स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
किष्किन्धाकाण्ड – तेसर अध्याय
ताराक विलाप, राम द्वारा उपदेश
।दोबय छन्दः।
वानरवृन्द बालि-वध देखल विकल कहल शुनु रानी ॥१॥
रामक बाण बिधुन्तुद विघसित बालि पूर्ण विधु जानी ॥२॥
कोट-कपाट द्वार ठिक ठोकब वानर रोकब बाटे ॥३॥
वानरेन्द्र अङ्गदकाँ मानब सुग्रीवक कुल काँटे ॥४॥
सचिव सकल सह रहस विचारिय सोदर-द्रोही मारू ॥५॥
वीरवधू प्रिय-विरहिनि विकले विश्व अनित्य विचारू ॥६॥
सकल कला लय काल क्रूर जौँ करता कलह कठोरे ॥७॥
वानरेन्द्र-विश्लेषित वानर समर नाम नहि बोरे ॥८॥
भावार्थः
वानर सब बालिक वध देखि दुःखी भ’ रानी तारा सँ कहलक – “रामक बाणरूपी राहु बालिरूपी पूर्णचन्द्र केँ खा गेल । किलाक फाटक नीक जेकाँ बन्द कय देल जायत । वानर सब रस्ते मे रोकि देल जायत । अंगद केँ वानर सभक राजा मानल जायत । ओ सुग्रीवक वंश लेल काँट होयत । सारा मंत्री सब एकान्त मे राय-सलाह कयल जाय जे केना सहोदर भाइ दुश्मन सुग्रीव केँ मारल जाय । हे वीरबधू, अहाँ पतिक विरह सँ विकल छी, मुदा एहि शोक केँ ‘ई संसार अनित्य छी’ एना सोचिकय छोड़ि देल जाउ । यदि क्रूर कालहु अपन पूरा ताकत लगाकय हमरा संग लड़ाइ करत त वानरराज बालिक चलि गेला पर वानरदल लड़ाइ मे अपन नाम नहि बुड़ायत ॥१-८॥
।सोरठा।
बालि-मरण शुनि कान, विपतलि निपतित क्षिति मुरुछि ॥९॥
तारा तारा भान, प्रात जहन अरुणित गगन ॥१०॥
भावार्थः
बालिक मरबाक समाचार सुनि विपत्ति मे पड़ि तारा मूर्च्छित भ’ ओहिना निष्प्रभ भ’ धरती पर खसि पड़लिह जेना अरुणोदय भेला पर प्रातःकालक तारा ॥९-१०॥
।चौपाइ।
मुरुछि मुरुछि क्षण मन बिनु ज्ञान । कह विधि बुधि सुधि आनक आन ॥११॥
दुहु कर पीटथि छाती माँथ । धिक धिक जीवन आज अनाथ ॥१२॥
वानरेन्द्र कत गेला त्यागि । हमहूँ जायब तनि संग लागि ॥१३॥
फूजल केश नयन जलधार । चललि विकलि प्रिय-शव अभिसार ॥१४॥
शोणित धूलि अङ्ग परिपूर । देखल मृतक स्वामि-तन शूर ॥१५॥
हा हा नाथ नाथ कहि चरण । धयल कयल पूरण रस करुण ॥१६॥
तारा ततय राम दिशि ताक । करुणाकर किछु अछि कहबाक ॥१७॥
बालि-वक्ष बेधल जे बाण । तहि सौँ लय लिय पापिनि-प्राण ॥१८॥
तकयित हयता तारा-बाट । वल्लभ-विप्रयोग हिय फाट ॥१९॥
बिनु दारा दुख जे परिणाम । अनुभव सब अपनहुँ का राम ॥२०॥
बालिक वदन विलोकब जाय । रघुनन्दन-शर शरण उपाय ॥२१॥
अहं सुग्रीव कयल भल काज । रुमा-सहित सुख भोगू राज ॥२२॥
भावार्थः
तारा दुनू हाथ सँ छाती आ माथ पिटथि आ कहथि – ‘हाय, एहि जीवन केँ धिक्कार अछि । आइ हम अनाथ भ’ गेलहुँ । कपिराज बालि हमरा छोड़ि कतय चलि गेलाह ? हमहुँ हुनकर संग धय केँ जायब ।’ केश खुजि गेलनि (छितरा गेलनि) । आँखि सँ नोरक धार बहय लगलनि । ओ विकल भ’ अपन पतिक लाश देखय चलि पड़लिह । जाकय तारा अपन मरल वीर पतिक लाश केँ देखलिह जे धूरा आ रक्त सँ भरल छल । “हा नाथ ! हा नाथ !” कहैत ओ पतिक चरण धय लेलिह आ करुण रस केँ परिपूर्ण कय देलिह । तखन तारा ओतय ठाढ़ राम दिश निहारलिह आ बजलिह – “हे दयालु प्रभु, हम किछु कहय चाहैत छी । जाहि बाण सँ अपने बालिक छाती केँ बेधलहुँ, ताहि सँ कृपा कय हम पापिनक प्राण सेहो हैरि लियह । बालि ताराक बाट तकैत हेताह । प्रिय-विरह सँ हमर कलेजा फाटि रहल अछि । प्रिय पत्नीक बिना केहेन दुःख होइत छैक तेकर अनुभव तँ हे राम, स्वयं अपनहुँ केँ अछि । हम पति बालिक मुँह देखब, आर एकर सीधा उपाय छैक जे अहाँक बाणक शरण मे जाय । हे सुग्रीव, अहाँ नीक काज कयलहुँ । आब रुमाक संग अहाँ सुखपूर्वक राज्यक भोग करू ॥११-२२॥
।दोबय छन्दः।
हरि हरि से हरि-केहरि किय हरि, हरल सकल सुख-सारा ॥२३॥
किष्किन्धाक कलाकर-कामिनि, हम प्रदोष-तुष-तारा ॥२४॥
विबुध-वैरि-रावण-मद-वारण-विद्रावण मृगराजे ॥२५॥
शिव-शिव शयित समर से उर शर-शल्लित श्रीहत आजे ॥२६॥
भावार्थः
हाय-हाय ! वानर सब मे सिंहक समान पराक्रमी हमर पति केँ हैरिकय अहाँ हमर सुखक जैड़े केँ कियैक उजाड़ि देलहुँ ? हम जे किष्किन्धाक पूर्णिमारूपी कामिनी रही, से साँझक तुच्छ तारा बनि गेलहुँ । जे हमर पति देवता सभक शत्रु रावण केर मदरूपी हाथी केँ भगबय मे सिंहक समान रहथि से आइ, हाय-हाय! शोभाहीन भ’ रणभूमि मे सुतल छथि आर हुनकर हृदय मे बाण भोंकायल छन्हि ।” ॥२३-२६॥
।बानिनी छन्द।
कहल रघुवीर धीर शोक रोक तारा ॥२७॥
दृश्य काँ अनित्य जान बालि के बेचारा ॥२८॥
पूर्व्व जन्म बालिबधू पूर्ण भक्ति तोरा ॥२९॥
दरशन तेँ हमर भेल सुयश लोक सारा ॥३०॥
भावार्थः
राम कहलनि – “हे धैर्यवती तारा, शोक दूर करू । संसार मे जे किछु देखाय दैत अछि, ओ सब अनित्य अछि । फेर बेचारा बालि के थिक जे सब दिन जिबैत रहत ? अहाँ पैछला जन्म मे बालिक स्त्री रही आ हुनका प्रति अहाँक पूरा भक्ति रहय अर्थात् अहाँ पतिव्रता रही । एहि पुण्य सँ अहाँ केँ हमर दर्शन भेल आ अहाँक नाम पतिव्रताक रूप मे दुनिया भरि मे विख्यात भेल ॥२७-३०॥
।दोबय छन्दः।
बलाराति-बालक तोर वल्लभ वानरेन्द्र छल बाली ॥३१॥
वासव-रूप बनल रणविजयी सुरपुर बस बलशाली ॥३२॥
आत्मा अव्यय निर्भय सुखमय देहक दुर्गति खाली ॥३३॥
देख विचार तत्त्व सौँ तारा के तोँ कह दुख-बाली ॥३४॥
भावार्थः
अहाँक पति वानरराज बालि इन्द्रक पुत्र रहथि । ओ एहि शरीर केँ त्यागिकय इन्द्र भ’ गेलाह आ युद्ध मे सदा विजयी एवं परम बलवान इन्द्र बनिकय स्वर्गलोक मे वास कय रहल छथि । आत्मा अव्यय (नित्य, अविनाशी) अछि आ सदा सुखमय अछि । दुःखक अबस्था मे केवल शरीर पहुँचैत अछि । तेँ तात्त्विक विचार कय केँ देखू आ कहू त दुःख पाबयवाली अहाँ के होइत छी ?” ॥३१-३४॥
।सोरठा।
ज्ञान-ज्ञेय रमेश, उपदेष्टा रघुवीर जहँ ॥३५॥
तारा विगत-कलेश, उदित शान्त करुणान्तरस ॥३६॥
भावार्थः
जेतय केवल ज्ञान-मार्ग सँ जानय योग्य स्वयं राम उपदेश देनिहार भेलथि, ताराक सब क्लेश दूर भ’ गेल आ हुनकर हृदय मे करुणा सँ उपर केर शान्त रस उदित भेल तथा ओ प्रार्थना करय लगलिह ॥३५-३६॥
