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मिथिलाभाषा रामायण – अयोध्याकाण्डः पाँचम अध्याय – श्री राम, सीता ओ लक्ष्मणजीक वन लेल प्रस्थान

1472 भ्यूज

स्वाध्याय पाठ

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण 

अयोध्याकाण्ड – पाँचम अध्याय

वन के लेल राम, लक्ष्मण आ सीताक प्रस्थान

।चौपाइ।

।राग-तरङ्गिणी-ग्रन्थानुसारेण मंगलराज-विजय छन्दः।

केकयि कयल कुठाठ कठोर । गुपचुप रहल न भय गेल सोर ॥१॥
केकयि-कृत शुनि शुनि उतपात । कह पुरजन बड़ कयलक घात ॥२॥
देति राम काँ विपिन पठाय । देखल न एहन कसाइनि माय ॥३॥
कतहु कि केओ कहत भल लोक । शुनितहिँ सभकाँ होइछ शोक ॥४॥
ककरा नयन बहय नहि नोर । धिक धिक जीवन केकयि तोर ॥५॥
मूढ़ि मन्थरा कहलक जैह । महरानी भय मानल सैह ॥६॥
बसय योग्य नहि ई थिक देश । जतय रहल नहि नीतिक लेश ॥७॥
वनिता-कारण सुत वनवास । कतगोट दशरथ नृपकाँ हास ॥८॥
चलु चलु सभ जन रामक सङ्ग । राजा रानीक जानल रङ्ग ॥९॥
बरु दुख गौरव रौरव जाइ । एहन समाज बसिअ नहि भाइ ॥१०॥
पयरहि चलती जनक-कुमारि । अति सुकुमारि स्वकीया नारि ॥११॥
आब रहल नहि ककरो शक्क । केकयि डाकिनि दशरथ ठक्क ॥१२॥
की सुख मे भेल आनक आन । विधिगति अछि सभ सौँ बलवान ॥१३॥
पशु पक्षी तृण भक्ष्य न खाय । लता वृक्ष सभ गेल सुखाय ॥१४॥
केकयि-हृदय अशनि सन थीक । कयलक ककरो ई नहि नीक ॥१५॥
यमराजा सौँ कहथि मनाय । एखनहि जौँ केकयि मरि जाय ॥१६॥
पूजा करब लेब नित नाम । घर मे रहता सीता-राम ॥१७॥
साधुवृन्द भेल व्याकुल-चित्त । वामदेव मुनि कहल निमित्त ॥१८॥
शोच न करिअ धरिअ मन धीर । विष्णु अनादि थिकथि रघुवीर ॥१९॥
लक्ष्मी माया जानकि जानु । वासुकि लक्ष्मणकाँ जिअ मानु ॥२०॥
विधि हरि हर छथि त्रिगुण सरूप । कि कहब हिनकर चरित अनूप ॥२१॥
प्रलय म धयल मत्स्य अवतार । वैवस्वत मनु पालन-हार ॥२२॥
मथन समुद्र भेल जेहि बेरि । मन्दर गेल सुतलमे फेरि ॥२३॥
कमठ-रूप बनि पर्व्वत धयल । उदधि सुरासुर मन्थन कयल ॥२४॥
धरणी जखन रसातल जाय । शूकर-तन बनि लेल उठाय ॥२५॥
फाड़ल कनककशिपु हठ वक्ष । विधि प्रभृतिक दुखहरण मे दक्ष ॥२६॥
नारसिंह-तनु नख अति चोष । दुष्ट सहत के तनिकर रोष ॥२७॥
वामन-तन बलि-छलनक काज । अदितिक अनुमति सुरपति-राज ॥२८॥
परशुराम पुन एक अवतार । क्षत्रिय-क्षय-कर हर महि भार ॥२९॥
रावणादि वध करता जैह । राम थिकथि परमेश्वर सैह ॥३०॥
बड़ तप कयलनि दशरथ भूप । पुत्र-कामना देखल स्वरूप ॥३१॥
सीता माया थिकि तनि सङ्ग । जे चाहथि से करथि तरङ्ग ॥३२॥
लक्ष्मण रामक थिकथि सहाय । वन जयताह सङ्ग दुहु भाय ॥३३॥
राजा-केकयि-कृत नहि दोष । कथिलय शोक हेतु की रोष ॥३४॥
पूर्व्वहि दिन नारद कहि गेल । भूपहु काँ मति ईश्वर देल ॥३५॥
रामचन्द्र कयलनि स्वीकार । चिन्ता त्यागिअ करिय विचार ॥३६॥
नित्य रामजप निर्म्मल चित्त । रवि-सुत-भय नहि तनिक निमित्त ॥३७॥
शुनु पुन कलिमे आन न युक्ति । राम राम रटलहिँ हो मुक्ति ॥३८॥
काल जनिक डर थर थर काँप । दुख शङ्कर की तनिका व्याप ॥३९॥
मुनि गेल अनत बुझल सभ लोक । किछु किछु छूटल मानस शोक ॥४०॥
भूपक निकट मुदित सुखधाम । अविकल कहल जाय श्रीराम ॥४१॥

