स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण
सुन्दरकाण्ड – चारिम अध्याय
रावणक दरबार मे हनुमानजी संग संवाद
।चौपाइ।
बाँधल काँ पुरजन मिलि मार । कौतुक पहुँचल दशमुख-द्वार ॥१॥
त्रास-हीन हर्षित हनुमान । केवल कौशलेश-पद ध्यान ॥२॥
मारि गारि सबहिक सहि लेथि । पामर काँ नहि उत्तर देथि ॥३॥
मेघनाद कहलनि शुनु तात । कयलक ई वानर उतपात ॥४॥
ब्रह्मास्त्रैँ हम जीतल जखन । वानर वशमे आयल तखन ॥५॥
कहल जाय की समुचित मन्त्र । वानर काँ नहि करब स्वतन्त्र ॥६॥
लौकिक वानर सन नहि कर्म्म । अपनहिँ जानब हिनकर मर्म्म ॥७॥
ताकि प्रहस्त सचिव सौँ कहल । विषय विचार करक जे रहल ॥८॥
पुछु वानर केँ मन्त्रि प्रहस्त । बौआयल कपि कालक ग्रस्त ॥९॥
की आयल अछि की अछि काज । वानर सौँ बजइत हो लाज ॥१०॥
कथि लय कयलक उपवन नाश । राक्षस वध करइत नहि त्रास ॥११॥
कहलनि मन्त्रि प्रहस्त प्रकाश । कपि मनमे नहि मानब त्रास ॥१२॥
प्रेषित ककर कहब से साँच । प्राण अहाँक अवश्ये बाँच ॥१३॥
कहलनि हरि बड़ गोट मोर भाग । दूरक ढोल सोहाओन लाग ॥१४॥
भावार्थः
बाँधल गेला हनुमानजी केँ नगरक लोक मिलिकय मारैत छन्हि आ ई कौतुक (तमासा) रावणक दरबार मे पहुँचि गेल । मुदा हनुमानजी केँ कोनो डर नहि छन्हि, ओ केवल रामक चरण केर ध्यान करैत प्रसन्न मुद्रा मे छथि । सभक माइर आ गाइर बरदाश्त कएने जाइत छथि । ओहि अबूझ (नासमझ) सब केँ कोनो उत्तर नहि दैत छथि । मेघनाद बाजल – ‘हे पिता, सुनू । यैह वानर उत्पात मचौलक अछि । जखन हम ब्रह्मास्त्र चलाकय एकरा जितलहुँ तखन ई काबू मे आयल हँ । आब कहू कि कयनाय उचित होयत ? एहि वानर केँ स्वतंत्र नहि छोड़ब । एकर चाइल सामान्य वानर-जेहेन नहि छैक । एकर रहस्य अहीं जानब ।” फेर मेघनाद प्रहस्त नामक मंत्री दिश देखिकय कहलनि जे कि विचार करबाक अछि ? “हे मंत्री प्रहस्त, काल सँ ग्रसित भ’ भटकैत आयल एहि वानर सँ पुछू – ई कियैक आयल अछि आ एकरा कोन काज छैक ? हमरा त वानर सब सँ बतियाइतो लाज लगैत अछि । पुछू जे ई अशोक वाटिका कियैक उजाड़लक ? राक्षस सब केँ मारैत एकरा डर नहि लगलैक ?” मंत्री प्रहस्त पुछलनि – ‘हे कपि, मोन मे डर नहि करू । सच-सच बताउ जे अहाँ केँ के पठौलक अछि ? अहाँक प्राण उपर कोनो खतरा नहि होयत ।” हनुमानजी कहलखिन – “हम बड़ा भाग्यवान छी । दूर सँ आयल ढोलक आवाज मीठ लगैत अछि ॥१-१४॥
।दोवय छन्दः।
भूषल छलहुँ सङ्ग नहि खर्चा, तोड़ि तोड़ि फल खयलहुँ ॥१५॥
रक्षक लण्ठ प्राण लेबा पर, बहुत नेहोरा कयलहुँ ॥१६॥
कान कपार एक नहि बूझल, पातैँ पात नुकयलहुँ ॥१७॥
अपन स्वरूप धयल हम सभकाँ, कालक धाम पठयलहुँ ॥१८॥
पहिलय मारि बहुत हम सहलहुँ, पाछाँ अनुचित कयलहुँ ॥१९॥
दश-मस्तक लङ्कापति राजा, की अपने खिसिअयलहुँ ॥२०॥
एक गोट वानर पर एते, सेना व्यर्थ पठयलहुँ ॥२१॥
धर्म्म-शास्त्र-वेत्ता अपनैँ सन, न्याय करू अगुतयलहुँ ॥२२॥
भावार्थः
हम भूखल रही, संग मे बटखर्चा नहि रहय, तेँ तोड़ि-तोड़िकय फल खयलहुँ । अहाँक रक्षक लोक सब बड बदमाश अछि, बहुते नेहोरा (विनती) कयलो पर ओ सब हमरा जान लय पर उतारू भ’ गेल । ओ सब जहाँ-तहाँ हमरा पर प्रहार करय लागल आ हम पत्ता-पत्ता मे नुकाइत रहलहुँ । तखन हम अपन स्वरूप धारण कयलहुँ आ सब केँ मृत्युक बाट देखा देलहुँ । पहिने त हमहीं बड मारि खेलहुँ मुदा बाद मे हम तोड़-फोड़ कय केँ अनुचित काज कयलहुँ । हे लंकेश्वर दशकन्धर राजा, अहाँ कियैक खिसियेलहुँ ? एकमात्र असहाय वानर पर एतेक रास सेना कियैक पठेलहुँ ? अहाँ त धर्मशास्त्र जनैत छी, न्याय करू । अगुतेलहुँ कियैक ?” ॥१५-२२॥
।रावणोक्ति।
।वसन्त-तिलका छन्दः।
के तोँ थिकाँहि कत सौँ यत आबि गेलैँ ॥२३॥
की नाम तोहर निशाचर-भक्ष्य भेलैँ ॥२४॥
आज्ञा-विहीन फल तोड़ि बहुत खैलैँ ॥२५॥
निर्हेतु रक्षक तहाँ किय मारि देलैँ ॥२६॥
भावार्थः
रावण पुछलक – “तूँ के थिकेँ ? एतय कतय सँ अयलें हँ ? तोहर नाम कि थिकौक ? आब तूँ राक्षस सभक भक्ष्य भ’ गेलें अछि । बिना हुकुम के तूँ बहुते रास फल तोड़िकय खयलें, से त कयलें मुदा बिना कारण ओतय रक्षक सब केँ कियैक मारलें ? ॥२३-२६॥
।हनुमानक उक्ति।
रे दुष्ट लागल क्षुधा फल तोड़ खेलौ ॥२७॥
कैलैँ उपद्रव ततै तरु तोड़ि देलौ ॥२८॥
हैतौ बहूत नहि सम्प्रति विघ्न भेलौ ॥२९॥
अस्त्र-प्रहार कयलैँ हम प्राण लेलौ ॥३०॥
भावार्थः
हनुमानजी कहलनि – “अरे दुष्ट ! भूख लागल छल तेँ तोड़िकय फल खयलहुँ । तूँ सब ओतय उपद्रव कयलें, तेँ हम गाछ सब केँ तोड़लहुँ । एखन कि भेलौक हँ ? आगू आरो बहुते बर्बादी हेतौक । हमरा उपर हथियार छोड़में त हम जान लय लेबौक ॥२७-३०॥
।मालिनी-छन्दः।
रघुपतिक पठौलैँ लाँघि केँ सिन्धु ऐलौ ॥३१॥
तनिक कुशल-वार्ता जानकी कैँ शुनेलौ ॥३२॥
क्षुधित बहुत भेलैँ तैँ फलाहार कैलौ ॥३३॥
मरुत-सुत हनुमान्नाम की बाँधि लैलौ ॥३४॥
किछु दिन रहि लङ्का सिन्धु केँ फानि जैबे ॥३५॥
जनक-नृपति-पुत्री दुःख-वार्ता शुनैबे ॥३६॥
प्रबल सकल सेना सङ्ग लै फेरि ऐबे ॥३७॥
तखन बुझब जे छी से अहाकाँ बुझैबे ॥३८॥
भावार्थः
रामक पठायल हम समुद्र नाँघिकय एतय आयल छी । हुनकर कुशल-समाचार जानकी केँ सुनेलहुँ । बहुत भूख लागल तेँ फल खयलहुँ । हमर नाम हनुमान छी । हम वायुक पुत्र छी । अहाँ सब हमरा नाहक मे एतय बन्हने छी । किछु समय लंका मे रहिकय फेर समुद्र फाँगिकय हम चलि जायब । राजा जनकक पुत्री सीताक दुख-दर्द रामजी केँ सुनायब । समस्त प्रबल (ताकतवर) सेना सभक संग फेर एतय आयब । तखन अहाँ सब केँ बुझय मे आबि जायत जे हम के छी ॥३१-३८॥
।भुजङ्गप्रयातछन्दः।
चिन्हारे अहाँ छी विरञ्चि-प्रपौत्रे ॥३९॥
कुकर्म्मी अहाँ छी करैछी की श्रौत्रे ॥४०॥
गिरीशार्च्चना छोड़ि ई की करै छी ॥४१॥
परस्त्री अहाँ छद्म सौँ की हरैछी ॥४२॥
भावार्थः
अहाँ तँ चिन्हले-जानल लोक छी । अहाँ ब्रह्माजीक परपोता छी । अहाँ त कुकर्म मे रत छी । एहेन (वेद-विरूद्ध) कर्म कियैक करैत छी ? गिरीश अर्चना (शिव पूजन) छोड़ि ई कि करैत छी ? दोसरक स्त्री अहाँ छल सँ कियैक हरैत छी ?” ॥३९-४२॥
