मे पसरल खराब नीतिक अन्त हो ॥३७-४४॥

।हरिपद।

कपट-रहित स्तुति कयल विभीषण शुनि प्रभु हर्षित-चित्त ॥४५॥
माँगू वर वरदानी हम छी जे अभीष्ट से वृत्त ॥४६॥
कहल विभीषण देव धन्य हम भेल सकल सिधि काज ॥४७॥
प्रभु-पद-कमल नयन भरि देखल सत्य मुक्त हम आज ॥४८॥

भावार्थः

एहि प्रकारे विभीषण कपट-रहित (सत्य) हृदय सँ स्तुति कयलनि आ रामजी सुनिकय प्रसन्न भेलाह आ कहलनि – “वर माँगू, हम वर दय लेल तैयार छी । अहाँक जे किछु इच्छा हो, से पूरा होयत ।” विभीषण कहलखिन – “हे प्रभु, हम धन्य भेलहुँ । हमर सब काज सिद्ध भ’ गेल, कियैक तँ अहाँक चरण-कमल केँ नजरि भरि देखलहुँ; आइ हम वास्तव मे मुक्त भ’ गेलहुँ ॥४५-४८॥

।दोबय छन्द।

कर्म्मक बन्ध-विनाश हेतु हम, भक्तिज्ञान काँ पाबी ॥४९॥
देल जाय परमार्थ ध्यान निज, अपनैँक दास कहाबी ॥५०॥
विषय-सुखक वैराग्य बनल रह, अपनैँक पद थिर भक्ती ॥५१॥
अपनैँ सौँ प्रभु किछु दुर्ल्लभ नहि, परमेश्वर वरशक्ती ॥५२॥
विमल विराग हमर जन योगी, शान्त हृदय से वासा ॥५३॥
सीतासहित हमर अछि निश्चय, करब ध्यान प्रत्याशा ॥५४॥

भावार्थः

कर्मबन्धन सँ मुक्तिक वास्ते हम भक्तिक ज्ञान प्राप्त करी, हमरा पर अपन परमार्थ ध्यान देल जाय जाहि सँ हम अपनहिँ केर दास कहाबी । विषय-सुख (सांसारिक सुख) सँ वैराग्य बनल रहय, अपनेक चरण मे थिर भक्ति भेटय । अपने लेल प्रभु किछुओ दुर्लभ नहि अछि, अपने परम् शक्तिवान् परमेश्वर थिकहुँ ।” ई सुनिकय रामजी कहलनि – “जे हमर सेवक योगी छथि हुनका निर्मल, रागहीन, शान्ति हृदय मे सीता-सहित हमर निवास रहैत अछि, एहि लेल अहाँ पूर्ण आशान्वित रहू । ॥४९-५४॥

