Search

मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड आठम अध्याय – जटायुक मृत्यु

1184 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड

आठम अध्याय

जटायुक मृत्यु

।रूपमाला।

कपट-मृग मारीच मारल, घुरल घर रघुराय ॥१॥
देखल अबइत दूरसौँ, मन-विकल लक्ष्मण भाय ॥२॥
कयल लीला सकल अपनहिँ, करथि अपनहिँ शोच ॥३॥
ई मनुष्य-चरित्र विस्तृत, करथि लोकक रोच ॥४॥
त्यागि कैँ प्राणेशि अयलहुँ, वत्स कहु की काज ॥५॥
दुष्ट खयलक जानकी कैँ, गेल लय की आज ॥६॥
देल सोपि विदेहजाकाँ, दोष सकल अहीँक ॥७॥
बहुत राक्षस भ्रमय वनमे, चोर अति निर्भीक ॥८॥
कहल दुहु कर जोड़ि लक्ष्मण, नाथ हमरे दोष ॥९॥
कहल सीता वचन जे जे, तार सौँ से चोष ॥१०॥
प्रभुक आगाँ कहि न होइछ, सहल हम भरि पोष ॥११॥
कानि कानि अनर्थ कहलनि, कयल दुस्सह रोष ॥१२॥
दौड़ु लक्ष्मण यहन राक्षस-वचन पड़ितहिँ कान ॥१३॥
की कहू से बताहि जेहन, कहथि आनक आन ॥१४॥
देवि चिन्ता कयल जाय न, बहुत कहल बुझाय ॥१५॥
कहथि सङ्कट नाथ पड़ला, जाय होउ सहाय ॥१६॥
की कहब रघुनाथ हमरा, वचन भेल न शूनि ॥१७॥
चाप शर लय शीघ्र चललहुँ, कान आँगुरि मूनि ॥१८॥
राम कहल तथापि लक्ष्मण, बहुत अनुचित भेल ॥१९॥
स्त्री कथा की सत्य मानल, किछु विचारि न लेल ॥२०॥

भावार्थः

राम माया-मृग रूपी मारीच केँ मारिकय घर दिश घुरलाह । भाइ लक्ष्मण दूरहि सँ हुनका विकल मन सँ अबैत देखलन्हि । ई सबटा लीला स्वयं केर कयल छन्हि, तैयो स्वयं सोच मे डूबल छथि । ई मनुष्य-चरित्र बड विस्तृत अछि जे (श्री रामचन्द्र) लोक रुचिक वास्ते कयलनि । ओ लक्ष्मण सँ पुछैत छथि – “हे लक्ष्मण, अहाँ प्राणेश्वरी जानकी केँ (आश्रम मे) छोड़िकय आबि गेलहुँ ? कहू कि काज अछि ? कहीं आइ दुष्ट राक्षस सब जानकी केँ खा गेल या पकड़िकय तँ नहि लय गेल ? हम तँ विदेहजा (जानकी) केँ अहाँक जिम्मा सौंपि आयल छलहुँ । जँ किछु भेल तँ अहाँक दोष लागत । वन मे बहुते-रास राक्षस सब घुमैत रहैत अछि; ओ सब बड निडर आ चोर सब होइत अछि ।” दुनू हाथ जोड़िकय लक्ष्मण कहलनि – “हे प्रभु, एहि मे हमरहि दोष अछि । सीता हमरा जेहेन-जेहेन वचन कहलिह से तीरहु सँ बेसी तीख छल । ई बात अहाँक सोझाँ बाजइयो के हमरा साहस नहि होइत अछि । जेतय धरि भेल, हम बर्दाश्त कयलहुँ । ओ कानि-कानिकय बहुते अनाप-शनाप बजलिह आ अत्यन्त क्रोध मे आबि गेलिह । ‘हे लक्ष्मण, दौड़ू ।’ – ई बात राक्षसक मुँह सँ सुनितहि ओ, कि कहू, बताहि जेकाँ अन्ट-शन्ट बाजय लगलिह । हम बहुते बुझेलहुँ-सुझेलहुँ जे ‘हे देवी, अहाँ नाहक मे चिन्ता जुनि करू ।’ तैयो ओ कहलनि – ‘स्वामी संकट मे पड़ल छथि; जाउ, हुनकर मदति करू ।’ हे रघुनाथ, हम कि कहू । हमरा सँ हुनकर कटु वचन सुनल नहि गेल । हम आंगुर सँ कान बन्द कय धनुष-बाण लेने तुरत चलि पड़लहुँ ।” राम कहलनि – “तैयो, हे लक्ष्मण, अहाँ ई बड पैघ चूक कयलहुँ । स्त्री-कथा केँ सच मानि गेलहुँ, कनिकबो विचार नहि कयलहुँ ।” ॥१-२०॥