।चौपाइ।
लङ्कापति हमछी निर्भीत । फेरि गबैछी गओले गीत ॥४३॥
ब्रह्म विष्णु रामक अवतार । के गुण कहत हुनक विस्तार ॥४४॥
वेद न पाबथि कहयित पार । जनिकर सिरजल थिक संसार ॥४५॥
तनिकर माया सीता-रूप । हरि आनल वनसौँ चुप चूप ॥४६॥
गञ्जन बन्धन कर्म्मक भोग । अयलहुँ नदिया-नाव-संयोग ॥४७॥
तनिकर दूत चोर हम धयल । करब उपाय एखन की कयल ॥४८॥
अनुभव बाली-बल विस्तार । तनिक राम कयलनि संहार ॥४९॥
दीनक झेर देखल दरबार । अयलहुँ दबि छपि सागर पार ॥५०॥
राम-सख्य सुग्रीवक संग । किछु दिन बितलय देखब रङ्ग ॥५१॥
कपिपति सचिव थिकहुँ हनुमान । अञ्जनि जननि जनक पवमान ॥५२॥
वानर चर फिरइछ सभ ठाम । हम लङ्का अयलहुँ शुनि नाम ॥५३॥
नीति धर्म्म हम देल शुनाय । सत्य कहय से मारल जाय ॥५४॥
हृदय अहाँक अधिक अछि मैल । झिटुकी सौँ फुटि जाइछ घैल ॥५५॥
प्रभुक कुशल सीता सँ भाषि । लोभ भेल एक फल केँ चाषि ॥५६॥
लोभहिँ पतन कहय संसार । हमरा अपनहि पड़ल कपार ॥५७॥
बड़ गोट वंश ओ विस्तर राज । अयशक नहि किछु मन मे लाज ॥५८॥
करब न अहँसौँ किछु हम लाथ । अहँक नीक रघुनन्दन-हाथ ॥५९॥
पण्डित वेश कुपथ की धयल । हाथी सौँ हथि-बेसन कयल ॥६०॥
हमरा मारल बाँधल बेश । बुद्धि-वृद्धि हो लगलेँ ठेस ॥६१॥
हसि बजला तखना दशकण्ठ । ई वानर अछि बड़का लण्ठ ॥६२॥
मृतसम बाँधल मन अभिमान । हमरहु निकट छटै अछि ज्ञान ॥६३॥
मानुष राम गहन मे वास । हमरा तकर देखाबै त्रास ॥६४॥
तनिका मारब दनुज पठाय । वानर बिलटत रहित-सहाय ॥६५॥
सीता-कारण अछि उतपात । करब तनिक हम प्राणक घात ॥६६॥
सनकल अछि कपि बड़ वाचाल । हिनका माथ नचै अछि काल ॥६७॥
मारुत-नन्दन उत्तर कहल । रावण-कुवचन एक न सहल ॥६८॥
भावार्थः
हे लंकापति रावण ! हम फेर वैह बात दोहराबैत छी जे हमरा केकरहु डर नहि अछि । ब्रह्मा आ विष्णु रामक रूप मे अवतार लेलनि अछि । हुनकर गुणक पूरा-पूरा वर्णन के कय सकैत अछि ? जिनकर गुणक वर्णन करैत वेदो केँ पार नहि लगैत छैक तथा जे एहि दुनियाक सर्जन करयवला छथि, हुनक माया-स्वरूपा स्त्री केँ हैर अनने छी । हमरा जे गारि सुनय पड़ल अछि आ जेना बन्धन मे पड़ि गेल छी, ओ त मात्र नदी-नाव-संयोग अर्थात् आकस्मिक घटना टा छी आ हमर पूर्व जन्मक कर्मक फल छी । हुनकर दूत हमरा अहाँ सब चोर बुझिकय पकड़ि लेलहुँ अछि । एकरो उपाय हम करब । एखन त किछु नहि कयलहुँ अछि । अहाँ केँ बालि कतेक बलवान छल तेकर नीक अनुभव अछिये, तिनको राम संहार (वध) कयलनि । अहाँक दरबार मे दीन लोकनिक जमघट देखलहुँ । नुका-छिपाकय समुद्रक पार आयल छी । रामजी जे सुग्रीवक संग मित्रता कयलनि अछि तेकर रंग किछु दिन बितलाक बाद पता चलत । हम सुग्रीवक मंत्री हनुमान छी । हमर माताक नाम ‘अंजनि’ थिक आर हमर पिता वायु (पवमान) थिकाह । दूतक रूप मे वानर सब जहाँ-तहाँ घूमि रहल अछि । हम नाम सुनिकय लंका अयलहुँ अछि । नीति कि अछि आ धर्म कि अछि ? ई हम बुझा देलहुँ । कहावत छैक जे सत्य बात कहयवला मारल जाइत अछि । अहाँक हृदय अत्यधिक मलिन अछि । कहल जाइत छैक जे एकटा झुटकी सँ घैल फुटि जाइत छैक । रामक संदेश जखन सीता केँ सुना देलहुँ त फल चखबाक लोभ भ’ गेल । संसार भरि केँ ई बुझल छैक जे लोभे सँ पतन होइत छैक । से कहावत त हमरा अपनहि सिर पर पड़ल । अहाँक कुल बड पैघ अछि । अहाँक राज्य सेहो विस्तृत अछि । तैयो अहाँक मोन मे बदनामीक लाज नहि अछि । अहाँ सँ हम कोनो बात नहि नुकायब । अहाँक कल्याण रामक हाथ मे अछि । विद्वानक रूप पाबिकय अहाँ कुमार्ग पर पैर कियैक रखलहुँ ? अहाँ हाथी सँ हथिवेसन कयलहुँ । हमरा पिटलहुँ-बन्हलहुँ, एकर फल बाद मे चाखब । कहावत छैक, ठेस लगला सँ बुद्धि बढ़ैत छैक ।” ॥४३-६१॥
तखन रावण हँसिकय बाजल – “ई वानर बड़ा लण्ठ (बदमाश) अछि । मुर्दा जेकाँ बान्हल अछि, तैयो एकर मोन मे अभिमान भरल छैक । हमरहि सोझाँ मे ज्ञान बघारैत अछि । राम, जे मनुष्य थिक आर वन मे रहैत अछि, ओकरे डर ई हमरा देखाबैत अछि । राक्षस सब केँ पठाकय ओहि राम केँ मारि देब । तखन ई वानर बे-सहारा भ’ कानैत फिरत । ई खुराफात सीताक कारणे भेल अछि, तेँ आब ओकरे जान सँ मारि देबाक अछि । ई वानर बड़ा बतक्कर आ बताह जेकाँ अछि । एकरा माथ पर काल नाचि रहल छैक ।” हनुमान सभक उत्तर देलनि । रावणक एकहु गोट दुर्वचन केँ बर्दाश्त नहि कयलनि ॥६२-६८॥
।द्वितीय त्रिभंगी छन्द।
दशमुख-वचन शुनल कपि कहलनि ॥६९॥
चुप रह रे अभिमानी, करतौ हानी, कटु बानी ॥७०॥
प्रभुकर-शरक निकर विषधर सन ॥७१॥
लगलैँ के बच प्रानी, शठ अज्ञानी, वक-ध्यानी ॥७२॥
अपनहिँ मन नृप बनल सनल छह ॥७३॥
कहतौ के गुरु तोरा, शुनु स्त्री-चोरा, कुल-बोरा ॥७४॥
हित अनहित अनहित हित कयलह ॥७५॥
प्रभुक न कयल निहोरा, मति घोरा, शुभ थोरा ॥७६॥
भावार्थः
हुनकर वचन सुनितहि हनुमानजी कहलनि – अरे अभिमानी, तूँ चुपे रह । बड़का बात बजला सँ तोरा मजा चाखय पड़तौक । रामक हाथ सँ छुटल विषैला साँपक समान तीर लगला सँ के बचि सकैत अछि रे पाखंडी , दुष्ट, नादान ? अरे स्त्री केँ चोरेनिहार, कुल केँ बुड़ेनिहार रावण, तूँ तँ अपनहि मोन सँ राजा बनल बैसल छँ । तोरा के बड़का कहतौक ? अरे मतिमन्द अभागल, तूँ हित केँ अहित आ अहित केँ हित बुझलें । राम केर प्रार्थना नहि कएलें ॥६९-७६॥
।घनाक्षरी।
सत्य हनुमान तौँ प्रमाण ई वचन जान ॥७७॥
मर्क्कट विकट भालु-भट वश परबैँ ॥७८॥
प्रभु-दल प्रबल जखन उतरत इत ॥७९॥
दशमुख तखन उपाय कोन करबैँ ॥८०॥
मुष्टिका-आघात लात-घात-सन्निपात वश ॥८१॥
शोचवश रण मे त्राहि त्राहिकेँ कहरबैँ ॥८२॥
‘चन्द्र’ भन रामचन्द्र सर्व्वनाथ-हाथ-तीर ॥८३॥
लगतहु जखन तखन मूढ मरबैँ ॥८४॥
भावार्थः
यदि हम वास्तव मे हनुमान छी त ई बात निश्चित बुझ जे तूँ दारुण वानर-भालू सैनिक सभक पंजा मे पड़ि जेमें । रामक प्रबल सेना एतय उतरत तखन रे रावण, तूँ कि उपाय करमे ? ओहि सैनिक सभक मुक्का पर मुक्का आ लात पर लात खा-खाकय शोक सँ ‘बचाउ-बचाउ’ चिकरय लगमें । ‘चन्द्र कवि’ कहैत छथि जे जखन सौंसे दुनिया केँ नाश करय मे समर्थ रामक हाथ सँ तीर लगतौक तखन रे नादान, तोहर अन्त भ’ जयतौक ॥७७-८४॥