भावार्थः

कैकेयि जे भारी विघटन कयलनि से नुकायल नहि रहल, तुरन्त चारूदिश पसैर गेल । कैकेयि केर कयल उत्पात सुनि-सुनिकय नगरवासी लोक सब बाजय लगलाह – “अरे ई त बड़ा भारी घात कयलनि । राम केँ जंगल पठा देलनि, एहेन कसाइन माता त कहियो नहि देखल गेल । कि एकरा कतहु कियो भला कहत ! सुनैत देरी सभक मोन मे शोक पसैर गेल अछि । केकर आँखि मे नोर नहि आयल । हे कैकेयि, तोहर जीवन केँ धिक्कार छह । मूर्ख मन्थरा जे-जे कहलकह, महरानी भ’ कय ओ सबटा मानि लेलनि । आब ई देश बसबाक योग्य नहि रहल, जेतय नामोमात्रक न्याय नहि रहल । स्त्रीक खातिर बेटा केँ वनवास देलनि, एहि सँ राजा दशरथ केँ कतेक पैघ अयश भेलनि । चलू, सब मिलिकय राम लग चली । राजा-रानीक रंग त देखिये लेलहुँ । भले हि भारी कष्टदायक रौरव-नरक चलि जायब, मुदा एहेन समाज मे बसबाक नहि चाही । राजा जनकक बेटी पतिव्रता नारी परम सुकुमारी सीता पैदल चलतिह । आब ई बात केकरहु वश मे नहि रहल । कैकेयि डाकिनी भ’ गेलि आ राजा दशरथ ठकहरबा भ’ गेलाह । केना रंग मे भंग भ’ गेल ! होनी सब सँ भारी बलवान् होइत अछि । शोक सँ माल-जाल (मवेशियो सब) खेनाय छोड़ि देलक आ पक्षी सब चरनाय छोड़ि देलक । गाछक ठाढ़ि-पात (लता) आ गाछो सब सुखा गेल अछि । कैकेयि केर हृदय बज्र-सन (कठोर) अछि । ओ केकरो भलाइ नहि कयलक ।” ॥१-१५॥

नगरक लोक यमराज केँ मनाबय लगलाह – “यदि कैकेयि एखनहि मरि जायत हम सब, हे यमराज, अहाँ पूजा करब, आ नित्य नाम जपब । सीता आर राम तखनहिं टा घर मे रहि पेताह ।” साधु-सन्त सभक चित्त सेहो व्याकुल भ’ गेलनि । ऋषि बामदेव एहि घटनाक कारण बुझेलनि । “शोक जुनि करय जाउ । मोन मे धीरज राखू । राम अनादि ईश्वर विष्णु थिकाह । जानकी माया-रूप मे लक्ष्मी छथि आ लक्ष्मण वासुकि नाग छथि । ई सब सत्त्व, रज आ तम – तीनू गुणक तीन रूप ब्रह्मा, विष्णु आ शिवस्वरूप छथि । हिनक अद्भुत चरित केर वर्णन हम कतय धरि करू ? ई महाप्रलय केर समय ‘मत्स्य’ केर स्वरूप धारण कयलनि आ वैवस्वत मनुक रक्षा कयलनि । जाहि समय समुद्र-मन्थन भेल आर मन्दार पर्वत रसातल जाय लागल, ताहि समय ई ‘कच्छप’ केर रूप धारण कय केँ मन्दराचल केँ अपन पीठ पर धारण कयलनि, आर देवता लोकनि व असुर सब मिलिकय समुद्र मन्थन कयलक । जखन धरती रसातल जाय लागल तखन ओ ‘बराह’ केर रूप धारण कय एकरा उठा लेलनि । फेर ई एकदम तीख-तेज नह (नाखून) वला ‘नरसिंह’ केर रूप धारण कय केँ बलपूर्वक हिरण्यकशिपु केर छाती केँ चिरलनि । एखन ब्रह्मा आदि देवता सभक दुःख केँ दूर करबाक समय अछि । हिनकर क्रोधक सामना कोन दुष्ट कय सकत । ई फेर अदितिक अनुमति पाबिकय इन्द्रक काज सँ राजा बलि केँ छलबाक लेल ‘वामन’ रूप धारण कयलनि । फेर ई एकटा अवतार ‘परशुराम’ केर रूप लेलनि आ क्षत्रिय सभक संहार कय केँ धरतीक भार दूर कयलनि । ई ‘राम’ वैह परमेश्वर छथि जे रावण आदिक वध करताह । राजा दशरथ पुत्र केर कामना सँ बहुत तप कयलनि आ ओ राम केर रूप मे ईश्वर केँ देखलनि । सीता हुनका संग मायास्वरूपा छथि जे इच्छानुसार जगत् केर रचना करैत छथि । लक्ष्मण राम केर सहायक छथि । दुनू भाइ संग-संग वन जेताह । एहि मे राजा दशरथ आ रानी कैकेयि केर कोनो कसूर नहि छन्हि । फेर अहाँ सब कियैक शोक करैत छी आ कियैक क्रोध मे अबैत छी । पैछले दिन नारद कहि गेल छथि । राजा केँ सेहो ईश्वरे एहेन गति देलनि अछि । रामचन्द्र स्वीकार कय लेलनि अछि । एना सोचिकय चिन्ता छोड़ू । जे युद्ध चित्त सँ नित्य राम-नाम जपब ओकरा यम केर कोनो भय नहि रहत । आर सुनू, कलियुग मे दोसर कोनो उपायो नहि अछि, मात्र राम-नाम जपला सँ मुक्ति भेटैत अछि । जिनकर डर सँ काल (यमराज) सेहो थरथराइत छथि, हुनकर बारे मे दुःखक आशंका करब बेकार अछि ।” एतेक कहिकय मुनि बामदेव अन्यत्र चलि गेलाह । लोक सब केँ यथार्थ बात बुझय मे अयलनि । हुनका सभक मोन सँ शोक बहुत हद तक दूर भ’ गेलनि । तखन सुखक खजाना प्रसन्नचित्त श्रीराम राजा दशरथ लग जाकय साफ-साफ कहलनि ॥१६-४१॥

