स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण
किष्किन्धाकाण्ड – छठम अध्याय
सुग्रीव द्वारा अपन सेनाक श्री रामजी सँ परिचय तथा सेनाक प्रस्थान
।रूपक घनाक्षरी।
।तीरभुक्तिसङ्गीतरीत्या कानरा-राजविजय छन्दः।
अजिन-वसन शुचि नवघन-सम रुचि, कमल-नयन हसयित मुख परसन ॥१॥
रघुवर गिरिगुहा पुर थित छला भन, वैदेही-विरह-जर जनु जरजर सन ॥२॥
लक्ष्मण कपिवर चरण प्रणति कर, वानर-निकर प्रमुदित शुभ-दरशन ॥३॥
जटिल सुभग तन-रुचि-शशिसन, खग मृग प्रमुदित प्रभु रघुवर सन ॥४॥
भावार्थः
स्वच्छ मृगचर्म पहिरने छथि, नव मेघ-समान श्यामल रंग छन्हि, कमल-जेहेन आँखि छन्हि, मुखमंडल मुस्कान-भरल प्रसन्न छन्हि, सीताक विरह सँ शरीर जर्जर-सन भेल छन्हि, एहेन रामचन्द्र पर्वतक खोह मे सुशोभित रूप सँ विराजमान छथि । लक्ष्मण आ हनुमान चरण पर प्रणत छथि, वानर सभक दल कल्याणकारी दर्शन पाबिकय प्रसन्न अछि, माथा पर जटा छन्हि, सुन्दर शरीर सुर्य आ चन्द्रमा समान चमकि रहल छन्हि, पशु व पक्षी सब सेहो प्रमुदित अछि । सभक कामना एतबे अछि जे स्वामी होइथ तँ राम-जेहेन होइथ ॥१-४॥
।रूपमाला।
चरण पड़ल निहारि कपि-पति हृदय लेल लगाय ॥५॥
कुशल पुछलनि राम प्रभु, बैसलाह आज्ञा पाय ॥६॥
तखन पुन रघुनाथ काँ से, कहल दुहु कर जोड़ि ॥७॥
चमृ आइलि वानरी रघुनाथ अछि नहि थोड़ि ॥८॥
काम-रूपी द्वीप द्वीपक, विकट मर्क्कट लोक ॥९॥
पर्व्वतोपम युद्धमे, अरि कय शकथि नहि रोक ॥१०॥
देव-सम्भव अमित-बल सभ, अभय नानाकार ॥११॥
युद्ध करबाँ सतत उद्यत, सहि न शकु महि भार ॥१२॥
प्रभुक आज्ञा पाल फल दल, मूल सभकाँ भक्ष्य ॥१३॥
दैत्य दानव प्रभृति हिनका, युद्धमे नहि लक्ष्य ॥१४॥
जाम्बवान सुबुद्धि ऋक्षक, अधिप मन्त्रि महान ॥१५॥
कोटिशः भल्लूक वशमे, आन कहल कि मान ॥१६॥
वायु-पुत्र पवित्र मन्त्री, हिनक अद्भुत कार्य्य ॥१७॥
वायु-बलक समान-बल छथि, समर मे अनिवार्य्य ॥१८॥
नील नल गवयादि अङ्गद, मादनादि सुवीर ॥१९॥
शरभ मैन्दव गज पनस ओ, बली दधिमुख धीर ॥२०॥
तार नाम सुषेण केसरि, विश्व के नहि जान ॥२१॥
महाबल जनिके कहल छल, पुत्र छथि हनुमान ॥२२॥
एक एकक कोटि सेना, कहल यूथप नाम ॥२३॥
ई प्रधानैँ कहल अछि छथि, अति कुशल सङ्ग्राम ॥२४॥
बालिपुत्र महाबली छथि, हिनक समुचित चालि ॥२५॥
थिकथि राक्षस कुलक अन्तक, सोपि गेला बालि ॥२६॥
सकल सेना सहित प्रज्ञा, करथि आज्ञा नाथ ॥२७॥
हमर नाम निमित्त मात्रक, विजय प्रभुवर हाथ ॥२८॥
राम शुनि हर्षाश्रु लोचन, कहल हृदय लगाय ॥२९॥
मित्र सभटा अहँ जनैछी, करक तकर उपाय ॥३०॥
तखन शुनि सुग्रीव दश दिश, कपि पठावल वीर ॥३१॥
कहल दक्षिण दिश विशेषैँ, जाथि सभ रणधीर ॥३२॥
बालि-सुत-युत मरुत-सुत ओ, जाम्बवान महान ॥३३॥
नल सुषेण ओ शरभ मैन्दव, द्विविद करथु प्रयाण ॥३४॥
यत्नसौँ सभ जानकी केँ, ताकि केँ भरि मास ॥३५॥