।चौपाइ।

दर्शन हमर लाभ फल एक । सम्प्रति अहँक राज्य-अभिषेक ॥५५॥
लङ्कापति बनि भोगू राज । यावत गगन सूर्य्य द्विजराज ॥५६॥
शुनु कपीश जल घट भरि लाउ । हिनकाँ लङ्का-नृपति बनाउ ॥५७॥
घट भरि आयल सागर-पानि । भेल अभिषेक लग्न शुभ जानि ॥५८॥
देखि देखि जन जोड़ल हाथ । प्रणत-आर्त्ति-हर जय रघुनाथ ॥५९॥
अरि रावणक सहोदर भाय । करुणाकर लेलनि अपनाय ॥६०॥
मिलि कपीश कह लङ्कानाथ । सानुकूल प्रभु श्रीरघुनाथ ॥६१॥
रावण-वध मे होउ सहाय । किङ्कर-कोटि मे मुख्य कहाय ॥६२॥
कहल विभीषण शुनु कपिनाथ । सब गति मति रघुनन्दन-हाथ ॥६३॥
किङ्कर-कर्म्म कुशल हम करब । अपने सबहिक सह सञ्चरब ॥६४॥
रावण दूत पठाओल चार । पर नर वानर बुझि व्यवहार ॥६५॥
रुसि गेला अछि हमरा भाय । लङ्का किदहु देता उलटाय ॥६६॥
शुक नामक चर गगन उचार । शुनु सुग्रीव समय अनुसार ॥६७॥
राक्षसेन्द्र कहलनि संवाद । नहि किछु कपिपति संग विवाद ॥६८॥
भ्राता सदृश वंश बड़ गोट । कर्म्म उठाओल अछि की छोट ॥६९॥
वनचर-राजा बड़ गोट नाम । आयल छी छिः की एहिठाम ॥७०॥
राजकुमारक हृत भेलि नारि । अहँक दोष नहि कयल विचारि ॥७१॥
घुरि सेना लय सदनहिँ जाउ । स्वेच्छाचार अमृत फल खाउ ॥७२॥
वानर जीतय लङ्का हाय । तौँ अकाल ध्रुव उदधि सुखाय ॥७३॥
वनचर-राजा ई नहि ज्ञान । वञ्चक-वचन गमायब प्रान ॥७४॥
जतय अमरपति मानथि हारि । ततय करत नर वानर मारि ॥७५॥
वानर शुनल उड़ल कय गोट । शुक काँ पटकि कयल लोटपोट ॥७६॥
रामचन्द्र काँ कहथि शुनाय । आहि दूत नहि मारल जाय ॥७७॥
वानर हटल जाय महराज । प्राण लेबय चाहै अछि आज ॥७८॥
अपनैँक देखयित ई बड़ शोच । दाढ़ी मोछ कठिन कपि नोच ॥७९॥
रामचन्द्र हँसि देल छोड़ाय । शुक लङ्का मुख चलल पड़ाय ॥८०॥
पुन आकाश जाय संभाष । कपिपति रहल कहक अभिलाष ॥८१॥
लङ्केश्वर सौँ कि कहब जाय । कहल जाय से कथा शुनाय ॥८२॥
कह सुग्रीव कहबगय सैह । बालिक गति भेलनि अछि जैह ॥८३॥
राक्षस-नगर निन्द्य व्यवहार । आबि करब हम अरि-संहार ॥८४॥
रामाङ्गना हरल खल चोर । जयबह कतय अन्त दिन तोर ॥८५॥
आज्ञा देल तखन रघुनाथ । बाँधि धरू हिनका दुनू हाथ ॥८६॥
रावण-दूत नाम शार्दूल । छल देखयित राक्षस प्रतिकूल ॥८७॥
कपि मे कपि बनि गेल मिझड़ाय । चिन्हल भेल तौँ गेल पड़ाय ॥८८॥
रावण सौँ कहलक से जाय । अनइत छी नहि दूत छोड़ाय ॥८९॥
भाग्यहिँ बचि अयलहुँ हम आज । प्राण के अर्प्पय काल-समाज ॥९०॥
अतिचिन्तातुर नृप लङ्केश । अन्तःपुर मे कयल प्रवेश ॥९१॥

भावार्थः

हमर दर्शन पेबाक एक गोट फल अहाँ केँ ई भेटल जे हम सम्प्रति अहाँक राज्याभिषेक करैत छी । अहाँ लंकाक राजा बनिकय ताबत धरि राज्यक भोग करू, जाबत धरि आकाश मे सूर्य आ चन्द्रमा रहथि ।” ॥५५-५६॥

फेर रामचन्द्रजी सुग्रीव सँ कहलनि – “हे कपिराज सुग्रीव, सुनल जाउ । घैल मे जल भरिकय आनू आ हिनका लंकाक राजा बनाबू ।” समुद्र सँ घैला भरि जल आनल गेल । शुभ लग्न जानिकय तुरन्त अभिषेक कयल गेल । ई देखि-देखिकय चकित भ’ सब कियो हाथ जोड़ि कहलनि – “चरण पर खसल लोकक आर्ति दूर करनिहार रामचन्द्रजीक जय हो ! अपन शत्रु रावणक सहोदर भाइ केँ सेहो परम दयालु रामचन्द्रजी अपन बना लेलनि ।” फेर विभीषण सँ भेटिकय सुग्रीव कहलनि – “हे लंकाक राजा, अहाँ पर भगवान राम अनुकूल छथि । अहाँ रावणक वध मे हमर सहायक होउ आ रामक सेवक केर मुखिया बनू ।” विभीषण कहलनि – “सब काज आ सब बुद्धि रामहि केर हाथ मे छन्हि । हम तँ दक्षतापूर्वक मात्र दासक काज करब आ अपने लोकनिक संगहि-संग चलब ।” ॥५७-६४॥