।दोहा।

लक्ष्मण सीता सहित हम, अयलहुँ केकयि माय ॥४२॥
नृप-आज्ञा सुनि लेब किछु, अपनैक साध्य उपाय ॥४३॥
पिता वृद्ध सौजन्यमय, सत्य-प्रतिज्ञ उदार ॥४४॥
वन-गमनेँ अयलहुँ निकट, सह-लक्ष्मण सह-दार ॥४५॥

भावार्थः

हे माता कैकेयि! लक्ष्मण आ सीता सहित हम अपनेक कामना पूरा करबाक लेल आबि गेल छी । पिताजीक किछु आज्ञा सुनबाक अछि । पिता बूढ़ छथि, सज्जन छथि, सत्य पर अटल रहयवला आ उदार छथि । हम लक्ष्मण आ सीता सहित वन जेबाक वास्ते हुनका लग अयलहुँ अछि ॥४२-४५॥

।गीतछन्दस्तु मिथिलासंगीतानुसारेण धनछी मालवीयम्।

(१)

पिता रहु हमरा उपर दयाल ॥४६॥
सीता लक्ष्मण सहित विपिन हम जाइत छी यहि काल ॥४७॥
परिहरु शोक शरीर वृद्ध अछि कम्म लिखल फल भाल ॥४८॥
प्रजा-दुःख सभ भरत हरत नित कि कहत जन वाचाल ॥४९॥
कन्द मूल फल वन बसि खायब ओढ़ब हम मृगछाल ॥५०॥
गुरु गारुड़िक मन्त्र जनइत छी वाधा करत न व्याल ॥५१॥
वन जायक हमरा भेल आज्ञा दुइ हठि आगत हाल ॥५२॥
हाहा रामचन्द्र नृप कहलनि मनमे आधि विशाल ॥५३॥

भावार्थः

हे पिता, अपने हमरा उपर दया राखी । हम सीता आ लक्ष्मण केर संग एखनहिं वन जा रहल छी । अपने शोक एकदम नहि करब । अपने शरीर सँ बूढ़ भ’ गेल छी । बाजयवला जे बाजथि से बाजथि । हम वन मे रहिकय कन्द-मूल-फल खायब आ मृगछाला ओढ़ब । गुरु गारुड़िक मंत्र जनैत छी, साँप हमरा कोनो बाधा नहि करत । वन जेबाक आज्ञा त असगर हमरा भेल छल, मुदा ई दुनू जिद्द कय केँ संग भ’ गेल छथि ।” एतेक सुनिकय राजा दशरथ ‘हा हा रामचन्द्र!’ चिकरय लगलाह आ मोन मे भारी शोक पसैर गेलनि ॥४६-५३॥

(२)

चरणमे जानकि गेलि लपटाय ॥५४॥
गुरु सङ्कोच शोच बड़ भारी, कहलनि किछु न लजाय ॥५५॥
कहलनि लक्ष्मण थिकथि जनकजा केकयि दुर्ग्रह पाय ॥५६॥
बड़ हठ ठानल कहल न मानल कि करथु बड़का भाय ॥५७॥
नव-पल्लव पङ्कज-दल सन पद, शिरिस सुमन मृदु काय ॥५८॥
से पुन पयरहि कानन जायती, कि कहब केकयि माय ॥५९॥
दशरथ कहलनि हम बड़ पापी, कयल कठिन अन्याय ॥६०॥
हाय सकल सुख नाशि बैसलहुँ, शोक-समुद्र समाय ॥६१॥