अन्यथा दिन एक बीतत, प्राणकाँ बुझु त्रास ॥३६॥
भावार्थः
कपीश सुग्रीव केँ प्रभु रामक पैर पर पड़ल देखि छाती सँ लगा लेलनि, आर हाल-समाचार पुछलनि । सुग्रीव आज्ञा पाबि (यथासन पर) बैसि रहलाह । फेर ओ दुनू हाथ जोड़िकय राम सँ कहलनि – “हे प्रभु ! वानरक भारी सेना आबि गेल अछि । ई वानर सैनिक विभिन्न द्वीप सब सँ आयल अछि आ अत्यन्त विकट अछि । लड़ाइ मे ई सब पहाड़क समान अचल अछि । एकरा सब केँ दुश्मन रोकि नहि सकैत छैक । एकरा सब केँ देवता लोकनि सँ असीम बल भेटल छैक, भाँति-भाँति केर अभय वर भेटल छैक । ई सब हमेशा लड़ाइ लेल तैयार रहैत अछि । पृथ्वी एकरा सभक भार नहि सहि सकैत छथि । ई सब अपनेक आज्ञाक पालन करयवला अछि । ई सब कन्द-मूल-फल आ पत्ता खाकय रहैत अछि । लड़ाइ मे दैत्य-दानव आदि कियो एकरा सभक सामना नहि कय सकैछ । ई भालू जाम्बवान थिकाह जे बुद्धिमान छथि आ हमर महामंत्री थिकथि । हिनकर वश मे करोड़ों भालू छन्हि जे कियो दोसरक आज्ञा नहि मानैछ । ई पवनसुत हनुमान थिकाह । ई हमर परम विश्वसनीय मंत्री थिकथि । हिनकर करतूत अद्भुत छन्हि । हिनक बल वायुक समान छन्हि । लड़ाइ मे हिनका कियो रोकि नहि सकैत अछि । हिनक अलावा नील, नल, गबय, अंगद, मादन, शरभ, मैन्दव, गज, पनस, दधिमुख आदि धीर-वीर सैनिक लोकनि छथि । सिंहक समान सुषेण छथि, जिनकर नाम विश्व भरि मे के नहि जनैछ । हिनकहि पुत्र महाबली हनुमान छथि । एक-एक केर अधीन मे एक-एक करोड़ सेना अछि, हम त केवल सेनापति लोकनिक नाम गनेलहुँ । इहो नाम सब मुख्य-मुख्य केर मात्र कहल गेल अछि जे लड़ाइ मे बहुत कुशल छथि । ई छथि बालिक पुत्र परमबलवान् अंगद, जे सदा सन्मार्ग पर चलयवला छथि । ई राक्षस-कुल केँ समाप्त करयवला छथि । बालि हिनका सौंपि गेल छथि । ई समूचा सेना बहुते समझदार अछि । अपने जेना आज्ञा करब, ई सब ताहि टाक पालन करत । हमर नाम त निमित्त मात्र अछि । विजय अपनहिंक हाथ मे अछि ।” ॥५-२८॥
राम सुग्रीवक बात सुनलनि । हर्ष सँ हुनकर आँखि मे नोर आबि गेलनि । हृदय सँ लगाकय ओ कहलनि – “हे मित्र, अहाँ सब किछु जनैत छी । आब जे उपाय करबाक हो से करू ।” ई सुनिकय सुग्रीव दसो दिशा मे वीर वानर सब केँ पठौलनि । आर हुनका सब सँ कहलनि – “अहाँ लोकनि दक्षिण देश मे विशेष रूप सँ जाउ । बालिक पुत्र अंगद, पवनपुत्र हनुमान, जाम्बवान, नल, सुषेण, शरभ, मैन्दव आ द्विविद – ई सब प्रयाण करथि । सब कियो यत्नपूर्वक जानकी केँ ताकिकय एक मासक भीतर खबरि करथि; एहि सँ आगू एको दिन बितत तँ जान पर खतरा बुझब ।” ॥२९-३६॥
।चौपाइ।
वानर-वीर कपीश पठाय । बइसला विनत राम लग जाय ॥३७॥
मारुत-सुत काँ कहलनि राम । ई मुद्रा अछि अङ्कित नाम ॥३८॥
यतनैँ सौँ लिय सङ्ग लगाय । देब जनकजाकाँ अहँ जाय ॥३९॥