हनुमानजीक पुच्छर मे आगि लगायल गेनाय आ लंका केँ जरेनाय
।चौपाइ।
मारुत-वचन शुनल लङ्केश । कोप-विवश जन देल निदेश ॥८५॥
हम कटु वचन शुनै छी कान । वानर बजइछ आनक आन ॥८६॥
हिनका मारय लय कय खण्ड । हिनकर सभ छूटय पाखण्ड ॥८७॥
कपिकाँ मारय दौड़ल जखन । अयला सभा विभीषण तखन ॥८८॥
कहलनि नीतिशास्त्र-अनुसार । चारक वध नहि अछि व्यवहार ॥८९॥
दूत बेचारा मारल जयत । रामचन्द्र सौँ युद्ध न हयत ॥९०॥
अङ्कित हयता कहता जाय । राखक नहि थिक दूत बझाय ॥९१॥
नीति विभीषण कहलहुँ नीक । मानल वचन सदर्थ अहीँक ॥९२॥
शण मन बहुत वस्त्र घृत तेल । ढेर भेल नृप आज्ञा देल ॥९३॥
कपि-वालधि मे सभ लपटाब । कौतुक करइत नृपति हसाब ॥९४॥
किछु तहि ऊपर आगि लगाव । के बुझ भावी काल स्वभाव ॥९५॥
मारथि गारि देथि कय बेरि । योगी सौँ कयलनि धुरखेरि ॥९६॥
नाना तरहक बाजन बाज । प्रबल चोर काँ पकड़ल आज ॥९७॥
पश्चिम द्वार पवन-सुत जाय । बन्धन लेलनि सहज छोड़ाय ॥९८॥
सूक्ष्मरूप सौँ गेल बहराय । सभ राक्षस-मन देल शुखाय ॥९९॥
सभ जन हृदय कदलि सन काँप । जनु कपि भेल चोटाओल साँप ॥१००॥
कपिकाँ मन मे अछि बड़ रोष । करत उपद्रव पुन भरि पोष ॥१०१॥
रावण-सभा उठल घमलौड़ि । ऐठन जरल न जरि गेल जौड़ि ॥१०२॥
के थिक केहन न कयल विचार । मूर्खक लाठी माँझ कपार ॥१०३॥
के कह कपि कपि-रूपी काल । नहि बुझ लङ्कापति दशभाल ॥१०४॥
भावार्थः
रावण हनुमानजीक बात सुनिकय बेश कुपित (आगिबबूला) भ’ गेल आ अपन सेवक सब केँ आदेश देलक – ‘हम एकर तीत-तीत बात सब अपन कान सँ सुनि रहल छी । ई वानर अंट-संट बकैत जा रहल अछि । एकरा काटिकय टुकड़ा-टुकड़ा कय दे जाहि सँ एकर पाखंड दूर हो ।” सेवक सब कपि केँ मारय लेल दौड़ल लेकिन एहि अवसर पर विभीषण पहुँचि गेलाह । ओ कहलखिन – “प्रभु, नीतिशास्त्र कहैत अछि जे दूत अबध्य होइत अछि । बेचारा दूत मारल जायत त रामचन्द्र सँ युद्ध केना होयत ? एकरा कोनो दाग लगाकय छोड़ि देल जाय त ओ जाकय रामचन्द्र सँ कहत । दूत केँ बाँधिकय राखब ठीक नहि अछि ।” रावण कहलक – “अरे विभीषण, तूँ नीक नीति कहलह । मानलहुँ जे तोहर कहब जायज छह ।” अनेकों मन पटुआ (पटसन), कपड़ा, घी आ तेल जमा कयल गेल आ राजा रावण आज्ञा देलक – “ई सब एहि वानरक पूँछ मे लपेटि दिहिन आ आगि लगा दिहिन जाहि सँ ई वानर नाच-तमाशा कय केँ राजा केँ हँसाबय ।” के जनैत छल जे कि नतीजा हेतैक ? लोक सब हुनका मारय आ गारि दियए लागल । मानू ओ सब योगी संग होली खेलाय लागल हो । तरह-तरह के बाजा सब बाजय लागल आ सब गोटे खुशी मनाबय लागल जे आइ भारी चोर केँ पकड़लहुँ । तखन हनुमानजी पश्चिमी दरबाजा पर गेलाह आ अनायास बन्धन केँ हंटा देलनि । फेर अति लघु रूप धारण कय निकलि गेलाह । सब राक्षस सभक मोन घबरा उठलैक । सभक कलेजा केराक पात जेकाँ काँपय लगलैक । मानू ओ वानर चोट खायल साँप भ’ गेल हो । हनुमानजीक मोन मे बड़ा भारी रोष रहनि । ओ फेर भारी उपद्रव मचेता । रावणक सभा मे हो-हल्ला मचय लागल । रस्सी त जरि गेल मुदा ऐँठन नहि जरल । ई के छी, केहेन अछि, किछुओ विचार नहि कयल गेल ? ई मूर्खतापूर्ण काज भेल । कहावत अछि – ‘मूर्खक लाठी बीच कपार’ । के कहय जे ई वानर छी या वानरक रूप मे काल आयल अछि ? लंकेश्वर रावण केँ बुझय मे नहि अयलनि ॥८५-१०४॥
।घानक्षरी।
अग्निमान त्रिकूट-अचल अनुमान भेल ॥१०५॥
धूम-धार नाम घन प्रलय समान रे ॥१०६॥
आगि आगि पानि भेल धह धह छानि भेल ॥१०७॥
कपि-मन आनि भेल सङ्ग पवमान रे ॥१०८॥
वानर न जानि भेल हसयित हानि भेल ॥१०९॥
हास्य राजधानी भेल रावण मलान रे ॥११०॥
आनही सौं आन भेल सर्व्व सावधान भेल ॥१११॥
रावण-प्रताप हर हरि हनुमान रे ॥११२॥
भावार्थः
लगैत छल जे त्रिकूट पर्वत आगिक गोला बनि गेल हो । धुआँ जे आकाश मे गेल त मानू प्रलय केर बादल जेकाँ पसैर गेल । पानि सेहो आगि-आगि भ’ गेल । उपर धह-धह जरय लागल । हनुमानजीक मोन मे बड़ा भारी आइन लगलनि । हवा सेहो हुनका संग देलकनि । ई वानर कि छी ? ई बात बुझय मे नहि आयल केकरहु । हँसी-हँसी मे सब किछु सर्वनाश भ’ गेल । राजधानी मे लोक उपहास करय लागल । रावणक मोन उदास भ’ गेल । कि सँ कि भ’ गेल ? सब सावधान भ’ गेल । एना बुझायल जे ई वानर हनुमान रावणक महिमा केँ समाप्त करयवला अछि ॥१०५-११२॥
।चौपाइ।
बहल बहल तत प्रलय बिहाड़ि । जनु पर्व्वत काँ देत उखाड़ि ॥११३॥
कपिक पूछ मे धधकल आगि । विकल पड़ायल सभ घर त्यागि ॥११४॥
गोपुर ऊपर कपि चढ़ि फानि । सभ मन छूटल मारिक बानि ॥११५॥
गरजि गरजि कपि ठोकल ताल । राड़क असँघै जिवक जञ्जाल ॥११६॥
भावार्थः
ओतय प्रलयकाल-समान एहेन आँधी आयल मानू पहाड़हु सब केँ उखाड़ि फेकत । हनुमानजीक पूँछ मे जहिना आइगक लपट उठल कि सब लोक घबराकय घर-द्वार छोड़ि भागि गेल । हनुमान फानिकय नगरक द्वारभवन पर चढ़ि गेलाह । सभक मोन सँ मारि-पीटक भावना भागि गेल । ओ गरजि-गरजि कय ताल ठोकय लगलाह । कहावत अछि – ‘राड़क असँघै जिवक जंजाल (मूर्खक विद्रोह खतरनाक होइछ)’ ॥११३-११६॥
।रूपक घनाक्षरी।
गगन अनिल ओ अनल जल महि विश्व ॥११७॥
सिरिजल जनिक तनिक दूत जरबहु ॥११८॥
कोटि कोटि रावण समान गण लड़बह ॥११९॥
मृग-गण-मारक मृगेन्द्र जकाँ पड़बहु ॥१२०॥
देखल प्रचण्ड रण हमर उदण्ड बल ॥१२१॥
भेल आब कोप अभिमान लोप करबहु ॥१२२॥
कालहुक काल विकराल सौँ नै भीति अछि ॥१२३॥
तोहरा लोकनि बुतै हम कतै मरबहु ॥१२४॥
भावार्थः
आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी – ई सब पदार्थ जिनकर सृजल अछि, हुनकहि दूत केँ तूँ सब जरबय चाहैत छँ । यदि रावणक तुल्य करोड़ों जवान मिलिकय लड़में तैयो जेना मृग केँ मारबाक लेल सिंह छूटैत अछि, ओहिना भिड़ जेबउ । तूँ सब युद्ध मे हमर प्रचंड पराक्रम देख लेलें । आब हम तामस मे आबि गेल छी । तोरा सभक घमंड चूर-चूर कय देबौक । विकराल काल केर कालहु सँ हमरा डर नहि अछि । तोरा लोकनिक कतेक ताकत जे हमरा मारि सकमें ? ॥११७-१२४॥
