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मिथिलाभाषा रामायणः अयोध्याकाण्ड आठम अध्याय – भरत द्वारा राज्य अस्वीकृति आ राम केँ घुरेबाक प्रयास

830 भ्यूज

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – अध्याय आठम

भरत द्वारा राज्य अस्वीकृति आ राम केँ घुरेबाक प्रयास

।चौपाइ।

मुनि वसिष्ठ मंत्री-गण सहित । नृपतिक सभा गेला नृप-रहित ॥१॥
सुरपति-सभा समान विराज । अतिशय शोभित विबुध समाज ॥२॥
ब्रह्मा सन आसन-आसीन । धर्म्म-कर्म्म-रत धर्म्म-धुरीण ॥३॥
भरतहु काँ तत लेल बजाय । देश काल विधि कहल बुझाय ॥४॥
भरत सुमति शुनु कहल वसिष्ठ । कर्म्म शुभाशुभ काल बलिष्ठ ॥५॥
अहाँ महाशय महि सविवेक । करब अहाँक राज्य-अभिषेक ॥६॥
केकयि-कहल रहल सिद्धान्त । कहि गेला छल भूप नितान्त ॥७॥
राजा राज्य करिय स्वीकार । सभ लोकक अछि सत्य विचार ॥८॥
भरत कहल शुनु शुनु ई राज । हमरा नहि सपनहुँ मे काज ॥९॥
हम किङ्कर राजा श्रीराम । अनुचित नृपति बनब एहि ठाम ॥१०॥
नृपवर किङ्कर नृपति भिषारि । सन्मार्गक जनु टूटल आरि ॥११॥
सत्य कहैछी भुजा उठाय । हम नहि करब राज्य अन्याय ॥१२॥
केकयि-सुत बुझि जे जे कहब । हम अपराधी से से सहब ॥१३॥
लय अनितहु सत्वर तरुआरि । मन हो केकयि दीतहुँ मारि ॥१४॥
पतित मातृहा शुनि रघुनाथ । परश हमर नहि करता हाथ ॥१५॥
आनव तिनु जनकाँ घर फेरि । जायब जङ्गल प्रात सबेरि ॥१६॥
जटिल वेष धरणीमे शयन । व्रतनिधि देखब पंकजनयन ॥१७॥
जे विधि बनि वन बड़का भाय । गेला तेहिं गत हमहूँ जाय ॥१८॥
पयरहि चलब वनो व्यवहार । कन्द मूल फल प्राणाधार ॥१९॥
वन शत्रुघ्न सेहो चलताह । भवन सविघ्न वृथा रहताह ॥२०॥
चलु चलु गुरु तत होयब सहाय । अयबे करता बड़का भाय ॥२१॥
कहि चुप रहला जखना भरत । सभ्य सकल कह एहन के करत ॥२२॥
साधु कहल सज्जन-समुदाय । रघुनन्दन काँ समुचित भाय ॥२३॥
बड़ गोट मनमे छल अछि त्रास । भरत पुरत सबहिक मन आस ॥२४॥

भावार्थः

तखन मंत्री लोकनि सहित गुरु वसिष्ठ राज दरबार मे गेलाह जे कि राजाक उपस्थिति बिना सुन्न छल । ओ राजदरबार इन्द्र केर सभा समान विराजमान छल, जाहिठाम विबुध (पंडित एवं देवता लोकनिक) मंडली जुटल छल । ओतय ब्रह्माक समान आसन पर बैसल धर्म-कर्मपरायण धर्मोपदेशक मुनि वसिष्ठ भरत केँ सेहो बजा लेलनि आ हुनका उपदेश देलनि जे एहेन अवसर पर कि करबाक अछि । मुनि वसिष्ठ कहलनि – “हे बुझनुक भरतजी, सुनू । कर्मक अनुसारे नीक आ बेजा फल भेटैत छैक । काल प्रबल होइत छैक । अहाँ संसार मे उदार आ विवेकवान् छी, तेँ अहाँ केँ तिलक देब । कैकेयि जे कहली ओ अन्तिम रूप सँ तय भ’ गेल । अन्तिम समय राजा एनाही कहि गेला अछि । सब लोक केँ सचमुच यैह विचार अछि जे अहाँ राजा भ’ कय राज्य करी ।” ॥१-८॥