रावणक गुप्त केर रामक छावनी मे पहुँचनाय

ओम्हर रावण अपन दुश्मन, मनुष्य ओ वानर सभक हाल जनबाक लेल आर ई सोचिकय जे भाइ विभीषण रुसिकय गेल अछि, ओ कतहु लंकाक अहित नहि करय ताहि वास्ते एकटा गुप्तचर दूत पठेलक । शुक नामक गुप्तचर आसमान मे उड़ल आ ओतहि सँ बाजल – “हे सुग्रीव, समय अनुरूप हमर बात सुनू । राक्षसराज रावण संवाद कहलनि अछि जे हुनका सुग्रीवक संग कोनो झगड़ा नहि छन्हि । अहाँ भाइ समान प्रतिष्ठित कुल केर छी, फेर ई छोट काज कियैक अपना उपर लेलहुँ ? अहाँ वनचर सभक राजा छी । अहाँक बहुते नाम अछि । फेर एतय कियैक आयल छी ? राजकुमारक स्त्रीक हरण भेलनि, एहि मे अहाँक दोष नहि अछि । सोच-विचार कय लिय’ । सेना लय केँ अपन घर वापस जाउ । इच्छानुसार सुखक भोग करू । यदि वानर लंका केँ जीतय तँ निश्चय अकाल सँ समुद्र सेहो सुखा जायत । हे वनचर लोकनिक राजा ! अहाँ केँ बुझय मे नहि आयल अछि । अहाँ एहि ठक सभक बात मे पड़िकय जान गमायब । जेतय देवता सब सेहो हारि मानैत छथि, तेतय ई नर आ वानर कि लड़ाइ करत ?” कपि सब ई बात सुनलनि । कतेको वानर फाँगिकय आकाश पहुँचि गेलाह आ शुक नामक दूत केँ पकड़िकय गरदनि मोंकि देलनि । शुक रामचन्द्र केँ सुनाकय चिकरि उठल – “हाय ! दूत केँ मारबाक नहि चाही । हे महाराज, अहाँ एहि वानर सब केँ रोकू । ई सब तँ आइ हमर जान लेबय चाहैत अछि । अहाँक आँखिक सोझाँ ई हाल होय, ई बड दुःखक बात भेल । ई कपि लोकनि तँ हमर दाढ़ी-मोंछ नोचि रहल अछि ।” रामचन्द्र हँसिकय छोड़ा देलनि । बेचारा शुक जान बचाकय लंका दिश भागल । फेर आकाश मे जाकय बाजल – “हे कपिराज, एकटा बात कहनाय छुटि गेल छल । हमरा ई बुझाकय कहू जे हम जाकय लंकापति रावण सँ कि कहबनि ?” सुग्रीव कहलखिन – “यैह कहबनि कि जे हाल बालि केर भेलनि वैह अहूँक होयत । राक्षस सभक नगर लंका मे खराब आचरण होइत अछि, तेँ हम सब ओतय आबि केँ दुश्मन सभक अन्त करब । अरे चोर, तूँ रामक स्त्री केँ हरण कएलें । तूँ जएमें कतय ? आब तोहर मृत्युक दिन आबि गेलौक ।” ॥६५-८५॥

तखन रामजी आज्ञा देलनि जे एकर दुनू हाथ बान्हिकय राखू । ई शार्दुल नामक रावणक गुप्तचर छल जे राक्षस जेकाँ कनिकबो नहि लगैत छल । ई कपि संग कपि बनिकय शामिल भ गेल छल । जेनाही पहिचान मे आयल, तेनाही उड़िकय भागल । ओ रावण सँ जाय केँ कहलक – “अहाँ दूत केँ छोड़ाकय नहि अनितहुँ । हम त भाग्ये सँ बचिकय आयल छी । कालक पास जाकय अपन जान के गमायत ।” ई सुनिकय लंकापति रावण भारी चिन्ता मे पड़ि गेल आ रनिवास दिश चलि गेल ॥८६-९१॥

समुद्रक मान-मर्दन आ सेतु बनेबाक तैयारी 

।रूपमाला।

देखल वारिधि तखन रघुवर कोप लोचन लाल ॥९२॥
देखु लक्ष्मण दुष्ट वारिधि कयल गर्व विशाल ॥९३॥
हमर दर्शन हेतु ई नहि अबै छथि एक बेरि ॥९४॥
हमर की करताह वानर मनुज ई मन टेरि ॥९५॥

भावार्थः

रामजी आँखि लाल कय क्रोधपूर्वक समुद्र दिश देखलनि आ बजलाह – “हे लक्ष्मण, देखू, एहि दुष्ट समुद्र केँ बहुते घमंड भ’ गेलनि अछि । हिनका हमर दर्शनहु वास्ते एक बेर नहि आयल भेलनि । ओ मनहि-मन बुझैत छथि जे ई मनुष्य आ वानर हमर कइये कि लेत ॥९२-९४॥

।जलहरण छन्द।

अथ जलनिधि-तट कहु निज निज मत ॥९६॥
कोन गति जलनिधि विषम तरू ॥९७॥
कमलनयन कुशशयन बहुत दिन ॥९८॥
अनशन व्रत प्रभु कयल बरू ॥९९॥
लछुमन कहल कुपित भय शुनु शुनु ॥१००॥
निज कर शर-वर-धनुष धरू ॥१०१॥
जड़ जलनिधि नहि कहल करथि हठ ॥१०२॥
हिनक सकल जलहरण करू ॥१०३॥

