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मिथिलाभाषा रामायण – अयोध्याकाण्ड चारिम अध्याय – लक्ष्मण आ सीताक वन जेबाक आग्रह

1029 भ्यूज

कवि चन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – चारिम अध्याय

लक्ष्मण आ सीताक वन जेबाक आग्रह

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण मिथिला गौड़-मालवं छन्दः।

जैँ कौशल्या जानथि शञ्च । तेहन सुमित्रा कयल प्रपञ्च ॥१॥
रामक छवि देखल भरि नयन । नील-कमल-निन्दक छवि अयन ॥२॥
लेल अङ्क भरि लगइत गोड़ । सुत-मुख देखि हर्ष नहि थोड़ ॥३॥
कौशल्या उठि कहलनि आउ । देव-प्रसाद मधुर किछु खाउ ॥४॥
जननि न अवसर बड़ अगुताइ । चललहुँ अछि दण्डक-वन आइ ॥५॥
केकयि-वरक विवश महिपाल । विकल पड़ल छथि चिन्ताजाल ॥६॥
भरत एतय होयता युवराज । हमर कुटी मुनि वनी समाज ॥७॥
कन्द मूल फल भल आहार । चौदह वर्ष एहन व्यवहार ॥८॥
आयब अवश तदुत्तर फेरि । चिन्ता जननि न करु एहि बेरि ॥९॥
शुनि मूर्च्छित उठि कहलनि हाय । हमहूँ वन जायब से न्याय ॥१०॥
अहँ बिनु कोन गति जीवन रहत । विषम वियोग प्राण कत सहत ॥११॥
राज भरत नृप-अनुमति लेथु । अहँ काँ विपिन-वास जनु देथु ॥१२॥
केकयिक भूपक कयल न दोष । सुत सज्जन पर एतगोट रोष ॥१३॥
नृप छथि पिता हमहुँ छी माय । हमहुँ देब नहि कानन जाय ॥१४॥
वचन हमर जौँ धरब न कान । शुनु सुत त्यागब एखनहि प्राण ॥१५॥
शुनि लक्ष्मण कौशल्या-करुण । भृकुटी कुटिल नयन अति अरुण ॥१६॥
कहल शूरतासौँ से वाक । केकयि राजा देलनि डाक ॥१७॥
सभ जन शुनु किछु हमर न दोष । प्रलय-करण मन जागल रोष ॥१८॥
केकयि-वश उनमत्त बताह । बड़ अनुचित कर धरणी-नाह ॥१९॥
नृपकाँ देब हरी मे ठोकि । भरतक हृदय बाण देब भोकि ॥२०॥
एतटा दर्प्प केकयी-चित्त । रामचन्द्र वन वृथा निमित्त ॥२१॥
चलु चलु नाथ होउ युवराज । तखन देखब संसारी काज ॥२२॥
जनिकाँ अरुचि होयत मन आन । तनिक हृदय मे बेधब बाण ॥२३॥
राम कहल शुनु लक्ष्मण वीर । असमय त्यागु धनुष ओ तीर ॥२४॥
अहँक सत्त्व हमरा अछि ज्ञात । नहि कर्त्तव्य एखन उत्पात ॥२५॥
देखइत छी जे ई संसार । सकल भरल विष विषय-विकार ॥२६॥
विद्युत जेहन चमकि छपि जाय । जानब तेहन भोग्य-समुदाय ॥२७॥
अनल-तप्त लौहक पर जेहन । वारि-विन्दु आयुक गति तेहन ॥२८॥
भेक व्याल-गलमे पड़ि जाथि । टप टप तैओ माछी खाथि ॥२९॥
काल-व्याल सौँ जन छथि ग्रस्त । तदपि न विषय-मनोरथ अस्त ॥३०॥
माय बाप सुत भ्राता दार । प्रपा- मिलन सन सुख संसार ॥३१॥
देह भोग लय पल पल खिन्न । ई शरीर पुरुषहुँ सौं भिन्न ॥३२॥
बन्धु-समूह-जनित सुख-भोग । जानब नदिया-नाव-संयोग ॥३३॥