भरतजी कहलनि – “सुनल जाय, ई राज्य हमरा सपनों मे स्वीकार नहि अछि । हम केवल सेवक छी । राजा तँ रामचन्द्र छथि । एतय यदि हम राजा बनि बैसब त ओ अनुचित होयत । यदि सेवक राजा बनि बैसय आर राजा भिखारी भ’ जाय तखन त नीक परम्पराक बान्हे टूटि जायत । हम बाँहि उठाकय सच-सच कहैत छी, हम अन्यायपूर्वक राज्य नहि करब । हमरा कैकेयिक बेटा बुझिकय जे कोनो दुर्वचन कहब से हम चुपचाप सहि लेब, कियैक तँ हम अपराधी छी । मन त होइत अछि जे तुरत तलवार लय आबी आ कैकेयि केँ मारि दी । मुदा राम एना सुनता त हमरा मातृघाती पतित बुझिकय हमरा स्पर्शो नहि करता । हम हुनका तीनू गोटे केँ घर घुरा लायब । काल्हि भोरे वन जायब । जटा धारण करब, जमीने (माटिये) उपर सुतब आर व्रत केर पालन करैत वन जा कय कमलनयन राम केँ देखब । जेहेन वेश बनाकय हमर बड़का भैया वन गेलाह, ओहिना हमहूँ जायब । वनवासी लोकनिक रीति सँ पैदल चलब, प्राणक रक्षा लेल मात्र कन्द-मूल-फल खायब । शत्रुघ्न सेहो हमरा संगे चलताह ।घर विघ्न सब सँ ग्रस्त अछि, ओतय बेकारे रहत । हे गुरु महाराज, अपने सेहो चलू । अपने सहयोग करब । बड़का भैया राम अवश्य घुरि अओताह ।” एतेक कहिकय जखन भरत चुप भेलाह, तखन सभासद लोकनि बजलाह – “एहेन त्याग आर के कय सकैत अछि ।” सभाक लोक सब ‘वाह-वाह’ केर आवाज देलनि आ कहलनि – “भरत रामहि केर अनुरूप भ्राता छथि । मन मे बहुत भारी डर छल । भरत सभक मोनक इच्छा केँ पूरा कयलनि ।” ॥९-२४॥

।दोबय छन्द।

सगर नगरमे बाजल डङ्का, भरत न राजा हयता ॥२५॥
आनय हेतु राम नृप-वरकाँ पयरहि सानुज जयता ॥२६॥
सेना सम तैयार चलै सङ्ग साजल घोड़ा हाथी ॥२७॥
गुरु वसिष्ठ द्विज-गण महरानी, कौशल्यादिक जाथी ॥२८॥
चढ़लि पालकी केकयि रानी, सुमरि सुमरि निज करणी ॥२९॥
जाइ पताल तेहन हो लज्जा, फाटि जाथि जौं धरणी ॥३०॥
हा विधि गुणनिधि पुत्र पुतोहुक, कयल दुर्दशा भारी ॥३१॥
रघुनन्दन लक्ष्मण की कहता, कि कहति जनक-दुलारी ॥३२॥

भावार्थः

भरि नगर मे डंकाक आवाज संग ई खबरि पसैर गेल जे भरत राजा नहि बनताह । ओ लक्ष्मण-सहित राजा राम केँ घुरेबाक लेल पैदले वन केँ जयताह । सेना तैयार भ’ संग मे जेतनि । हाथी आ घोड़ा सजि गेल । गुरु वसिष्ठ, ब्राह्मण लोकनि आ कौशल्या आदि महारानी लोकनि सेहो चललिह । रानी कैकेयि अपन करणी याद कय-कय केँ ग्लानि मे डूबल पालकी पर चलि पड़लिह । हुनका एहेन लज्जा भ’ रहल छन्हि जे यदि धरती फाटि जाय त ओ ओहि मे समा जाइथ । ओ मन मे कहैत छथि – ‘हाय विधाता, हम गुणवान् पुत्र आ पुतोहु केँ भारी दुर्दशा कयलहुँ । राम आ लक्ष्मण कि कहताह आ जनकनन्दिनी सीता कि कहतिह ?” ॥२५-३२॥

।दोहा।

गजरथ गोरथ तरगरथ, शिविका सैन्य-समूह ॥३३॥
गुहो शुनलनि भरतागमन, मन मन कर किछु ऊह ॥३४॥
जौँ हम देखब राज्य-मद, तौँ न उतारब पार ॥३५॥
रामक कारण कण्ठ दय, समर करब अनिवार ॥३६॥