।हंसगति छन्द।
।लावण्य।
जगत जनन पालन प्रचण्ड लय कर्त्ता ॥३७॥
धयल मनुज-अवतार दनुज-संहर्त्ता ॥३८॥
अबला काँ की ज्ञान वियोगिनि आर्त्ता ॥३९॥
त्राहि त्राहि जगदीश जलधिजा-भर्त्ता ॥४०॥
फरकल मोर दृग दक्ष नाथ दृग-वामा ॥४१॥
देवल दृग दुहु गोट शकुन सिधि ठामा ॥४२॥
देल जाय प्रभु चरण-भक्ति अभिरामा ॥४३॥
माँगब आन कि वीर-वधू निष्कामा ॥४४॥
श्री रघुवर घन-क्रान्ति शान्ति उपदेशैँ ॥४५॥
तारा तखन निराश मृतक प्राणेशैँ ॥४६॥
शुनल सकल सुग्रीव रहित से क्लेशैँ ॥४७॥
घनधुनि मुदित मयूरि श्रवन-परवेशैँ ॥४८॥
भावार्थः
“हे राम, अहाँ संसार केँ रचयवला, पोसयवला आ उजाड़यवला छी । अहाँ राक्षस सभक संहारक लेल मानव अवतार ग्रहण कयलहुँ अछि । अबला ज्ञानहीन होइत अछि । हम पतिक विरह सँ व्याकुल छी । हे जगदीश्वर लक्ष्मीपति भगवान ! हमर त्राण करू । हमर दाहिना आँखि आ हमर पतिक बायाँ आँखि फड़कल छल । आर हमर देवर सुग्रीवक दुनू आँखि फड़कल छलन्हि । ई शुभ शकुन थिक जेकर फलस्वरूप अपनेक दर्शन भेटल । हे प्रभु, आब अपने अपन चरण मे भक्ति दिय’ । हम वीर केर पत्नी आब कामना सब सँ हीन भ’ गेल छी; आर कि माँगू ?” पतिक मृत्यु सँ निराश तारा तथा सबटा क्लेश सब सँ मुक्त सुग्रीव मेघ जेहेन श्यामल राम केर मुँह सँ शान्तिक उपदेश सुनलनि आ ओहि प्रकारे प्रसन्न भेलाह जाहि प्रकारे कान मे मेघक आवाज पड़ला सँ मयूरी प्रसन्न होइत अछि ॥३७-४८॥
सुग्रीव राजा बनलाह
।रूपक चौपाइ।
कहल राम हे धीर कपीश । किछु देखक थिक लौकिक दीश ॥४९॥
बालिक हो दाहादिक काज । अङ्गद आबथु सहित समाज ॥५०॥
पुष्पक ततय विचित्र बनाय । वानरेन्द्र काँ शयन कराय ॥५१॥
नाना तरहक बाजन बाज । सभ विधि जे भूपति साम्राज ॥५२॥
सेनापति मन्त्री परिवार । अङ्गद तारा सैन्य अपार ॥५३॥
यथाविहित दाहादिक कर्म्म । कयल सकल मिलि जैँ हो शर्म्म ॥५४॥
स्नानोत्तर मिलि सभ्य समाज । रघुपति-चरण धयल कपिराज ॥५५॥
राज्य प्रभुक सुखसौँ करि भोग्य । हम चरणक दासत्वक योग्य ॥५६॥
भावार्थः
तखन राम बजलाह – “हे धीर वानरराज सुग्रीव ! आब लौकिक व्यवहार दिश सेहो ध्यान देबाक अछि । सब बन्धुवर्गक संग अंगद आबथि आ बालिक दाहादि संस्कार हो ।” ताहिपर ओतय सुन्दर पुष्पक बनायल गेल आ वानरराज बालि केँ ओहिपर सुतायल गेल । तरह-तरह केर बाजा बाजल । राजाक ठाठक लायक हरेक तरह सँ कारोबार कयल गेल । सेनापति, मंत्री, परिवारक लोक, अपार सेना, अंगद आ तारा सब कियो मिलिकय शास्त्रोक्त विधिक अनुसार हुनकर दाह-संस्कार कयलनि जाहि सँ हुनका सद्गति होइन्ह । फेर स्नानक बाद कपिराज सुग्रीव परिजन-समेत रामक चरण गहलनि आ कहलनि – “हे प्रभु ! ई राज्य अहाँक थिक । अपने सुखपूर्वक एकर भोग करू । हम सब तँ अहाँ चरणक दास मात्र होयबाक योग्य छी ।”॥४९-५६॥
।सोरठा।
कहल ततय श्रीराम, सुग्रीवक शुनि प्रार्थना ॥५७॥
