स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
बालकाण्डः छठम् अध्याय
राम-लक्ष्मण केर धनुष-यज्ञ देखय जनकपुर पहुँचब
।चौपाइ।
गौतम-घरणि सरणि भल गेलि । गौतम सङ्ग पूर्व सनि भेलि ॥१॥
कौशिक कहल कुशल-मति राम । गुण कि कहब अपनै गुणधाम ॥२॥
ज्ञान-समुद्र नृपति मिथिलेश । तिरहुति सन नहि दोसर देश ॥३॥
जीवन्मुक्त जतय बस लोक । ज्ञान प्रताप चित्त नहि शोक ॥४॥
सीता कन्या ततय कुमारि । धनुष-यज्ञ नृप कयल विचारि ॥५॥
शिवक धनुष तोड़त जे आय । एहि कन्या मे सैह जमाय ॥६॥
पत्र पठाओल तैँ सभ देश । एकहि ठाम देखि पड़त नरेश ॥७॥
जायब ततय अँहउ चलु संग । देखक योग्य सभा भल रङ्ग ॥८॥
गुरु आज्ञा शुनि चलला राम । देखइत शोभा पथ वन गाम ॥९॥
भावार्थः
गौतमक स्त्री अहल्या केँ सुन्दर गति भेटि गेलनि आर ओ गौतमक संग फेर सँ पहिने जेकाँ रहय लगलिह । विश्वामित्र कहलनि – “हे बुद्धिमान् राम, गुणक वर्णन कि करू । अपने त गुणक खजाना छी । मिथिलाक राजा जनक मानू ज्ञानक समुद्र छथि । तिरहुत-सन दोसर कोनो देश नहि अछि । जाहिठाम लोक जीविते अवस्था मे मुक्तजीव जेकाँ रहैत अछि, ज्ञानक प्रभाव सँ चित्त मे कोनो शोक नहि भ’ पबैत छैक । ओहि देश मे राजाक बेटी सीता कुमारि छथि । हुनकर विवाह लेल राजा धनुष-यज्ञ करबाक निर्णय कयलनि अछि । जे कियो आबिकय शिवजीक धनुष केँ तोड़त वैह एहि कन्याक वर बनत । ताहि लेल सब देश मे निमन्त्रण पत्र पठायल गेल अछि । सबटा राजा लोकनिक दर्शन एक्के ठाम भ’ जायत । हम ओतय जायब । अपने सेहो संग चलू । ओ सुन्दर सभा देखय योग्य होयत ।” ॥१-८॥
गुरुक आज्ञा पाबिकय राम विदाह भेलाह । रस्ता मे वन आ गाम सभक शोभा देखैत छलाह ॥९॥
।वरवृत्त।
आनन्दित मन चलला प्रभु दुहु भाय ।
जनकक जनपद मुनि पुन देल देखाय ॥१०॥
सुनतहिँ छल छी लक्ष्मण तिरहुति राज ।
कहलनि रघुवर अयलहुँ देखल आज ॥११॥
भावार्थः
प्रसन्न मोन सँ दुनू भाइ चललाह । मुनि हुनका लोकनि केँ जनकक देश देखौलनि । रघुवीर बजलाह – “हे लक्ष्मण! तिरहुतराजक चर्चा त सुनैत छलहुँ, मुदा आइ एतय आबि अपन आँखि सँ देखलहुँ ॥१०-११॥
।वसन्त-तिलका।
की दिव्य भूमि मिथिला हम आबि गेलौँ ।
देखैत मात्र मन लक्ष्मण तृप्त भेलौँ ॥१२॥
की दिव्य फूल फल वृक्ष अनन्त धान ।
पक्षी विलक्षण करै अछि रम्य गान ॥१३॥
भावार्थः
कतेक विलक्षण मिथिला-देश हम पहुँचि गेल छी । हे लक्ष्मण! देखिते मोन तृप्त भ’ गेल । एहिठामक फूल, फल, वृक्ष आर तरह-तरह केर धान कतेक सुन्दर अछि । पक्षी सब विलक्षण गान कय रहल अछि ॥१२-१३॥
।नागच।
प्रपूर्ण सत् तडाग कि सुधा समान वारिसौँ
विचित्र पद्मिनी-वनी विहङ्ग वारि-चारिसौँ ॥१४॥
द्विरेफ गुञ्जि गुञ्जि केँ महा मदान्ध घूमिकेँ
सरोजिनीक अङ्ग सुप्त वार वार चूमिकेँ ॥१५॥
भावार्थः
सुन्दर-सुन्दर पोखरि अमृत समान जल सँ भरल अछि । एहि पोखरि सब मे कमल-वन जलचर पक्षी सब सँ अपूर्व शोभा पाबि रहल अछि । मद सँ आन्हर भौंरा सब गुंजि-गुंजिकय आ घुमरि-घुमरिकय कमलिनीक मुँह केँ बेर-बेर चूमिकय ओकरहि अंग पर सुइत रहैत अछि ॥१४-१५॥
।चञ्चला।
शालि गोप गीतिकाँ सुप्रीति रीति शूनि शूनि ।
खेत शस्य खाथि नै कुरङ्ग आँखि मूनि मूनि ॥१६॥
सत्य तीरहूति यज्ञ-भूमि पुण्य देनिहारि ।
शास्त्र केँ बजैत बेस कार बैसि डारि डारि ॥१७॥
भावार्थः