अहँ का सतत रहत कल्याण । अहँक समान सूझ नहि आन ॥४०॥
अपन नीक जानब से करब । कालहुँ सौँ संग्राम न डरब ॥४१॥
प्रभु-आशिष मारुति फल पाब । विश्व-विजय बल पाओल आब ॥४२॥
अङ्गद आदि चलल मिलि सङ्ग । कोटि कोटि गुण बल बढ़ अङ्ग ॥४३॥
फिरइत वन राक्षस जे भेट । तनिक प्राण हर मार चपेट ॥४४॥
श्रमसौँ क्षुधा-तृषातुर भाख । आब प्राण परमेश्वर राख ॥४५॥
देखल सभ गह्वर बड़ बेश । लता गुल्म तृण आवृत देश ॥४६॥
क्रौञ्च हंसगण तीतल पाँखि । देखल सब जन निज निज आँखि ॥४७॥
तेहि अभ्यन्तर जल अनुमान । पैशल विवर आगु हनुमान ॥४८॥
बहुत दूर छल निविड़ अन्धार । हाथैँ हाथ धयल गेल पार ॥४९॥
देखल जलाशय मणि-सम नीर । कल्पवृक्ष-सम तरुवर तीर ॥५०॥
फलसौँ नमित भरल मधुमार । कपि-सेनागन हर्ष अपार ॥५१॥
सभ गुण भरल देखल एक गाम । एक गोट नहि लोकक नाम ॥५२॥
कनकासन बैसलि एक नारि । अपन कान्ति सौँ जोति पसारि ॥५३॥
ध्यानावस्थ योगिनी जानि । की थिक विषय कि बुझ अनुमानि ॥५४॥
भक्ति भीति सौँ कयल प्रणाम । के अहाँ थिकहुँ कहू निज नाम ॥५५॥
त्यागि समाधि सुबुद्धि विचारि । सभकाँ देखल पलक उघारि ॥५६॥
देखितहि कहल दिव्य अवतारि । आश्रम करु जनु हमर उजारि ॥५७॥
कहँसौँ ककर पठावल दूत । लोचन-गोचर वीर बहूत ॥५८॥
शुनि कहलनि उत्तर हनुमान । पुरी अयोध्याधिप श्रीमान ॥५९॥
दशरथ नृपक जेठ सुत राम । शुनितहि होयब हुनकर नाम ॥६०॥
पिता-वचन वन नारि-समेत । अयला सानुज सत्य-निकेत ॥६१॥
रावण हरलक तनिकर नारि । किछु दिन बितलय होएत मारि ॥६२॥
सुग्रीवक सँग मैत्री बेश । सभ चललहुँ सीताक उदेश ॥६३॥
धन्यतमा अपनेँ केँ जानि । आश्रम अयलहुँ पीबय पानि ॥६४॥
के अपनैँ देवि कारण कोन । कहू तखन बरु साधब मौन ॥६५॥
कहल यथेच्छित फल भल खाउ । कहब स्वस्थ जल पिबि पिबि आउ ॥६६॥
फलाहारकैँ पिउलनि पानि । अयलहुँ सभ जन योगिनि जानि ॥६७॥
सभ जन नम्र जोड़ि दुहु हाथ । देवि सत्य कहु करु जनु लाथ ॥६८॥
विश्वकर्म्म काँ हेमा नाम । पुत्री जानथि उत्तम साम ॥६९॥
नृत्य-तुष्ट शङ्कर वृषकेतु । ई पुर देलनि हेमा हेतु ॥७०॥
दश अयुतायुत बसयित भेलि । तदुपरि ब्रह्मपुरी चलि गेलि ॥७१॥
चलयित हमरा से सन्मानि । विष्णु-भक्ति-रति सहचरि जानि ॥७२॥
कहलनि सखि तप करु यहिठाम । लाभ तपस्या-फल परिणाम ॥७३॥
त्रेतायुग रामक अवतार । हरता से प्रभु पृथिवी-भार ॥७४॥
सीतान्वेषक वानर जखन । देखब पूर्ण मनोरथ तखन ॥७५॥
योगि-गम्य श्रीविष्णुक गेह । जायब अयि सखि निस्सन्देह ॥७६॥
एकसरि रहलहुँ सखि-उपदेश । अपनहुँ अयलहुँ कयलहुँ बेश ॥७७॥
स्वयम्प्रभा थिक हमरो नाम । देखब जाय आइ श्रीराम ॥७८॥
मुद्रित करु कपि सभ जन आँखि । तप-बल हम देब बाहर राखि ॥७९॥
यहि गत सभ जन से वन देख । हेमा-कर्म्म अलौकिक लेख ॥८०॥
से पहुँचलि सानुज जत राम । भक्ति प्रदक्षिण कयल प्रणाम ॥८१॥
भावार्थः