भावार्थः

सीता राजा दशरथक चरण सँ लिपटि गेलिह । गुरुजन लोकनिक आगाँ लाज होइत छलन्हि । चित्त शोक सँ व्याकुल छलन्हि । लजाइते ओ किछु नहि बजलिह । लक्ष्मण बजलाह – ‘ई जनकनन्दिनी सीता छथि, ई कैकेयिक हठक फलस्वरूप रामक संग वन जेबाक हठ ठानि देलिह, आर मना कयलो पर नहि मानलिह । बड़ भाइ राम कि करथि । हिनकर पैर नव-पल्लव समान आ कमलक पंखुड़ी जेकाँ कोमल छन्हि आ हिनकर शरीर शिरीष केर फूल-जेहेन कोमल छन्हि । ई सीता पैदले वन जेतिह । माता कैकेयि केँ कहबनि की!” राजा दशरथ बजलाह – “हम बड पापी छी, हमहीं क्रूर अन्याय कयलहुँ अछि । हँ, हम अपने सबटा सुख केँ गमाकय शोकसिन्धु मे डूबि गेलहुँ ।” ॥५४-६१॥

।चौपाइ।

।मैथिललोचनशम्म – सङ्गीतानुसारेण घनछी-पञ्चस्वरा छन्दः।

शुनि केकयि उठि सत्वर जाय । मुनिक चीर काँ लइलि उठाय ॥६२॥
देलनि तिनुजनकाँ ओ चीर । प्रथमहि पहिरल श्रीरघुवीर ॥६३॥
अपन वसन कयलनि परित्याग । कह केकयि हसि सुन्दर लाग ॥६४॥
सीताकाँ मन उपगत लाज । पहिर न जानथि गुरुक समाज ॥६५॥
धयल दुहूटा रामक हाथ । मुख देखलनि बुझलनि रघुनाथ ॥६६॥
वसन राम राखल लपटाय । राजदार देखि भूमि लोटाय ॥६७॥
गुरु वसिष्ठ काँ देखि न भेल । धिक धिक केकयि कुमति कि लेल ॥६८॥
कालकूट सौँ किछु घट्टि । कि कहब भेलहुँ अहाँ निरहट्टि ॥६९॥
एतय न भरत नृपक ई हाल । बाघिनि सनि अहाँ बनलहुँ काल ॥७०॥
लक्ष्मण वीर ठाढ़ सन्नद्ध । डर नहि करता कचबाबद्ध ॥७१॥
केकयि तखन कहल हसि फेरि । देल सनेहै चलइक बेरि ॥७२॥
केकयीक की हृदय कठोर।  कि हयत दुर्ग्गति आगाँ तोर ॥७३॥
एक बेर रामचन्द्र वनवास । लक्ष्मण सीताकाँ की त्रास ॥७४॥
देल कि सीताकाँ इ चीर । देखलय ककर जीव रह थीर ॥७५॥
रामक सङ्ग पतिव्रत काज । जाइत छथि अहँकाँ नहि लाज ॥७६॥
नैहर हिनकर तिरहुति थीक । कर्म्म हिनक सभटा अछि नीक ॥७७॥
दिव्याम्बर वर गहना गात्र । पतिव्रता की दुःखक पात्र ॥७८॥
नृप कह रथ सुमन्त लय आउ । रामचन्द्रकाँ विपिन देखाउ ॥७९॥
कसि रथ आयल कहलनि राम । चढ़बे रथ पर बाहर गाम ॥८०॥
देखल तिनु जन काँ नृप नयन । शोकवृद्ध नहि मन मे चयन ॥८१॥
कयल प्रदक्षिण बापक राम । लक्ष्मण रखन तेहन तहिठाम ॥८२॥
भूप-कोट सौँ बाहर जाय । रथ छल ठाढ़ देखल दुओ भाय ॥८३॥
सिरिस-सुमन सन तन सुकुमारि । पुरि-परिसर मे जनक-दुलारि ॥८४॥
चलि नहि शकथि कहथि से घूरि । दण्डक-वन प्रिय अछि कत दूरि ॥८५॥
से शुनि रहल न करुण संभार । नयन-नीर प्रथमहि अवतार ॥८६॥
रथपर चढ़लिह जनक-कुमारि । श्रीरघुवर-मुख-कमल निहारि ॥८७॥
सभ जन सौँ कहि मन उत्साह । रामचन्द्र रथ पर चढ़लाह ॥८८॥
लक्ष्मण रथ पर चढ़ला फानि । नगर सगर जन उठला कानि ॥८९॥
रथ धय धनुष तीर तरुआरि । रथ सुमन्त हाँकल ललकारि ॥९०॥
भूपति कहथि सुमन्त रहु ठाढ़ । दुस्सह आधि बहुत मन बाढ़ ॥९१॥
चलु रथ हाँकि करिय जनु थीर । बारम्बार कहथि रघुवीर ॥९२॥
ध्यान राम सुन्दर मुख चूमि । खसला दशरथ महि मे घूमि ॥९३॥
सभ दिश बाहर अहँइक भास । हमर हृदयमे नियत निवास ॥९४॥
वत्स विपिन जनु कयल पयान । सन्तापहि होइछ अनुमान ॥९५॥
नृप काँ छूटल जीवन-आश । छन छन मूर्छा कान्ति हरास ॥९६॥
भृत्य वृत्त छल लेलक उठाय । शोक वृद्ध कानथि शुशुआय ॥९७॥
कष्टहि कहल नृपति सन्ताप । प्राण-पवन पिब शोकज-शाप ॥९८॥