भावार्थः

हाथीवला रथ, बरदवला रथ, घोड़ावला रथ, पालकी सब आ सैनिक लोकनिक दल चलि पड़ल । निषादराज गुह केँ खबरि भेलनि जे भरत आबि रहल छथि । सुनिते देरी ओ तरह-तरह केँ तर्क-वितर्क करय लगलाह । “अगर हम हुनका मे राज्यक मद (राजा भ’ जेबाक अभिमान) देखब त हुनका पार नहि जाय देबनि, बल्कि रामक खातिर प्राण दय केँ दुर्दम्य युद्ध ठानि देब ॥३३-३६॥

।चौपाइ।

शृंगवेरपुर दल विशराम । छल छथि जेहि थल लक्ष्मण राम ॥३७॥
गुहजन यदपि निषादक जाति । साँठल भारहि भार उपाति ॥३८॥
कन्द मूल फल लागल ढेर । आगाँ राखल मिलइक बेर ॥३९॥
भरत स्वरूप देखल गुह जखन । संशय मनक मेटायल तखन ॥४०॥
चीराम्बर धर श्याम-शरीर । जटा-मुकुट धर जनु रघुवीर ॥४१॥
लेश न मन मे राजस रोच । राम राम रट मन बड़ शोच ॥४२॥
सीता लक्ष्मण नाम उचार । अकपट निकट देखल व्यवहार ॥४३॥
गुरु वसिष्ठ मन्त्री मिलि सङ्ग । संस्थित सानुज रामक रङ्ग ॥४४॥
कयल प्रणाम कहल गुह नाम । भरत हमर अछि निकटहि गाम ॥४५॥
गुह अहँ थिकहुँ कहैत उठि जाय । लेल भरत झट हृदय लगाय ॥४६॥
कुशल क्षेम अछि पुछल अनेक । मित्र अहाँकाँ विसद विवेक ॥४७॥
रामचन्द्र परमेश अनन्य । तनिसौँ मिललहुँ अहँ अतिधन्य ॥४८॥
रघुनन्दन सौँ वार्त्तालाप । गुह अहँ नियत भेलहुँ निष्पाप ॥४९॥
सीता सहित छला जत राम । मित्र शीघ्र चलु लय से ठाम ॥५०॥
नयन सजल थल देखितहि जाय । शयन कयल जत घास ओछाय ॥५१॥
सीताभरणक कनकक विन्दु । कहुँ कहु खण्ड खसल जनु इन्दु ॥५२॥
मन अति दुखित तखन भेल भरत । कह विधि विपति हमर कोना टरत ॥५३॥
अति सुकुमारि कुशासन शयन । मन बड़ व्याकुल देखइत नयन ॥५४॥
हमर निमित्त राम काँ कष्ट । केकयि-सुत बनि भेलहुँ नष्ट ॥५५॥
धन्य सुमित्रा लक्ष्मण धन्य । जनि काँ अछि रामक सौजन्य ॥५६॥
रामक सङ्ग सुयश सभ ठाम । भल के कहता केकयि नाम ॥५७॥
हम रामक दासक जे दास । तनिको दास एक मन आश ॥५८॥
छथि प्रभु कतय अहाँ काँ ज्ञात । मित्र कहू हम चलब प्रभात ॥५९॥
हमरे कारण सभक किछु दोष । रघुनन्दन मन तदपि न रोष ॥६०॥
घुरि घर चलता कहबनि कानि । होयत न हमर मनोरथ हानि ॥६१॥
रघुपति-भक्त भरत अहँ धन्य । सकल-लोक-सम्मानित गण्य ॥६२॥
एहन न भक्ति शुनल छल कान । अपनैँ काँ देखि भेलि प्रमान ॥६३॥