भावार्थः

कौशल्या केँ चुपेचाप खबरि भ’ जाइन्ह, सुमित्रा तेहेन युक्ति निकालि लेलिह । कौशल्या रामक छवि जे नीलकमल केँ हराबयवला छल से जी भरि (भरि इच्छा) देखलिह । राम प्रणाम करय अयलाह त हुनका कोरा मे बैसा लेलिह । बेटाक मुँह देखि हुनकर हर्षक ठेकान नहि रहल । फेर उठिकय कहली – “आउ पुत्र, भगवानक प्रसाद किछु मिठाइ खा लियह ।” राम कहलनि – “हे माता, आइ हमरा मिठाइ खेबाक फुर्सत नहि अछि । बहुत हड़बड़ी अछि । हम दण्डक वन जा रहल छी । राजा कैकेयि केर वर सँ विवश भ’ चिन्ता-जाल मे फँसल व्याकुल पड़ल छथि । एतय भरत युवराज बनता । हमर कुटी वनवासी मुनि सभक संग तपोवन मे रहत । ओतय कन्द-मूल आ फल जेहेन नीक खेनाय भेटत । चौदह बरिस एहि तरहें रहबाक अछि । तेकर बाद हम जरूर घुरिकय आयब । हे माता, एहि बेर अहाँ चिन्ता जुनि करब ।” कौशल्या एतबा सुनिते देरी मूर्च्छित भ’ कय खसि पड़लिह । फेर होश सम्हारि ओ कहली – “हमहुँ वन जायब । यैह उचित होयत । अहाँ बिना हमर जिनगी केहेन होयत ? अहाँ सँ दारुण बिछोह हमर प्राण कतेक सहत ? भरत राजाक आज्ञा सँ राज लियए चाहथि तँ लेथि । मुदा अहाँ केँ वनवास नहि देथि । राम त कैकेयि केर या राजा दशरथ केर किछुओ नहि बिगाड़लनि अछि । फेर सज्जन पुत्र पर एतेक क्रोध कियैक ? राजा अहाँक पिता छथि । हमहुँ त अहाँक माता छी । हम अहाँ केँ वन नहि जाय देब । यदि अहाँ हमर बात नहि सुनब त हे पुत्र, सुनि लियह, हम एखनहिं प्राण त्यागि देब ।” कौशल्याक करुण-कथा सुनिकय लक्ष्मणक भौंह टेढ़ भ’ गेलनि; आँखि लाल भ’ गेलनि । ओ वीर-भाव मे आबिकय बजलाह – “कैकेयि आ राजा दशरथ अनर्थ कयलनि अछि । सब कियो सुनू । हमरा दोष नहि देब । हमर मन मे प्रलय मचाबयवला क्रोध जागि उठल हँ । कैकेयि केर वश मे पड़िकय राजा बताह भ’ गेलाह अछि । ओ बड अनुचित कय रहल छथि । राजा केँ पागलक बेड़ी पहिरा देबनि आ भरतक छाती मे बाण धँसा देबनि । कैकेयि केर मोन मे एतेक अभिमान भ’ गेलनि । रामचन्द्र केँ बिना कोनो कारणक वनवास दय देलिह !” फेर ओ रामचन्द्र सँ कहला – “हे नाथ, चलू, अहाँ युवराज बनू । तखन सांसारिक काज सब देखब । जिनकर मोन मे कोनो आर बात हेतनि आ ई अभिषेक नीक नहि लगतनि तिनकर हृदय केँ हम अपन तीर के निशाना बनायब ।” राम कहलखिन – “हे वीर लक्ष्मण, सुनू! बे-मौका धनुष-बाण जुनि उठाउ । देखैत छी कि ई जे संसार अछि ओहि मे जहर समान विषयरूपी विकार भरल अछि । एहि संसार मे भोग केहेन अछि, जेना बिजली चमैक उठैत अछि आ क्षणहि भरि मे चलि जाइत अछि । मनुष्यक आयु तप्त लौह पर खसल पानिक बूँद समान क्षणिक स्थायी अछि । बेंग अपने साँपक गला मे फँसल रहैत अछि, तैयो माछी (मक्खी) केँ पकड़िकय गटगट खाइत रहैत अछि । तहिना मानव काल रूपी साँप सँ ग्रस्त रहैछ, तैयो विषय-भोग मे व्यस्त रहैत अछि । माता, पिता, पुत्र, भ्राता, पत्नी – एहि सभक संग ओहने अछि जेहेन प्रपा (पानि-पियाउ) लग प्यासल लोक जुटल रहैछ आ पानि पीबिकय क्षण भरि मे चलि जाइत अछि । भोग पाबिकय शरीर प्रतिक्षण क्षीण होइत रहैत अछि । ई शरीर पुरुष (भोक्ता) सँ भिन्न अछि । बन्धु-बान्धव सभक मिलन मे जे सुख होइत अछि, तेकरा नदी-नाव केर संयोग बुझबाक चाही ॥१-३३॥