।सोरठा।

चित चिन्तातुर राम, देखल आश्रम शून्य से ॥२१॥
हा जानकि यहिठाम, त्यागि कतय गेलहुँ विकल ॥२२॥

भावार्थः

आश्रम केँ सून्न देखिकय रामक मन चिन्ता सँ व्याकुल भ’ गेलनि । ओ बजलाह – हा जानकी, एहि स्थान केँ छोड़िकय अहाँ कतय चलि गेलहुँ ? ॥२१-२२॥

।गीत।
।वानिनी छन्द।

हाय रे कतै गेली विदेह-भूप-बाला ॥२३॥
वन-दुख अनुभूत आइ शून्य पर्णशाला ॥२४॥
विधिआ नहि निधन देथि वृद्धि आधि-माला २५॥
विपतिहु मे विपति घोर दुर्द्दशा विशाला ॥२६॥

भावार्थः

हाय-रे ! राजा जनकक बाला आइ कतय चलि गेलिह ? आइ पहिले-पहिल वनवासक दुःख केर अनुभूति भ’ रहल अछि जे ई पर्णशाला (कुटिया) सून्न भेल अछि । ओह, विधाता मृत्युओ नहि दैत छथि आ मोन मे वेदना बढ़िते जा रहल अछि । विपतियो मे ई भारी विपत्ति आ घोर विशाल दुर्दशा आबि गेल अछि ॥२३-२६॥

।गीत।

हा हंसगती विधि देल वनमे बड़ विपती ॥२७॥
हेम-हरिण पाछाँ हम दौड़लहुँ जानि पड़ल नहि एक रती ॥२८॥
पिता उचित कयलनि वन देलनि पुरी अयोध्या वर नृपती ॥२९॥
मृग पक्षी वनतरु वनदेवी कहु कहुँ सीता देखल सती ॥३०॥
जिव सनि धनि हा हमर हेड़ाइलि दैव हरल मोर सकल मती ॥३१॥
धिक धिक प्रभुता धिक धिक जीवन निज मति भय गेल यहन छती ॥३२॥
राम-‘चन्द्र’ कह हा प्रिय जानकि एत गोट दुःख कोना सहती ॥३३॥

भावार्थः

हा हंसगमना सीता, विधाता वन मे हमरा भारी विपत्ति मे दय देलनि अछि । हम सोनाक हरिनक पाछाँ दौड़लहुँ, कनिकबो भान नहि भेल जे ओ वंचना (झूठक प्रपंच) छल । अयोध्याक राजा पिता दशरथ उचिते कयलनि जे वनवास देलनि । हे मृग, हे पक्षी, हे वनक गाछ-वृक्ष, हे वनदेवी लोकनि, अहाँ सब कहू, कतहु सती सीता केँ देखलियनि अछि ? प्राण-जेहेन प्यारी हमर पत्नी हेरा गेलिह । विधाता हमर सबटा सुइध-बुइध (मति) हरण कय लेलनि । हमर प्रभुत्व-पौरुष केँ धिक्कार अछि । हमर जिनगी केँ धिक्कार अछि । एहेन भारी क्षति भ’ गेल अछि । चन्द्रकवि कहैत छथि जे राम बेर-बेर सोच करैत छथि जे हुनक प्रिया जानकी आब एतेक पैघ दुःख केँ कोना सहती !” ॥२७-३३॥