।चौपाइ।
जरय न कपि जरइत अछि गाम । कह जन भेल विधाता वाम ॥१२५॥
लोह-स्तम्भ कपिक अछि हाथ । जे लग भिड़थिन फोड़थिन माँथ ॥१२६॥
सगर नगर अनल क सञ्चार । विना विभीषण घर ओ द्वार ॥१२७॥
धर धर कहथि निकट नहि जाथि । हाथी कुक्कुर रीति डराथि ॥१२८॥
पीटथि छाती वनिता कानि । कपि-उतपात भेल सभ हानि ॥१२९॥
जरल कनक-मणिमय वर गेह । सम्पति रह की पाप-सिनेह ॥१३०॥
दूत-पराक्रम कहल न जाय । भाग्यवान काँ भूत कमाय ॥१३१॥
कपि कह लङ्का करब विनाश । घैल काँच केँ मुगरक आश ॥१३२॥
धिक रावण आनन न मलान । चोरक मुह जनु चमकय चान ॥१३३॥
दशकन्धर की रहबह चैन । भल-घर-मध देलह अछि बैन ॥१३४॥
हनुमानक लग के-ओ न जाय । मारिक डर सौँ भूत पड़ाय ॥१३५॥
भावार्थः
वानर नहि जरैछ मुदा बस्ती सब जरि रहल अछि । लोक कहैत अछि विधाता प्रतिकूल भ’ गेलाह अछि । लोहाक डंटा कपिक हाथ मे अछि । जे हुनका सँ भिड़त तेकरा ओ माथ फोड़ि देता । सारा नगर मे आगि पसैर गेल । मात्र विभीषणक घर-द्वार बचल रहल । सब लोक ‘पकड़-पकड़’ आवाज लगबैत अछि मुदा डर सँ कियो लगो मे नहि जाइछ; जेना हाथी सँ कुत्ता, तहिना सब डरा-डराकय भगैत अछि । महिला सब कानि-कानिकय छाती पिटैत अछि – हाय, वानर केर उत्पात सँ सबटा नाश भ’ गेल । सोना आ रत्न सब सँ बनल नीक-नीक भवन जरि गेल । पाप मे पड़ल रहला सँ कि सम्पत्ति बचि सकैत अछि ? दूत एहेन वीरता देखाबय से अजीब बात भेल । कहावत छैक, ‘भूतो भाग्यवानक काज कय दैछ, दूतक बाते जुनि पुछू’ । हनुमानजी कहैत छथि – “हम लंका केँ ध्वस्त कय देब । कहावत अछि, काँच घैल केँ मुँगराक चोट चाही । धिक्कार अछि रावण केँ, एतेक भेलो पर जेकर मुँह मलिन नहि भेल अछि । कहावत अछि – चोर के मुँह चान समान चमकैत अछि, से वाली बात । हे रावण आब तूँ केना चैन पेमें ? तूँ त अपने भल (नीक) लोक केँ बैन (उपहार) पठा देने छेँ, यानि अपना सँ अधिक बलवान केँ चुनौती दय चुकल छेँ ” हनुमानजी लग कियो नहि जाइछ । कहावत छैक, ‘मारिक डरे भूत पराय’ ॥१२५-१३५॥
।घनाक्षरी।
अनुचित भेल न विचार दृढ़ कय लेल ॥१३६॥
छोड़ि देल वानर विकट अधबध कै ॥१३७॥
दिन भेल वक्र आब ककरो न शक अछि ॥१३८॥
एक छानि आगि तौँ हजार घर धधकै ॥१३९॥
प्रलय-कृशानु सन तखनुक भानु सन ॥१४०॥
वीर हनुमान सनमुख जित-युधकै ॥१४१॥
ताल घहराय के वारण करै जाय ॥१४२॥
जत कयल अन्याय फल रावण अबुध कै ॥१४३॥
भावार्थः
ई अनुचित भेल । बढियाँ सँ सोचि-विचारिकय काज नहि कयल गेल । विकट वानर केँ चोटा कय जिबिते (अधबध कय) छोड़ि देल गेल । आब खराब समय आबि गेल । केकरहु वश नहि चलत । एकटा छानि (छत) मे आगि लगला सँ हजारों घर जरि जाइत छैक । प्रलयकालक आगि आ तखनुक सूर्य केर समान वीर हनुमानजीक सोझाँ लड़ाइ मे के जितयवला अछि ? घहराइत बाढ़ि केँ के रोकि सकैत अछि ? अबुध (नादान) रावण जतेक पाप कयलक ओकरा ओतेक फल भोगहे टा पड़तैक ॥१३६-१४३॥
।शिखरिणी छन्दः।
अरे बाबा दावानल-सदृश लङ्का जरइयै ॥१४४॥
अधर्म्मी लङ्केशे तनिक सभ पापे करइयै ॥१४५॥
पड़ा रे रे बाबू किछु न मन काबू परइयै ॥१४६॥
विना पानी लङ्का-नृपति-पट-रानी मरइयै ॥१४७॥
भावार्थः
अरे बाबा ! ई लंका दावानल जेकाँ जरैत अछि । लंकेश्वर रावण बड़ा भारी पापी अछि । ओकरहि पाप सँ ई सब किछु भ’ रहल अछि । अरे भाइ-बहिन सब, भागे-भागे ! आब स्थिति काबू मे नहि रहलौक । लंकाधिपति रावणक पटरानी सेहो आब पानि बिना मरि रहल छौक ॥१४४-१४७॥
।नाराच।
पड़ा पड़ा बड़ा बड़ा गृहाट्ट जारि देलकौ ॥१४८॥
विदेह-कन्यका-विपत्ति जानि कानि लेलकौ ॥१४९॥
बहूत छोट वानरे सभैक हाल कैलकौ ॥१५०॥
प्रचण्ड दण्ड-देनिहार दूत चोर धैलकौ ॥१५१॥
भावार्थः
भाइ सब, पड़ा-पड़ा (भागे-भागे) ! ई (वानर) बड़का-बड़का महलो सब केँ जरा देलकौक । जनकक बेटी सीता केँ सतेबाक बदला लय लेलकौक । बित भरिक ई वानर सभक दुर्दशा कय देलकौक । ई चोर दूत कड़ा सजा दयवला केँ मजा चखा देलकौक ॥१४८-१५१॥
।समानिका।
मेघनाद की कहू, बुद्धि-हीन छी अहूँ ॥१५२॥
बाप पाप कैल की, मृत्यु-मार्ग धैल की ॥१५३॥
भावार्थः
हे मेघनाद, अहाँ केँ कि कहू ? अहूँ अबुझे लोक ठहरलहुँ । अहाँक पिता पाप कयलनि ताहि सँ अहाँ मृत्युक बाट धयलहुँ ॥१५२-१५३॥
।दोवय छन्दः।
हरि-पद-विमुख कतहु सुख पाबथि, धिक थिक दशमुख-ज्ञाने ॥१५४॥
दुर्गति कय कपि लङ्का जारय, धयलहिँ छथि अभिमाने ॥१५५॥
एहि सौँ आब कि गण्जन देखता, मरणाधिक अपमाने ॥१५६॥
के कपि पकड़ लड़य के कालसौँ, नहि कपि-वीर समाने ॥१५७॥
भावार्थः
जे भगवद्भक्ति सँ विमुख होयत ओ कतहु सुख पायत ? हे रावण, तोहर ज्ञान केँ धिक्कार छह । वानर दुर्गति कय केँ लंका केँ जरा रहल अछि, एतबहु पर रावणक अभिमान नहि टूटल अछि । एहि सँ बढ़िकय गञ्जन (तौहीनी) आर कि होयत ? अपमान त मरणहु सँ बढ़िकय अछि । एहि कपि (वानर) केँ के पकड़त ? काल सँ के लड़य आओत ? एहि वानरक बराबर हमरा सब मे कियो वीरो नहि अछि ॥१५४-१५७॥
हनुमानजीक सीता सँ विदा लेनाय, मधुवन उजाड़नाय आ रामजीक पास घुरनाय
।चौपाइ।
लङ्का-नगर सगर कपि डाह, स्वामि-कार्य्य शूरत्वि निवाहि ॥१५८॥
कुदि खसला सागर मे जाय । पुच्छल बाँधल आगि मिझाय ॥१५९॥
स्वस्थ-चित्त भेला हनुमान । यहन पराक्रम कर के आन ॥१६०॥
सीता-आशिष-बल नहि जरल । लङ्कापतिक गर्व्व सभ हरल ॥१६१॥
अग्नि वायु दुनु थिकथि इयार । जरल न सखि-सम्बन्ध विचार ॥१६२॥
जनिक नाम जपि छुट तिन ताप । भवकृत-दोष-लेश नहि व्याप ॥१६३॥
तनि रघुवरक दूतवर जानि । प्राकृत अनल कयल नहि हानि ॥१६४॥
हनुमानक डर केओ नहि बाज । जनु कपि पायोल रामक राज ॥१६५॥
जनकनन्दिनी छलि जहि ठाम । घुरि पुन तनिकर कयल प्रणाम ॥१६६॥
सानुज प्रभुवर अयोता तखन । जननि ततय पहुँचब हम जखन ॥१६७॥
तीनि प्रदक्षिण ई कहि देल । आगाँ ठाढ़ जोड़ि कर भेल ॥१६८॥
जे किछु बनल कयल हम काज । दशकन्धर निर्ल्लज्ज कि बाज ॥१६९॥