भावार्थः

आब समुद्रक किनार पर सब गोटे अपन-अपन राय देल जाउ जे बीहड़ समुद्र केर लंघन कोना कयल जाय ?” कमलनयन राम बहुत दिन धरि कुशक आसन पर सुतिकय अनशन-व्रत कयलनि, मुदा समुद्र केँ कोनो परवाह नहि । तखन लक्ष्मण क्रोधित भ’ कय बजलाह – ‘सुनू । आब अपने धनुष-बाण अपन हाथ मे लेल जाउ । ई जड़ (चैतन्यहीन व मूर्ख) समुद्र हठी अछि, हमरा सभक बात केँ सुनयवला नहि अछि । आब तीर चलाकय एकर सारा पानि केँ सोखि लेल जाउ ।’ ॥९६-१०३॥

।मिथिला सङ्गीतानुसारेण केदार छन्दः।

कहल प्रभु जलनिधि महाजड़, कयल अति अपमान ॥१०४॥
खनल हमरे पूर्व्व पूरुष, अहित हमरहि मान ॥१०५॥
तरत बल शोषण करब धय, बाण अनल-समान ॥१०६॥
प्रीति भय बिनु कतहु प्रायः, शुनल अछि नहि कान ॥१०७॥
कालकाल कराल शासन, धयल कर शर चाप ॥१०८॥
शैल कानन सहित वसुधा-बलय भय-भर काँप ॥१०९॥
एक योजन कूल त्यागल, जलधि मन सन्ताप ॥११०॥
वारिचर-गण विकल-तर मन, करथि विकल विलाप ॥१११॥

भावार्थः

राम कहलनि – “सचमुच मे ई समुद्र भारी मूर्ख अछि । ई हमर अपमान कयलक । हमर पूर्वज सगर एकरा खोदिकय बनौलनि आर ई हमरहि शत्रु बुझैत अछि । हम आगिक समान बाण चलाकय एकर सारा जल केँ सोखि लेब । भय के बिना प्रीति कतहु होइत छैक, से बात कान सँ नहि सुनल गेल अछि ।” एना कहिकय कालहु केर काल तथा कठोर शासन करनिहार राम धनुष-बाण हाथ मे लेलनि । पहाड़ आ जंगल सहित समूचा धरती डर सँ काँपय लागल । समुद्र केँ एतेक सन्ताप भेलनि जे किनारा केँ एक योजन दूर छोड़ि चललाह । जल-जन्तु सभक मोन व्याकुल भ’ गेलैक आर ओहो सब विकल विलाप करय लागल (खूब जोर-जोर सँ कानय लागल) ॥१०४-१११॥

।चौपाइ।

डर सौँ सागर थर थर काँप । देखल रामक प्रबल प्रताप ॥११२॥
दिव्यरूप धय मणि लय हाथ । गेला जतय राम रघुनाथ ॥११३॥
पदपङ्कज पर मणि देल राखि । त्राहि त्राहि पुन उठला भाखि ॥११४॥
हम बड़ जड़ खल-निकट निवास । एत दिन हम छल छी निस्त्रास ॥११५॥
समुचित हमरा होमहि बूझ । परमेश्वर जनिकाँ नहि सूझ ॥११६॥
नाश करू की राखू नाथ । अयलहुँ शरण करण प्रभु हाथ ॥११७॥
पुन नहि एहन करब हम दोष । परमेश्वर मन परिहरु रोष ॥११८॥
सागर-विनय शुनल प्रभु कान । मन प्रसन्न भेला भगवान ॥११९॥
अभय देल शरणागत जानि । जलधि तोहर नहि होयत हानि ॥१२०॥
हम जे चाप चढ़ाओल बाण । तकर कहू की गति हो आन ॥१२१॥
उत्तर देश नाम गिरि कुल्य । पापी बसइछ बहुत अतुल्य ॥१२२॥
ततहि तीर प्रभु फेकल जाय । जैँ आभीर जरय समुदाय ॥१२३॥
बाण-निपाति ततय भेल जाय । जारि घूरि तूणीर समाय ॥१२४॥
पुन सागर कहलनि शुनु राम । सहज उपाय सङ्ग एहिठाम ॥१२५॥
बहुत परिश्रम हो की हेतु । नल भल करता प्रस्तर-सेतु ॥१२६॥
मर्य्यादा प्रभु राखू आज । अनायास मे होइछ काज ॥१२७॥
कय प्रणाम गेल सागर पैशि । तखन विचार एतय भेल बैशि ॥१२८॥
कपिपति लक्ष्मणयुत श्रीराम । नल बजबाय लेल तहिठाम ॥१२९॥
शुनु नल शत योजन बन सेतु । अगध जलधि लङ्का-जय हेतु ॥१३०॥
प्रभु भल कहल कहल नल वीर । चल दल संगी प्रबल समीर ॥१३१॥
कत अर्ब्बुद वानर बलवान । लाबथि गिरिवर तोड़ि पखान ॥१३२॥
नल काँ सभ कल पढ़ले पाठ । ढेर भेल पाथर ओ काठ ॥१३३॥
अप्रधान के ततय प्रधान । राम-काज मे सकल समान ॥१३४॥
वर प्रसाद नल लेलन्हि काँधि । शत योजनक बाँध लेब बाँधि ॥१३५॥