।चौपाइ।

प्रभु सर्व्वज्ञ देखथि सभ नयन । परमानन्द वियोग अचयन ॥३४॥
निरहङ्कार अखण्डानन्द । निर्म्मल अचल चलथि निर्द्वन्द ॥३५॥
जाया हमर इ करथि विलाप । निज माया-विस्तार-प्रताप ॥३६॥
वन वन फिरथि न मन बिसराम । तकयित सीता विरही राम ॥३७॥
देखल टूटल रथ पथ बेश । उजड़ल पजड़ल जत तत केश ॥३८॥
लक्ष्मण देखु भेल छल मारि । नाना अस्त्र चलल तरुआरि ॥३९॥
शोणित सौँ धरणी गेलि पाटि । काक शृगाल शकल नहि चाटि ॥४०॥
टूटल धनुषक देखिय खण्ड । युद्ध भेल अछि एतय प्रचण्ड ॥४१॥
सीता काँ जे हरलय जाय । तनि सौँ जनि लेल आन छोड़ाय ॥४२॥
पर्व्वत सन शोणित भरि अङ्ग । विकल पड़ल मूर्छित रण-रङ्ग ॥४३॥
शुनु लक्ष्मण राक्षस ई सैह । सीताकैँ हरि खयलक जैह ॥४४॥
तृप्त शयन कर निर्ज्जन आबि । देत दुःख पुन अवसर पाबि ॥४५॥
धनुष बाण अहं सत्वर लाउ । हिनकाँ यमपुर झटिति पठाउ ॥४६॥
शुनि जटायु कहलनि हे राम । रावण सौँ हमरा सङ्ग्राम ॥४७॥
थिकहुँ जटायु निकट प्रभु आउ । वर्त्तमान वार्त्ता बुझि जाउ ॥४८॥
रावण हरलक सीता हाय । गगनक पथ रथ चलल उड़ाय ॥४९॥
सीता-करुण-वचन शुनि कान । दौड़लहुँ हरब दशानन-प्रान ॥५०॥
रथ देल चूरि मारि देल घोड़ । ताड़ल धनुष प्रताप न थोड़ ॥५१॥
सीता छीनि लेल हम नाथ । विकल भेलहुँ तरुआरिक हाथ ॥५२॥
से विपक्ष कयलक बिनु-पक्ष । प्रभु सपक्ष विभु-धाम समक्ष ॥५३॥
मन प्रभु-चरण-कमल अनुरागि । इच्छा होइछ तन दिअ त्यागि ॥५४॥
हम छी गृद्ध वृद्ध भेल देह । समुचित त्यागी विश्व-सिनेह ॥५५॥
मरण-समय प्रभु सोझाँ ठाढ़ । होयब मुक्त विपति छुट गाढ़ ॥५६॥
चरणैँ परश हमर करु नाथ । मरण शरण श्रीप्रभु गुणगाथ ॥५७॥
हँसि परसन प्रभु परसल गात । वृद्ध मान्य जिमि दशरथ तात ॥५८॥
वृद्ध गृद्ध तत त्यागल प्राण । यहन सभाग्य विश्व के आन ॥५९॥
लक्ष्मण काष्ठ-चिता निर्म्माय । अनल आनि पुन देल लगाय ॥६०॥
स्नान कयल विधि दूनू भाय । कहयित छल छथि हमर सहाय ॥६१॥
गुणगण कहिकहि कर प्रभु शोच । प्रभु काँ बड़ मन भक्तक रोच ॥६२॥
खण्ड खण्ड कय हरिणक मांस । सत्वर वितरल पक्षिक ग्रास ॥६३॥
बहुत पक्षि मिलि सुझसौँ खाथु । खगपति तृप्त परम-गति जाथु ॥६४॥
विष्णुक सम खगपति तन पाबि । परमेश्वर-स्तुति कर से गाबि ॥६५॥