।हरिपद।

।मिथिला संगीतानुसारेण देवराज-विजय छन्दः।

लक्ष्मी थिकि चपला छाया सनि तन-तारुण्य-तरङ्गे ॥३४॥
स्वप्नोपम वनिता-सुख तेहन मन अभिमान अभङ्गे ॥३५॥
दिनकर-देव-गतागत घटइछ आयु क्रमहि जन-तनसौँ ॥३६॥
अनकर जरा मरण काँ देखथि किछु नहि बूझथि मनसौँ ॥३७॥
काँच-कलश-जल-उपमा आयुक जाइत छथि तनु तनसौँ ।३८॥
रोग प्रबल रिपु देह-हरण कर लपटायल मन धनसौँ ॥३९॥
व्याघ्री जरा धरय चाहै मृति सङ्गी समय तकै छथि ॥४०॥
विश्रुत राजा अहँ-भाव-वश देह समस्त कहै छथि ॥४१॥
त्वचा आस्थ रक्तादि भरल जे तनमे कह की निष्ठा ॥४२॥
अन्त समय मे देह होइ छथि कृमि की भस्म कि विष्ठा ॥४३॥
आत्मा देह थिकथि नहि अह काँ लोक दग्धकर इच्छा ॥४४॥
सकल लोक अभिमानहि होइछ दैछी लक्ष्मण शिक्षा ॥४५॥
हम छी देह एहन मतिकेँ अहाँ सदा अविद्या जानू ॥४६॥
थिकहुँ चिदात्मा हम न देह छी ई मति विद्या मानू ॥४७॥
संसृति-हेतु अविद्या जानब विद्या संसृतिहरिणी ॥४८॥
विद्याभ्यास मुमुक्षु-का थिक मननादिक कय करणी ॥४९॥
शत्रु काम क्रोधादि ततय छथि सभसौँ दुर्ज्जय क्रोधे ॥५०॥
जै वश जननि पिता भ्रातादिक जन मारैछ अबोधे ॥५१॥
मूल मनस्तापक कोपे थिक संसारक से बन्धन ॥५२॥
धम्म-नाशकर कोपे मानब अनल बनल बिनु इन्धन ॥५३॥
यम साक्षात कोप काँ जानब तृष्णानदि वैतरणी ॥५४॥
नन्दन वन सन्तोष सदा थिक शान्ति कामगवि करणी ॥५५॥
शान्त-शील रहु कोप करिय जनु शत्रु केओ नहि हयता ॥५६॥
शत्रु मित्र ओ उदासीन जन एक दिन सभ जन जयता ॥५७॥
देहेन्द्रिय मन प्राण बुद्धिसौँ आत्मा थिकथि विलक्षण ॥५८॥
स्वयं-ज्योति आकार-रहित छथि ज्ञाता शुद्ध विचक्षण ॥५९॥
देहेन्द्रिय-प्राणादि-भिन्न जन आत्मा बुझथि न यावत ॥६०॥
जन्म-मृत्यु-संसार-दुःखसौँ पीड़ित होइछथि तावत ॥६१॥
बुद्ध्यादिक सौँ बाहर आत्मा एहन भावना राखू ॥६२॥
सुख दुख प्रारब्धक फल खेद न ज्ञानामृत केँ चाखू ॥६३॥
अन्तःशुद्ध स्वभाव बनल रहु बाहर रहु व्यवहारी ॥६४॥
कर्म्म-दोष किञ्चित नहि लागत बनल रहब संसारी ॥६५॥
कहल भावना जननी राखब दुःख न होयत मन मे ॥६६॥
हमर आगमन करब प्रतीक्षा जाइत छी हम वन मे ॥६७॥
चौदह वर्ष अर्द्ध क्षण सन मन भासित होयत ज्ञाने ॥६८॥
आज्ञा देल जाय वन जायक मानब नहि मन आने ॥६९॥

