स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड

अध्याय दोसर
– शरभंग ऋषिक मुक्ति तथा सुतीक्ष्ण मुनिक आश्रम पहुँचब
।चौपाइ।
स्वर्गत भेला जखन विराध । तखन गगन सुरजन सम्बाध ॥१॥
प्रभु सानुज वैदेही सङ्ग । गेला ततय जतय शरभङ्ग ॥२॥
आयल छथि वन श्रीभगवान । मुनि जानल साधन विज्ञान ॥३॥
सत्वर विधि विष्टर देल नीक । पूजा कयल विहित जे थीक ॥४॥
प्रिय आतिथ्य कन्द फल मूल । कहल आइ दिन अति अनुकूल ॥५॥
एतय बहुत दिन तप जे कयल । पुण्यकर्म जे जे अछि धयल ॥६॥
अपनैँ विषय समर्प्पण भेल । दुर्ल्लभ दर्शन अपनैँ देल ॥७॥
फल-विरक्त हम पायब मुक्ति । एक कहक थिक वचन सुयुक्ति ॥८॥
सकल-हृदय-गृह नव घनश्याम । सरसिज-लोचन-रघुवर राम ॥९॥
चोराम्बर धर जटा-कलाप । सानुज श्रीपति हरु सन्ताप ॥१०॥
चिता चढ़ल योगीश्वर बाज । हे रघुनन्दन देखू आज ॥११॥
देह दग्ध कय हम ब्रह्मत्व । जाइत छी अपनैँ क समक्ष ॥१२॥
भावार्थः
जखन विराध स्वर्ग गेल, ताहि समय आकाश मे देवता लोकनिक भीड़ लागि गेल छल । फेर लक्ष्मण आ सीता सहित राम ओतय गेलाह जेतय शरभंग ऋषिक आश्रम रहनि । मुनि केँ अपन अलौकिक ज्ञानक सहारे बुझय मे आबि गेलनि जे भगवान राम वन मे आयल छथि । ऋषि वैदिक विधिक अनुसार शीघ्रहि एकटा सुन्दर विष्टर (कुशक आसन) आनिकय देलनि आर यथाविहित रीति सँ हुनकर पूजा कयलनि । कन्द-मूल-फल सँ अपन प्रिय अतिथिक सत्कार कयलनि आर कहलनि जे हमर आजुक दिन बहुते शुभ भेल । एतय हम जे दीर्घकाल धरि तपस्या कयलहुँ आर जेहो किछु पुण्य संचित कयलहुँ ओ सब आइ हम अपने केँ समर्पित करैत छी । अपने हमरा दर्शन देलहुँ, जे बहुत दुर्लभ अछि । फल केर कामना केँ छोड़ि आइ हम मुक्ति पायब । मात्र एक बेर युक्तिपूर्वक कहय चाहैत छी – हे कमलनयन रघुश्रेष्ठ राम, अपने सभक हृदयरूपी आंगन मे नव मेघ समान छी । चीर एवं जटा धारण कएने लक्ष्मण आर सीता समेत हे राम, अपने हमर सन्ताप हरण करी । चिता पर चढ़ल योगीश्वर कहैत छथि, हे राम देखू; आइ हम अपनेक सोझाँ मे अपन शरीर केँ दग्ध कय केँ ब्रह्मत्व प्राप्त करैत छी ॥१-१२॥
।दोहा।
बाम अङ्गमे जानकी, घन चपला समतूल ॥१३॥
पुरी-अयोध्या-पति रहथु, हृदय सदा अनुकूल ॥१४॥
मुनि पुन आगि पजारिकेँ, कयलनि दग्ध शरीर ॥१५॥
दिव्य-देह लोकेश-पद, गेला कहि रघुवीर ॥१६॥
भावार्थः
जिनक बाम अंग मे सीता ओहि तरहें विराजमान छथि जाहि तरहें मेघ मे बिजली, तेहेन अयोध्यापति रामचन्द्र सदैव हमर हृदय मे दहिन रहथि । एतेक कहिकय मुनि चिता जरौलनि आर शरीर केँ ओहि मे दग्ध कयलनि । पुनः दिव्य शरीर मे प्रकट भ’ राम केर नाम लय केँ ब्रह्मपद (ब्रह्मत्व) केँ प्राप्त भ’ गेलाह ॥१३-१६॥
।चौपाइ।
कत मुनिवर आयल तहिठाम । सभकाँ तिनु जन कयल प्रणाम ॥१७॥
आशिष दय कहलनि प्रभु वेश । अयलहुँ छूटल मुनिक कलेश ॥१८॥
मुनि शरभङ्गक देखल प्रयाण । प्रभुसौँ सबहिक हो कल्याण ॥१९॥
टहलि घूमि वन देखल जाय । होयत ज्ञात घोर अन्याय ॥२०॥