भावार्थः

दल शृंगवेरपुर मे आबिकय विश्राम कयलक जेतय राम आ लक्ष्मण ठहरल छलाह । यद्यपि गुह लोकनि निषाद जातिक रहथि तथापि ओ सब भार भरिकय उपाति (भोजन-सामग्री सब) सजा-सजाकय लय अनलनि । कन्द-मूल-फल केर अम्बार लागि गेल आ भेंट केर समय ओ वस्तु सब हुनका सभक सोझाँ राखि देल गेल । गुह जहिना भरतक बाना (रूप) देखलनि हुनकर मोनक आशंका दूर भ’ गेलनि । भरत श्यामवर्ण केर शरीर मे चीवर धारण कएने रहथि । जटा केँ मोड़िकय मुकुट बनौने रहथि । लगैत छल जेना स्वयं रामचन्द्र होइथ । हुनकर मोन मे राजसत्ताक दर्प केर लेश तक नहि छल । राम-राम रटि रहल छथि । मोन मे गहींर पीड़ा छन्हि । सीता आ लक्ष्मण केर नाम लय रहल छथि । गुह शुद्ध हृदय सँ नजदीक सँ हुनकर आचरण देखलनि । ओ गुरु वसिष्ठ आ मंत्री लोकनिक संग अनुज शत्रुघ्न-सहित विराजमान छथि । हुनक आभास राम-समान लगैत अछि । गुह हुनका प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “हे भरत, हम गुह छी । हमर गाम लगे मे अछि ।” ‘अहाँ गुह छी ?’ एना कहैत भरत उठिकय ठाढ़ भ’ गेलाह आ तुरत हुनका छाती सँ लगा लेलनि । बेर-बेर पुछलनि – “कहू हे मित्र, कुशल-क्षेम त अछि ? अहाँ बड विवेकी (ज्ञानवान्) छी । रामचन्द्र साक्षात् परमेश्वर छथि । हुनका सँ अहाँ भेटलहुँ, तेँ अहाँ धन्य छी । हे गुह, अहाँ रघुनन्दन राम सँ बातचीत कयलहुँ, एहि अहाँ अवश्य पापहीन भ’ गेलहुँ । हे मित्र, हमरा जल्दी ओहि स्थान पर लय चलू जेतय सीता-सहित राम रुकल रहथि ।” जाकय ओहि स्थान केँ देखिते, जेतय राम घास बिछाकय शयन कएने रहथि, भरतक आँखि मे नोर भरि गेलनि । घासक ओहि बिछाउन पर कतहु-कतहु सीताक गहना केर बिन्दिया खसल छल, जे लगैत छल जेना चान केर टुकड़ा छिड़ियायल हो । फेर ओ देखिकय भरक मोन परम दुःखी भ’ गेलनि । ओ बजलाह – “हाय विधाता, हमर विपदा कोना टलत । अत्यन्त कोमलांगी सीता कुशक आसन पर सुतलिह, ई देखि हमर नयन बड व्याकुल भ’ गेल । हमरे चलते राम केँ ई सबटा कष्ट उठबय पड़लन्हि । हम कैकेयि केर बेटा भ’ कय नष्ट भ’ गेलहुँ । धन्य छथि सुमित्रा, आर धन्य छथि लक्ष्मण, जिनका उपर रामक अपार सिनेह छन्हि । रामक संग हर जगह सुयश अछि । कैकेयि केँ के भला कहतनि ? हमर मोन मे एकटा यैह कामना अछि जे हम रामक दास केर दास बनी । हे मित्र गुह ! बताउ, कि अहाँ केँ पता अछि जे राम कतय छथि ? हम भोरे ओतय जायब । सबटा अनर्थ हमरहि खातिर भेल अछि, तैयो राम केर मोन मे हमरा प्रति कनिको क्रोध नहि छन्हि । कानि-कानिकय मनेबनि । ओ तखन घर घुरि जेताह । हमर मनोरथ निष्फल नहि होयत ।” तखन गुह कहलनि – ‘हे रघुपतिभक्त भरत, अहाँ धन्य छी । सारा संसार मे अहाँक सम्मान अछि, अहाँक प्रतिष्ठा अछि । एहेन भक्ति तँ कतहु सुननहि नहि छलहुँ । अहाँ केँ देखियेकय विश्वास भ’ गेल जे एहनो भक्ति भ’ सकैत अछि ॥३७-६३॥

।दोहा।

चित्रकूट मन्दाकिनी, निकट कुटी निर्म्माय ॥६४॥
सानुज सीताराम छथि, कहब देब पहुचाय ॥६५॥

भावार्थः

चित्रकुट मे गंगाक किनार पर कुटी बनाकय लक्ष्मण-सहित सीता आ राम रहैत छथि । आज्ञा हो त’ पहुँचा दी ।” ॥६४-६५॥

