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मिथिला भाषा रामायण – अयोध्याकाण्ड प्रथम अध्याय

445 भ्यूज

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण

॥अयोध्याकाण्ड॥

।श्लोक।

।शार्दूलविक्रोडित छन्दः।

भाले बालकलाकरं गलगरं वामाङ्गवामाधरं
चञ्चन्मौलिसरिद्वरं वृषचरं सर्व्वप्रदं निर्द्दरम्।
वन्दे पिङ्गजटं मनाहरनटं विश्रान्तिभूसद्वटं
श्रीमन्निष्कपटं सुकृत्तिकपटं भ्राजद्विभूतिच्छटम् ॥१॥

भावार्थः

शिवजीक हम वन्दना करैत छी, जिनकर माथा पर बालचन्द्र छथि, गला मे विष छन्हि, बामा अंग मे गौरी विराजमान छथि, सिर पर चञ्चल वेगवती गंगा छथि, जे बसहा पर सवार भ’ कय चलैत छथि, सब किछु दयवला छथि, भयरहित छथि, पियर जटावला छथि, सुन्दर नृत्य करयवला छथि, पथिक लोकनिक विश्रामस्थल बरगद वृक्ष समान छथि, श्री सँ सम्पन्न छथि, कपट सँ रहित छथि, ललित गजचर्म केर वस्त्र धारण कएने छथि, विभूति (भस्म तथा ऐश्वर्य केर छटा) सँ विराजमान छथि ॥१॥

।मालिनीछन्दः।

अवतु जलदनीलस्सद्गृही पुण्यशील-
स्त्रिभुवनखलजिष्णू रामचन्द्राख्यविष्णुः।
रघुवरवरजाया सर्व्वसम्पन्निकाया
जनिरखिलसहायाः पातु मान्देवमाया ॥२॥

भावार्थः

रामचन्द्र नाम सँ विदित विष्णु भगवान् हमर रक्षा करथि जे मेघ समान नीलवर्ण छथि, बहुत नीक गृहपति छथि, पुण्यकार्य मे स्वभावतः संलग्न रहैत छथि, आर तीनू भुवन केर दुष्ट सब केँ जितयवला छथि । ओ भगवती हमर पालन करथि जे रामचन्द्रक पत्नीक रूप मे अवतीर्ण छथि, सकल सम्पत्ति स्वरूपा छथि, सर्वसहा पृथ्वी सँ उत्पन्न भेल छथि, आर देवमायारूपिणी छथि ॥२॥

।चौपाइ।

बारह वरष अयोध्यावास । वैदेही संग विविध विलास ॥३॥
श्रीरघुनन्दन भूमिक भार । हरनिहार नरवर अवतार ॥४॥
कहलनि मुनि नारद विधि कान । विधिहुक सभा आन नहि जान ॥५॥
सुरधरणिक अहँ होउ सहाय । कहू सन्देश राम काँ जाय ॥६॥
जे कारण लेलहुँ अवतार । एखनहुँ धरि धरती काँ भार ॥७॥
सीतासहित विपिन कय वास । कयल जाय सुर-अरिक विनाश ॥८॥
विधिक कहल शुनि मुनि मुदचित्त । चलला सुर-अचलाक निमित्त ॥९॥
वीणा सरस राग भल बाज । अति उत्साह देखब विभु आज ॥१०॥
मुनि नारदक मनोरथ पूर्ण । अतिथि राम तट से भेल तूर्ण ॥११॥

।दोहा।

अभ्यागत नारद जतय, गृही जतय श्रीराम ।
की अपूर्व आतिथ्य-विधि, विधिसुत प्रभु गुणधाम ॥१२॥