कहल जानकी शुनु कपि धीर । सकल-नियन्ता श्रीरघुवीर ॥१७०॥
तनिकर इच्छा होयत जेहन । कार्य्य-सिद्धि होयत शुभ तेहन ॥१७१॥
भावार्थः
हनुमानजी समूचा लंका केँ जराकय, स्वामी रामजीक कार्य केँ शूरता (वीरता) सँ पूर्ण कयकेँ, सागर मे कूदि खसलाह आ आगि मिझाकय अपन पूँछ केँ समेटि लेलनि । तखन हनुमानजी स्वस्थ चित्त भेलाह (हुनका तखन आराम भेटलनि) । एहेन पराक्रम आर के कय सकैत अछि ! सीताक आशीर्वादक बल सँ हुनकर किछु नहि बिगड़लनि (पूँछो तक नहि जरलनि) लेकिन लंकापति रावणहु केर घमंड चूर-चूर कय देलनि । अग्नि आ वायु दुनू यार थिक; तेँ, अग्नि अपन मित्र (वायु) संग सखाभाव केर विचार कयलनि जाहि सँ हनुमानजी नहि जरलाह (अर्थात्, वायुपुत्र हनुमानजी पर अग्नि सखाभाव सँ कृपा करबाक विचार कयलनि) । जिनकर नामक जप सँ (कायिक, वाचिक आ मानसिक) तीन प्रकारक पाप दूर भ’ जाइत अछि आ सांसारिक दोष सब लेशोमात्र (नामो मात्र लेल) नहि लगैत अछि, ताहि रघुवर (राम) केर श्रेष्ठ दूत बुझिकय पार्थिव अग्नि हुनकर कोनो हानि (नोकसानी) नहि कयलनि । आब हनुमानजीक डर सँ कियो किछु नहि बजैत अछि । मानू हनुमानेजी रामजीक राज्य पाबि गेल होइथ । हनुमानजी घुरिकय ओतय गेलाह जेतय जानकीजी रहथि आ फेर हुनका प्रणाम कयलनि । ओ कहलनि – “हे माता, सानुज प्रभुवर (भाइ लक्ष्मणजीक संग श्रीरामजी) तखनहिं अओता जखन, हे जननी, हम ओतय पहुँचब ।” एतेक कहिकय ओ तीन बेर प्रदक्षिणा कयलनि आ फेर हाथ जोड़िकय हुनका आगाँ मे ठाढ़ भ’ गेलाह आ कहलाह – “हे माता ! हमरा सँ जे किछु बनि पड़ल, से काज हम कयलहुँ । ई निर्लज्ज रावण कि बाजत ?” जानकी कहलखिन – “हे धीर कपि, सुनू । सब किछु श्रीरामक हाथ मे छन्हि । हुनका जेहेन इच्छा हेतनि, ताहि अनुसार सब शुभ काज सिद्ध होयत ।” ॥१५८-१७१॥
।पादाकुल दोहा।
(श्री सीताक प्रति हनुमानक वचन – तिरहुति)
ओरे से दिन बीतल । नयनक नोर तोर वसन तितल ॥१७२॥
आबि एकगोट कपि रावण जितल । करमक लिखल कतहु नहि विचल ॥१७३॥
करु करु जानकी जी हृदय शीतल । लङ्कापुर जरइछ प्रलय अनल ॥१७४॥
सुखपाख सभ जन रावण हीतल । “चन्द्र” भन ठाढ़ जनु प्रतिमा लिखल ॥१७५॥
भावार्थः
हनुमानजी कहलनि – “अहो, ओ दुःखक दिन आब बीति गेल, जखन आँखिक नोर सँ अपनेक कपड़ा भिजल रहैत छल । एकटा कपि आयल आ ओ रावण केँ जीति लेलक । भाग्य मे जे लिखल रहैछ से टालल नहि जा सकैछ । हे जानकीजी, आब अपन हृदय केँ शीतल करू । प्रलयाग्नि मे लंकापुरी जरि रहल अछि । सब नगरवासी लोकनिक तथा रावणहु केर हृदय दहैल गेल अछि । ‘चन्द्र’ कवि कहैत छथि, ई सबटा लिखल गेल प्रतिमा समान भ’ गेल अछि । (यानि दूत रूपी हनुमानजीक वीरता देखि सब मूर्तिवत् – हक्का-बक्का भ गेल अछि ।) ॥१७२-१७५॥
।षट्पद छन्द।
हम किङ्कर हनुमान, देवि चिन्ता चित परिहरु ॥१७६॥
हमरा काँधा चढ़लि, घोर सागर काँ सन्तरु ॥१७७॥
क्षण मे श्रीरघुनाथ निकट कौशल पहुँचायब ॥१७८॥
आज्ञा प्रभुसौँ पाबि, फेरि लङ्का घुरि आयब ॥१७९॥
प्रलय करब लङ्कापुरी, हमरा के रोकत सुभट ॥१८०॥
जौँ ई रुचि हा स्वामिनी, देल जाय आज्ञा प्रगट ॥१८१॥
शरसौँ शोषि समेद्र सेतु, शर-निकरक करता ॥१८२॥
सानुज से प्रभु आबि, रावणक प्राणे हरता ॥१८३॥
सुग्रीवक सभ सैन्य, आबि लङ्का केँ लूटै ॥१८४॥
सुयश लोक मे होयत, अचल लङ्कागढ़ टूटै ॥१८५॥
हम मारुत-सुत प्राण काँ, कोनहुँ यत्न राखब एतय ॥१८६॥
कुशल-क्षेम सौँ जाउ अहँ, श्रीरघुनन्दन छथि जतय ॥१८७॥
भावार्थः
हे देवी, हम हनुमान अहाँक सेवक छी । अहाँ सब चिन्ता छोड़ू । हमर कन्धा पर चढ़िकय एहि समुद्र केँ पार करू । हम क्षणहि भरि मे कुशलपूर्वक रामजी लग पहुँचा देब । रामजीक आज्ञा पाबिकय लंका फेर घुरिकय आयब । लंकापुरी मे हम प्रलय मचा देब । के योद्धा हमरा रोकि सकैत अछि ? यदि हमर ई प्रस्ताव अहाँ केँ पसिन हो तँ स्पष्ट आदेश देल जाउ ।” ई सुनिकय सीता कहलनि – “राम बाण सँ समुद्र केँ सोखि लेता आ बाणक पुल बना लेता । फेर ओहि पुल सँ लक्ष्मण-सहित आबिकय रावणक प्राण हरण करता । सुग्रीवक सेना आबिकय लंका केँ लूटि लेत । दुनिया मे रामक यश पसरनि आ लंकाक मजगूत गढ़ ध्वस्त होइ । हे पवनसुत हनुमानजी, हम ताबत धरि जेना-तेना अपन प्राण बचेने राखब । अहाँ कुशलपूर्वक ओतय जाउ जेतय श्रीराम छथि ।” ॥१७६-१८७॥
।दोबय छन्दः।
कयल प्रणाम अनेक बार कपि, पर्व्वत पर चढ़ि गेला ॥१८८॥
योजन तीश प्रमाण उच्च गिरि, समभूमिक सम भेला ॥१८९॥
पर्व्वत वायु वेग सौँ महितल, दबि गेला तत्काले ॥१९०॥
सागर तरथि घोर धुनि करइत, धर्म्मक सोर पताले ॥१९१॥
भावार्थः
हनुमानजी बेर-बेर प्रणाम कयलनि, फेर पर्वत पर चढ़ि गेलाह । पर्वत तीस योजन ऊँच छल, मुदा ओ भूमिक सतहक समान तल पर आबि गेल । जहिना हनुमानजी ओहि पर चढ़लाह, तहिना ओ दबिकय भूमितल केर बराबर भ’ गेल । घोर ध्वनि करिते समुद्र तरय लगलाह, हुनकर धर्मक आवाज (शोर) पाताल धरि पहुँचि गेल ॥१८८-१९१॥
।चौपाइ।
अङ्गदादि कयलनि अनुमान । अबइत छथि हर्षित हनुमान ॥१९२॥
शब्द एहन करता के आन । श्रवण-सुखद बर अमृत समान ॥१९३॥
एतहु सकल कपि बालि-किशोर । हर्षक शब्द कयल नहि थोर ॥१९४॥
गिरि पर पहुँचि गेला हनुमान । मृतक देह जनु पलटल प्राण ॥१९५॥
कार्य्यसिद्धि होइछ अनुमान । हर्षक सुख मुख-शोभा आन ॥१९६॥
शस्त्रक क्षत कत देखिय अङ्ग । भेल समर जनि लगइछ रङ्ग ॥१९७॥
महावीर कह शुनु प्रिय सर्व्व । प्रभु-प्रताप किछु हमर न गर्व्व ॥१९८॥
देखि जनकजा बिपिन उजारि । रक्षक जन केँ रण मे मारि ॥१९९॥
कि करब ततय पड़ल बड़ मारि । राम-प्रताप कतहु नहि हारि ॥२००॥
दशकन्धर सौँ वाद विवाद । बचलहुँ श्री रघुनाथ-प्रसाद ॥२०१॥
अयलहुँ बहुत सुभट केँ मारि । रावण-पालित लङ्का जारि ॥२०२॥
राम-कपीशक तट हम जयब । एखनहि ततहि स्वस्थ हम हयब ॥२०३॥
वानर-वृन्द मिलल भरि अङ्क । जेहन परशमणि पाबथि रङ्क ॥२०४॥
पूछ चूमि गुणगण सभ बाँच । हरषि हरषि हरिगण भल नाँच ॥२०५॥
भावार्थः