भावार्थः

लक्ष्मी छाया जेकाँ अवास्तविक आ क्षणिक छथि । शरीरक जबानी मानू एकटा लहरि हो । स्त्री सँ भेटयवला सुख सपना मे भेटयवला सुख समान अछि । तैयो मोन मे एहेन मिथ्या धारणा (अभिमान) रहैत अछि जे ई सबटा स्थायी (अभंग) अछि । जेना-जेना सूरज अबैत आ जाइत रहैत छथि, तेना-तेना मानवक आयु घटैत चलि जाइत अछि । लोक दोसरक बुढ़ापा आ मृत्यु केँ देखैत रहैत अछि, तैयो अपन मोन मे कोनो ज्ञान नहि करैत अछि । आयुक (उमेरक) उपमा काँच माइटक घैल मे राखल गेल पानि सँ देल जा सकैत अछि, एहि तरहें शरीर सँ प्राण निकलि जाइत अछि । शरीरक भारी दुश्म रोग शरीर केँ नष्ट करैत रहैत अछि, तैयो मनुष्यक मन धन-सम्पत्ति मे लेपटायल रहैत छैक । जरा (बुढ़ापा) रूपी बाघिन अपन सहेली मृत्युक इन्तजार करैत रहैत अछि । कहल जाइछ जे शरीरक मालिक अर्थात् आत्मा अहंकार (अज्ञान) मे पड़िकय शरीरहि केँ सब किछु बुझि बैसैत अछि । चमड़ा, हड्डी, लहू आदि विकार सब सँ भरल शरीर मे केहेन श्रद्धा कयल जाय, ई त मृत्युक बाद कीड़ा, छाउर या विष्ठा बनि जाइत अछि । आत्मा शरीर नहि थिक । संसार मे जन्म अभिमान (अज्ञान) केर कारणे होइत अछि । हे लक्ष्मण ! हम अहाँ केँ शिक्षा दैत छी । “हम ई शरीररूपी छी”, एहि धारणा केँ सदिखन ‘अविद्या’ (अज्ञान) बुझू । “हम देह नहि, चिदात्मा छी”, एहि धारणा केँ ‘विद्या’ बुझू । अविद्या (मिथ्या ज्ञान) टा संसार (जन्म-मृत्यु केर चक्र) केर कारण छी, आर विद्या संसार सँ छुटकारा दियाबैत अछि । जे मोक्ष (संसार सँ छुटकारा) चाहय ओकरा मनन आदि कर्म कय केँ अन्त मे विद्याभास (सही ज्ञानक अर्जन) करबाक चाही । एहि साधना मे काम, क्रोध आदि शत्रु (बाधक) होइत छैक । ताहू मे क्रोध केँ जीतब सब सँ बेसी कठिन छैक । एहि क्रोधक वश मे आबिकय लोक अपन माता, पिता, भाइ आदि केँ सेहो मारि दैत अछि । मानसिक पीड़ाक मूल यैह क्रोध छी । यैह संसार मे बान्हयवला अछि । क्रोधे धर्महु केँ खत्म करैत अछि । ई मानू जे बिना ईंधन के जरयवाली आइग छी । क्रोध साक्षात् यम (मृत्यु) छी । तृष्णा वैतरणी नदी छी । सन्तोष नन्दनवन छी । शान्ति मानू कामधेनु छी । सदिखन शान्तचित्त रहू, क्रोध जुनि करू, कियो अहाँक शत्रु नहि बनत । शत्रु, मित्र या तटस्थ सब एक-न-एक दिन अवश्य चलि जायत । शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण आ बुद्धि – ई सबटा आत्माक मित्र थिक । आत्मा स्वतःप्रकाश होइछ, निराकार होइछ, निर्लिप्त होइछ आ ज्ञानक आश्रय (ज्ञानवान्) होइत अछि । जाबत धरि आत्मा केँ देह, इन्द्रिय, प्राण आदि सँ भिन्न नहि बुझब ताबत धरि जन्म-मरण आदि सांसारिक दुःख होइते रहत । आत्मा बुद्धि आदि सँ बाहर अछि, एहेन धारणा बनाउ । सुख आ दुःख त प्रारब्ध (संचित पुण्य-पाप) केर फल थिक । एहि लेल चिन्ता एकदम नहि करू । ज्ञान रूपी अमृत पिबैत चलू । भीतर सँ शुद्ध स्वभाव राखू आ बाहर सँ सांसारिक कर्म करैत रहू । एना कयला सँ सांसारिक बनल रहलो पर कर्मजन्य विकार सँ लिप्त नहि होयब ।” फेर राम माता सँ कहला – “हे माता, हम जे किछु कहलहुँ अछि से याद राखब । एहि सँ अहाँक मोन मे दुःख नहि होयत । हमर घुरबाक प्रतीक्षा करब । हम वन जाइत छी । वनवासक चौदह वर्ष आधा क्षण जेहेन लागत । आब वन जेबाक आज्ञा दिय’ आ मोन मे अन्यथा नहि मानब ॥३४-६९॥