हरिन सब खेतक फसल नहि खाइत अछि कियैक तँ धानक रखबार सब जे गीत गबैत अछि तेकरा ओ सब बहुते रुचिक संग आँखि मुनिकय सुनय मे लीन अछि । वास्तव मे यज्ञभूमि मिथिला पावन अछि, जेतय तोता सब डार्हि-डार्हि पर बैसिकय शास्त्रक विवेचना करैत अछि ॥१६-१७॥
।रूपमाला।
नदी-मातृक क्षेत्र सुन्दर शस्य सौँ सम्पन्न ।
समय सिर पर होय वर्षा बहुत सञ्चित अन्न ॥१८॥
दयायुत नर सकल सुन्दर स्वच्छ सभ व्यवहार ।
सकल-विद्या-उदधि मिथिला विदित भरि संसार ॥१९॥
भावार्थः
नदी सँ सींचल (पटायल) जायवला सोहाओन खेत सब फसल सँ भरल-पुरल अछि । समय पर बरखा होइत अछि आर अन्न केर अम्बार लागल रहैत अछि । सब लोक सुन्दर आ दयालु होइत अछि आर ओकर व्यवहार बहुत साफ (निश्छल) होइत छैक । पूरे दुनिया मे प्रसिद्ध छैक जे मिथिला सब विद्या केर समुद्र थिक ॥१८-१९॥
।षट्पद।
कनक सुमणि सौँ खचित रचित नृप विमल अटारी ।
नन्दन-सोदर सुवन रती रम्भा सनि नारी ॥२०॥
मद्र भद्र पर्य्याय भद्र-कर करि ओ करिणी ।
सभ गुण नियत निवास कनक-रत्नाकर घरणी ॥२१॥
उत्तर हिम गिरिवर निकट सुलभ रत्न औषधि सकल ।
पुरि महती मिथिला-पुरी ककरहु नहि देखल विकल ॥२२॥
भावार्थः
एतुका राजमहल सोना सँ रचित आ मणि सँ खचित अछि । एतुका वन स्वर्गक नन्दन-वन समान अछि । एतुका हरेक नारी इन्द्रक परी रम्भा समान सुन्दर छथि । एतय मन्द आ भद्र दुइ प्रकारक कल्याणकारी हाथी आ हथिनी होइत अछि । सब गुण अपन-अपन जगह पर निश्चित छैक ।धरती सोना आ रत्न सँ भरल छैक । बगलहि मे उत्कृष्ट हिमालय पर्वत स्थित अछि जाहिठाम हरेक प्रकारक रत्न आ जड़ी-बूटी सब अपनेआप भेटि जाइछ । समस्त नगरी सब मे मिथिलानगरी महान अछि जेतय केकरहु दीन (विपन्न) नहि देखलहुँ ॥२०-२२॥
शुभ लक्षण संयुक्त मनोगति सुन्दर सुन्दर ।
उच्चैःश्रवा समान अश्व नृप जेहन पुरन्दर ॥२३॥
राज-कुमार उदार सकल विद्या काँ जनइत ।
शौर्य्यशील सन्तोष धर्म्मवेत्ता स्मृति मनइत ॥२४॥
सकल प्रजा आनन्द-मन विहित गृहाश्रम धर्म्ममत ।
नृपतिक शुभ-चिन्तक सतत नीति-निपुण मन कर्म्मरत ॥२५॥
पशु पक्षी सभ हृष्ट पुष्ट नहि दुष्ट कुलक्षण ।
कृष्णसार मृग बहुत नृपति कर सभहिक रक्षण ॥२६॥
अतिशय जन सौजन्य देश मुनिजन-मनरञ्जन ।
जे ताकी से भेट कतहु नहि सृष्टि एहन सन ॥२७॥
नारि सुनयना शुभमती कुलदैवत लज्जावती ।
सकल रसज्ञा नतिमती मत्त-मतङ्गज-वर-गती ॥२८॥
भावार्थः
एतय मन समान तेज दौड़यवला सबटा शुभ-लक्षण सँ युक्त सुन्दर-सुन्दर घोड़ा सब अछि । ओ घोड़ा ओहने अछि जेहेन इन्द्रक पास उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा छन्हि । राजा उदार (दाता) छथि, सब विद्या जननिहार छथि, शूरता, सुशीलता आ सन्तोष रखैत छथि, धर्मक ज्ञाता छथि आर स्मृति सब केँ मनन करयवला छथि । सम्पूर्ण प्रजा प्रसन्न रहैत अपन-अपन कुल आ आश्रमक अनुरूप काज मे लागल रहैत अछि । राजाक भलाइ सोचैत अछि । ओकरा लोकनिक मोन नीति मे (कर्तव्याकर्तव्य-विवेचन मे) आर तन कर्म मे लागल रहैत अछि । सब पशु आ पक्षी हृष्ट-पुष्ट अछि आ कियो बदमाश ऐब (दुर्गुण) वला नहि अछि । बहुते रास कृष्णसार मृग चरैत अछि । राजा सभक रक्षा करैत छथि । लोक मे मेल-जोल खुब रहैत अछि । ई मिथिलादेश मुनि लोकनिक मोन केँ प्रसन्न करयवला अछि । जे किछु ताकब से सब भेटि जायत । एहेन सृष्टि तँ कतहु नहि देखल । एहिठामक स्त्री लोकनि सुन्दर आँखिवाली, सदा शुभचिन्तक, कुलदेवता, भक्त आ लज्जाशील होइत छथि । सब रसीली, विनीत आ मत्त हाथीक समान झूमि-झूमिकय चलयवाली होइत छथि ।” ॥२३-२८॥