लै चल रामक जननी-धाम । मन कदाच पाओत विसराम ॥९९॥
नहि चिर जीवन निश्चय भेल । मणिधर-फणि-मणि जनि छिनि लेल ॥१००॥
तनि घर करइत नृपति प्रवेश । मुरछि खसल नहि संज्ञा-लेश ॥१०१॥
मूर्छा छुटलहुँ बाढ़ल आधि । नृप रहलाह मौनकाँ साधि ॥१०२॥
ओत रथ पहुँचल तमसा तीर । पड़ला उतरि ततय रघुवीर ॥१०३॥
ईश्वर-चरण-कमलमे ध्यान । निराहार जल-मात्रे पान ॥१०४॥
तरुतल सहित जानकी शयन । सुखसौँ कयलनि सरसिज-नयन ॥१०५॥
धृत-कर-शर-धनु ठाढ़ अनन्त । जागल पहरा देथि सुमन्त ॥१०६॥
दुख मन पुरजन सङ्गहि लागि । कह निज जनकाँ देल कि त्यागि ॥१०७॥
जत जायब तत पुरजन जोहि । लागल रहते नगर धरोहि ॥१०८॥
रघुनन्दन नहि छाड़ब चरण । अयलहुँ सभ मिलि अपनैक शरण ॥१०९॥
वन बसि रहब नगर नहि जयब । अपनै नृपतिक प्रजा कहयब ॥११०॥
नगर अयोध्या सौँ की काज । सानुकूल संग सकल समाज ॥१११॥
अन्न पानि परित्यागल लोक । डेरा कयलनि रोक न टोक ॥११२॥
अर्द्धरात्रि मे मन्त्रि बजाय । कहल राम रथ आनु नुकाय ॥११३॥
हठसौँ त्यागत लोक न सङ्ग । देखला जाइछ सभहिक रङ्ग ॥११४॥
दौड़ितहि आयल छथि हठ टेक । कहलय फिरता नहि जन एक ॥११५॥
भौकी काटि चलू चुपचाप । दुख पओता सङ्ग होयत पाप ॥११६॥
बालक सभ घर भुखले छैक । वृद्ध-लोककेँ-अन्न के दैक ॥११७॥
सीता ओ सानुज रघुवीर । रातिहि त्यागल तमसा-तीर ॥११८॥
हाहा रामचन्द्र कहि भोर । कानथि पुरजन कय कय सोर ॥११९॥
हा रघुनन्दन कयल कि लाथ । सोपि देल ओहि पापिनि हाथ ॥१२०॥
घुरि पुरि पुरिजन शञ्च गेलाह । शोकहिँ दुर्ब्बल बहुत भेलाह ॥१२१॥
देखइत जनपद सुन्दर भूमि । रथ पर सौँ तिनु जन घुमि घूमि ॥१२२॥
शृङ्गवेरपुर गङ्गातीर । रथ अटकाओल श्रीरघुवीर ॥१२३॥
ततय शिशुपा तरु भेटि गेल । तेहि तर सुखसौँ बासा देल ॥१२४॥
गङ्गा-अर्च्चन स्नान विधान । कयल तिनू जन धर्म्म-निधान ॥१२५॥
रामागमन तहाँ गुह शुनल । उत्सव भाग्य अपन वर गुनल ॥१२६॥
मधु फल पुष्प कन्द कय भार । प्रभुक उपायन कयल विचार ॥१२७॥
भोर सकल देखल श्रीराम । उत्तम कहलनि प्रभु गुण-धाम ॥१२८॥
दुर बसि गुह कर दण्डप्रणाम । नयन सफल कर कह निज नाम ॥१२९॥
राम उठाय लेल भरि पाँज । हरष बहुत गुह किछु नहि बाज ॥१३०॥
राम कुशल पुछलनि कय बेरि । बद्धाञ्जलि गुह कहलनि फेरि ॥१३१॥
हम अति धन्य जन्म-फल पाय । अपनै मिललहुँ अङ्क लगाय ॥१३२॥
किङ्कर-किङ्कर जाति निषाद । घर प्रभुहिक थिक न करु विषाद ॥१३३॥
करु पवित्र प्रभु एतहुक गेह । बहिआ पर राखल थिक नेह ॥१३४॥
बहिआ कहिआ आओत काज । भागल जाय अपन थिक राज ॥१३५॥
ई फल मूल ग्रहण हो नाथ । लायलछी हम हयब सनाथ ॥१३६॥
कहल राम अहाँ भक्त पवित्र । अहँक राज्य हमर थिक मित्र ॥१३७॥
चौदह वर्ष नगर नहि जाइ । आनक देल वस्तु नहि खाइ ॥१३८॥
बटक दुग्ध दुहि सत्वर लाउ । हम मुनि-जन सन जटा बनाउ ॥१३९॥
बटक्षार लायल गुह-लोक । प्रभु-वर आज्ञा के जन रोक ॥१४०॥
लक्ष्मण राम कयल मुनि-वेष । गुह-समूह तहँ टक टक देख ॥१४१॥
घास पात कुश शयन बनाय । निज गृह शय्या सन सुख पाय ॥१४२॥
ओहि रजनी जल-मात्रे पान । शयन कयल दुख लेश न जान ॥१४३॥
सीता-सहित भवन निज जेहन । अति प्रसन्न मन ओतहु तेहन ॥१४४॥
लक्ष्मण गुह निज परिजन सङ्ग । कर शर-धनुष वीर-रस अङ्ग ॥१४५॥
यामिक कोटवार बल-पूर । सावधान लक्ष्मण रण-शूर ॥१४६॥