।चौपाइ।
।मिथिला संगीतानुसारेण घनछीशाम्भवी छन्दः।
वननिवास मन हर्षित करण । कयल प्रणाम जननि-युग-चरण ॥७०॥
कौशल्या पुनि अङ्क लगाय । आशिष देलनि देव मनाय ॥७१॥
ब्रह्म विष्णु शिव सुर गन्धर्व्व । रक्षा अहँ क करथु मिलि सर्व्व ॥७२॥
रौदहि माँटि होअ जत झाम । तेहि वन चललहुँ अछि अहँ राम ॥७३॥
स्थित चलइत करयित वन शयन । रवि शशि राखथु अहँपर नयन ॥७४॥
पुन पुन जननी हृदय लगाय । आशिष देल कहल वन जाय ॥७५॥
रामक लक्ष्मण कयल प्रणाम । नोर भरल लोचन अभिराम ॥७६॥
देव कयल मन संशय नाश । हमहु करब गय कानन वास ॥७७॥
आज्ञा देल जाय प्रभु आज । अपनैक त्यागब हम न समाज ॥७८॥
हम न रहब एत पापी धाम । नव नव रीति होयत सङ्ग्राम ॥७९॥
अनुचित सहब न होयत मारि । क्रोधे धरब तीर तरुआरि ॥८०॥
भरत सहित तनिकर हित जानि । मारब समर धरब निज बानि ॥८१॥
त्यागि चलब तौँ त्यागब प्राण । हे रघुनन्दन करु दुख त्राण ॥८२॥
चलु चलु लक्ष्मण कहलनि राम । गेला जनकनन्दिनी धाम ॥८३॥
प्राणनाथ काँ अबइत जानि । सीता कनकपात्र लय पानि ॥८४॥
पति-पद-पङ्कज लेल धोआय । सिंहासन पर बैसला जाय ॥८५॥
नृपति किरीट आदि नहि अङ्ग । सेवा गज वाजी नहि सङ्ग ॥८६॥
बाजन बाज न छत्र न श्वेत । कुशल सकल अछि नृपनि-निकेत ॥८७॥
पअरहि चलइत अएलहुँ कान्त । कहल जाय थिक की वृत्तान्त ॥८८॥
सीताकाँ कहलनि हँसि राम । त्यागब हम एखनहि ई धाम ॥८९॥
पिता कहल दण्डक बन जाउ । चौदह वर्ष व्यतीतहि आउ ॥९०॥
सीता पुछल बहुत मन त्रास । कहु कहु नृप किय देल बनवास ॥९१॥
कहल राम कारण नहि आन । केकयि पाओल दुइ वरदान ॥९२॥
एक वर भरत होथि युवराज । दोसर हमर वन-वासक काज ॥९३॥
पिता धर्म्म-व्रत राखब टेक । विघ्न करिय जनु गुणवति एक ॥९४॥
सीता कहल चलब सङ्ग लागि । सहब न शोक विरह-जर-आगि ॥९५॥
शुनि उत्तर कहलनि श्रीराम । हठक समय नहि थिक ई ठाम ॥९६॥
साहस तजु मिथिलेश-कुमारि । उचित कि हमर वचन दिय टारि ॥९७॥
भल नहि थिक लय जायब सङ्ग । घोर विपिन अछि भूमि कुरङ्ग ॥९८॥
भूख पियासैँ होयब आँट । गड़त पअर-पङ्कज मे काँट ॥९९॥
दौड़त बाघ सिंह मुह बाय । कत जन काँ राक्षस धय खाय ॥१००॥
गड़बड़ बड़ बड़ विषधर साप । स्मरण होइत जिब थरथर काँप ॥१०१॥
बहुत बुझाओल अपनहि राम । ठानल हठ सीता तहि ठाम ॥१०२॥
भावार्थः
कौशल्या फेर गला सँ लगेलिह आर देवता सब केँ मनबैत आशीर्वाद देलिह – “ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवता आर गन्धर्व – सब मिलिकय अहाँक रक्षा करथि । जेतय रौद सँ माटि झाम जेकाँ कड़ा भ’ जाइत अछि, हे राम, अहाँ ताहि वन मे जा रहल छी । ठाढ़ रहैत, चलैत वा सुतैत समय सूरज आ चाँद अहाँ पर नजरि राखथि ।” एहि तरहें माता बेर-बेर छाती सँ लगाकय आशीर्वाद देलिह आ वन जेबाक अनुमति देलिह । तखन लक्ष्मण राम केँ प्रणाम कयलनि, रामक सुन्दर आँखि मे नोर भरि गेलनि, फेर लक्ष्मण बजलाह – “हे देव, अपने