मिथिलाभाषा रामायण – अयोध्याकाण्डः चारिम अध्याय

कवि चन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – चारिम अध्याय

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण मिथिला गौड़-मालवं छन्दः।

जैँ कौशल्या जानथि शञ्च। तेहन सुमित्र कयल प्रपञ्च॥
रामक छवि देखल भरि नयन। नील-कमल-निन्दक छवि अयन॥
लेल अङ्क भरि लगइत गोड़। सुत – मुख देखि हर्ष नहि थोड़॥
कौशल्या उठि कहलनि आउ। देव-प्रसाद मधुर किछु खाउ॥
जननि न अवसर बड़ अगुताइ। चललहुँ अछि दण्डक-वन आइ॥
केकयि – वरक विवश महिपाल। विकल पड़ल छथि चिन्ताजाल॥
भरत एतय होयता युवराज। हमर कुटी मुनि वनी समाज॥
कन्द मूल फल भल आहार। चौदह वर्ष एहन व्यवहार॥
आयब अवश तदुत्तर फेरि। चिन्ता जननि न करु एहि बेरि॥
शुनि मूर्च्छित उठि कहलनि हाय। हमहूँ वन जायब से न्याय॥
अहँ बिनु कोन गति जीवन रहत। विषम वियोग प्राण कत सहत॥
राज भरत नृप – अनुमति लेथु। अहँ काँ विपिन – वास जनु देथु॥
केकयिक भूपक कयल न दोष। सुत सज्जन पर एतगोट रोष॥
नृप छथि पिता हमहुँ छी माय। हमहुँ देब नहि कानन जाय॥
वचन हमर जौँ धरब न कान। शुनु सुत त्यागब एखनहि प्राण॥
शुनि लक्ष्मण कौशल्या – करुण। भृकुटी कुटिल नयन अति अरुण॥
कहल शूरतासौँ से वाक। केकयि राजा देलनि डाक॥
सभ जन शुनु किछु हमर न दोष। प्रलय-करण मन जागल रोष॥
केकयि-वश उनमत्त बताह। बड़ अनुचित कर धरणी – नाह॥
नृपकाँ देब हरी मे ठोकि। भरतक हृदय बाण देब भोकि॥
एतटा दर्प्प केकयी-चित्त। रामचन्द्र वन वृथा निमित्त॥
चलु चलु नाथ होउ युवराज। तखन देखब संसारी काज॥
जनिकाँ अरुचि होयत मन आन। तनिक हृदय मे बेधब बाण॥
राम कहल शुनु लक्ष्मण वीर। असमय त्यागु धनुष ओ तीर॥
अहँक सत्त्व हमरा अछि ज्ञात। नहि कर्त्तव्य एखन उत्पात॥
देखइत छी जे ई संसार। सकल भरल विष विषय-विकार॥
विद्युत जेहन चमकि छपि जाय। जानब तेहन भोग्य – समुदाय॥
अनल – तप्त लौहक पर जेहन। वारि – विन्दु आयुक गति तेहन॥
भेक व्याल – गलमे पड़ि जाथि। टप टप तैओ माछी खाथि॥
काल – व्याल सौँ जन छथि ग्रस्त। तदपि न विषय – मनोरथ अस्त॥
माय बाप सुत भ्राता दार। प्रपा – मिलन सन सुख संसार॥
देह भोग लय पल पल खिन्न। ई शरीर पुरुषहुँ सौं भिन्न॥
बन्धु – समूह – जनित सुख – भोग। जानब नदिया – नाव – संयोग॥