भावार्थः

ई सुनिकय कैकेयि फुर्ती सँ उठलिह आ जाकय मुनिक लायक चीर (वस्त्र) उठा अनलिह । तीनू गोटे केँ वैह चीर देलिह । पहिने श्रीराम ओ पहिरलनि । आर अपन राजसी वस्त्र केँ त्यागि देलनि । कैकेयि हँसिकय कहली – “कतेक नीक!” सीता केँ लाज भेलनि । ओ गुरुजन सभक सोझाँ पहिरय नहि जनैत छलिह । ओ दुनू टुक वस्त्र केँ रामक हाथ मे दय देलिह । राम हुनकर चेहरा देखलाह आ बात बुझि गेलाह । राम वस्त्र लपेटिकय राखि लेलनि । ई देखि रानी कैकेयि रुष्ट भ’ जमीन पर ओंघराय लगलिह । गुरु वसिष्ठ सँ देखल नहि गेलनि । ओ बजलाह – “कैकेयि, अहाँक बुद्धि मारल गेल अछि । धिक्कार अछि अहाँ केँ । अहाँ कालकूट नामक जहर सँ कनिकबो कम नहि छी । कि कहू अहाँ केँ, अहाँ बेहया भ’ गेलहुँ अछि । एतय भरत नहि छथि । राजाक एहेन हाल छन्हि । अहाँ बाघिन जेकाँ विनाशकारणी बनि गेलहुँ । वीर लक्ष्मण कटिबद्ध भ’ कय ठाढ़ छथि । ओ नहि डरेता, कत्लेआम मचा देता ।” ॥६२-७१॥

कैकेयि ताहि पर हँसिकय बजलिह – “अरे, हम तँ जाइत समय स्नेहवश ई चीर देलियनि ।” लक्ष्मण ताहि पर कहय लगलाह – “केहेन कठोर छन्हि कैकेयि केर हृदय । नहि जानि आगाँ केहेन दुर्गति हेतनि । अहाँ एकटा वर पेलहुँ जे राम केँ वनवास भेटनि । लक्ष्मण आ सीता सँ कोन भय ? सीता केँ अहाँ कियैक ई चीर देलियनि ? अहाँक ई करनी देखिकय केकर कलेजा स्थिर रहतय ? सीता पतिव्रत निभेबाक लेल रामक संग वन जाइत छथि, एहि मे अहाँ केँ लाज नहि लगैत अछि ? हिनकर नैहर तिरहुत छन्हि । हिनक सब कर्म प्रशंसनीय छन्हि । हिनकर शरीर पर दिव्य वस्त्र आ आभूषण छन्हि । कि एहेन पतिव्रता नारी सतबय योग्य छथि ?” ॥७२-७८॥