हमर मोनक संशय केँ दूर कय देलहुँ । हमहुँ वनवास करब । प्रभु आज्ञा देल जाउ । हम अहाँक संग नहि छोड़ब । हम एहि पापक घर मे नहि रहब । एतय तँ आब नव-नव ढंग सँ लड़ाइ होयत । हम अनुचित बात बर्दाश्त नहि कय सकब । हमरा विरोध भ’ जायत । आर हम क्रोधित भ’ कय अस्त्र उठा लेब । भरत सहित हुनकर पक्षक जतेक लोक होयत, सब केँ युद्ध मे मारि देब आर अपन रंग पकड़ि लेब । यदि अहाँ हमरा छोड़िकय चलि जायब त हम प्राण त्यागि देब । हे रघुनन्दन! हमरा एहि दुःख सँ बचाउ ।” ॥७०-८२॥
राम कहलनि – “बड बढ़िया लक्ष्मण! अहाँ सेहो चलू ।” ई कहिकय राम जानकीक भवन मे गेलाह । पति केँ आबैत देखि सीता सोनाक जलपात्र मे पानि लय अनलिह, पतिक पैर पखारलिह, आर राम सिंहासन पर बैसलाह । नहिये देह मे किरीट-आभूषण रहनि आ न संग मे हाथी-घोड़ा आदि सवारिये छलन्हि । नहि त बाजा बाजि रहल छल, आर नहिये श्वेत छत्र छल । सीता पुछलिह – ‘राजभवन मे सब कुशल त अछि ? हे पतिदेव, अपने पैदले कियैक आयल छी ? कहू त कि बात अछि ?” राम विहँसैत सीता सँ कहलनि – “हम एखन ई राजमहल केँ छोड़ब । पिता आज्ञा देलनि अछि, दण्डक वन जाय आर चौदह वर्ष बितलाक बाद वापस आबी ।” सीता पुछलिह – “हमर मन त्रस्त भ’ गेल । कहू त राजा कियैक वनवास देलनि?” राम कहलनि – “कोनो आर कारण नहि छैक, कैकेयि दुइ गोट वरदान पेने छलिह, ताहि मे सँ एक वर मंगलिह जे भरत युवराज होथि आर दोसर वर मंगलिह जे हम वनवास जाय । हम पिताक धर्मव्रत केर पालन करब । हे गुणवती! एहि मे अहाँ कोनो विघ्न नहि डालू ।” सीता बजलिह – “हमहुँ अहाँक संग जायब । एतय रहिकय बिछोहक आगिक जलन नहि सहब ।” उत्तर सुनिकय श्रीराम कहलनि – “ई हठ केर उचित बेर नहि थिक । हे मिथिलेशकुमारी! साहस छोड़ू, हमर बात केँ टालनाय कि उचित होयत ? संग लय जायब ठीक नहि होयत । वन विकराल अछि । ओतुका धरती आरे तरहक अछि । अहाँ भूख आ प्यास सँ व्याकुल भ’ जायब । अहाँक पैर मे काँट गड़ि जायत । मुंह बेने बाघ-सिंह दौड़त । कतेको लोक केँ राक्षस सब पकड़ि-पकड़ि खा जायत । वन मे बड़का-बड़का विषैला साँप होयत, जेकर ध्यान अबिते प्राण थरथर काँपय लगैछ ।” एहि तरहें राम स्वयं बहुते बुझेलनि, मुदा सीता वैह हठ ठानि देलिह ॥८३-१०२॥
।छन्द।
।मिथिला संगीतानुसारेण कोड़ार-भेदे सूहबछन्दः।
प्रिये हम जाइतछी वनवास ॥१०३॥
सत्य-प्रतिज्ञ पिता कहलनि अछि, केकयि कयल प्रयास ॥१०४॥
कौशल्या सन सासु सदन मे, राखब नियत निवास ॥१०५॥
तनिकर सेवा उचित करक थिक, धैर्य्यहि विपतिक नाश ॥१०६॥
ई संसार असार सर्व्वदा, माया सकल विलास ॥१०७॥
सुख दुख मनमे सम कय मानब, मन जनु करब उदास ॥१०८॥
कन्दमूल सय्योँगहि भेटत, लागत भूष पियास ॥१०९॥
रामचन्द्र कह कानन अति दुख, राक्षस लोकक त्रास ॥११०॥
वचन शुनि जिव मोर थर थर काँप ॥१११॥
हम नहि भवन रहब शुनु प्रियतम, देखब की सन्ताप ॥११२॥