॥चौपाइ॥

भरत कहल सुरसरिता तरिय । मित्र उपाय तेहन अहँ करिय ॥६६॥
गुह कह भरत विलम्ब न आब । कयलहुँ वृत्त पाँच शय नाव ॥६७॥
राज-नाव एक अपनहि खेबि । गुह आनल सभसौँ भल टेबि ॥६८॥
कौशल्यादिक सानुज भरत । गुरु वसिष्ठ एहिसौँ सन्तरत ॥६९॥
सकल सैन्य गुण उतरल पार । घोड़ा हाथी भरिया भार ॥७०॥
उठइत चलइत पथ विश्राम । कहल सकल जन सीताराम ॥७१॥

भावार्थः

भरत कहलनि – “हे मित्र, अहाँ एहेन व्यवस्था कय दिय’ जे हम गंगा पार करी ।” गुह कहलनि – “हे भरत, एहि मे आब देरी कि अछि ? पाँच सौ नाव तैयार अछि ।” गुह ओहि नाव सब मे सँ एक गोट राजनाव चुनिकय स्वयं खेबिकय आनि लेलनि । एहि नाव सँ कौशल्या आदि माता लोकनि, शत्रुघ्न सहित भरत आ गुरु वसिष्ठ पार उतरलथि । सब सैनिक, हाथी, घोड़ा, कुली आ सहयोगी सब पार उतरल । उठैत-चलैत, रास्ता मे विश्राम करैत सब लोक ‘सीता-राम’ केर रट लगबैत रहलाह ॥६६-७१॥

।दोहा।

भरद्वाज-आश्रम निकट, सभ कयलनि विश्राम ॥७२॥
गेला सानुज भरत तत, मुनि-पद कयल प्रणाम ॥७३॥

भावार्थः

भरद्वाज केर आश्रम लग आबिकय सब गोटे विश्राम कयलनि । शत्रुघ्न आ भरत दुनू भाइ आश्रम मे गेलाह आ भरद्वाज मुनिक चरण मे सिर झुकौलनि ॥७२-७३॥

।चौपाइ।

मुनिकैँ केकयि-तनय चिन्हार । कुशल क्षेम पुछलनि व्यवहार ॥७४॥
कहु कहु भरत अहाँ महराज । आयलछी की मुनिक समाज ॥७५॥
की अहँ जटा बनाओल केश । हँसी करत जे देखत देश ॥७६॥
रामक सन वलकल की धयल । भूपति भय अति अनुचित कयल ॥७७॥
कन्द मूल फल निःफल खाइ । जङ्गल जङ्गल जनु बौआइ ॥७८॥
भरत अहाँ घुरिकेँ घर जाउ । बड़ गोट राज्यक सुखकेँ पाउ ॥७९॥

भावार्थः

कैकेयि केर पुत्र भरत केँ मुनि भरद्वाज चिन्हैत रहथि । ओ शिष्टाचार मुताबिक कुशल-क्षेम पुछलनि । ओ बजलाह, “हे भरत ! कहू, महाराज दशरथ कतय छथि ? अहाँ मुनि लोकनिक मंडली मे कियैक आयल छी ? अहाँ सिर पर जटा कियैक बनेलहुँ ? देशक लोक देखत त हँसी करत । अहाँ राम जेकाँ वल्कल कियैक पहिरि रखने छी ? अहाँ राजा भ’ कय ई अनुचित काज कयलहुँ । कन्द-मूल-फल व्यर्थ खाइत छी । अहाँ वने-वने जुनि बौआउ । हे भरत ! अहाँ घुरिकय घर जाउ । अहाँक राज्य बड पैघ अछि, जा कय राज्यसुख भोगू ।” ॥७४-७९॥

।सोरठा।

सभ अपनैँ काँ ज्ञात, कृपा करिय कारुणिक मुनि ॥८०॥
कहि नहि होइछ तात, सजल-नयन कहलनि भरत ॥८१॥

भावार्थः

नोर भरल आँखि सँ भरत कहलनि – “हे मुनि ! कि कहू । कहल नहि जाइत अछि । अपने केँ त सब किछु बुझले अछि । हे करुणानिधान मुनि ! हमरा उपर कृपा करू ॥८०-८१॥

