मोरंग केर धरतीक मैथिलीपुत्र – उदय चन्द्र गोपाल

कवि-कृतित्व-व्यक्तित्व

उदय चन्द्र गोपाल

मोरङ्ग के बुधनगरा निवासी उदय चन्द्र गोपाल सँ २०६९ साल मे आदर्श माध्यमिक विद्यालय (विराटनगर) प्रांगण मे महाकवि विद्यापतिक स्मृति समारोह मे भेंट भेल छल । मोरङ्ग – बुधनगरा निवासी आशुकवि दयानन्द दिक्पाल यदुवंशीक संग उदय चन्द्र गोपाल सँ परिचय-पाती भेल । पुनः ३ वर्ष पूर्व बुधनगरा वयोवृद्ध कवि दिक्पालजी सँ हालचाल लेबय हुनकर घर पर गेल रही, त रस्ते मे पता चलल जे गोपाल आब एहि संसार मे नहि रहलाह । हुनक धर्मपत्नी सँ दर्शन भेल । हुनका प्रणाम कयल । हुनकर आशीर्वाद लैत मोन बड हर्षक अनुभव कयलक । कारण हमरा मोन मे कवि गोपालक प्रति अगाध श्रद्धा रहय, ताहि भाव सँ एकटा ग्रामसभा मे हम हुनकर चर्चा कएने रही आ तत्क्षण जानकारी भेटल जे आब ओ परलोकवासी भ’ गेलाह आ ई माताजी हुनकर श्रीमती (धर्मपत्नी) छथिन जे एहि ग्रामसभाक हिस्सा छथि । हमरा मुंह सँ कवि गोपालक कृतित्वक बारे मे सुनि-बुझि आ प्रशंसा-सराहनाक शब्द-भाव पढ़ि ओ बुरही बड खुश भेल छलीह । हुनकर ओ खुशमिजाजी आ आह्लाद सँ भरिकय देल गेल आशीर्वाद हमरा बहुत खुशी देलक ।

अहाँ सब सँ आइ गोपालक ओ पोथीक संग वैह चर्चा करय जा रहल छी जे ओहि दिन ओहि ग्रामसभा मे कएने रही । अहाँ सब सेहो बहुत आह्लादित होयब ई बात बुझिकय । गर्व करब जे एहेन-एहेन सपूत अपन मिथिलाक हरेक गाम-ठाम मे आइयो धरि ओहिना छथि, बस हम सब हुनका लोकनि केँ केना ताकब आ केना सभक सामने आनब, ई भार हमरहि सब पर अछि । मैथिली महायात्रा सँ एहने-एहने महात्मा आ विभूति लोकनिक खोज करबाक हमर सपना छल । बहुत दूर धरि चलबो कयल, लेकिन अधूरा छुटल अछि । एकरा पूरा करब जरूरी अछि । अपना भरि हम करिते छी, कइये रहल छी । परञ्च एकटा टन्ना या दुक्खा केर यात्रा सँ मिथिलाक सब विभूति अथवा उल्लेख्य संख्याक महात्मा आ विभूति लोकनिक खोज किन्नहुं पूरा नहि भ’ सकैत अछि । तखन त बिया रोपि देल अछि, गाछ हेब्बे करत, फूल-पात लगबे करत, फर सेहो फरबे करत । सपना कहियो पूरा हेब्बे टा करत । आउ सुनी ओ बात जे हमरा लेल उदय चन्द्र गोपाल समान वीर सपूत केँ अमर-अमिट आ अविस्मरणीय बनबैत अछि ।

“समाजक विकृति” नाम के एकटा पोथी उदय चन्द्र गोपाल छपबौलनि । मैथिली कविता संग्रह आ स्वयं केँ संकलनकर्ता कहैत आवरण पृष्ठ पर जानकीजीक मन्दिर सहित अति साधारण ढंग सँ प्रकाशित करबौलनि स्वयं । एहि मे प्रकाशन वर्ष नहि लिखल अछि, लेकिन हमरा लागि रहल अछि जे नेपाल मे अन्तरिम संविधान सँ शासन चलय लागल छल, पहिल संविधानसभाक गठन भ’ गेल छलैक जाहि मे हमरा सभक क्षेत्र सँ माननीय जयराम यादव संविधानसभा सदस्य उपनिर्वाचन सँ जीतल रहथि । मूल निर्वाचन सँ उपेन्द्र यादव जीतल रहथि । आर एहि पोथी मे शुभेच्छु-सहयोगीक रूप मे हुनकर नाम दर्ज अछि ।