आवाज सुनिकय अंगद आदि अनुमान करय लगलाह जे प्रसन्न भ’ हनुमान घुरि रहल छथि । कियैक तँ अमृतक समान कान मे प्रिय लागयवला एहेन शब्द आर के कय सकैत अछि ! एम्हरहु बालिक पुत्र अंगद व अन्य कपि सब जोर-जोर सँ हर्षध्वनि कयलनि । ओहि पर्वत पर हनुमानजी पहुँचि गेलाह, मानू मृतक (मृतप्राय भेल) वानर लोकनि केँ प्राण पलटिकय घुरि अयलनि । लगैत अछि कार्य सिद्ध भ’ गेल हँ कियैक तँ अन्तर मे हर्ष रहला पर चेहराक रंग किछु आर भ’ जाइत छैक । हुनकर शरीर पर अस्त्र सभक किछु घाव देखाय दैत अछि, एहि सँ लगैत अछि जे लड़ाइ भेल छल । हुनका सभक लग मे पहुँचिकय महावीरजी कहलनि – हे समस्त प्रियजन लोकनि, सब गोटे संवाद सुनय जाउ । सब किछु रामजीक प्रताप सँ भेल । एहि मे हमर कोनो श्रेय नहि अछि । जानकीजी केँ देखिकय, अशोक वाटिका उजाड़िकय आ युद्ध मे रक्षक सब केँ मारिकय हम आबि गेलहुँ । कि कहू ! ओतय बहुते लड़ाइ भेल, मुदा रामजीक प्रताप सँ हमर कतहु हारि नहि भेल । रावण सँ वाद-विवाद भ’ गेल, ओहि मे सेहो रामहि केर प्रताप सँ हम बचि गेलहुँ । बहुत भारी-भारी योद्धा सब केँ मारिकय आ रावण द्वारा रक्षित लंकापुरी केँ जराकय हम आबि गेलहुँ । आब हम राम व सुग्रीवक समीप जखन जायब, तखनहिं स्वस्थ होयब (चैनक साँस लेब) ।” कपि सब गला सँ गला लगाकय मिलन कयलनि, जेना रंक सब केँ पारस भेटि गेल होइन्ह । हनुमानजीक पूँछ केँ चुमिकय सब गोटे हुनकर गुणगान करय लगलाह । ओ वानर लोकनिक दल हर्षक मारे खूब नाच-गान करय लगलाह ॥१९२-२०५॥
।सारबती छन्दः।
राम कहू पुन राम कहू, मारुत-नन्दन धन्य अहूँ ॥२०६॥
आब चलू छथि नाथ जहाँ, की सुखलाभ अनन्त तहाँ ॥२०७॥
भावार्थः
वानर लोकनि कहलनि – “राम-राम कहय जाउ । हे पवनसुत, अहाँ धन्य छी, आब ओतय चलू जेतय प्रभु राम छथि, ओतय अपार आनन्त प्राप्त होयत ॥२०६-२०७॥
।सोरठा।
चलल वीर-समुदाय, महावीर अगुआय चल ॥२०८॥
प्रस्र वणाचल जाय, कपिपति-मधुवन प्राप्त सभ ॥२०९॥
भावार्थः
सब वीर लोकनि चलि पड़लाह । हनुमानजी आगू-आगू चललाह । सब गोटे प्रस्रवण पर्वत पर चढ़िकय सुग्रीवक निवास मधुबन मे पहुँचलाह ॥२०८-२०९॥
।दोबय छन्दः।
वानर सकल कहल अङ्गद काँ, अहँ छी भूपक बालक ॥२१०॥
आज्ञा देल जाय मधुवन-फल, खायब अपनैँ पालक ॥२११॥
जनितहि छी सभ जन छी भुखले, फलमधु यहन न पायब ॥२१२॥
खाय पीबि सन्तुष्ट चित्तसौँ, प्रभुक निकट मे जायब ॥२१३॥
भावार्थः
सब वानर लोकनि अंगद सँ कहलनि – “अहाँ राजकुमार छी, अहाँ एहि मधुबन केर संरक्षक छी । आज्ञा होइ त हम सब एकर फल खाय । अहाँ त जनिते छी जे हम सब गोटे कतेक भूखल छी । एहेन मीठ फल आर कतय पायब ? खा-पीकय प्रसन्न मोन सँ प्रभु रामजी लग जायब ॥२१०-२१३॥
।चौपाइ।
अङ्गद कहल सुखित फल खाउ । किछ नहि ककरो डरैँ डराउ ॥२१४॥
कपि फल खाथि करथि मधुपान । रक्षक हटल पटल नहि मान ॥२१५॥
दधिमुख-अनुशासन काँ पाय । देल रक्षक सभकैँ लठिआय ॥२१६॥
अतिबल वानर भूखल घूरि । सभ रक्षक काँ देलनि चूरि ॥२१७॥
दधिमुख-मुख भय गेल मलान । कुपित न बजला से मतिमान ॥२१८॥
सभ रक्षक केँ संग लगाय । कपिपति काँ कहि देल देखाय ॥२१९॥
तारा तनय हठी हनुमान । जेहन आगि केँ पवन दिवान ॥२२०॥
मधुवन फल भल खयलय जाथि । किछु नहि अपनैक त्रास डराथि ॥२२१॥
हम नहि करब बिपिन रखबारि । किछु बजितौं तौँ खइतहुँ मारि ॥२२२॥
मधुवन फल राखल छल ढेर । लूटि भेल ककरहु नहि टेर ॥२२३॥
युवराजक हनुमान प्रधान । बिपिन विनाशक कि कहब ज्ञान ॥२२४॥
हम छी कपि-भूपालक माम । नहि घुरि जायब गञ्जन ठाम ॥२२५॥
सत्य कहै छी शुनु कपिनाथ । मर्य्यादा रह अपनहिँ हाथ ॥२२६॥
मधुवन फल मधु कयलक नाश । भूतक घर सन्ततिक निवास ॥२२७॥
शुनल वचन कहलनि जे माम । कपिपति-मन नहि कोपक ठाम ॥२२८॥
हर्षक नोर भरल दुहु आँखि । अयला अयला उठला भाखि ॥२२९॥
सीता देखि आयल हनुमान । हमरा मन से निश्चय ज्ञान ॥२३०॥
से शुनि पुछलनि अपनहि राम । मारि भेल अछि की कोन ठाम ॥२३१॥
की कहयित छथि कपिपति माम । लेल कि जनकनन्दिनी नाम ॥२३२॥
कहलनि गेल जे दक्षिण देश । आयल सभ जन रहित कलेश ॥२३३॥
कार्य्यसिद्धि कयलनि हनुमान । मधुवन फल के चाखत आन ॥२३४॥
दधिमुखकाँ कहलनि अहँ जाउ । सभ जनकाँ सत्वर लय आउ ॥२३५॥
बहुत शीघ्र से वन मे जाय । अङ्गदादि काँ कहल बुझाय ॥२३६॥
रामचन्द्र लक्ष्मण कपिराज । बड़ सन्तुष्ट भेल छथि आज ॥२३७॥
शीघ्र बजौलनि करू प्रयाण । भाग्य ककर तुल अहँक समान ॥२३८॥
शुनितहिँ चलल सकल जन तुष्ट । प्रभुक समक्ष मुदित-मन पुष्ट ॥२३९॥
अङ्गद आदि सहित हनुमान । प्रणत कहल हरिभक्त-प्रधान ॥२४०॥
मारुत-नन्दन जोड़ल हाथ । कृपा-जलधि जय जय रघुनाथ ॥२४१॥
वैदेही हम देखल आँखि । कुशल प्रभुक विधिवत सभ भाखि ॥२४२॥
भावार्थः
अंगद कहलनि – खूब मजा सँ फल खाउ । केकरो कोनो डर नहि करू ।” कपि सब फल खाय लगलाह आ मधु पिबय लगलाह । रक्षक (रखबार) लोकनिक रोक-टोक केँ अनसुना कय देलनि । तखन दधिमुखक आज्ञा पाबिकय रखबार (रक्षक) सब वानर केँ लठियाबय (लाठी चलबय) लागल । बड़ा भारी बलवान वानर लोकनि जे भुखल रहथि से सब घुरलाह आ रखबारो सब केँ चूरि (पीटि) देलनि । ई हाल देखि दधिमुखक मुंह अपना सन भ’ गेलनि । ओ तामस सँ भरि गेलाह मुदा बुझनुक रहथि, तेँ किछु नहि बजलाह । ओ सबटा रखबार सब केँ संग लय केँ गेलाह आ सुग्रीव केँ देखाकय कहलनि – ‘ताराक पुत्र अंगद आ हठी (जिद्दी) हनुमान, जेना अग्निक मित्र वायु होइत छथि, तहिना दुनू मिलिकय मधुबन केर फल खेने जा रहल छथि । अहाँक सेहो डर हुनका सब केँ नहि भ’ रहल छन्हि । आब हम बगियाक रखबारी नहि करब । अगर किछु बजितहुँ त माइर खयतहुँ । मधुबन मे बहुते रास फल सुरक्षित छल । केकरो नहि टेरलनि । युवराज अंगदक जे प्रमुख साथी हनुमान छथि से बगिया उजाड़य मे खूब माहिर छथि । हम कपिराजक मामा छी । हम ओहि अपमानजनक जगह पर फेर घुरिकय नहि जायब । हे कपिराज, हम सत्य कहैत छी, प्रतिष्ठा अपनहिं बचेला सँ बचैत अछि । मधुबन मे जे फल आ मधु छल, सबटा नाश कय देलाह । कहावत अछि, बालबच्चा सभक निवास भूतक डेरा भ’ जाइत अछि ।” मामा जे सब कहलनि से सुग्रीव सुनि लेलनि । हुनकर मोन मे कनिकबो तामस नहि भेलनि । दुनू आँखि सँ हर्षक नोर बहय लागलनि । बाजि उठलाह – “आबि गेलाह ! आबि गेलाह ! हमरा मन मे ई पक्का विश्वास अछि जे हनुमान सीता केँ देखिकय आबि गेलाह ।” ई सुनिकय रामजी स्वयं पुछलन्हि – “कि, कोनो जगह लड़ाइ भेल की ? राजा सुग्रीवक मामा कि कहैत छथि ? कि अहाँ जानकीक नाम लेलहुँ अछि ?” सुग्रीव कहलखिन – जे कपि दक्षिण देश गेल छलथि से सब सकुशल वापस आबि गेलाह । हनुमान कार्य सिद्ध कयकेँ अयलाह अछि । हुनकर सिवा मधुबनक फल आर के चाखत ।” फेर ओ दधिमुख सँ कहलनि – “अहाँ जाउ आ सब केँ तुरत लय केँ आउ ।” दधिमुख बड़ा शीघ्रता सँ बगीचा गेलाह आ अंगद आदि केँ बुझाकय कहलनि – “राम लक्ष्मण आ सुग्रीव आइ बड प्रसन्न छथि । अहाँ सब गोटे केँ जल्दी बजौलनि अछि । चलय चलू । अहाँ सब जेहेन केकर भाग्य छैक !” सुनितहि सब गोटे खूब प्रसन्न भ’ रामजी लग पहुँचि गेलाह । अंगद आदिक संग प्रमुख भक्त हनुमानजी प्रणाम कयलनि । फेर पवनसुत हनुमानजी हाथ जोड़िकय कहलनि – “हे कृपासागर रघुनाथ! अपनेक जय हो । जय हो । हम अपन आँखि सँ सीता केँ देखलहुँ आर हुनका प्रभुक कुशल यथाविधि सुनेलहुँ ॥२१४-२४२॥
।दोबयछन्दः।
मलिनवसन एक-वेणी अतिदुख, निराहार दुबराइलि ॥२४३॥
राम राम रट सकरुण धुनि कय, शुद्ध समाधि समाइलि ॥२४४॥
अहह अशोकवाटिकाभ्यन्तर, वृक्ष-शिंशुपा छाया ॥२४५॥
लङ्कापुरी राक्षसी-घेड़लि, छथि प्रभु अपनैँक माया ॥२४६॥
भावार्थः
हे प्रभु, ओ मैल कपड़ा पहिरने, एकटा चोटी लटकौने, तीव्र विरह-वेदना सँ खेनाय-पिनाय छोड़िकय दुब्बर भ’ गेल छथि । करुण आवाज सँ राम-राम रटैत अहाँक ध्यान मे डूबल रहैत छथि, जेना शुद्ध समाधि मे लीन होइथ । अपनेक माया-सीता लंकापुरी मे अशोक वाटिकाक भीतर शीशम केर एकटा गाछक छाया मे राक्षसी सब सँ घेरायल अबस्था मे छथि ।” ॥२४३-२४६॥
।चौपाइ।
कि करब यत्न फुरल नहि आन । कयल तखन रघुपति-गुण-गान ॥२४७॥
जैँ विधि प्रभु लेलनि अवतार । हरण हेतु पृथिविक खल-भार ॥२४८॥
धनुषभङ्ग परिणय जे रीति । सकल शुनाओल मङ्गल गीति ॥२४९॥
अयला प्रभु जे विधि वनवास । सकल कथा से कयल प्रकाश ॥२५०॥
आश्रमशून्य जानि लङ्केश । देवी हरि अनलक एहि देश ॥२५१॥
कथा शुनथि वैदेही कान । मन-मन करथि बहुत अनुमान ॥२५२॥
मैत्री जैँ विधि कयल कपीश । अपनाओल प्रभु अपना दीश ॥२५३॥
अनुज-नारि-रत बालि विचारि । तनिकाँ रघुपति सत्वर मारि ॥२५४॥
से सुग्रीव विदित कपिराज । सम्प्रति प्रभु छथि तनिक समाज ॥२५५॥
तनिक सचिव हम श्रीपति-दास । सीता देखक बहुत प्रयास ॥२५६॥
से कोन देश कोन से ठाम । दूत पठाओल जतय न राम ॥२५७॥
आज फलित भेल हमर प्रयास । मानस-दुःख-राशि भेल नाश ॥२५८॥
तकलनि कहलनि अमृत-समान । वचन शुनाओल के ई कान ॥२५९॥
लोचन-गोचर से भय जाथु । कहथु कथा नहि एखन नुकाथु ॥२६०॥
दूरहि सौँ हम कयल प्रणाम । अञ्जलि-बद्ध ठाढ़ तहिठाम ॥२६१॥
सूक्ष्म-रूप वानर-आकार । हम प्रभु-चरित कहल विस्तार ॥२६२॥
परिचय पुछलनि पुछलनि नाम । नर-वानर-सङ्गति कोन ठाम ॥२६३॥
स्वामिनि कथा पुछल जय बेरि । हमहुँ शुनाओल से सभ फेरि ॥२६४॥
प्रत्ययमूल मुद्रिका देल । तखन प्रतीति तनिक मन भेल ॥२६५॥
भावार्थः
कि करितहुँ, जखन कोनो उपाय नहि सुझायल तखन हम रामक गुणगान करय लागलहुँ – ‘कोन तरहें प्रभु धरती पर सँ पापी सभक भार हरण करबाक लेल अवतार लेलनि ? कोन तरहें धनुष-भंग आ विवाह कयलनि ? इत्यादि कल्याणकारी गाथा सब सुनेलहुँ । फेर ओ सबटा कथा सुनेलहुँ जे प्रभु केँ केना वनवास भेटलनि ? आर केना आश्रम केँ सून्न देखि लंकापति रावण सीता केँ ओतय सँ हरण कय आनि लेलक । सीता ई कहानी सुनैत छलिह, मनहि-मन भाँति-भाँतिक बात ओ अनुमान करैत छलिह । फेर आगू सुनेलहुँ जे कपिराज सुग्रीव सँ राम मैत्री कयलनि आ हुनका अपन पक्षमे कय लेलनि । अपन छोट भाइक पत्नी मे बालि केँ अनुरक्त देखिकय राम हुनकर वध कयलनि । सुग्रीव कपि सभक राजा भेलाह । राम एखन हुनकहि संग मे छथि । हम हुनकर मंत्री आ राम केर सेवक (हनुमान) छी । सीता केँ तकबाक बहुते प्रयास भेल । एहेन कोन देश आ कोन स्थान अछि जेतय राम द्वारा सीताक खोज लेल दूत नहि पठायल गेल हो ! आइ हमर प्रयास सफल भेल । मोन मे जे अपार दुःख छल से दूर भेल ।” तखन सीता हमरा दिश निहारलनि आ कहलनि – “के हमर कान मे अमृत-समान वचन सुनेलक अछि ? जेहो हो, ओ हमर नजरिक सोझाँ मे आबय आ सबटा हाल सुनाबय; ओ आब नुकायल नहि रहय ।” ई सुनिकय हम दूरहि सँ हुनका प्रणाम कयलहुँ आ हुनकर सोझाँ मे हाथ जोड़िकय ठाढ़ भ’ गेलहुँ । छोट वानरक रूप मे हम रामक वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनेलहुँ । सीता हमर परिचय आ नाम पुछलनि तथा जिज्ञासा कयलनि जे मानव आ वानर केर बीच केना संगति भेल ? सीता जतेको बेर जे-जे हाल पुछलनि, हम बेर-बेर हुनका से सब सुना देलियनि । अपनेक देल पहिचानक निशानी मुद्रिका देलियनि । तखन सीताक मोन मे प्रतीति (विश्वास) भेलनि ।” ॥२४७-२६५॥
।घनाक्षरी छन्द।
गञ्जन ताड़न राक्षसीक सहै पड़इछ, एहन विपति पड़उन जनु अनका ॥२६६॥
हमर विपत्ति देखतहिँ छीय अपनहुँ, सपनहुँ चैन नहि दिन राति मनकाँ ॥२६७॥
जनु मनु राखथु अपराध किछु, निवेदन कय देब धरणी-धरण काँ ॥२६८॥
सकरुण सजल-नयन देवी कहलनि, कहबनि अहाँ कपि विपति-हरण काँ ॥२६९॥
भावार्थः
तखन सीता हमरा सँ कहलनि – हमरा राक्षसी सभक गञ्जन (डाँट-फटकार) आ ताड़न (अनेक तरहक हिन्सक व्यवहार सब) सहय पड़ैत अछि । एहेन विपत्ति केकरहु (दोसर) पर नहि आबय । हमर विपत्ति त अहाँ स्वयं देखिते छी, दिन-राति सपनहुँ मे चित्त चैन (शान्त) नहि होइत अछि । राजा रामचन्द्र सँ निवेदन कय देब जे हमर कोनो अपराध मोन मे नहि राखथि ।” नोर भरल आँखि सँ करुण स्वर मे देवी कहलनि – “ई समाद विपत्ति केँ हरण करनिहार राम केँ सुनेबनि ।” ॥२६६-२६९॥
।चौपाइ।
सीता-वचन करुण-परिपूर । शुनि शुनि कि करब से नहि फूर ॥२७०॥