सुग्रीव वीर वानर सब केँ प्रयाण करबाक आज्ञा दय कय नम्र भ’ रामक लग मे बैसलाह । राम जाइत समय हनुमान सँ कहलनि – “ई औंठी लिय’ । एहि मे हमर नाम लिखल अछि । एकरा हिफाजत सँ अपना लग राखू आ जाकय जानकी केँ देबनि । अहाँक सदा कल्याण होयत । अहाँ समान सूझ-बूझवला दोसर नहि अछि । जाहि मे अपन हित देखब सैह करब । लड़ाइ मे कालहुँ सँ नहि डरायब ।” ॥३७-४१॥
पवनसुत हनुमान रामक आशीष अनुरूप फल पेलनि आ आब हुनका मे दुनिया केँ जीति लेबाक ताकत आबि गेलनि । अंगद आदि मिलिकय चलि पड़लाह आ हुनका सभक शरीर मे बल करोड़ों गुना बढ़ि गेलनि । वन मे घूमैत समय हुनका सब केँ जे राक्षस भेटैत छलन्हि ओकरा चपेट मे लय केँ मारि दैत छलथि ॥४२-४४॥
स्वयंप्रभा केँ रामक दर्शन आ मोक्ष
थाकिकय सब वानर भूख आ प्यास सँ व्याकुल भ’ बाजय लगलाह, “हे ईश्वर, आब हमरा सभक जान बचाउ । सब गोटे एकटा बड पैघ खोह देखलनि जे झाड़-फूल आ लता सब सँ भरल छल । ओतय सब गोटे अपन आँखि सँ क्रौंच (सारस) एवं हंस सभक पाँखि भीजल देखलनि । एहि सँ अनुमान भेलनि जे ओहि खोहक भीतर कतहु जलाशय अछि । हनुमान केँ आगू कय केँ सब गोटे ओहि खोह मे पैसलाह । बहुत दूर धरि घनघोर अन्हार पसरल छल । हाथ सँ हाथ जोड़िकय ओहि अन्हरिया केँ पार करय जाय गेलाह । तखन एकटा जलाशय देखलनि, जेकर पानि नीलम-सन हरियर छल । ओकर किनार पर कल्पवृक्ष समान सुन्दर-सुन्दर गाछ सब लागल छल । से गाछ सब मीठ फल सब सँ लदल छल । देखिकय वानरी सेना बड खुश भेल । ओतय सब सुख-सुविधा सँ भरल-पुरल एकटा गाम देखलनि, मुदा ओतय एको गोट आदमी नहि छल । मात्र एकटा महिला सोनाक आसन पर बैसल रहथि आ अपन सौन्दर्य सँ अपन चमक पसारि रहल छलथि । ओ (वानर) सब हुनका ध्यान मे लीन योगिनी बुझलनि, मुदा बात कि छैक, से अनुमान सँ बुझि नहि सकलाह । डराइते भक्ति-भाव सँ हुनका प्रणाम कयलनि आ पुछलनि – “हे देवी, अपने के थिकहुँ ? अपन नाम बताउ ।” ॥४५-५५॥
ओ (महिला) समाधि तोड़िकय आ आँखिक पलक उठाकय मनोयोग सँ सब केँ देखलिह । देखिते ओ बजलिह – “हे दिव्य अवतार लोकनि, हमर आश्रय केँ अहाँ सब उजाड़ू जुनि । अहाँ बहुते-रास वीर लोकनि हमर सोझाँ अयलहुँ अछि । अहाँ सब कतय सँ आयल छी ? के पठौलनि अछि ?” ई सुनिकय हनुमानजी उत्तर देलनि – “अयोध्याक राजा दशरथक ज्येष्ठ पुत्र श्री राम छथि जिनकर नाम अपने सुननहि होयब । ओ सत्यनिष्ठ राम पिताक आज्ञा सँ स्त्री आ छोट भाइक संग वनवास करय आयल छथि । रावण हुनक स्त्रीक हरण कय लेलक अछि । आब किछु दिन मे लड़ाइ होयत । राजा सुग्रीवक संग हुनकर गहींर मित्रता भेलनि अछि । हम सब सीता केँ खोजय वास्ते चलल छी । अपने केँ परम धन्य बुझिकय हम सब पानि पिबय लेल अपनेक आश्रम मे आयल छी । हे देवी, ‘अपने के थिकहुँ ?’ कोन कारण सँ एतय तपस्या कय रहल छी ? हमरा सब केँ एतेक बता देल जाउ, फेर अपन तपस्या मे लीन भ’ जायब ।” ॥५६-६५॥