।चौपाइ।
कौशिक सङ्ग ततय दुहु भाय । धनुष-यज्ञ थल देखल जाय ॥२९॥
जनकपुरी मे कयल प्रवेश । कौशिक अयला शुनल नरेश ॥३०॥
उपाध्याय काँ सङ्ग लगाय । अति आतिथ्य कयल नृप जाय ॥३१॥
मुनि-पद-पङ्कज अतिशय प्रीति । कयल दण्डवत नृपति सुरीति ॥३२॥
देखलनि पुछलनि जुगल कुमार । नर नारायण जनु अवतार ॥३३॥
श्यामल गोर मनोहर देह । चन्द्र सूर्य्य सन निस्सन्देह ॥३४॥
सब दिश होय प्रकाशित आज । के ई थिकथि कुमर द्विजराज ॥३५॥
मनमे होइछ प्रीति अपार । देखइत बालक परमादार ॥३६॥
मौन महीपति भेल ई भाखि । एक टक ताटक लागल आँखि ॥३७॥
नृपतिक वचन विनयमय शूनि । प्रश्नोत्तर कहलनि मुनि पूनि ॥३८॥
परिचय हिनकर अगम अपार । थिकथि दुहू जन विश्वाधार ॥३९॥
राम श्याम-घन लक्ष्मण गौर । दशरथ नृपतिक जुगल किशोर ॥४०॥
आनल माँगि नृपति सौँ जाय । हमरा भेला बहुत सहाय ॥४१॥
भेटलि ताटका अबितहिँ मात्र । राम हनल एक शर तनि गात्र ॥४२॥
छटपटाय छन छोड़लक प्रान । हिनकर सन रन-सूर न आन ॥४३॥
आश्रम आबि कयल विसराम । कयल पराक्रम बड़ गोट राम ॥४४॥
यज्ञारम्भ कयल मुनि-वृन्द । भेल उपस्थित राक्षस निन्द ॥४५॥
पौरुष हिनक देखल हम नयन । वैरि-विहीन विपिन भेल चयन ॥४६॥
रावण अनुचर अति बलवान । सिंह समक्ष शृगाल समान ॥४७॥
बेल सुबाहु प्रभृति भट नास । बहुत पड़ाएल बड़ मन त्रास ॥४८॥
खसल समुद्र बीच मारीच । बड़ कठजीव मुइल नहि नीच ॥४९॥
गौतम आश्रम गङ्गा-तीर । अयला जखन ततय रघुवीर ॥५०॥
पतिक शाप दुख कारागार । कैलनि रघुवर ततय उधार ॥५१॥
अहल्याक प्रभु कयल प्रनाम । रघुवर कहल अपन वर नाम ॥५२॥
प्रभु-पदधूलि पड़ल उड़ि अङ्ग । भेल अहल्या पूर्व्वक रङ्ग ॥५३॥
महादेव धनु देखय काज । आयल छथि अनपैँक समाज ॥५४॥
भावार्थः
विश्वामित्रक संग दुनू भाइ ओतय जाकय धनुष-यज्ञ-स्थल देखलनि । ओ लोकनि जनकक राजधानी मे प्रवेश कयलनि । राजा जनक केँ खबरि भ’ गेलनि जे विश्वामित्र आयल छथि । अपन गुरु केँ संग लयकेँ राजा हुनका लग पहुँचलाह आ हुनकर खुब आतिथ्य कयलनि । हुनका विश्वामित्रक चरणकमल मे खुब प्रीति भेलनि । ओ उचित रीति सँ दंडवत् प्रणाम कयलनि । दुनू कुमार लोकनि केँ देखलनि आ पुछलनि – “ई दुनू कुमार त बुझाइत छथि जेना नर आ नारायण केर अवतार होइथ । हिनका दुनूक क्रमशः श्यामवर्ण आ गौरवर्ण शरीर निश्चय चाँद आ सूरज सन लगैत अछि । कियैक तँ हिनका लोकनिक आभा सँ चारू दिशा चमकि रहल अछि । ई दुनू राजकुमार के थिकाह ? परम उदार एहि दुनू बालक केँ देखिते हमर मोन मे अपार प्रेम उमड़ि रहल अछि ।” एतेक कहिकय राजा चुप भ’ गेलाह आर हुनक एकटक आँखि मे मानू त्राटक लागि गेल हो । राजाक नम्रतापूर्ण वचन सुनिकय मुनि विश्वामित्र हुनकर प्रश्नक उत्तर देलनि – “हिनका दुनू गोटाक परिचय अगम्य आ अपार छन्हि । ई दुनू संसारक आधार छथि । जे मेघ-जेहेन श्यामल छथि ओ राम थिकाह आ जे गौरवर्ण छथि से लक्ष्मण थिकाह । ई दुनू कुमार राजा दशरथ केर पुत्र छथि । हम हिनका सब केँ राजा दशरथ सँ माँगिकय अनलहुँ अछि । ई हमरा लेल बड पैघ सहायक भेलाह अछि । अबितेकाल ताटका राक्षसी