हे प्रभु कहलहुँ बहुत बुझाय । तनि घन-नयन न नीर सुखाय ॥२७१॥
कर औँठी कङ्कण प्रभु-हाथ । तुअ वियोग भृश कृश रघुनाथ ॥२७२॥
जायब अभिज्ञान काँ पाय । देल जाय श्रीजानकि माय ॥२७३॥
चूड़ामणि देलनि कहि कानि । कत हम कयल विरञ्चिक हानि ॥२७४॥
वासवसुत वायस वनवास । खल छल पहुँचल मन निस्त्रास ॥२७५॥
फल भल पौलनि स्वामि-समीप । भय भ्रमि अयला सातो दीप ॥२७६॥
अति सामर्थ्य प्रभुक सभ काल । के थिक दुर्न्नय खल दशभाल ॥२७७॥
प्रभु-पत्नी पाबिय दुख घोर । जलधर जितल अखण्डित नोर ॥२७८॥
देवर काँ हम वचन कठोर । कहल तकर फल भेल न थोर ॥२७९॥
अनुचित क्षमा करत के आन । कहब दयामय देवर-कान ॥२८०॥
संकट सौँ लय जाथि छोड़ाय । प्रभुक अनुज से करथु उपाय ॥२८१॥
चलि नहि रहि नहि हा तहिठाम । आज्ञा बिनु कत करु सङ्ग्राम ॥२८२॥
विकल स्वामिनी-दशा निहारि । चलयित कयलहुँ बिपिन उजारि ॥२८३॥
भेल लड़ाई तहाँ घमसान । बहुत वीर समरहिं निःप्रान ॥२८४॥
दशवदनक सुत अक्षय कुमार । हमरहि सौँ तनिकर संहार ॥२८५॥
मेघनाद आयल खिसिआय । रण-निर्ज्जित कयलक अन्याय ॥२८६॥
ब्रह्मास्त्रक से कयल प्रयोग । बाँधल गेलहुँ कयल दुख-भोग ॥२८७॥
लङ्का मे सञ्चित घृत तेल । हमरा बालधि अर्प्पित भेल ॥२८८॥
सन ओ वसन लपेटल पूछ । मन जरि जायत वानर तूछ ॥२८९॥
प्रभु-प्रताप नहि मानल हारि । सगर नगर घर देल हम जारि ॥२९०॥
भावार्थः
सीताक करुणा भरल बात सुनि-सुनिकय बुझि नहि पेलहुँ जे कि करू । हे राम, हम हुनका बहुते बुझेलहुँ-सुझेलहुँ, मुदा हुनकर आँखि सँ नोर सुखेबाक नाम नहि लैत छल । तखन हम कहलियनि – रामक हाथक औंठी आब हुनकर कंगन बनि गेलनि अछि कियैक तँ अहाँक विरह मे राम बहुते दुब्बर भ’ गेला अछि । अहाँ सँ किछु निशानी (पहिचानक चिह्न) लय केँ जायब । हे माता जानकी, किछु पहिचानक निशानी देल जाउ ।” ई सुनिकय सीता कनिते अपन चूड़ामणि (टीका) उतारिकय देलनि आ कहलनि – ‘हम ब्रह्मा (विधाता) केर कि बिगाड़लियनि ? वनवासक समय इन्द्रक बेटा दुष्ट जयन्त निर्भीक भ’ कौआक रूप मे आयल छल । राम सँ ओकरा नीक सीख भेटलैक । डरक मारे सातो द्वीप भटैक आयल । सब काल मे रामक सामर्थ्य अपरम्पार छन्हि । हुनका आगू कुविचारी दुष्ट रावण कि अछि ! वैह रामक पत्नी भ’ हम घोर दुःख पाबि रहल छी । हमर अविरल अश्रु-प्रवाह मेघो केँ जीति लेलक । हम अपन दिअर लक्ष्मण केँ कटु वचन कहने रहियनि, तेकरे ई खराब फल भोगि रहल छी । रामक छोट भाइ लक्ष्मण आब एहेन उपाय करथि जाहि सँ राम हमरा एहि संकट सँ उबारिकय लय जाइथ । ओतय सँ हमरा नहि चलिते बनैत छल, आ न रहिते । आज्ञाक बिना लड़ाइ सेहो केना ठनितहुँ । हम सीताक दशा देखि खिन्न भ’ गेलहुँ आर चलैत-चलैत अशोक वाटिका उजाड़ि देलहुँ । ओतय घमासान लड़ाइ भेल । बहुते रास वीर सब लड़ाइक मैदाने मे निष्प्राण भ’ गेल – मारल गेल । रावणक बेटा अक्षयकुमार हमरहि हाथ सँ मारल गेल । तखन क्रोधित भ’ कय मेघनाद आयल आ ओ अन्यायपूर्वक हमरा परास्त कयलक । ओ ब्रह्मास्त्र चला देलक । हम ओहि मे बन्हा गेलहुँ आ दुःख-भोग करय लगलहुँ । तखन लंका मे घी आ तेल सब जमा कयल गेल । हमर पूँछ मे पटुआ आ कपड़ा सब लपेटल गेल आ ओकरा तेल सँ भिजायल गेल आ ई सोचिकय ओहि मे आगि लगा देल गेल जे ई तुच्छ वानर ओहि मे जरिकय मरि जायत । रामक प्रताप सँ हम हारलहुँ नहि । हम नगर भरिक सबटा भवन केँ जरा देलहुँ ।” ॥२७०-२९०॥
।सोरठा।
कर्म्म करत के आन, सुरदुर्ल्लभ हनुमान सन ॥२९१॥
हित अहँक समान, सजल-नयन रघुनाथ कह ॥२९२॥
अतिसाहसधर वीर, अविरल भक्तिक भवन अहँ ॥२९३॥
पिता अहाँक समीर, जगत्प्राण-सुत उचित थिक ॥२९४॥
भावार्थः
सुनिकय रामक आँखि मे हर्षक नोर भरि गेलनि आ ओ बजलाह – “अहाँ जेहेन काज कयलहुँ ओ अहाँक सिवाय दोसर के सकैत अछि ? देवता सभक लेल एना करब कठिन अछि । अहाँ समान हमर हितकारी आर के अछि ? अहाँ परम साहसी आ वीर छी । अहाँ अविरल (अटूट) भक्तिक खान छी । अहाँक पिता वायु छथि जे ‘जगत-प्राण’ कहबैत छथि, एहेन पिताक पुत्र लेल ई उचिते अछि ॥२९१-२९४॥
।घनाक्षरी।
नाव अरि लाब नहि, उतरक दाब नहि ॥२९५॥
एक बुद्धि आब नहि सागर अपार मे ॥२९६॥
वीर अरि छोट नहि, सङ्ग एक गोट नहि ॥२९७॥
लङ्का लघु कोट नहि विदित संसार मे ॥२९८॥
दनुज अबल नहि, पुरी गम्य थल नहि ॥२९९॥
प्रदेश अमल्ल नहि युद्धक विचार मे ॥३००॥
अहाँक समान महि वीर हनुमान नहि ॥३०१॥
सर्व्वस्वक दान नहि तूल उपकार मे ॥३०२॥
भावार्थः
नाव उपलब्ध नहि अछि । पार उतरबाक कोनो दाव (रास्ता) नहि अछि । एहि अपार सागर मे कोनो बुद्धि काज नहि आबि रहल अछि । दुश्मन मामूली वीर नहि अछि । संग दयवला कियो नहि अछि । संसार मे प्रसिद्ध अछि जे लंका कोनो छोट किला नहि छी । राक्षस अबल (कमजोर) नहि अछि । लंकापुरी गेनाय आसान नहि अछि । युद्धक मामिला मे लंका अमल्ल (वीर योद्धा सब सँ खाली) नहि अछि । हे हनुमान, अहाँक समान धरती पर आर कियो वीर नहि अछि, आर सर्वस्व केर दान पर्यन्त परोपकारक तुल्य नहि होइत अछि ॥२९५-३०२॥
॥इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिलाभाषा-रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुर्थोध्यायस्समाप्तः ॥
॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे सुन्दरकाण्ड केर चारिम अध्याय समाप्त भेल॥
॥सुन्दरकाण्ड समाप्त॥
हरिः हरः!!

2 Comments
Aahahaha
Eh poora paidh mon bhav bibhor bho gel. Hnuman jee k Lanka ja k Sita jee k khoj aa raksh sabsan kel tndab, fer wpas aabhi k Prabhu k sab brirant kahi k bujhelkhin.
Prabhu kahal je Hanuman aha san ehi dharadham par aan keyo nai je ehan kaaj ko sktah
कर्म्म करत के आन, सुरदुर्ल्लभ हनुमान सन ॥२९१॥
हित अहँक समान, सजल-नयन रघुनाथ कह ॥२९२॥
अतिसाहसधर वीर, अविरल भक्तिक भवन अहँ ॥२९३॥
पिता अहाँक समीर, जगत्प्राण-सुत उचित थिक ॥२९४॥
शतशः साधुवाद।
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