ओ महिला कहलिह – “पहिने अपने लोकनि जी-भरिकय (भरि इच्छा) फल खाउ आ पानि पीबिकय स्वस्थ भ’ जाउ तखन बतबैत छी ।” वानर सब फल खा-खाकय पानि पिलनि । फेर हनुमानजी कहलनि – “हम सब अपने केँ योगिनी बुझिकय एतय अयलहुँ । हम सब हाथ जोड़ि नम्र बनि अपनेक सोझाँ मे ठाढ़ छी । अपने बिना कोनो दूराव केँ सत्य-सत्य बताउ ।” ओ महिला कहलिह – “सुनू । विश्वकर्माक हेमा नामक एकटा बेटी छलथिन । ओ साम-गान मे प्रवीण छलथिन । हुनक नृत्य सँ प्रसन्न भ’ भगवान शिव ई नगर हुनका देलथिन । ओ एहि नगर मे करोड़ों वर्ष धरि निवास कयलिह, तेकर बाद ब्रह्मलोक चलि गेलिह । जाइत समय ओ हमरा विष्णुक भक्ति मे लागल अपन सहचरी बुझिकय सम्मानपूर्वक कहलिह – ‘हे सखी, अहाँ एतहि रहिकय तपस्या करू, अन्त मे एहि तपस्याक उत्तम फल भेटत । त्रेतायुग मे राम अवतार लेताह आ पृथ्वीक भार हरण करताह । जखन अहाँ सीताक खोज मे निकलल वानर सब केँ देखब, तखन अहाँक कामना पूर्ण भ’ जायत । हे सखी, अहाँ अवश्य विष्णु-लोक केँ प्राप्त करब जाहिठाम योगी सब मात्र पहुँचि सकैत छथि ।’ सहचरीक एहि उपदेश अनुसार हम एतय असगरे रहय लगलहुँ । अपने सब एतय अयलहुँ, से बड नीक कयलहुँ । हमर नाम अछि स्वयंप्रभा । हम आइ जाय कय श्री राम केर दर्शन करब । हे वीर वानर लोकनि, अहाँ सब आँखि मुँदि लियह । हम तपस्याक बल सँ अहाँ सब केँ बाहर पहुँचा देब ।” ॥६६-७९॥
एहि तरहें सब गोटे ओ वन देखलनि आ हेमाक अद्भुत करनी केँ देखलनि । स्वयंप्रभा ओतय पहुँचि गेलिह जेतय लक्ष्मण-सहित राम छलथि । भक्तिपूर्वक रामक प्रदक्षिण कयकेँ प्रणाम कयलनि ॥८०-८१॥
।मौक्तिकछन्दः।
हरे रघुनन्दन सानुज राम, विभा कमनीयतनी जितकाम ॥८२॥
अनन्यवदान्यतयावितभक्त, स्वयन्न जगत्स्वरनुरक्तविरक्त ॥८३॥
भावार्थः
“हे हरि, हे रघुनन्दन लक्ष्मण-सहित राम, चमक सँ अहाँक शरीर सुन्दर लगैत अछि, अहाँ काम केँ जितलहुँ अछि, अहाँ असाधारण उदारता सँ अपन भक्त सभक पालन करैत छी, अहाँ स्वयं संसार मे अनुरक्त नहि छी, बल्कि रागहीन छी ।” ॥८२-८३॥
।दोहा।
भक्ति-योग-लाभैँ बसलि, बदरीवन तप लागि ॥८४॥
गेलि दिव्य गति योगिनी, अन्त देह परित्यागि ॥८५॥
भावार्थः
स्वयंप्रभा केँ भक्तियोग भेटलनि आ ओ बदरीवन मे जाकय तप करय लगलिह । अन्त मे ओ योगिनी देहक त्याग कय केँ दिव्य धाम पहुँचि गेलिह ॥८४-८५॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे षष्ठोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायणक किष्किन्धाकाण्डक छठम अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

2 Comments