राजा कहलनि – “हे सुमन्त, रथ लय आनू । रामचन्द्र केँ वन देखा आनू ।” रथा सजिकय आबि गेल । राम कहला – “गामक बाहर जाकय रथ पर चढ़ब ।” राजा दशरथ तीनू गोटे केँ नजरि उठाकय देखलनि । शोकक सागर उमड़ि पड़लनि । मोन बेचैन भ’ गेलनि । राम पिताक प्रदक्षिणा कयलनि । फेर लक्ष्मण आ सीता सेहो ओहिना कयलनि । दुनू भाइ देखलनि, रथ राजाक परकोटाक बाहर ठाढ़ अछि । शिरीषक फूल जेकाँ सुकुमारि शरीरवाली जनकनन्दिनी सीता नगरक आसो-पास नहि चलि सकैत छलिह, आ घुमिकय पुछैत छलिह – “हे प्रियतम, आब दण्डक वन कतेक दूर अछि ?” ई सुनिकय व्यथा केँ दबा नहि सकलाह । आँखि मे पहिल बेर नोर आबि गेलनि । रामचन्द्रक मुख-कमल केर दर्शन कय केँ जनकनन्दिनी रथ पर चढ़लिह । तखन रामचन्द्र अपन मोनक उत्साह सब लोक केँ जनाकय रथ पर चढ़लाह । लक्ष्मण फानिकय रथ पर चढ़ि गेलाह । नगरक लोक सब कानय लागल । सुमन्त अपन धनुष-बाण आ तलवार केँ रथ पर राखिकय रथ चलबय लगलाह । एम्हर राजा दशरथ कहैत छथि – “सुमन्त, कनेक रुकल रहू । हमर मोन मे बड तेज वेदना भ’ रहल अछि ।” आर ओम्हर रामचन्द्र बेर-बेर कहैत छथि – “रथ केँ बढ़ाउ, रोकू जुनि ।” राजा दशरथ ध्यान मे रामचन्द्रक मुख चुमिकय लड़खड़ाइत धरती पर खसि पड़लाह । ओ बिलखय (हिंचुकय) लगलाह । “हे वत्स राम, बाहर सब दिशा मे अहीँक भान होइत अछि । आर भीतर हमर हृदय मे सेहो अहीँ सदिखन मौजूद छी ।” राजा दशरथ केँ जिबय केर आश खत्म भ’ रहल छलन्हि । क्षण-क्षण मे मूर्च्छा आबय लगलनि आ चेहरा सँ चमक सेहो उतरय लगलनि । सेवक सब तत्पर छलन्हि । तुरन्त हुनका उठौलकनि । ओ शोकक लहरि मे हिचुँकि-हिचुँकि केँ कानय लगलाह । बहुत मोस्किल सँ राजा अपन सन्ताप व्यक्त कय पबैत छलथि – “शोकरूपी साँस हमर प्राण केँ पीबि गेल । आब हमरा राजक माता कौशल्याक भवन मे लय चले । ओतय कदाचित मोन मे किछु चैन भेटय ।” हुनकर हाल सँ ई पक्का भ’ गेल जे राजा दशरथ आब बेसी दिन नहि जिबित रहताह । मानू मनिआर नागक मणि छिना गेल हो । कौशल्याक भवन मे पहुँचिते राजा मूर्च्छित भ’ कय खसि पड़लाह । हुनका संज्ञाक भान लेशो भरि नहि रहलनि । मूर्च्छा खत्म भेलो पर हुनकर व्यथा बढ़िते चलि गेलनि आ मौन पड़ल रहलाह ॥७९-१०२॥

ओम्हर रामचन्द्रक रथ तमसा नदीक किनार पर पहुँचि गेल । ओतय रामचन्द्र उतरि गेलाह । ओ सदिखन भगवानक चरण-कमल मे ध्यान लगौने मात्र पानि पीबिकय निराहार रहि गेलथि । सीता-सहित एकटा गाछक नीचाँ मे कमल-नयन राम सुखपूर्वक शयन कयलनि । हाथ मे धनुष-बाण लेने शेषावतार लक्ष्मण आ सुमन्त पहरा दैत जागल रहि गेलाह । दुःखी नगरवासी लोक सब संगे चलि आयल छल । ओ सब राम सँ कहैत अछि – “हे प्रभु, अपने अपन सेवक सब केँ कियैक छोड़ि देलहुँ ? अपने जेतहि जायब, पुरजन सभक भीड़ लगले रहत । हे रघुनाथ, हम सब अपनेक चरण केँ नहि छोड़ब । हम सब मिलिकय अपनहिक शरण मे आयल छी । वन मे घर बनाकय संगहि रहब; अपन नगर कहियो नहि जायब । अहीं केँ राजा मानब आ अहीँक प्रजा कहायब । हमरा सब केँ अयोध्या नगर सँ कोन काज ! मिलिजुलि कय सब कियो एक्के संग रहब ।” सब कियो खेनाय-पीनाय छोड़ि देलक । बिना रोक-टोक केँ सब कियो ओतहि डेरा डालि देलक । आधा राति बितला पर मंत्री केँ बजाकय राम कहला – “चुपेचाप रथ लय आनू । समझेला-बुझेला सँ ई लोक सब संग नहि छोड़त, तेहने रंग-ढंग देखा रहल अछि । ई लोक सब दृढ़ प्रतिज्ञा कय केँ रथक पाछाँ दौड़ैत-दौड़ैत आबि गेल अछि । कहला-सुनला सँ एकरा सब मे सँ एकहु गोटे नहि घुरत । चकमा दय केँ चुपचाप चलि पड़ू । ई सब संग मे रहत त एकरा सब केँ तकलीफ हेतैक आ ओहि सँ हमरे पाप लागत । एकरा लोकनिक घरक धियापुता, बूढ़-पुरान सब अन्न बिना भूख सँ परेशान भ’ जेतैक । एहि प्रकारें सीता आ लक्ष्मण सहित राम रातिये मे तमसा नदीक किनार छोड़ि चलि देलाह । नगरनिवासी भोरे उठलाह त “हा राम” चिकरैत हाक्रोश पाड़य लगलाह । “हा रघुनन्दन, हमरा सब केँ कियैक चकमा दय केँ पापिन कैकेयि केर हाथ मे सौँपि गेलहुँ ?” फेर पुरवासी लोक शान्त भ’ कय अयोध्यापुरी घुरि गेलाह । ओ सब शोक सँ एकदम दुब्बर भ’ गेल छलाह । ओम्हर तीनू गोटे रथे सँ घुमि-घुमिकय जनपदक सुन्दर धरती केँ देखलनि । राम गंगाक किनार पर शृंगवेरपुर मे रथ केँ रोकबौलनि । ओतय शीशम केर एक गाछ देखलनि । ताहिक नीचाँ डेरा डालि देलनि । ओतय धर्मपरायण राम, लक्ष्मण आ सीता तीनू गंगाक पूजा आ गंगास्नान कयलनि ॥१०३-१२५॥