अस्थि कपाल पड़ल छल ढेर । राम पुछल की विषय अन्धेर ॥२१॥
मुनि कह मृत मुनि लोकक हाड़ । हिनका खयलक राक्षस राड़ ॥२२॥
करुणासौँ परिपूरित आँखि । श्री रघुनन्दन उठला भाखि ॥२३॥
कयल प्रतिज्ञा प्रभु विख्यात । कयलक अछि जे जे उतपात ॥२४॥
सभ राक्षसक करब संहार । विजय सुयश त्रिभुवन विस्तार ॥२५॥
मुनिजन चिन्ता करु जनु आब । कि कहब अड़ड़ा लागल नाब ॥२६॥
नाम सुतीक्ष्ण अगस्तिक शिष्य । शुचि संयम आहार हविष्य ॥२७॥
रामक मन्त्रोपासक एक । भक्ति अनन्य धन्य सविवेक ॥२८॥
तनिकर आश्रम गेला राम । सभ ऋतु कयल जतय विसराम ॥२९॥
शुनल सुतीक्ष्ण अबै छथि राम । विधिवत पूजन कयल प्रणाम ॥३०॥
मन्त्रोपासक भक्त सिनेह । अपनहि अयलहुँ हमरा गेह ॥३१॥
विश्व-अगोचर देखल नयन । सकल लोक मानस-गृह शयन ॥३२॥
अपनेक मन्त्र-विमुख-मति जैह । माया-मोहित होईछ सैह ॥३३॥
जल-गत दिनकर-बिम्ब समान । मायामोहित जन-मन-धाम ॥३४॥
विभु अपूर्व्व देखल से रूप । माया-मानुष सुन्दर भूप ॥३५॥
कोटि-काम-छवि अति कमनीय । चाप बाण धरइत रमणीय ॥३६॥
दया-सरस सुन्दर मुख-हास । हरथु हमर रघुवर भव-त्रास ॥३७॥
अमल अजिन पट सीतासङ्ग । सेवक लक्ष्मण प्रीति अभङ्ग ॥३८॥
गुणानन्त नीलोत्पल-कान्ति । वीर-धुरन्धर मानस-शान्ति ॥३९॥
ब्रह्म राम चिद्घन कह वेद । बसथि मुनिक मन अति निर्व्वेद ॥४०॥
देखल जे हम रूप समक्ष । हृदय बसथु से प्रभु परतक्ष ॥४१॥
मुनिक विनय शुनि कहलनि राम । वचन कहैछी हम अभिराम ॥४२॥
हमरा मन्त्रोपासक भक्त । हमरहि विषय सतत अनुरक्त ॥४३॥
हमरा दर्शन सौँ हो मुक्त । भक्ति-भावना सौँ संयुक्त ॥४४॥
दर्शन हमर न दुर्ल्लभ ताहि । दिअ तनिका हम सत्य निबाहि ॥४५॥
कहलनि राम नयन-जलजाभ । होयत हमर सायुज्यक लाभ ॥४६॥
गुरु अगस्ति मुनि नाथ अहाँक । शिष्य तपस्वी वृद्ध जहाँक ॥४७॥
किछु दिन ततय रहब हम जाय । तकर बाट अँह देब देखाय ॥४८॥
भेल बहुत दिन हमहूँ जयब । गुरुदर्शन कय पुनि एत अयब ॥४९॥
प्रात भेल प्रभु कहि चललाह । सीता लक्ष्मण सङ्ग छलाह ॥५०॥
मुनि अगस्ति कैँ छोटका भाय । मुनि सुतीक्ष्ण सभ देल देखाय ॥५१॥
भावार्थः
ओहिठाम बहुते रास मुनि सब जुटि गेलाह । सब केँ तीनू गोटे प्रणाम कयलनि । सब कियो आशीर्वाद देलनि आ कहलनि – प्रभो, नीक भेल जे अपने अयलहुँ । आब मुनि लोकनिक कष्ट दूर हेतनि । हमरा लोकनि शरभंग ऋषिक मुक्ति देखलहुँ । अपने सँ एहिना सभक कल्याण होइक । आब घुमि-फिरिकय ई तपोवन देखल जाउ । देखला सँ बुझय मे आबि जायत जे एतय कतेक घोर अनर्थ होइत रहल अछि । सोझेँ मे खोपड़ीक ढेरी लागल छल । राम पुछलनि, कोन बातक अनर्थ ? मुनि कहलनि, ई मारल गेला मुनि सभक हड्डीक अम्बार थिक । हिनका सब केँ दुष्ट राक्षस सब मारि-मारिकय खेलक अछि । करुणा सँ रामक आँखि भरि गेलनि आर ओ बाजि उठलाह, ओ तखन दृढ़ प्रतिज्ञा कयलनि – “जे-जे राक्षस सब एहेन उत्पात कयलक अछि, तेकरा सब केँ हम संहार करब । हमर जीतक यश तीनू लोक मे पसरत । हे मुनि लोकनि, आब अपने सब चिन्ता जुनि करू । कि कहू ! आब बुझू जे नाव किनार लागि गेल ।” ॥१७-२६॥