।चौपाइ।

कयल राम-राज्यक अविघात । केकयि से हमरा नहि ज्ञात ॥८२॥
मुनि हम छलछी मामक ग्राम । वन अयला सानुज श्रीराम ॥८३॥
कहइतछी छुबि अपनैँक चरण । हमरा नहि कलहक आचरण ॥८४॥
ई कहि मुनिपद छुइलनि जाय । अपनैँ सौँ मन कि रह नुकाय ॥८५॥
जनइत छी हम पाप अपाप । अनुचित कयलनि माता बाप ॥८६॥
हमरा नहि राज्यक अधिकार । प्रभु-पद-किङ्कर एहन विचार ॥८७॥
रामचन्द्र-पद मन आरोपि । राज्य-भार हुनकहि देव सोपि ॥८८॥
हमरा मनमे मुनि दृढ टेक । रामक करब एतहि अभिषेक ॥८९॥
छथि गुरुजन पुरजन समुदाय । सङ्ग नगर कर्त्तव्य सहाय ॥९०॥
प्रभुकाँ अपन नगर लय जयब । तनि चरणक किङ्कर हम हयब ॥९१॥
मुनि कह साधु साधु अहाँ भरत । अपथ कि अहँक हृदय सञ्चरत ॥९२॥
रघुनन्दनक अहाँ महाभक्त । सौमित्रिहुँ सौँ मन अनुरक्त ॥९३॥
हम आतिथ्य करब किछु आइ । बाबू भरत आइ जनु जाइ ॥९४॥
ज्ञान-नयनसौँ सभ अछि ज्ञात । कयल अमर-गण सभ उतपात ॥९५॥
स्मरण कयल मुनि भारद्वाज । कामधेनु करु समुचित काज ॥९६॥
आयल छथि पाहुन बड़ गोट । भोज्य वस्तु वर्षण हो ओट ॥९७॥
एकर मर्म्म आन नहि जान । दिव्य वस्तु भोजन विधि पान ॥९८॥
कामधेनु-कृत सभ सम्पन्न । जनिकाँ जेहन तेहन तत अन्न ॥९९॥
मुनिक पठाओल दिव्य उपाति । सुखसौँ सभ जन खयलनि राति ॥१००॥
कयल वसिष्ठक मुनि सत्कार । तखन भरत-वर्ग्गक व्यवहार ॥१०१॥
कयल भरत उठि मुनिक प्रणाम । सुखसौँ एतय कयल विशराम ॥१०२॥
भोर भेल आज्ञा देल जाय । सभ जन चलब महेश मनाय ॥१०३॥
भरद्वाज मुनि कहलनि जाउ । रघुनन्दन सौँ दर्शन पाउ ॥१०४॥

भावार्थः

रामक राज्याभिषेक मे कैकेयि जे विघ्न कयलिह, से हमरा नहि बुझल छल । हे मुनि ! हम त मामागाम गेल रही । ताहि बीच लक्ष्मण-सहित राम वन चलि गेलाह । हम अहाँक पैर छुबिकय कहैत छी, ई विरोधक काज हम नहि कयलहुँ अछि ।” एतेक कहिकय भरत मुनि भरद्वाजक पैर छुलाह आ फेर बजलाह – “अपनेक मन सँ कि छुपल अछि । हम जनैत छी जे कि पाप अछि आ कि पुण्य । हमर माता आ पिता अनुचित कयलनि अछि । हमरा राज्य पेबाक हक नहि अछि । हम त अपना केँ प्रभु राम केर चरणक सेवक मानैत छी । मोन मे रामचन्द्रक पद केँ राखिकय हुनके ई राज्य सौंपि देब । हम अपन मोन मे ई दृढ़निश्चय कय लेने छी जे एतहि रामक तिलक कय देब । गुरुजन, नगरनिवासी सब एहि काज मे संग दयवला एतय उपस्थिते छथि । प्रभु रामचन्द्र केँ हम अपन नगर लय आनब । हम हुनकर चरण केर दास बनब ।” मुनि कहलनि – “वाह, वाह भरत ! अहाँक हृदय कहियो कुमार्ग मे नहि जायत । अहाँ राम केर बड पैघ भक्त छी । लक्ष्मण सँ सेहो अहाँ केँ बहुते स्नेह अछि । बबुआ भरत, आइ हम अपने लोकनिक आतिथ्य करब । अपने आइ जुनि जाउ । ज्ञानरूपी आँखि सँ हम सब किछु देखैत छी । ई सारा उपद्रव देवता लोकनि कयलनि अछि ।” तखन मुनि भरद्वाज अपन कामधेनु केर स्मरण कयलनि आ कहलनि – “हे कामधेनु ! आब जे उचित अछि से काज करू । बहुते पैघ अतिथि सब आयल छथि । खेबाक-पीबाक चीज सभक अपार वर्षा करू । एहि तरहें बरसायब जे केकरो लक्षित नहि हो । नाना प्रकारक दिव्य भोज्य आ प्रेम बरसाउ ।” कामधेनु सब किछु पूरा कय देलनि । जिनका जेहेन भोजन चाही हुनका ओहने भोजन भेटि गेलनि । सब गोटे ओहि राति मुनिक पठायल दिव्य भोजन सुख सँ पयलनि । मुनि भरद्वाज पहिने मुनि वसिष्ठक सत्कार कयलनि, तखन भरत आदिक आचारानुसार सम्मान कयलनि । भरत उठिकय मुनि भरद्वाज केँ प्रणाम कयलनि, फेर ओहि आश्रम मे सुविधापूर्वक विश्राम कयलनि । भोर भेल । भरत मुनि भरद्वाज सँ कहलनि – “आब जेबाक आज्ञा देल जाउ । शिव केँ मनाकय हम सब आब प्रस्थान करब ।” भरद्वाज मुनि कहलनि – “जाउ आ रामक दर्शन पाउ ।” ॥८२-१०४॥