समुचित जे यहि ठाम, से कर्त्तव्य विचार थिक ॥५८॥
भावार्थः
सुग्रीवक प्रार्थना सुनिकय ओतय राम कहलनि – “एतय कि करब उचित होयत, से विचार कयल जाय ॥५७-५८॥
।चौपाइ रूपक।
अहँ राजा अङ्गद युवराज । थिक विचार निक कहत समाज ॥५९॥
जाउ झटिति राजा बनि जाउ । दिन दिन नव नव कीर्ति बढाउ ॥६०॥
हम न करब ब्रत नगर प्रवेश । कयल प्रतिज्ञा पिता-निर्देश ॥६१॥
लक्ष्मण जयता नहि सन्देह । मित्र अपन प्रिय परिजन गेह ॥६२॥
किछु दिन सुखपुर करब निवास । आयब मन नहि करब उदास ॥६३॥
सीता-अन्वेषण मे रहब । विषय बहुत अहँ काँ की कहब ॥६४॥
एहि गिरिपर हम बासा करब । गिरि कानन सुखसौँ सञ्चरब ॥६५॥
लक्ष्मण काँ लेल सङ्ग लगाय । आज्ञा पाबि अपन घर जाय ॥६६॥
कयल सकल आज्ञा अनुसार । लक्ष्मण-पूजन विविध प्रकार ॥६७॥
राम निकट लक्ष्मण अयलाह । किष्किन्धा-वार्त्ता लयलाह ॥६८॥
रामचन्द्र-पद कयल प्रणाम । राम कहल कयलनि विशराम ॥६९॥
कयल प्रवर्षण-गिरि पर वास । ततय बिताबथि चातुर्म्मास ॥७०॥
रहला गह्वर सुन्दर जानि । न पड़ पराभव रौदेँ पानि ॥७१॥
लग लग मिल भल कन्द सुमूल । पल्वल-जल मोती समतूल ॥७२॥
भावार्थः
अहाँ राजा बनी आर अंगद केँ युवराज बनाबी यैह विचार ठीकय होयत तथा एकरे समाज नीक कहत । जाउ, जल्दी राजा बनिकय आउ । रोज-रोज नव-नव कीर्ति बढ़बैत रहू । व्रत (प्रतिज्ञा) केर चलते हम नगर-प्रवेश नहि कय सकैत छी । हम पिताक आज्ञा सँ एहेन व्रत लेने छी । अहाँ हमर मित्र छी, अपन प्रिय परिजन छी, ताहि लेल लक्ष्मण अहाँक घर अवश्य जयताह । किछु दिन सुखक संग अपन नगर मे रहब । मन उदास बिल्कुल नहि करब । फेर वापस आबिकय हमरा लग आयब । सीताक खोज मे लागल रहब । बात बहुते अछि, अहाँ सँ कतय धरि कहू । हम एहि पहाड़ी पर वास करब । आर सुखक संग पहाड़ तथा जंगल मे घूमल करब ।” सुग्रीव रामक आज्ञा पाबि लक्ष्मण केँ संग लयकेँ अपन घर गेलाह । रामक आज्ञाक अनुसार सब किछु कयलनि आ हर तरह सँ लक्ष्मणक पूजा-परिचर्या कयलनि । फेर लक्ष्मण ओतय सँ घुरिकय राम लग अयलाह, आर किष्किन्धाक हाल सुनौलनि । रामचन्द्रक चरण मे प्रणाम कयलनि । फेर रामक आज्ञा सँ विश्राम कयलनि । ओतय राम प्रवर्षण नामक पहाड़ी पर डेरा रखलनि । ओतय बरसातक चारि मास (चौमास) बितेबाक रहनि । ओ एकटा सुन्दर गुफा देखि ओहि मे निवास कयलनि, जेतय रौद आ वर्षा सँ कोनो तकलीफ नहि होयबला छल । लगहि मे नीक-नीक कन्द-मूल-फल भेटैत छल । पत्ता सब सँ पानि मोती जेकाँ टपकैत छल ॥५९-७२॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे तृतीयोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक तेसर अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

1 Comment
Tara k eh virah bala gatha suin bhavbibhor bho gelao.
ज्ञान-ज्ञेय रमेश, उपदेष्टा रघुवीर जहँ ॥३५॥
तारा विगत-कलेश, उदित शान्त करुणान्तरस ॥३६॥
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