अगस्त्य मुनिक शिष्य सुतीक्ष्ण नामक एक ऋषि छलाह । ओ शुचिता आ संयम सँ रहैत छलाह । मात्र हविष्य वस्तु खाइत छलाह । एकमात्र राम मंत्रक उपासक रहथि । राम मे हुनकर अनन्य भक्ति छलन्हि । हुनकर विवेक प्रशंसनीय रहनि । राम हुनकर आश्रम मे पहुँचलाह जाहिठाम सब मौसम एक्के संग मौजूद रहैत छल । राम अयलाह – ई जनिते सुतीक्ष्ण विधिवत् प्रणाम कय केँ हुनकर पूजा कयलनि । ओ कहलनि, “अपने अपन मंत्रक उपासक भक्त केर प्रति (अर्थात् हमरा प्रति) स्नेहक कारण स्वयं हमर आश्रम मे अयलहुँ । जिनका संसार भरि मे कियो नहि देखि सकैत छथि से, आर जे सभक मनरूपी घर मे सुतयवला छथि, तिनका हम अपन आँखि सँ देखलहुँ । जेकर मन अहाँक मंत्र केर जप मे नहि लगैत छैक, ओ माया मे फँसल रहैछ । जेना – जल भीतर सूरज केर छाया अवास्तविक अछि, तहिना ई स्वजन, सम्पत्ति आ घरबार मायाक कारण देखाय पड़ैत अछि । लीलावश सुन्दर मानव-देह धारण कय राजाक रूप मे अवतीर्ण व्यापक प्रभुक अद्भुत स्वरूप हम देखलहुँ । करोड़ों कामदेवक शोभावला धनुष-बाण धारण कएने परम रमणीय आ कमनीय, दयालु हृदय, मुँह पर मधुर मुस्कान वला रघुवर हमर जन्म-मरण केर भय केँ नष्ट करथि । जे निर्मल मृगचर्म पहिरने छथि, संग मे सीता छथिन, लक्ष्मण सेवा कय रहल छथिन, हुनका पर अटूट प्रीति अछि । जिनकर गुणक अन्त नहि अछि, जिनकर शरीरक रंग नीलकमल सन अछि, जे वीर सभक अग्रणी छथि, आर जिनकर मन मे परम शान्ति छन्हि – वेद केर कहब अछि जे वैह राम छथि, चिद्घन छथि तथा वैह मुनि लोकनिक मन मे निर्वेद (वैराग्य) केर रूप मे निवास करैत छथि । ई रूप हम जे एखन प्रत्यक्ष देखलहुँ, ताहि रूप मे प्रभु हमर हृदय मे बसथि ।” ॥२७-४१॥
मुनि सुतीक्ष्णक स्तुति सुनिकय राम कहलनि – “हम (अहाँ सँ) रोचक बात कहैत छी – जे हमर मंत्रक उपासना करयवला भक्त अछि आर हमेशा हमरा मे रमल रहैत अछि, हमरा प्रति भक्तिभाव रखैत अछि, ओ हमर दर्शन सँ मुक्ति पबैत अछि । ओकरा हमर दर्शन आसानी सँ भेटि जाइत छैक, ओकरा हम अवश्य तारि दैत छियैक ।” कमलनयन राम फेर आगू कहलनि, “अहाँ केँ हमर सायुज्य प्राप्त होयत । अहाँक गुरु मुनिवर अगस्ति तपस्वी शिष्य लोकनिक संग जेतय रहैत छथि, हम किछु दिन ओतय जा कय रहब । ओहिठामक रास्ता अहाँ हमरा देखा दिय’ । एतय रहैत बहुत दिन भ’ गेल । आब हम जायब । गुरु अगस्तिक दर्शन कय केँ फेर एतय आयब ।” ॥४२-४९॥
भोर होइतहि प्रभु रामचन्द्र विदा लय केँ चललाह । संग मे सीता आर लक्ष्मण रहथि । अगस्ति मुनिक छोट भाइ सुतीक्ष्ण मुनि संग चलिकय हुनका रास्ता देखौलनि ॥५०-५१॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः।
।श्री चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे आरण्यकाण्डक दोसर अध्याय समाप्त।
हरिः हरः!!

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