सर्व्वसहा जननी धरणी थिकि, जनक नृपति थिका बाप ॥११३॥
शमता-सहन तेहन अछि तनि काँ, सम मणिमाला साप ॥११४॥
त्रिभुवन बली प्रभुक सन के अछि, तोड़ल शङ्कर-चाप ॥११५॥
ई गोट आज्ञा हम नहि मानब, धर्म्म होएत की पाप ॥११६॥
चन्द्र चन्द्रिका घन बिनु दामिनि, रहय न पृतक मिलाप ॥११७॥
कनइत जनक-नन्दिनी कयलनि, कोटि विलाप-कलाप ॥११८॥
वचन प्रिय ई गोट मानल जाय ॥११९॥
हम किङ्करी चलब कानन संग, अपने रहब सहाय ॥१२०॥
नैहर मध्य सकल फल कहलनि, वृद्ध जोतिषी आबि ॥१२१॥
कानन पति संग जानकि जाएब, भाल लिखल अछि भावि ॥१२२॥
बहुत रमायण कथा शुनल अछि, शङ्कर वचन प्रमाण ॥१२३॥
कतहु न लिखल त्यागि सीता-गृह, कानन देब प्रयाण ॥१२४॥
जौँ अन्यथा प्राण परित्यागब, अपनैँक आगाँ आज ॥१२५॥
चलु चलु विपिन सङ्ग वैदेही, हसि कहलनि रघुराज ॥१२६॥
भावार्थः
राम कहलनि – “प्रिये, हम वनवास लेल जा रहल छी । सत्यवादी पिताक यैह आज्ञा अछि, आर कैकेयि एहि लेल रस्ता (बाट) बनेलिह अछि । कौशल्या जेहेन सासु राजभवन मे छथि । अहाँ निश्चिन्त रूप सँ एतय रही । ओहि सासुक सेवा करब अहाँक कर्तव्य छी । धैर्यहि सँ विपत्ति केँ पार कयल जाइत छैक । ई संसार सदिखन सार-हीन अछि । एकर सारा सुखभोग माया मात्र अछि । सुख आर दुःख दुनू केँ मोन मे बराबर बुझब । मोन उदास नहि करब । वन मे कन्द-मूल-फल सेहो नियत रूप सँ नहि भेटत, भुखे आ प्यासे रहय पड़त । रामचन्द्र कहैत छथि जे वन मे बड़ा कष्ट होयत आर राक्षस सभक डर लागत ॥१०३-११०॥
सीता कहलनि – “अहाँक वचन सुनिकय हमर कलेजा थरथर काँपि रहल अछि । हे प्रियतम, सुनू, हम घर मे नहि रहब । कि एतय सन्ताप देखय लेल रहब ? हमर माता धरती छथि जे सर्वसहा (सब सन्ताप केँ सहयवाली) कहाइत छथि आर राजा जनक हमर पिता छथि । हुनका सुख आ दुःख दुनू बर्दाश्त करबाक क्षमता एहेन छन्हि जे मणिमाला आ साँ दुनू हुनका लेल बराबर छन्हि । तीनू लोक मे अहाँ समान बली के अछि जे शिवजीक धनुष केँ तोड़लहुँ ? अहाँक एक एहि आज्ञा केँ हम नहि मानब, चाहे एहि सँ हमरा पुण्य हो या पाप । चाँद सँ अलग कतहु चाँदनी रहि सकैत अछि आ बादल सँ अलग कतहु बिजली रहि सकैत अछि ?” कनैत जानकी अनेकों तरहक विलाप कयलिह ॥१११-११८॥
फेर सीता कहलनि – “हे प्रिय, हमर ई बात मानि लियह । हम अहाँक दासी संगे-संग वन जायब । अहाँ स्वयं हमर सहायक रहब । बूढ़-पुराण ज्योतिषी सब नानीगाम मे हमरा ई भविष्यवाणी सुनौने रहथि । ‘हे जानकी, तूँ पतिक संग वन जयबह, तोहर भाल (ललाट) पर यैह भविष्य लिखल छह ।’ हम रामायणक बहुतो-रास कहानी सब सुनने छी, जे शंकरजीक वाणी सँ कहल गेल अछि । ओहि मे कतहु ई नहि लिखल अछि जे सीता केँ घरहि छोड़ि भगवान् वन गेलाह । अगर एना भेल त हम अहाँक सोझें मे आइये प्राण त्यागि देब ।” एतेक सुनिकय राम मुस्कुराइत कहला – “हे वैदेही, अच्छा, चलू हमरा संगे वन ।” ॥११९-१२६॥