।हरिपद।

।मिथिला संगीतानुसारेण देवराज-विजय छन्दः।

लक्ष्मी थिकि चपला छाया सनि तन-तारुण्य-तरङ्गे।
स्वप्नोपम वनिता-सुख तेहन मन अभिमान अभङ्गे॥
दिनकर-देव-गतागत घटइछ आयु क्रमहि जन-तनसौँ।
अनकर जरा मरण काँ देखथि किछु नहि बूझथि मनसौँ॥
काँच-कलश-जल-उपमा आयुक जाइत छथि तनु तनसौँ।
रोग प्रबल रिपु देह-हरण कर लपटायल मन धनसौँ॥
व्याघ्री जरा धरय चाहै मृति सङ्गी समय तकै छथि।
विश्रुत राजा अहँ-भाव-वश देह समस्त कहै छथि॥
त्वचा आस्थ रक्तादि भरल जे तनमे कह की निष्ठा।
अन्त समय मे देह होइ छथि कृमि की भस्म कि विष्ठा॥
आत्मा देह थिकथि नहि अह काँ लोक दग्धकर इच्छा।
सकल लोक अभिमानहि होइछ दैछी लक्ष्मण शिक्षा॥
हम छी देह एहन मतिकेँ अहाँ सदा अविद्या जानू।
थिकहुँ चिदात्मा हम न देह छी ई मति विद्या मानू॥
संसृति-हेतु अविद्या जानब विद्या संसृतिहरिणी।
विद्याभ्यास मुमुक्षु-का थिक मननादिक कय करणी॥
शत्रु काम क्रोधादि ततय छथि सभसौँ दुर्ज्जय क्रोधे।
जै वश जननि पिता भ्रातादिक जन मारैछ अबोधे॥
मूल मनस्तापक कोपे थिक संसारक से बन्धन।
धम्म-नाशकर कोपे मानब अनल बनल बिनु इन्धन॥
यम साक्षात कोप काँ जानब तृष्णानदि वैतरणी।
नन्दन वन सन्तोष सदा थिक शान्ति कामगवि करणी॥
शान्त-शील रहु कोप करिय जनु शत्रु केओ नहि हयता।
शत्रु मित्र ओ उदासीन जन एक दिन सभ जन जयता॥
देहेन्द्रिय मन प्राण बुद्धिसौँ आत्मा थिकथि विलक्षण।
स्वयं – ज्योति आकार-रहित छथि ज्ञाता शुद्ध विचक्षण॥
देहेन्द्रिय-प्राणादि-भिन्न जन आत्मा बुझथि न यावत।
जन्म-मृत्यु-संसार-दुःखसौँ पीड़ित होइछथि तावत॥
बुद्ध्यादिक सौँ बाहर आत्मा एहन भावना राखू।
सुख दुख प्रारब्धक फल खेद न ज्ञानामृत केँ चाखू॥
अन्तःशुद्ध स्वभाव बनल रहु बाहर रहु व्यवहारी।
कर्म्म-दोष किञ्चित नहि लागत बनल रहब संसारी॥
कहल भावना जननी राखब दुःख न होयत मन मे।
हमर आगमन करब प्रतीक्षा जाइत छी हम वन मे॥
चौदह वर्ष अर्द्ध क्षण सन मन भासित होयत ज्ञाने।
आज्ञा देल जाय वन जायक मानब नहि मन आने॥

।चौपाइ।
।मिथिला संगीतानुसारेण घनछीशाम्भवी छन्दः।
वननिवास मन हर्षित करण। कयल प्रणाम जननि-युग-चरण॥
कौशल्या पुनि अङ्क लगाय। आशिष देलनि देव मनाय॥
ब्रह्म विष्णु शिव सुर गन्धर्व्व। रक्षा अहँ क करथु मिलि सर्व्व॥
रौदहि माँटि होअ जत झाम। तेहि वन चललहुँ अछि अहँ राम॥
स्थित चलइत करयित वन शयन। रवि शशि राखथु अहँपर नयन॥
पुन पुन जननी हृदय लगाय। आशिष देल कहल वन जाय॥
रामक लक्ष्मण कयल प्रणाम। नोर भरल लोचन अभिराम॥
देव कयल मन संशय नाश। हमहु करब गय कानन वास॥
आज्ञा देल जाय प्रभु आज। अपनैक त्यागब हम न समाज॥
हम न रहब एत पापी धाम। नव नव रीति होयत सङ्ग्राम॥
अनुचित सहब न होयत मारि। क्रोधे धरब तीर तरुआरि॥
भरत सहित तनिकर हित जानि। मारब समर धरब निज बानि॥
त्यागि चलब तौँ त्यागब प्राण। हे रघुनन्दन करु दुख त्राण॥
चलु चलु लक्ष्मण कहलनि राम। गेला जनकनन्दिनी धाम॥
प्राणनाथ काँ अबइत जानि। सीता कनकपात्र लय पानि॥
पति – पद – पङ्कज लेल धोआय। सिंहासन पर बैसला जाय॥
नृपति किरीट आदि नहि अङ्ग। सेवा गज वाजी नहि सङ्ग॥
बाजन बाज न छत्र न श्वेत। कुशल सकल अछि नृपनि-निकेत॥
पअरहि चलइत अएलहुँ कान्त। कहल जाय थिक की वृत्तान्त॥
सीताकाँ कहलनि हँसि राम। त्यागब हम एखनहि ई धाम॥
पिता कहल दण्डक बन जाउ। चौदह वर्ष व्यतीतहि आउ॥
सीता पुछल बहुत मन त्रास। कहु कहु नृप किय देल बनवास॥
कहल राम कारण नहि आन। केकयि पाओल दुइ वरदान॥
एक वर भरत होथि युवराज। दोसर हमर वन-वासक काज॥
पिता धर्म्म – व्रत राखब टेक। विघ्न करिय जनु गुणवति एक॥
सीता कहल चलब सङ्ग लागि। सहब न शोक विरह – जर-आगि॥
शुनि उत्तर कहलनि श्रीराम। हठक समय नहि थिक ई ठाम॥
साहस तजु मिथिलेश – कुमारि। उचित कि हमर वचन दिय टारि॥
भल नहि थिक लय जायब सङ्ग। घोर विपिन अछि भूमि कुरङ्ग॥
भूख पियासैँ होयब आँट। गड़त पअर – पङ्कज मे काँट॥
दौड़त बाघ सिंह मुह बाय। कत जन काँ राक्षस धय खाय॥
गड़बड़ बड़ बड़ विषधर साप। स्मरण होइत जिब थरथर काँप॥
बहुत बुझाओल अपनहि राम। ठानल हठ सीता तहि ठाम॥
।छन्द।
।मिथिला संगीतानुसारेण कोड़ार-भेदे सूहबछन्दः।
प्रिये हम जाइतछी वनवास।
सत्य – प्रतिज्ञ पिता कहलनि अछि, केकयि कयल प्रयास॥
कौशल्या सन सासु सदन मे, राखब नियत निवास॥
तनिकर सेवा उचित करक थिक, धैर्य्यहि विपतिक नाश॥
ई संसार असार सर्व्वदा, माया सकल विलास॥
सुख दुख मनमे सम कय मानब, मन जनु करब उदास॥
कन्दमूल सय्योँगहि भेटत, लागत भूष पियास॥
रामचन्द्र कह कानन अति दुख, राक्षस लोकक त्रास॥
वचन शुनि जिव मोर थर थर काँप।
हम नहि भवन रहब शुनु प्रियतम, देखब की सन्ताप।
सर्व्वसहा जननी धरणी थिकि, जनक नृपति थिका बाप॥
शमता-सहन तेहन अछि तनि काँ, सम मणिमाला साप॥
त्रिभुवन बली प्रभुक सन के अछि, तोड़ल शङ्कर – चाप॥
ई गोट आज्ञा हम नहि मानब, धर्म्म होएत की पाप॥
चन्द्र चन्द्रिका घन बिनु दामिनि, रहय न पृतक मिलाप॥
कनइत जनक – नन्दिनी कयलनि, कोटि विलाप – कलाप॥
वचन प्रिय ई गोट मानल जाय।
हम किङ्करी चलब कानन संग, अपने रहब सहाय॥
नैहर मध्य सकल फल कहलनि, वृद्ध जोतिषी आबि।
कानन पति संग जानकि जाएब, भाल लिखल अछि भावि॥
बहुत रमायण कथा शुनल अछि, शङ्कर वचन प्रमाण।
कतहु न लिखल त्यागि सीता-गृह, कानन देब प्रयाण॥
जौँ अन्यथा प्राण परित्यागब, अपनैँक आगाँ आज।
चलु चलु विपिन सङ्ग वैदेही, हसि कहलनि रघुराज॥

