कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड आठम् अध्याय

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड

आठम् अध्याय

।रूपमाला।

कपट – मृग मारीच मारल, घुरल घर रघुराय।
देखल अबइत दूरसौँ मन – विकल लक्ष्मण भाय॥
कयल लीला सकल अपनहिँ, करथि अपनहिँ शोच।
ई मनुष्य – चरित्र विस्तृत, करथि लोकक रोच॥
त्यागि कैँ प्राणेशि अयलहुँ, वत्स कहु की काज।
दुष्ट खयलक जानकी कैँ, गेल लय की आज॥
बल सोपि विदेहजाकाँ, दोष सकल अहीँक।
बहुत राक्षस भ्रमय वनमे, चोर अति निर्भीक॥
कहल दुहु कर जोड़ि लक्ष्मण, नाथ हमरे दोष।
कहल सीता वचन जे जे, तार सौँ से चोष॥
प्रभुक आगाँ कहि न होइछ, सहल हम भरि पोष।
कानि कानि अनर्थ कहलनि, कयल दुस्सह रोष॥
दौड़ु लक्ष्मण यहन राक्षस – वचन पड़ितहिँ कान।
की कहू से बताहि जेहन, कहथि आनक आन॥
देवि चिन्ता कयल जाय न, बहुत कहल बुझाय।
कहथि सङ्कट नाथ पड़ला, जाय होउ सहया॥
की कहब रघुनाथ हमरा, वचन भेल न शूनि।
चाप शर लय शीघ्र चललहुँ, कान आँगुरि मूनि॥
राम कहल तथापि लक्ष्मण, बहुत अनुचित भेल।
स्त्री कथा की सत्य मानल, किछु विचारि न लेल॥

।सोरठा।

चित चिन्तातुर राम, देखल आश्रम शून्य से।
हा जानकि यहिठाम, त्यागि कतय गेलहुँ विकल॥

।गीत।
।वानिनी छन्द।

हार रे कतै गेली विदेह – भूप – बाला।
वन-दुख अनुभूत आइ शून्य पर्णशाला॥
विधिआ नहि निधन देथि वृद्धि आधि – माला।
विपतिहु मे विपति घोर दुर्द्दशा विशाला॥

।गीत।

हा हंसगती विधि देल वनमे बड़ विपती।
हेम – हरिण पाछाँ हम दौड़लहुँ जानि पड़ल नहि एक रती॥
पिता उचित कयलनि वन देलनि पुरी अयोध्या वर नृपती॥
मृग पक्षी वनतरु वनदेवी कहु कहुँ सीता देखल लती॥
जिव सानि धनि हा हमर हेड़ाइलि दैव हरल मोर सकल मती॥
धिक धिक प्रभुता धिक धिक जीवन निज मति भय गेल यहन छती॥
रामचन्द्र कह हा प्रिय जानकि एत गोट दुःख कोना सहती॥

।चौपाइ।

प्रभु सर्व्वज्ञ देखथि सभ नयन। परमानन्द वियोग अचयन॥
निरहङ्कार अखण्डानन्द। निर्म्मल अचल चलथि निर्द्वन्द॥
जाया हमर इ करथि विलाप। निज माया – विस्तार – प्रताप॥
वन वन फिरथि न मन बिसराम। तकयित सीता विरही राम॥
देखल टूटल रथ पथ बेश। उजड़ल पजड़ल जत तत केश॥
लक्ष्मण देखु भेल छल मारि। नाना अस्त्र चलल तरुआरि॥
शोणित सौँ धरणी गेलि पाटि। काक शृगाल शकल नहि चाटि॥
टूटल धनुषक देखिय खण्ड। युद्ध भेल अछि एतय प्रचण्ड॥
सीता काँ जे हरलय जाय। तनि सौँ जनि लेल आन छोड़ाय॥
पर्व्वत सन शोणित भरि अङ्ग। विकल पड़ल मूर्छित रण – रङ्ग॥
शुनु लक्ष्मण राक्षस ई सैह। सीताकैँ हरि खयलक जैह॥
तृप्त शयन कर निर्ज्जन आबि। देत दुःख पुन अवसर पाबि॥
धनुष बाण अहं सत्वर लाउ। हिनकाँ यमपुर झटिति पठाउ॥
शुनि जटायु कहलनि हे राम। रावण सौँ हमरा सङ्ग्राम॥
थिकहुँ जटायु निकट प्रभु आउ। वर्त्तमान वार्त्ता बुझि जाउ॥
रावण हरलक सीता हाय। गगनक पथ रथ चलल उड़ाय॥
सीता – करुण – वचन शुनि कान। दौड़लहुँ हरब दशानन – प्रान॥
रथ देल चूरि मारि देल घोड़। ताड़ल धनुष प्रताप न थोड़॥
सीता छीनि लेल हम नाथ। विकल भेलहुँ तरुआरिक हाथ॥
से विपक्ष कयलक बिनु – पक्ष। प्रभु सपक्ष विभु – धाम समक्ष॥
मन प्रभु – चरण – कमल अनुरागि। इच्छा होइछ तन दिअ त्यागि॥
हम छी गृद्ध वृद्ध भेल देह। समुचित त्यागी विश्व – सिनेह॥
मरण – समय प्रभु सोझाँ ठाढ़। होयब मुक्त विपति छुट गाढ़॥
चरणैँ परश हमर करु नाथ। मरण शरण श्रीप्रभु गुणगाथ॥
हँसि परसन प्रभु परसल गात। वृद्ध मान्य जिमि दशरथ तात॥
वृद्ध गृद्ध तत त्यागल प्राण। यहन सभाग्य विश्व के आन॥
लक्ष्मण काष्ठ – चिता निर्म्माय। अनल आनि पुन देल लगाय॥
स्नान कयल विधि दूनू भाय। कहयित छल छथि हमर सहाय॥
गुणगण कहिकहि कर प्रभु शोच। प्रभु काँ बड़ मन भक्तक रोच॥
खण्ड खण्ड कय हरिणक मांस। चत्वर वितरल पक्षिक ग्रास॥
बहुत पक्षि मिलि सुझसौँ खाथु। खगपति तृप्त परम-गति जाथु॥
विष्णुक सम खगपति तन पाबि। परमेश्वर – स्तुति कर से गाबि॥

।हरिपद छन्दः।
।गीतम्।

कमला – रमणम् नाभि – सरोरुह – विधि-शरणम्।
नौमि महेन्द्रविभुधतस्सततं संसेवित-पङ्कज – चरणम्॥
धरणी-भार – विनाश – हेतवे सङ्कल्पित-रावण-मरणम्।
अप्रमेयमगणितगुणमीशं पितृवचनेन वनभ्रमणम्॥
मायानिज – लीलाविस्तारं हतखरदूषणसंसरणम्।
अचलमगोचरमणुतोप्यणुमथ माया-हेम-हरिण – हरणम्॥
त्वामिह राम जने किल मादृशि गुणनिधिमतुलकृपाकरणम्।

।दोहा।

ब्रह्म – सुपूजित – पद तखन, खगपति से गेलाह।
रामाज्ञा सौँ हर्ष मन, विस्मित सुर भेलाह॥

।इति।

हरिः हरः!!