Bahut sundar varnan. Jahi m sugrib apan sena sange Prabhu k darsan ko aadesh lo bida bhelah. Prabhu senapati Hnuman k Ram Name bala Vastra delkhin jahi san Mata Janki hunka sahjai pahichan jethin aa kahalkhin aha apan sujhbijh san faisla karav. Fer bida bho gelah.
Bich m ego Aashram bhetal jahi m Swemprabha namak ego yogini bhetlkhin hunka aadesh pabi ohitham khoob fal fool sab sena kogelaith aa bhair pok pain pilaith. O kahalkhin je Vishwakarma jee ke ego beti chhalkhin hunkar name hema chhlain . O nitriye vidya m pravin chhalkhin huna san Shiv prasan bho eh nagar hunka do delkhin aa o oto karoro barsh rahi k brahma lok chail gelih. Takha hamra Vishnu Bhajta buijh eh nagar hamra do chail gelih. O kahlith aha ethi rahu aha k treta yug m ekar paigh fal bhetat. Treta yug m bhagban jnm letah aha k hunkar sena bhent het t ahan k fal poora hoyat. Aai hom ja tapsya k bal par Ram k darshan karav aha sb ankhi muin liyo. Hom aha k ohi jangal san bahar ko dev. Bahut sundar varnan.
Fer sena sb apan kaaj k bare m batelkhin aa tahan o yogini apna bare m kahalkhin je hom.
भक्ति-योग-लाभैँ बसलि, बदरीवन तप लागि ॥८४॥
गेलि दिव्य गति योगिनी, अन्त देह परित्यागि ॥८५॥
Bahut sundar varnan. Jahi m sugrib apan sena sange Prabhu k darsan ko aadesh lo bida bhelah. Prabhu senapati Hnuman k Ram Name bala Vastra delkhin jahi san Mata Janki hunka sahjai pahichan jethin aa kahalkhin aha apan sujhbijh san faisla karav. Fer bida bho gelah.
Bich m ego Aashram bhetal jahi m Swemprabha namak ego yogini bhetlkhin hunka aadesh pabi ohitham khoob fal fool sab sena kogelaith aa bhair pok pain pilaith. O kahalkhin je Vishwakarma jee ke ego beti chhalkhin hunkar name hema chhlain . O nitriye vidya m pravin chhalkhin huna san Shiv prasan bho eh nagar hunka do delkhin aa o oto karoro barsh rahi k brahma lok chail gelih. Takha hamra Vishnu Bhajta buijh eh nagar hamra do chail gelih. O kahlith aha ethi rahu aha k treta yug m ekar paigh fal bhetat. Treta yug m bhagban jnm letah aha k hunkar sena bhent het t ahan k fal poora hoyat. Aai hom ja tapsya k bal par Ram k darshan karav aha sb ankhi muin liyo. Hom aha k ohi jangal san bahar ko dev. Bahut sundar varnan.
Fer sena sb apan kaaj k bare m batelkhin aa tahan o yogini apna bare m kahalkhin je hom. भक्ति-योग-लाभैँ बसलि, बदरीवन तप लागि ॥८४॥
गेलि दिव्य गति योगिनी, अन्त देह परित्यागि ॥८५॥
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