।चौपाइ।

।मिथिला संगीतानुसारेण देवकामोद छन्दः।

कि करब हार आभरण आब। विपिन बनब वनि मुनि शन भाव॥
अरुन्धती काँ गहना देब। नहि पाथेय एतय सौँ लेब॥
करब द्विजार्प्पण हम निज वित्त। राखब नहि किछु विपिन निमित्त॥
लक्ष्मण द्विज – गण काँ बजबाय। बहुत देल धन बहुतो गाय॥
अपन सकल धन सीता देथि। गुरु-गृहिणीसौँ आशिष लेथि॥
कहल राम मन करु जनु शोक। जे जननिक अन्तःपुर लोक॥
हमर जतेक धन से लय जाउ। चौदह वर्ष सुखी सौँ खाउ॥
कौशल्याक भरल भण्डार। माँगव सहब न पर – उपकार॥
कौशल्या ओ सुमित्रा सकल। वृद्धजननि मन अतिशय विकल॥
लक्ष्मण कहल रहब एक ठाम। सम्पति भरल सकल अछि धाम॥
निर्द्धन विषय करब नित दान। जनु करु दुओ जनि चित्त मलान॥
सेवक-जन नहि बिलटय पाब। देखब कतहु न लोक हसाब॥
शुनल सुमित्रा आशिष ढेरि। वन सौँ सुख सौँ अयबे फेरि॥
करबे की थिकि केकयि माय। भरत सेहो छथि अहँइक भाय॥
हमर तुल्य जानकि काँ जानि। रामचन्द्र काँ दशरथ मानि॥
विपिन अयोध्या मध्य कि भेद। सुखी जाउ वन वत्स कि खेद॥
कर धनु कोप न बाहर काढ़। लक्ष्मण रामक आगाँ ठाढ़॥
की विलम्ब कहि चलिअ गणेश। जतय पड़ल छथि विकल नरेश॥
नृपतिक भवन गमन प्रभु कयल। सीता लक्ष्मण प्रभु संग धयल॥

॥इति अयोध्याकाण्ड अध्याय ४॥

हरिः हरः!!