भेटल । राम एक्के तीर मे ओकर शरीर केँ बेधि देलनि । छटपटाकय ओ क्षणहि भरि मे प्राण छोड़ि देलक । लड़ाइ मे हिनका समान शूरवीर आर कियो नहि अछि । फेर ओ हमर आश्रम पर निवास कयलनि आ बहुत पैघ पराक्रम कयलनि । जखन मुनि सब यज्ञ-कर्म आरम्भ कयलनि त दुष्ट राक्षस सब आबि धमकल छल, हम तखन हिनकर वीरता अपन आँखि सँ देखलहुँ । ई तपोवनक शत्रु राक्षस सँ रहित कय देलनि आर तपोवन मे शान्ति पसरि गेल । रावणक सेवक सुबाहु आदि जे अति बलवान बुझल जाइत छल से सब हिनकर सामने गिदर समान सिद्ध भेल । ओहि वीर सभक नाश भ’ गेलैक आ बहुते-रास वीर त परम-त्रस्त मोन सँ भागि गेल । ओकरे सब मे एक गोट मारीच समुद्र मे जाकय खसल । ओ कठजीव (बड कठिनाइ सँ मरयवला) ठहरल, ताहि सँ तुरन्ते नहि मरल । गंगाक तट पर गौतमक आश्रम छल । रामजी ओतय पहुँचलाह । पतिक श्राप सँ अहल्या जे दुःखक कैदखाना मे बन्द रहथि, हुनकर राम उद्धार कयलनि । अहल्या केँ राम प्रणाम कयलनि आ अपन नाम सुनौलनि । रामक पैरक धुरा उड़िकय हुनकर अंग पर पड़लनि । से पड़ैत देरी अहल्या पाथर सँ फेरो नारी भ’ गेलिह । आइ ई शिवजीक धनुष केँ देखबाक लेल अपने ओतय अयलाह अछि ।” ॥२९-५४॥
।सोरठा।
विश्वामित्रक उक्ति, मिथिलापति मन दय शुनल ।
कार्य्यसिद्धि वर युक्ति, मानल मन सर्व्वज्ञ बुध ॥५५॥
भावार्थः
मिथिलापति जनक विश्वामित्रजीक बात सब ध्यान सँ सुनलनि । सर्वज्ञ विद्वान् जनक मनहि-मन सोचलनि जे काज बनबाक यैह नीक युक्ति (सुयोग) आयल अछि ॥५५॥
।चौपाइ।
बड़ बड़ नृपति गेल छथि आबि । टुटल न धनुष नीक फल भाबि ॥५६॥
जनक कहल पण हमर न व्यर्थ । मुनिवर अघटन घटन समर्थ ॥५७॥
कयल कृपा अयलहुँ मुनि आज । सिद्धि भेल मानल मन काज ॥५८॥
बहुत हर्ष नहि हृदय समाय । कहल सचिव सौँ जनक बुझाय ॥५९॥
ई बालक महिमा के जान । आगत जेहन स्वयं भगवान ॥६०॥
हिनकर करू वृहत सतकार । युगल बन्धु छथि परमोदार ॥६१॥
बाढ़ल नृप मन बहुत सनेह । पूजा विधिवत कयल विदेह ॥६२॥
कौशिक केँ दय उत्तम वास । समुचित उचिती कहल प्रकास ॥६३॥
गेल जाओ नृपकाँ मुनि पूनि । कहलनि कार्य्य-भार मन गूनि ॥६४॥
घर थिक अपन कहल नृप फेरि । हम आएब घुमि फिरि कय बेरि ॥६५॥
कौशिक युगल बन्धुकेँ कहल । वत्स करक थिक एकटा टहल ॥६६॥
भावार्थः
बड़का-बड़का राजा आबि चुकल छथि आर एखन धरि धनुष किनकहु सँ नहि टूटल अछि । एहि सँ लगैत अछि जे नीक फल होय वला अछि । जनक कहलनि – “हमर प्रतिज्ञा विफल नहि होयत । हे मुनिवर, अपनेक कृपा सँ असम्भव घटना सेहो सम्भव भ’ सकैत अछि । हे मुनि, अपने जे एतय अयलहुँ से बड पैघ कृपा कयलहुँ । आब हमरा मोन मे विश्वास भ’ गेल हमर मनोरथ पूरा होयत ।” राजा केँ एतेक हर्ष भेलनि जतेक हुनकर हृदय मे समा नहि सकैत छल । तखन जनक अपन सचिव केँ बुझाकय कहलनि – “एहि बालकक महिमा के जनैत अछि ! लगैत अछि जेना स्वयं भगवान् बालकक रूप धारण कय आयल छथि । एहि दुनू कुमार लोकनिक सत्कार खुब उच्चस्तर पर कयल जाय । ई दुनू भाइ बहुत पैघ उदार छथि ।” राजाक मोन मे दुनू कुमार लोकनिक प्रति बहुत बेसी स्नेह उमड़ि एलनि । राजा विदेह खुब विधान सँ हुनका लोकनिक आराधना कयलनि । विश्वामित्र ऋषि केँ खुब बढियाँ निवास देलनि आ उचित विनय-वचन कहलनि । राजा उपर काजक बोझ केर अनुमान कय केँ विश्वामित्र राजा सँ कहलनि – “आब अपने जा सकैत छी ।” फेर राजा कहलनि – “ई अहाँक अपन घर थिक । हम बीच-बीच मे बेर-बेर अपने सभक सेवा मे उपस्थित होइत रहब ।” ॥५६-६५॥
