स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
अरण्यकाण्ड – चारिम अध्याय।चौपाइ।
देखल शुनल स्मरण हो भाव । से अनित्य मानक थिक आब ॥३०॥
स्वप्न मनोरथ वितथ समान । ई शरीर मे आत्म-ज्ञान ॥३१॥
तरु संसार मूल थिक गेह । मानि लेब मन निस्सन्देह ॥३२॥
तकर मूल सुत-वनिता-बन्ध । सनयन जन मानिय मन अंध ॥३३॥
नाम जनिक जानल ई गात्र । स्थूलभूत से पचतन्मात्र ॥३४॥
अहङ्कार मति इन्द्रिय सर्व्व । चिदाभास मन प्रकृतिक पर्व्व ॥३५॥
हिनकर नाम क्षेत्र करु ज्ञान । जीव विलक्षण एहिसौँ आन ॥३६॥
ओ परमात्मा आमय-रहित । ज्ञान तनिक शुनु साधन सहित ॥३७॥
जीव परात्मा काँ नहि भेद । निश्चय ज्ञात रहय नहि खेद ॥३८॥
हिंसा-शून्य दया-संलीन । अहङ्कार-दम्भादि-विहीन ॥३९॥
अकुटिल सकल अपन व्यवहार । सहथि परक आक्षेप प्रहार ॥४०॥
गुरु-सेवन मन वचनेँ काय । भीतर बाहर शुद्ध बनाय ॥४१॥
उत्तम कर्म्म मे थिरता वेश । मनमे हो न अधर्म्मक लेश ॥४२॥
हम हम ई मति सत्वर छोड़ि । भ्रमसौँ सर्प होइ अछि जोड़ि ॥४३॥
करयित करयित – सज्जन संग । तखना हो ज्ञानोदय रंग ॥४४॥
ज्ञानोदय सौँ संशय दूर । तिमिर रहय की उगलेँ सूर ॥४५॥
स्वर्ग-वास ज्ञानामृत शर्म्म । सकल मूल थिक केवल धर्म्म ॥४६॥
सदाचार जे जे सद्ग्रन्थ । मुक्ति युक्ति गुरु-सेवा पन्थ ॥४७॥
श्रद्धा-हीन भक्ति नहि पाब । भक्ति-विमुख मे ज्ञान न आब ॥४८॥
ज्ञान-रहित केँ दुर्ल्लभ मुक्ति । हमरे सेवा साधन युक्ति ॥४९॥
विधिसन जौँ उपदेशक आब । सकल त्याग बिनु मोक्ष न पाब ॥५०॥
शुनल अनन्त शेष भगवान । रामचन्द्र सन वक्ता ज्ञान ॥५१॥
प्राकृत जन की वर्णन करत । स्मृति पुराण अनुमति सञ्चरत ॥५२॥
भावार्थः
जे किछु देखैत, सुनैत या स्मरण करैत छी ओ सबटा भाव क्षणभंगुर अछि । शरीर केँ आत्मा बुझनाय सपनाक मनोरथ जेकाँ अवास्तविक अछि । मोन मे ई निश्चय कय लिय जे ई संसार एकटा गाछक समान अछि । घर एकर जैड़ छी । तथा एकर जैड़ मे सन्तान, पत्नी आ समाज अछि । आँखिक रहितो लोक आन्हर रहैत अछि । हम सब जेकरा शरीर कहैत छी ओ आर किछु नहि, सांख्यदर्शन केर पाँच गोट तन्मात्रा सभक मूर्त विपरिणाम थिक । अहंकार, बुद्धि आ एगारह टा इन्द्रिय – ई सब प्रकृति केर परिणाम थिक आ मन चैतन्यवान् सन प्रतीत होइत अछि । एहि सब केँ क्षेत्र बुझू । जीव एहि सब सँ भिन्न किछु आरे होइत अछि । ओ परमात्मा-स्वरूप अछि आ निर्विकार अछि । आब सुनू जे एहि परमात्माक ज्ञान कोन साधन सँ भ’ सकैत अछि । जीव आ परमात्मा मे कोनो भेद नहि छैक, ई बुझि लेलापर कोनो दुःख नहि रहि जाइछ । जेकर मोन मे हिन्सा लेशोमात्र नहि हो, जे दया सँ भरल रहय, तथा अहंकार, घमण्ड आदि सँ दूर हो; भीतर