‘समाजक विकृति’ मे कविजी कुल ५७ गोट कविता लिखने छथि । सब कविता अपना आप मे विलक्षण भाव संग सहज सन्देश – कि बच्चा आ कि बुढ़, कि स्त्री आ कि पुरुष, कि गरीब आ कि धनिक – सभक लेल जरूरी आ पठनीय अछि । बेटीक विदाई आ सासुर मे केना बसबाक चाही, ताहि भाव के कविता त हमरा एतेक नीक लागल जे पुछू जुनि । गुरु महर्षि मेंही प्रति हुनक समर्पण भाव बेर-बेर आ अनेक बेर अनेकों कविता मे आयब आ भक्तिक महिमाक गायन – ई दुनू बात बहुत बेसी प्रेरित करैत अछि हमरा । कविक सहज रूप आ ओ बात – “प्रवीण बाबू, ई पोथी हम अपन श्रम बेचिकय जैह-जतबे पैसा जमा कयल ताहि सँ छपबेलहुँ, मुदा आब पाय नहि अछि जे आर छपा सकी । लिखने बहुत रास छी ।” – ई बात हमरा कहियो नहि बिसरायत । ताहि पर दयानन्द दिक्पाल यदुवंशी कहने रहथिन जे ‘काज करय मे प्रवीणे-प्रवीण आ पत्रकारिता मे नवीने-नवीन’ लग जखन बाजि देलहक त आब तोहर सबटा छपा जेतह।’ – ई पंक्ति हमरा एखन धरि कान मे गुंजैत अछि । जानि कहिया हुनका सभक सपना पूरा कय सकब !!

कवि उदय चन्द्र गोपाल अपन दु-टप्पी मे लिखने छथि जे अपन पिताक प्रेरणा सँ विद्या प्राप्ति लेल रामायण पढ़ब शुरू करैत आखिरकार ११वीं धरिक पढ़ाई पूरा करबाक आ फेर गाम-घर मे डाक्टरी, बैदगिरी, बिसहरा देवीक आशीर्वाद सँ सर्पदन्श आदिक इलाज आ विशेष रूप सँ माल-जाल सेहो बीमार भेल त ओकरो इलाज करैत जतबे-ततबे मे निर्वाह करैत रहनिहार छलथि, मुसाइ डाक्टर हिनक उपनाम छल । विद्या बड जरूरी होइछ । सन्त सेवा आ गुरु सेवा सेहो सब केँ जीवन मे करबाक चाही । सामाजिक कूरीति आ विकृतिक विरूद्ध सब कियो एकजुट भ’ आगू बढ़य आ समाज तखनहि आगू बढ़त – ई कविक मूल भाव रहलनि जे लेखनीक संग-संग वास्तविक जीवन मे सेहो ओ अनुकरण कएने रहथि । ओ अपन अल्प आमद सँ परिवारक गुजर-वशर करैत थोड़-बहुत कैञ्चा बचाकय किताब छपबौलनि तेकर प्रशंसा के नहि करत । बुधनगरहि के कवि नारायण प्रसाद राजवंशी सँ पोथीक भूमिका लिखबौलनि, तहिना गुरुदेव स्वरूप अपन अग्रज आशुकवि दयानन्द दिक्पाल केँ प्रेरणादाता मानि हुनकहि द्वारा हिन्दी कविताक लेखनी शुद्ध करैत मातृभाषा मे लेखनी लेल प्रोत्साहन अनुरूप ई पोथी ओ प्रकाशित करबौलनि । मिथिला मे एहि तरहक ‘जनक’ भले कम भेल होइथ, परञ्च भेल छथि तेकर साक्षात् उदाहरण थिकाह ‘उदय चन्द्र गोपाल’।

हम त चाहब जे अपन जीवनकाल मे उदय चन्द्र गोपाल केर लिखल किछु रचना केँ संकलन कय केँ प्रकाशन कार्य करी, मैथिलीक किछु जरूरी सेवा होयत आ हमरो भाग्यवृद्धि एहि सँ अवश्ये होयत । यदि एक साधारण आमद के स्रष्टा मे ई हिम्मत भ’ सकैत छैक त बहुते लोक सक्षम छथि, गोपालक एक कनमो प्रेरणा अपना मे आनि लेता त मैथिली भाषा-साहित्य केँ किछु डेग अवश्य बढा देथिन ।

हरिः हरः!!