राम केर फुलबाड़ी जायब आ सीता केँ देखब
विश्वामित्र दुनू भाइ सँ कहलनि – “वत्स लोकनि! अहाँ दुनू गोटे केँ एकटा टहल (गुरु सेवाकार्य) करबाक अछि ॥६६॥
।वसन्ततिलका।
राजा विदेहक वृहत् फुलबाड़ि जाउ ।
हे राम लक्ष्मण अहाँ फुल तोड़ि लाउ ॥६७॥
देव प्रदोष शिव पूजन मुख्य काज ।
राजन्य-वीज चरमाचल-मौलि राज ॥६८॥
भावार्थः
हे राम और लक्ष्मण! अहाँ दुनू गोटे राजा जनकक विशाल फुलबाड़ी मे जाउ आ ओतय सँ फूल तोड़िकय (चुनिकय) लेने आउ । देवप्रदोष (साँझ) केर बेर शिवजीक पूजा करब हमर मुख्य कार्य अछि । राजा लोकनिक मूल पुरुष सूर्य पश्चिमाचल (अस्ताचल) केर शिखर पर शोभित भ’ रहल छथि ।” ॥६७-६८॥
।चौपाइ।
गुरु आज्ञानुसार श्रीराम । चलला लक्ष्मण सङ्ग घनश्याम ॥६९॥
नन्दन-मद-गञ्जन वनवेश । शतमख शतगुण विभवि नरेश ॥७०॥
लक्ष्मी जतय लेल अवतार । तनिक विभव के वरनय पार ॥७१॥
देखल जखन जनक-वन जाय । बड़ मन हर्षित दूनू भाय ॥७२॥
माली सौँ पुछलनि फुल लेब । पूजा हेतु गुरू केँ देब ॥७३॥
मालि कहल फुलबाड़िक भाग । बड़ आश्चर्य एक गोट लाग ॥७४॥
सभ ऋतु फूल फुलायल आज । प्रकट एतय सभ दिन ऋतुराज ॥७५॥
कुमुदिनि कमलिनि गत-सङ्कोच । रवि-विधु बुधि अपनहिक किरोच ॥७६॥
अपने युगल मूर्त्ति गुणधाम । हमर भाग्य अयलहुँ एहि ठाम ॥७७॥
दुहु जन गल देल सुमनक माल । अञ्जलि-बद्ध कहल नयपाल ॥७८॥
रामचन्द्र शुनि पुनि बजलाह । निजगुणशालि मालि तोह जाह ॥७९॥
अपन काज कर स्वामि निमित्त । हम वन देखब टहलि सुचित्त ॥८०॥
भावार्थः
गुरुक आज्ञा पाबिकय मेघ-सन श्यामवर्ण रामचन्द्रजी लक्ष्मणजीक संग विदाह भेलाह । राजा जनकक फुलबाड़ी नन्दन-वनक घमंड केँ चूर (दूर) करयवला छल आर राजा इंद्रक विभव केर सौ गुना छल । जिनका लेल सीतारूपी लक्ष्मी जन्म लेलिह हुनक ऐश्वर्यक वर्णन के कय सकैत अछि । जखन दुनू भाइ जनकक फुलबाड़ी देखलनि त दुनूक मोन खुब हर्षित भ’ गेलनि । ओ लोकनि माली सँ अनुमति मँगलाह – “पूजा वास्ते गुरु केँ देबाक लेल हम सब फूल तोड़य चाहैत छी ।” माली उत्तर देलकनि – “अपने फूल तोड़ी, ई त फुलबाड़ी लेल सौभाग्यक बात भेल, मुदा एकटा बातक बड़ा आश्चर्य भ’ रहल अछि । आइ त सब मौसमक फूल फुलायल अछि, जखन कि सब दिन एहिठाम बसन्त ऋतु रहैत छल । आइ एक्के समय मे कुमुद सेहो फुलायल अछि आ कमल सेहो – हिसाब सँ दिन मे कमल आ राति मे कुमुद फुलेबाक चाही । कि सूरज आ चाँद अपनहि लोकनिक अनुरोध पर एहेन विचार कयलक ? अपने दुनू गुणक खान छी । अपने एतय पधारलहुँ, से हमर सौभाग्य थिक ।” एतेक कहिकय माली दुनू कुमार केर गला मे फूलक माला पहिरा देलनि आ हाथ जोड़िकय कहलनि । रामचन्द्र से सुनलाक बाद बजलाह – “हे अपन काज मे कुशल माली! अहाँ जाउ, अपन मालिकक काज करू । हम प्रसन्न मोन सँ घूमि-घूमिकय फुलबाड़ी देखब ।” ॥६९-८०॥
।कवित्त।
उपवन मध्यमे तड़ाग हंस चक्रवाक जल-खग सरस सुरस कलगान ।
देखि शुनइत मुनिहुक चित्तवित्त हर मानस समान जल एहन न आन ॥८१॥
अमल कमल कमला निवास भासमान गुञ्जित मधुप-पुञ्ज मत्त मधुपान ।
गान कान पड़य चामर चारू ढरइछ देवता-निवास मणिदीपक समान ॥८२॥
भावार्थः