।चौपाइ।

।मिथिला संगीतानुसारेण देवकामोद छन्दः।

कि करब हार आभरण आब । विपिन बनब वनि मुनि शन भाव ॥१२७॥
अरुन्धती काँ गहना देब । नहि पाथेय एतय सौँ लेब ॥१२८॥
करब द्विजार्प्पण हम निज वित्त । राखब नहि किछु विपिन निमित्त ॥१२९॥
लक्ष्मण द्विज-गण काँ बजबाय । बहुत देल धन बहुतो गाय ॥१३०॥
अपन सकल धन सीता देथि । गुरु-गृहिणीसौँ आशिष लेथि ॥१३१॥
कहल राम मन करु जनु शोक । जे जननिक अन्तःपुर लोक ॥१३२॥
हमर जतेक धन से लय जाउ । चौदह वर्ष सुखी सौँ खाउ ॥१३३॥
कौशल्याक भरल भण्डार । माँगव सहब न पर-उपकार ॥१३४॥
कौशल्या ओ सुमित्रा सकल । वृद्धजननि मन अतिशय विकल ॥१३५॥
लक्ष्मण कहल रहब एक ठाम । सम्पति भरल सकल अछि धाम ॥१३६॥
निर्द्धन विषय करब नित दान । जनु करु दुओ जनि चित्त मलान ॥१३७॥
सेवक-जन नहि बिलटय पाब । देखब कतहु न लोक हसाब ॥१३८॥
शुनल सुमित्रा आशिष ढेरि । वन सौँ सुख सौँ अयबे फेरि ॥१३९॥
करबे की थिकि केकयि माय । भरत सेहो छथि अहँइक भाय ॥१४०॥
हमर तुल्य जानकि काँ जानि । रामचन्द्र काँ दशरथ मानि ॥१४१॥
विपिन अयोध्या मध्य कि भेद । सुखी जाउ वन वत्स कि खेद ॥१४२॥
कर धनु कोप न बाहर काढ़ । लक्ष्मण रामक आगाँ ठाढ़ ॥१४३॥
की विलम्ब कहि चलिअ गणेश । जतय पड़ल छथि विकल नरेश ॥१४४॥
नृपतिक भवन गमन प्रभु कयल । सीता लक्ष्मण प्रभु संग धयल ॥१४५॥

भावार्थः

सीता बजलिह – “आब हार आ गहना सँ कोन काज ? आब त हमरा मुनि लोकनिक समान भाव राखिकय वन मे बसबाक अछि । जे किछु गहना सब अछि से सब अरुन्धती केँ दय जायब । एतय सँ बाटक खर्च लेल सेहो किछु लेनाय नहि अछि । अपन जे वैयक्तिक धन अछि से सब ब्राह्मण लोकनि केँ दान दय देबनि । वन लेल किछु नहि राखब ।” लक्ष्मण ब्राह्मण लोकनि केँ बजाकय बहुते रास धन आ बहुते रास गाय सब दान देलनि । सीता अपन सबटा धन दान कयलिह आ गुरुक पत्नी सब सँ आशीष पेलिह । राम बजलाह – “मोन मे शोक एकदम नहि करब । माताक रनिवास मे जे-जे अछि ओ हमर सबटा धन लय जाउ आ सुख सँ चौदह वर्ष धरि निर्वाह करू । कौशल्याक भंडार भरल छन्हि । ओ परोपकारक लेल मात्र अछि । कष्ट नहि सहब । जरूरत पड़ला पर माँगि लेब । कौशल्या सुमित्रा जे हमरा माता सब छथि, हुनका लोकनिक सेवा मन लगाकय करब ।” ई सुनिते सुमित्रा सहित सब वृद्धा लोकनिक मन विकल भ’ गेलनि । लक्ष्मण बजलाह – “अपने सब एकठाम मिलिकय रहब । घर मे सबटा सम्पत्ति भरल पड़ल अछि । गरीब सब केँ नित्य दान देल करब । दुनू गोटे मोन उदास एकदम नहि करब । ध्यान राखब जे सेवक वर्ग दुर्दशा मे नहि पड़य । देखब, कहीं लोक मे हसारत नहि हो ।” सुमित्रा सुनलनि आ खूब आशीर्वाद देलनि आ कहलनि – “वन सँ सुखपूर्वक घुरिकय फेर आउ । कि करब, आखिर कैकेयि सेहो त अहाँ लोकनिक माइये छथि आ भरत सेहो त अहाँ सभक भाइये छथि । अहाँ वन मे जानकी केँ हमरा तुल्य मानब आ रामजी केँ दशरथ समान मानब । फेर वन मे आ अयोध्या मे फर्क कि पड़ैत छैक ? हे वत्स, सुखपूर्वक वन जाउ । दुःख जुनि करब ।” लक्ष्मण हाथ मे धनुष लेने छथि, तामश बाहर नहि निकालि रहल छथि । ओ सीधे रामक आगाँ ठाढ़ छथि । फेर बजलाह – “आब कथीक देरी अछि, जय गणेश कहिकय ओतय प्रस्थान करू जेतय राजा दशरथ बेसुधि भ’ कय पड़ल छथि ।” ई सुनिते राम राजा दशरथक भवन दिश चललाह । सीता आर लक्ष्मण सेहो हुनकर अनुसरण कयलनि ॥१२७-१४६॥

॥इति श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा-रामायणे अयोध्याकाण्डे चतुर्थोऽध्यायः॥

॥मैथिल चन्द्र कवि विरचित मिथिला भाषा रामायण मे अयोध्याकाण्डक चारिम अध्याय समाप्त॥

हरिः हरः!!

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