भावार्थः

धरतीक भार केँ हरण करय लेल श्रेष्ठ मानवक रूप मे श्री रामचन्द्रजी सीताजीक संग भाँति-भाँति ढंग सँ विलास करैत बारह वर्ष धरि अयोध्या मे रहलाह । ओम्हर ब्रह्माजी, नारद मुनि केर कान मे कहलनि, जे बात ब्रह्माक दरबारहु आर कियो नहि बुझि सकल । “हे नारद! अहाँ स्वर्गलोकक सहायक बनू । राम केँ जा कय ई सन्देश कहियौन । अपने जाहि काजक लेल अवतार लेलहुँ अछि, से पूरा नहि भेल अछि । एखनहुँ धरती भार सँ व्याकुल छथि । आब अपने सीता सहित वनवास मे जाउ आर देवताक शत्रु राक्षस सभक विनाश करू ।” ब्रह्माक बात सुनिकय नारद मुनि देवलोकक भलाइ लेल प्रसन्न मन सँ विदा भेलाह । वीणा पर सुन्दर सरस राग बाजय लागल । मन मे उल्लास भरल छल जे आइ भगवान् विष्णुक दर्शन होयत । मुनि नारदक कामना पूरा भेलनि । ओ तुरन्त अतिथि बनिकय रामजीक घर पहुँचि गेलाह । जाहिठाम नारद मुनि अतिथि छथि आर रामचन्द्रजी गृहपति छथि, ओतय केहेन अपूर्व अतिथि-सत्कार भेल होयत से विदिते अछि । एक ब्रह्माक पुत्र छथि आर दोसर गुण सभक आश्रय भगवान् ! ॥३-१२॥

।चौपाइ।

रामचन्द्र उठि कयल प्रणाम । कयल वरासन मुनि विसराम ॥१३॥
लेल जानकी चरण धोआय । पूजन कयल विहित सन्याय ॥१४॥
स्तुति मुनि कयलनि बहुत प्रकार । अपनैँ प्रभु-वर जगदाधार ॥१५॥
कहइतछी आगमनक काज । कहय कहल कमलासन आज ॥१६॥
कहलनि विधि संक्षेप समाद । राखथु अपन वचन-मर्य्याद ॥१७॥
राम कहल हम करब से काज । गेल जाय मुनि द्रुहिण समाज ॥१८॥
बिसरल नहि महि किछु वृत्तान्त । हसि हसि कहलनि सीताकान्त ॥१९॥
प्रातहि हम जायब वनवास । भावी दशवदनादि विनाश ॥२०॥
चौदह वरष वनी बनि रहब । देखब चरित एखन की कहब ॥२१॥
तीनि प्रदक्षिण दण्ड प्रणाम । कय नारद गेल विबुधसुधाम ॥२२॥

भावार्थः

रामचन्द्रजी आसन सँ उठिकय मुनि केँ प्रणाम कयलाह तथा मुनिश्रेष्ठ आसन पर बैसलाह । जानकीजी हुनकर चरण पखारलनि तथा यथोचित विधि सँ हुनक पूजन कयलनि । मुनि नारद बहुतो प्रकार सँ रामक स्तुति कयलनि – “हे प्रभु, अपनहि पर संसार टिकल अछि । हम जाहि काज सँ आयल छी, से कहैत छी, आइ ब्रह्माजी अपने सँ निवेदन करय कहने छलाह । ब्रह्माजी संक्षेप मे एतबहि कहलनि अछि जे अपने अपन वचन देने छी से काज हेबाक चाही । सबटा सामान त घरहि मे मौजूद अछि । गुणशाली मर्यादाक पालन करी ।” राम कहलनि – “हम आइ ओ काज करब । हे मुनि, अहाँ देवता लोकनिक पास जाउ । धरती पर आबिकय हम ओ वृत्तान्त बिसरल नहि छी ।” हँसि-हँसिकय सीतापति राम कहलनि – भोर होइते हम वनवास लेल जायब । रावण आदि राक्षस सभक अन्त होयत । चौदह साल धरि हम वनवासी बनिकय रहब । हमर चरित्र देखब, एखन बेसी कि कहू !” तीन बेर प्रदक्षिणा आ दण्डवत् कय केँ नारदजी देवलोक चलि गेलाह ॥१३-२२॥

।इति श्रीमैथिलचन्द्रकवि विरचिते मिथिलाभाषारामायणे अयोध्याकाण्डे प्रथमोऽध्यायः।

मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे अयोध्याकाण्डक पहिल अध्याय समाप्त भेल ।

हरिः हरः!!

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