फुलबाड़ीक बीच मे एकटा पोखरि छल । ओहि मे हंस, चकेवा आदि जलचर पक्षी हजारोंक संख्या मे रस सँ भरल कलकल गान कय रहल छल । ई देखिकय आ सुनिकय मुनियहुं लोकनिक चित्त रूपी धन अपहृत भ’ जाइत छल । ई मानस सरोवर जेहेन लगैत छल । एहेन जल कोनो आर ठाम दुर्लभ अछि । निर्मल कमल केर फूल पर मानू लक्ष्मीक वास छलन्हि । भौंराक दल कमलमधु पीबिकय मत्त भ’ गुँजि रहल छल । पक्षी सभक गान कान मे पड़ि रहल छल, ओकर पाँखि मानू चँवर डोला रहल छल आर एहि तरहें पोखरि देवताक निवासस्थान मणिद्वीप जेहेन लगैत छल ॥८१-८२॥
।चौपाइ।
सीता चलली अवसर ताहि । युगल बन्धु छल छथि वन जाहि ॥८३॥
गिरिजा देवी पूजि मनाउ । माय कहल जानकि अहँ जाउ ॥८४॥
ततय सखी सङ्ग बहुत कुमारि । विधुर पूर-विधु सुमुख निहारि ॥८५॥
कमल हरिण खञ्जन ओ मीन । तनि-लोचन-जित सोचहि दीन ॥८६॥
मानस बासा कयल मरालि । उत्तम देखल जनि जनि चालि ॥८७॥
जनिक बाहु-जित मञ्जु मृणाल । लज्जित लपटाएल जलपाल ॥८८॥
तुल्य न कनक कदलि कह काँपि । जघनक हम छी हिनक कदापि ॥८९॥
अति कृश कटि करकश कुचभार । सुन्दरता सौँ जित संसार ॥९०॥
कुटिल सुचिक्कन केश विशाल । अंग अलङ्कृत शोभित माल ॥९१॥
जनिकर शुनल पिकी निक गान । गान-मानहत अङ्ग मलान ॥९२॥
शुनि नूपुर हंसक धुनि सार । उपवन राम नयन सञ्चार ॥९३॥
लक्ष्मण काँ पूछल छल-हीन । श्रुति मानस भेल धुनिक अधीन ॥९४॥
भावार्थः
एहि समय मे सीता सेहो संयोगवश ओहि फुलबाड़ी मे पहुँचलीह जेतय दुनू भाइ विराजमान छलाह । माता कहने रहथि – “हे जानकी, अहाँ जाउ, गिरिजाक पूजा कय केँ हुनका सँ मनाउ जे नीक वर भेटथि ।” ओतय बहुते रास कुमारि संगी-सहेली सब सीताक संग रहथि । सीताक सुन्दर मुख केँ देखिकय पूर्णचन्द्र विधुर (दुःखी) भ’ गेलाह । कमल, हरिण, खंजन आर मछरी – ई सब सीताक आँखिक शोभा सँ पराजित भ’ कय दुःख सँ दीन भ’ गेल । सीताक चलब केँ अपन चलब सँ उत्कृष्ट देखि हँसी लाजे मानसरोवर मे रहय लगलिह । मृणाल (कमलक डांट) सीताक बाँहि सँ हारिकय लज्जित भ’ थालहि मे लेपटा गेल । कनक-कदली (एक तरहक केराक गाछ) कँपैत कहि रहल होय – ‘हम सीताक जांघक बराबरी कथमपि नहि कय सकैत छी ।” सीताक अत्यन्त पातर डाँर्ह आ कठोर भारी स्तन अपन सुन्दरता सँ संसार केँ जीतयवला छल । घुँघरायल, चिक्कन आ लम्बा केश छल । अंग सब मे आभूषण छल । माला गला मे शोभित छल । हुनकर गलाक मीठ आवाज केँ सुनिकय कोयली अपन गानक घमन्ड बिसरि गेल आ (ग्लानि सँ) ओकर अंग कारी-झामर भ’ गेलैक । राम सीताक नूपुर केर ध्वनि केँ हंसक कलनाद बुझि लेलनि आ फुलबाड़ी मे अपन नजरि दौड़ेलनि । निश्छल भाव सँ लक्ष्मण सँ पुछलनि – “सुनिते देरी ई ध्वनि हमर मन केँ वश मे कय लेलक ॥८३-९४॥
।हरिपद।
बाल हंस कल श्रवण मनोहर एतय कतय सौँ आयल ।
जनक-पुरी युवतीक गम-जित मानस व्यथित नुकायल ॥९५॥
सैह थिकथि जनु देवि अवनिजा अबइत छथि सखि सङ्गे ।
नूपुर धुनि सुनलाँ जाइत अछि बुझलाँ जाइछ रङ्गे ॥९६॥
भावार्थः
एतय हंसक बच्चाक श्रवण-सुखद कलकाकली कतय सँ आयल ? हंस समान जनकपुरीक युवती लोकनिक चलब सँ हारिकय व्यथित भ’ मानसरोवर मे जाकय नुकायल अछि, फेर एतय हंसध्वनि केना सुनाय पड़ल ? लगैत अछि धरतीक बेटी सीता अपन सहेली सभक संग आबि रहल छथि । हुनकहि पैरक नूपुर केर ध्वनि सुनाय पड़ि रहल अछि आ ताहि सँ हमर मन उल्लासित भ’ रहल अछि ॥९५-९६॥