भावार्थः

रामक भारी प्रताप देखिकय समुद्र डर सँ थरथरा उठलथि । ओ दिव्य स्वरूप धारण कय केँ हाथ मे मणिक उपहार लेने ओतय अयलाह जेतय राम रहथि । रामक पैर पर मणि राखि देलनि आ कहलनि, “बचाउ, हमरा बचाउ ! हम भारी जड़ (मूर्ख) छी । दुष्ट सभक बीच मे रहैत छी । एतेक दिन धरि हमरा घमंड रहय जे हमरा केकरहु सँ डर नहि अछि । उचित दंड हमरा भेटबाके टा चाही, जेकरा परमेश्वर देखाय नहि पड़लथि । आब अहाँ चाही त मारि दी या बचा ली । हम चरण मे आबि गेल छी । किछुओ कयनाय आब अपनहिंक हाथ मे अछि । फेर हम एहेन अपराध कहियो नहि करब । हे ईश्वर, अपने मोन सँ क्रोध हंटा लेल जाउ ।” एहि प्रकारे समुद्रक बात सुनिकय भगवान राम हृदय सँ प्रसन्न भेलथि । शरण मे आयल जानिकय समुद्र केँ अभय देलनि – “हे समुद्र, अहाँक कोनो अहित नहि होयत । मुदा हम धनुष पर जे बाण चढ़ा लेलहुँ ओकरा आब दोसर चारा कि होयत से बताउ ?” समुद्र कहलखिन – “उत्तर मे गिरिकुल्य नामक एकटा देश अछि, जेतय भारी पापी लोक सब बसैत अछि । हे प्रभु, एहि बाण केँ ओतहि चलाउ जाहि सँ ओतुका निवासी आभीर लोक जरि मरय ।” राम बाण छोड़लनि आर ओ ओतय जा कय खसल, आभीर सब केँ जराकय लौटल आ फेर रामक तरकस मे प्रवेश कय गेल । फेर समुद्र कहलखिन – “हे राम, सुनू । ओतय पार जेबाक एकटा सहज उपाय अछि । बहुत परिश्रम करबाक आवश्यकता सेहो नहि अछि । नल पाथर केर शानदार पुल बना देताह । हे प्रभु ! हमर प्रतिष्ठा बचाउ । अपनेक कार्य आसानी सँ भ’ जायत ।” एतेक कहिकय समुद्र प्रणाम कय जलराशि मे लीन भ’ गेलथि । तखन ओतय बैसिकय विचार-विमर्श कयल गेल । सुग्रीव आ लक्ष्मण संग राम बैसलाह आ नल केँ ओतय बजा लेलनि । राम कहलनि – “हे नल, सुनू । लंका विजय करबाक लेल अगाध समुद्र मे सौ योजनक पुल बनायल जाय ।” नल उत्तर देलनि – “हे प्रभु, अपने ठीक कहलहुँ ।” एतेक कहिकय साथी-सहयोगी दलक संग वायु-जेहेन प्रबल वेग सँ चलि पड़लाह । अरबों वीर वानर पहाड़ तोड़ि-तोड़िकय पाथर आनय लगलाह । नल केँ सारा पाठ पढ़ले छलन्हि । पाथर आ लकड़ीक अम्बार लागि गेल । पुलक निर्माण मे के प्रधान छल आ के उपप्रधान छल, से कहब मुश्किल अछि । रामक काज मे सब बराबर रहथि । हुनका सब केँ जे वर भेटल रहनि, ओकर बदौलत ओ सब ई भार उठा लेलनि जे सौ योजनक पुल बाँधि लेब ॥११२-१३५॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे तृतीयोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक तेसर अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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