भावार्थः

ईश्वरावतार राम सब किछु जनैत छथि, अपन आँखि सँ सब किछु देखैत छथि, परमानन्द स्वरूप छथि, तैयो अपन स्त्रीक बिछोह सँ व्याकुल छथि । ओ अहम केर भावना सँ रहित छथि, अखंड आनन्द-स्वरूप छथि, सत्त्व-रजस् आदि विकार सब सँ रहित छथि, चलितो अचल (कूटस्थ) छथि, सुख-दुःख सँ उपर छथि । तैयो जे ओ ‘हमर पत्नी’ एना कहैत बिलखैत-घुरैत छथि, ई तँ हुनकर अपनहि माया-शक्तिक लीला थिक । विरह सँ व्याकुल राम सीता केँ तकैत वने-वन भटकि रहल छथि । हुनकर मन मे आराम नहि छन्हि । राम देखलनि, रस्ता मे एकटा सुन्दर-सन रथ टूटल पड़ल अछि आ ओतय यत्र-तत्र केश उजड़ल पड़ल अछि । देखिकय ओ बजलाह – “लक्ष्मण, देखू, एतय लड़ाइ भेल छल । तलवार आदि तरह-तरह केर अस्त्र-शस्त्र चलल अछि । लहू सँ धरती भिज गेल अछि । लहू (रक्त) एतबे बहल जे कौआ आ सियार सब चाटिकय खत्म नहि कय सकल । टूटल धनुष केर एक गोट टुकड़ा देखा रहल अछि । एतय घनघोर लड़ाइ भेल छल । लगैत अछि कि जे सीताक हरण कयलक, ओकरा सँ कोनो आर जीव छीनि लेलक अछि । लहू सँ लथपथ ई पहाड़-जेहेन शरीर रणभूमि मे अचेत पड़ल अछि । हे लक्ष्मण, सुनू, ई वैह राक्षस होयत, जे सीता केँ हरण कय खा गेल अछि । सीताक मांस सँ तृप्त भ’ निर्जन स्थान मे सुतल अछि । मौका पाबिकय ई फेर चोट करत । तेँ अहाँ झटपट धनुष-बाण लाउ, एकरा तुरन्त यमलोक पहुँचा दी ।” ॥३४-४६॥

रामक बात सुनिकय जटायु कहलनि – “हे राम, हमरा सँ रावणक लड़ाइ भेल छल । हम जटायु छी । हे प्रभु, अहाँ हमरा लग मे आउ आर हमर हाल-खबरि लिय’ । सीता हरण रावण कयलक अछि । ओ सीता लयकय आकाश-मार्ग सँ रथ उड़ाकय चलि गेल । सीताक करुण-क्रन्दन सुनिकय हम रावण केँ मारय लेल दौड़लहुँ । रथ केँ चूर-चूर कय देलहुँ, घोड़ा सब केँ मारि देलहुँ आ धनुष केँ तोड़ि देलहुँ । कियो कम पराक्रम नहि कयलक । सीता केँ ओकरा सँ छीनि लेलहुँ । मुदा जखन रावण तलवार चलेलक त हम घायल भ’ गेलहुँ । दुश्मन हमर पाँखि काटि देलक । अहाँ हमरा पर अनुकूल होउ, सामने स्वर्ग राखल अछि । मोन अहाँक चरण मे अनुरक्त अछि । भला एहि सँ नीक अवसर कोन होयत ? तेँ आब शरीर केँ छोड़ि देबाक इच्छा होइत अछि । हम गिद्ध छी । शरीर जराजीर्ण भ’ गेल अछि । आब यैह उचित अछि जे दुनिया सँ नाता तोड़ि ली । मरबाक समय अहाँ सोझाँ मे ठाढ़ छी । हम मुक्ति पायब । भारी कष्ट सँ छुटकारा भेटि जायत । हे प्रभु, हमरा अपन पैरक स्पर्श करा दिय’ । हे यशस्वी प्रभु, मरबाक समय अपन शरण मे लय लिय’ । ॥४७-५७॥