।बरबा तिरहुति गीत।
अबइत छथि वैदेही सखि मिलि सङ्ग ।
जित-जग-सेना जेना रचित अनङ्ग ॥९७॥
फरकै अछि सुनु लक्ष्मण दहिना आँखि ।
तन पुलकित प्रभु हरषित उठला भाखि ॥९८॥
गबइत अबइत छथि सब गौरी-गीति ।
सकल रागिनी तन धरु जेहन सुप्रीति ॥९९॥
भावार्थः
सहेली सभक संग सीता आबि रहली अछि, जेना कामदेव संसार केँ जीतयवाली सेना सजौने होइथ । हे लक्ष्मण! सुनू! हमर दहिना आँखि फड़ैक रहल अछि ।” कहैत-कहैत रामजीक शरीर मे रोमांच भेलनि आर ओ प्रसन्न भ’ फेर बजलाह – “सब सहेली लोकनि गिरिजाक गीत गबैत आबि रहल छथि, मानू सब रागिनी लोकनि प्रेमवश शरीर धारण कय लेने होइथ ॥९७-९९॥
।हरिपद।
धनुष यज्ञ केँ कारण होइछ उत्सव सकल समाजे ।
दर्शनीय तनिका हम देखल एक पन्थ दुइ काजे ॥१००॥
लोचनमे धन-सार-शलाका सनि लगइत छथि आबी ।
सुधा रसैक छटा सनि तनमे के बुझ की अछि भावी ॥१०१॥
भावार्थः
जिनकर कारण धनुषयज्ञ भ’ रहल अछि आर सारा समाज मे उत्सव भ’ रहल अछि, ओहि दर्शनीय कन्या केँ हम देख लेलहुँ – एक पन्थ दुइ काज । ई सीता हमरा आँखि मे कपूरक सलाइ-सन शीतल लगैत छथि आ शरीर मे अमृत-रसक छींट जेहेन लगैत छथि । के जनैत अछि कि होयवला अछि ।” ॥१००-१०१॥
।चौपाइ।
उपवन पहुँचलि सकल कुमारि । तोड़थि फूल नबाबथि डारि ॥१०२॥
तरु तरु छाया क्षण विसराम । देखथि चलि चलि भल आराम ॥१०३॥
सीता कहलनि हित-सखि कान । अहँकाँ अछि सभ सगुनक ज्ञान ॥१०४॥
जखनहि सौँ अयलहुँ आराम । बेरि बेरि फरकै अङ्ग बाम ॥१०५॥
सखि कहलनि शुभ-सूचक थीक । सगुनक गुन कहलनि मुनि नीक ॥१०६॥
मज्जन कयल तड़ाग मे जाय । गिरिजा काँ पूजल मन लाय ॥१०७॥
फुलहर थल शोभा भल राज । विष्णुरमा जत सहित समाज ॥१०८॥
भावार्थः
सब कुमारि लोकनि फुलबाड़ी मे पहुँचलिह । ओ सब डार्हि झुकाबथि आ फूल तोड़थि । सब गाछक छाहरि मे कनी-कनी समय पर विश्राम करथि, फेर घूमि-घूमिकय सुन्दर फुलबाड़ी केँ देखथि । सीता अपन एक अन्तरंग सखी सँ कहलनि – “हे सखी, तोरा त सब सगुनक ज्ञान छौक । हम जखन सँ फुलबाड़ी मे अयलहुँ तखनहि सँ बेर-बेर हमर बाम अंग फड़कि रहल अछि ।” सखी कहली – “ई त शुभसूचक छौक । ऋषि लोकनि एकर नीक फल कहलनि अछि ।” तखन सीता ओहि पोखरि मे जाकय स्नान कयलिह आ मन लगाकय गिरिजाक पूजन कयलिह । ओहि फुलहर नामक स्थलक शोभा अपूर्व भ’ गेल जेतय लक्ष्मी सहित विष्णु एक संग उपस्थित छथि । (पूजाक बाद सीता गिरिजाजीक स्तुति कयलिह – ) ॥१०२-१०८॥
।सुन्दरी छन्दः कमला छन्दश्च।
जय देव महेश-सुन्दरी । हम छी देवि अहाँक किङ्करी ।
शिव-देह-निवास-कारिणी । गिरिजा भक्त-समस्त-तारिणी ॥१०९॥
हम गोड़ लगैत छी शिवे । जननी भूधरराज-सम्भवे ।
जनता-मन-ताप-नाशिनी । जय कामेश्वरि शम्भुलासिनी ॥११०॥
भावार्थः
“हे देवी! हे महादेव केर पत्नी! अपनेक जय हो ! हम अहाँक सेविका छी । अहाँ शिव केर आधा शरीर मे निवास करैत छी, अहाँ पर्वतराजक पुत्री छी आ सब भक्त केँ उद्धार करयवाली छी । हे शिवे! हम अहाँक चरण मे प्रणाम करैत छी । अहाँ माता छी, अहाँ पर्वतराज हिमालयक सुपुत्री छी । अहाँ लोकक मोनक सन्ताप दूर करयवाली छी । शम्भु केँ प्रसन्न राखयवाली हे कामेश्वरी, अहाँक जय हो ॥१०९-११०॥
।भुजङ्ग-विजृम्भित छन्द।
महादेव-रानी सती श्री मृडानी सदा सच्चिदानन्द-रूपा अहैँ छी ।