निषादराज गुह सँ भेंट 

निषादराज गुह सुनलनि जे ओतय राम आयल छथि । ओ उल्लासित भ’ अपना केँ भाग्यवान बुझलनि । ओ मधु, फल, फूल आ कन्द सँ भरल भार लय केँ प्रभु राम केँ सौगात देबाक निश्चय कयलनि । सबटा सौगात देखिकय गुणक खजाना श्रीराम कहलखिन – “बड नीक।” (अपना केँ अछूत बुझिकय) गुह दूरे रहैत राम केँ दंड प्रणाम कयलनि । दर्शन पाबिकय ओ अपन आँखि केँ सफल कयलनि आ अपन नाम बजलाह । राम उठिकय हुनका छाती सँ लगा लेलनि । गुह केँ एतबा अधिक हर्ष भेलनि जे मुँह सँ बोल तक नहि निकलैत छन्हि । राम बेर-बेर कुशल पुछलाह । फेर गुह हाथ जोड़िकय कहलनि – “हम अपन जीवन केर फल पाबिकय परम धन्य भ’ गेलहुँ, कियैक तँ अपने छाती सँ लगाकय हमरा संग मिलन कयलहुँ । हम त अपनेक दासहु केर दास निषाद जाति केर छी । ई घर अपनहिक थिक, अपने कोनो चिन्ता नहि करी । हे प्रभु, अहाँ एतुको घर केँ पवित्र करू । अहाँ अपन सेवक पर अनुग्रह (कृपा) राखू । अहाँक ई सेवक फेर कहिया काज आओत । ई सबटा अपन राज छी, एकर भोग करू । हे प्रभु, ई फल-फूल ग्रहण कयल जाउ, जे सब हम सौगात (भार) मे लयकय आयल छी । अपनेक ग्रहण कयला सँ हम सनाथ भ’ जायब ॥१२६-१३६॥

राम कहलनि – “अहाँ अत्यन्त पवित्र भक्त थिकहुँ । हे मित्र, अहाँक राज्य तँ हमर अपनहि भेल । मुदा हमर व्रत अछि जे चौदह वर्ष धरि नगर नहि जायब आर दोसरक देल कोनो चीज नहि खायब । कृपाकय अहाँ जल्दी सँ बरगदक दूध आनि दिय’, जाहि सँ हम मुनि समान जटा बनायब ।” सुनिते देरी गुह आ हुनक लोक सब बरगदक दूध आनि देलनि । प्रभु राम केर आज्ञा केँ के टालि सकैत अछि । राम आ लक्ष्मण मुनिक भेष बनौलनि । गुह जातिक लोक सब ओतय एकटक देखैत रहलाह । घासक तृण, पत्ता व कुश सब सँ सेज बनौलनि । ताहि पर हुनका राजशय्याक जेकाँ सुख भेटलनि । ओहि राति मे लोक सब मात्र पानि पीबिकय सुति रहय गेला, कोनो तरहक तकलीफ किनकहु नहि बुझेलनि । सीता सँ सुशोभित जेना अपन राजभवन मे लगैत छल, ओहिना ओतहु हुनका सभक मोन अत्यन्त प्रसन्न रहलनि । अपन परिजनक रूप मे लक्ष्मण आ गुह संग मे रहथि । हुनका लोकनिक हाथ मे तीर-धनुष छल । ओ सब मानू देहधारी वीर-रस रहथि । रणवीर महाबली लक्ष्मण दुर्ग-रक्षक केर रूप मे चौकस भ’ कय पहरा दय रहल छलथि ॥१३७-१४६॥

॥इति श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे अयोध्याकाण्डे पंचमोऽध्यायः॥

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अयोध्याकाण्डक पाँचम अध्याय समाप्त भेल ॥

हरिः हरः!!

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