।दोवय छन्दः।

सानुज भरत सुमन्त सङ्ग मे, गुह निषाद अनुरागी ॥१०५॥
चित्रकूट पर्व्वत तट गेला, जतय बहुत मुनि त्यागी ॥१०६॥
सैन्य सकल गिरि नीचहि राखल, कयलनि भरत पुछारी ॥१०७॥
बासा कतय कयल रघुनन्दन, लक्ष्मण जनक-दुलारी ॥१०८॥
आम सफल भल भल फल कटहर, केरा घौड़िहि पाकल ॥१०९॥
कोविदार चम्पा बकुलादिक, बहुत जतय जे ताकल ॥११०॥
मन्दाकिनी गङ्गासौँ उत्तर, गिरिसौँ पश्चिम आशा ॥१११॥
सीता सहित सलक्ष्मण रामक, श्रीधर सुन्दर बासा ॥११२॥

भावार्थः

छोट भाइ शत्रुघ्न, सुमन्त आ प्रिय निषादराज गुहक संग भरत चित्रकूट पर्वतक किनार पर पहुँचि गेलाह, जेतय बहुते रास संन्यस्त मुनि लोकनिक आश्रम छल । भरत सारा सेना केँ पहाड़क नीचें राखि देलनि । स्वयं अन्वेषण करय चललाह जे लक्ष्मण आ सीताक संग रामक आश्रम कतय अछि । देखलनि जे आम आ कटहरक गाछ फल सँ लदल अछि । केराक फल गाछहि मे पाकल अछि । कचनार, चम्पा, बकुल आदिक गाछ सब जहाँ-तहाँ नजरि अबैत अछि । मन्दाकिनी गंगा सँ उत्तर दिश, पर्वत सँ पश्चिम लक्ष्मण आ सीता सहित रामक सुन्दर आवास अछि ॥१०५-११२॥

।सोरठा।

मुनिजन देल देखाय, श्रीरघुनन्दन‍-वन-भवन ॥११३॥
भरत चलल अगुआय, बहुत हर्ष उत्कर्ष मन ॥११४॥
मुनिजन-सेवित धाम, तरु लटकल बलकल अजिन ॥११५॥
राम-भवन अभिराम, सानुज देखल दूरसौँ ॥११६॥

भावार्थः

मुनि सब रामक वन-कुटी देखा देलनि । देखिकय हुनकर मन हर्षित भ’ गेलनि आर ओ आगू बढ़ैत चललाह । दूरे सँ शत्रुघ्न-सहित भरत रामक सुन्दर कुटी देखलनि, जेतय बहुते रास मुनि लोकनिक निवास छलन्हि, आर मुनि सभक परिधान गाछक छाल आ मृगचर्म सब गाछ सब पर लटकल छल ॥११३-११६॥

॥इति श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे अयोध्याकाण्डे अष्टमोऽध्यायः॥

॥श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अयोध्याकाण्डक आठम अध्याय समाप्त॥

हरिः हरः!!

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