प्रभु राम प्रसन्न भ’ विहुँसिकय जटायुक शरीर केँ स्पर्श कय देलनि, जे हुनका पिता दशरथक समान सम्मान्य रहथि । बूढ़ गिद्ध ओतहि प्राण त्याग कय देलनि । एहेन सौभाग्यशाली दुनिया मे आर के होयत ? लक्ष्मण लकड़ी जुटाकय चिता सजौलनि आ आइग आनिकय हुनका जरा देलनि । दुनू भ्राता विधिपूर्वक स्नान कयलनि आ कहलनि जे ई हमरा सभक बड पैघ मदति कयनिहार रहथि । राम हुनकर गुणक बखान करैत शोक प्रकट कयलनि । ईश्वर केँ अपन भक्त केर बहुत ध्यान रहैत छन्हि । फेर एकटा हरिनक मांस केर टुकड़ा-टुकड़ा कय केँ पक्षी सभक बीच ग्रास बँटलनि । प्रभुक कामना रहनि जे बहुते-रास पक्षी मिलिकय एहि ग्रास केँ खाय, जाहि सँ पक्षिराज जटायुक आत्मा तृप्त होइन्ह आर ओ परमगति (मोक्ष) केँ प्राप्त करथि । मरिकय गृध्रराज विष्णुक समान दिव्य शरीर प्राप्त कयलनि आ गाबि-गाबिकय प्रभु श्री रामचन्द्रक स्तुति करय लगलाह । ॥५८-६५॥

।हरिपद छन्दः गीतम्।

कमला-रमणम् नाभि-सरोरुह-विधि-शरणम् ॥६६॥
नौमि महेन्द्रविभुधतस्सततं संसेवित-पङ्कज-चरणम् ॥६७॥
धरणी-भार-विनाश-हेतवे सङ्कल्पित-रावण-मरणम् ॥६८॥
अप्रमेयमगणितगुणमीशं पितृवचनेन वनभ्रमणम् ॥६९॥
मायानिज-लीलाविस्तारं हतखरदूषणसंसरणम् ॥७०॥
अचलमगोचरमणुतोप्यणुमथ माया-हेम-हरिण-हरणम् ॥७१॥
त्वामिह राम जने किल मादृशि गुणनिधिमतुलकृपाकरणम् ॥७२॥

भावार्थः

‘भगवान् लक्ष्मीपति केँ हम प्रणाम करैत छी, जिनकर नाभि सँ निकलल कमल केर फूल ब्रह्माक आसन अछि, जिनकर चरण-कमल केर सेवा चारू दिश सँ इन्द्र आदि देवता जुटिकय करैत छथि, जे धरतीक भार केँ दूर करबाक लेल रावण केँ मारबाक संकल्प कयलनि अछि, जे असीम छथि, असंख्य गुण सब सँ युक्त छथि प्रभु अर्थात् सब किछु करय मे समर्थ छथि आर पिताक आज्ञा सँ वन मे घुमि रहल छथि, जे अपन मायाक सहारे नाना प्रकारक लीला करैत छथि, जे खर आ दूषण केर प्राण हरलनि, जे अचल छथि, अगोचर छथि, अणुओ सँ अणु-रूप छथि आर जे मायावश सोनाक हरिन केँ पकड़बाक लेल उद्यत छथि । हे गुणनिधि राम, अहाँ हमरा जेहेन लोक पर अपार कृपा करयवला छी । एहेन अहाँ केँ हम प्रणाम करैत छी ।” ॥६६-७२॥

।दोहा।

ब्रह्म-सुपूजित-पद तखन, खगपति से गेलाह ॥७३॥
रामाज्ञा सौँ हर्ष मन, विस्मित सुर भेलाह ॥७४॥

भावार्थः

तखन पक्षिराज जटायु राम सँ आज्ञा लय केँ हर्षितचित्त सँ ब्रह्मलोक पहुँचलाह । से देखि देवतहु सब विस्मित भ’ उठलाह ॥७३-७४॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे अष्टमोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक आठम अध्याय समाप्त।

हरिः हरः!!

Related Articles