आर बाहर सँ साफ रहैत हो; नीक कर्म मे लगन रखैत हो; मोन मे नामोमात्रक अधर्म नहि रखैत हो; वैह आत्मज्ञान पबैत अछि । शरीरे आत्मा छी, ई भ्रम केँ शीघ्र दूर करू । जाहि तरहें लोक भ्रमवश रस्सी केँ साँप बुझि लैत अछि, ओहि तरहें शरीर केँ आत्मा बुझि बैसैत अछि । ओ बहुत दिन धरि सवाल पर सवाल पूछैत रहत । जखन बहुत दिन धरि सत्संग करैत रहब तखन ज्ञानक उदय होयत । ज्ञानक उदय भेला पर संशय दूर भ’ जायत । सूरज उगला पर कि अन्हार टिक सकैत अछि ? स्वर्ग भेटनाय, ज्ञानरूपी अमृत आ आनन्द भेटनाय – सभक मूल अछि धर्मानुष्ठान । सुन्दर ग्रन्थ सब मे जे सदाचार वर्णित अछि ओकरा अपनाउ तथा गुरुक सेवा करू, यैह मुक्ति केर मार्ग थिक । जेकर मोन मे श्रद्धाभाव नहि होयत ओकरा भक्ति नहि भेटत । भक्तिक बिना कियो ज्ञान नहि पाबि सकैत अछि । जेकरा ज्ञान नहि हेतैक, ओकरा लेल मुक्ति दुर्लभ छैक । एहेन लोकक लेल यैह रास्ता छैक जे ओ अपन साधन अनुसार हमर पूजा करय । यदि ब्रह्माक समान गुरु भेटि जाइथ तैयो सब किछु त्यागने बिना मोक्ष नहि भेटि सकैत अछि ।” एहि तरहें रामचन्द्र-जेहेन वक्ता ज्ञानक उपदेश देलनि आर भगवान् शेषनाग केर अवतार लक्ष्मण एहि उपदेश केँ सुनलनि । साधारण मनुष्य एकर वर्णन कि करत ? जिनका अनुसार स्मृति, पुराण आदि धर्मग्रन्थो सब चलैत अछि ॥३०-५२॥
।दोहा।
कयल बहुत उपदेश प्रभु, लक्ष्मण मन आनन्द ॥५३॥
किछु विषाद नहि चित्तमे, तुष्ट पुष्ट निर्द्वन्द ॥५४॥
भावार्थः
प्रभु राम लक्ष्मण केँ प्रचुर ज्ञानोपदेश देलनि । सुनिकय लक्ष्मणक मोन प्रसन्न भ’ गेलनि । हुनकर मोन मे कोनो शंका नहि रहि गेलनि, ओ पूरे सन्तुष्ट भ’ गेलाह ॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे चतुर्थोऽध्यायः।
।श्री मैथिल चन्द्रकवि द्वारा विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक चारिम अध्याय समाप्त भेल।

1 Comment
Bahut sundar lagal aajuk prasang. Jahi m jakh prbhu k ego bridh jatayu san bhent bhelian. Prabhu bujhla je eh sant sabko khai bala raksh aichh. Baat m o bujhi gelah je eh bridh sant chhaith.
Ego baat eh bda satik lagal je jahi manushya m bhakti nahi rahit chhin o gyanarjan nai ko pabi sakait chhaith. Sange jinka m gyan nahin chhin o ehi Bhav san mukti nai pabi sakait chhaith 🙏🙏
प्रथम माया-रूप कहि हम ज्ञान – साधन कहब ॥२६॥
जानि ज्ञेय परात्मकाँ मन भयरहित नित रहब ॥२७॥
आत्मबुद्धि शरीर आदिमे करथि जे व्यवहार ॥२८॥
सैह बुद्धिक नाम माया ताहि सौँ संसार ॥२९॥
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