अहाँ शैल-राजाधिराजाक पुत्री धरित्री सवित्रीक कर्त्री कहै छी ॥१११॥
अहाँ योगमाया सदा निर्भया छी दया विश्व चैतन्य रूपे रहै छी ।
सदा स्वामिनी सानुकूला जतै छी धनुर्भङ्ग-चिन्ता ततै की सहै छी ॥११२॥
।उपजाति सुन्दरी क्षण।
अपने काँ हम गौरि की कहू । अनुकूला जनि मे सदा रहू ॥११३॥
हमरा जे मन मध्य चिन्तना । सभटा पूरब सैह प्रार्थना ॥११४॥
भावार्थः
अहीं महादेव शिव केर रानी, सती, श्री, मृडानी आर सदिखन सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी छी । अहीं पर्वताधिराज हिमालयक बेटी, धारण करयवाली शक्ति तथा सृजन करयवाली शक्ति केँ जन्म दयवाली छी । अहाँ योग-माया छी, सदा निर्भया छी, दयारूपा छी, विश्वरूपा छी आ चैतन्यरूपा छी । जेतय हमर स्वामिनी अहाँ हमरा उपर सदिखन अनुकूल (कृपालु) छी ओतय धनुर्भंग केर बारे मे चिन्ता कियैक सहय पड़य ! हे गौरी, हम अहाँ सँ कि माँगी ? अहाँ अपन दासी पर सदैव अनुकूल रही । हम मोन मे जे-जे कामना अछि, से सबटा अहाँ पूरा करब – यैह हमर प्रार्थना अछि ।” ॥१११-११४॥
।चौपाइ।
देखलनि एक जनि युगल-कुमार । हरषहि रहल न देह सँभार ॥११५॥
गेल छल छथि से सखि सङ्ग फूटि । तनिक भेल जनु मन धन लूटि ॥११६॥
कहु की देखल कहु की भेल । पुछलहु क्षण नहि उत्तर देल ॥११७॥
किछु न उपद्रव किछु नहि व्याधि । सहजहि लागल मदन समाधि ॥११८॥
सभ उपचार करथि भरि पोष । चेतए कहल आन नहि दोष ॥११९॥
विद्यमान एत युगल-कुमार । देखल तनि शोभा-विस्तार ॥१२०॥
रहितहुँ देवि सरस्वति शेष । कहि सकितहुँ सौन्दर्य्य विशेष ॥१२१॥
विश्व-मनोहर वयस किशोर । अति सुन्दर वर श्यामल गोर ॥१२२॥
जौँ गिरि-नन्दिनि होथि सहाय । देथि जनक-गृह योग्य जमाय ॥१२३॥
देखल न एहन शुनल नहि कान । नहि परतक्ष विषय परमान ॥१२४॥
दर्शनीय छथि एहि आराम । जनिक कान्ति सौँ निर्ज्जित काम ॥१२५॥
जे कहि गेला नारद मूनि । मन से पड़ल समय से शूनि ॥१२६॥
यदपि अपन सखि-जनिक समाज । तदपि जानकी मन भेल लाज ॥१२७॥
स्वेद स्तम्भ पुलक वर अङ्ग । भाव सरस धर गर स्वर-भङ्ग ॥१२८॥
देह काँप वैवर्ण्य शरीर । युगल जलज-लोचन धरु नीर ॥१२९॥
प्रलय भाव जागल भल आठ । मनसिज प्रथम पढ़ाओल पाठ ॥१३०॥
तनिक भाव बूझल सखि एक । जनि मनमे छल मूढ़ विवेक ॥१३१॥
चलु जानकि देखू आराम । नीलक कुरवक तरु जँहि ठाम ॥१३२॥
कहलनि से परिहरु परिहास । अहँक रहै अछि बड़ मन आश ॥१३३॥
सखि हँसि कहलनि शुनु सुकुमारि । वनछवि देखू आँखि पसारि ॥१३४॥
नव-घन-श्यामल छथि नहि दूर । धन बिनु बजइछ मत्त मयूर ॥१३५॥
वन घन शोभा कहु की आज । सगुन सिद्धि मन-वाञ्छित काज ॥१३६॥
हँसी देखल विपिन समाज । चतुर सखीक उकुति तनि बाज ॥१३७॥
भावार्थः
एकटा सखी दुनू कुमार केँ देखलनि । देखिकय एतेक हर्ष भेलनि जे अपन देह केँ सम्हारनाइयो कठिन भ’ गेलनि । ओ अपन सहेली सब सँ हंटिकय गेल रहथि, मानू ताहि सँ एकान्त मे कोनो लुटेरा हुनकर मनरूपी धन केँ लूटि लेलक । कहू कि देखलनि, कहू कि भ’ गेल, एना पुछलोपर ओ सहेली सब केँ जवाब नहि दय सकलिह । न कोनो उत्पात देखाय पड़ैत अछि आ न कोनो बीमारिये । अनायासे हुनका कामक चोट लागि गेल छन्हि । सब सखी लोकनि अपना भरि उपचार-इलाज करय लगलिह आर कहली जे होश मे आउ । ओ कहली – “आर कोनो बात नहि छैक । एतय दुइटा कुमार आयल छथि । हम हुनकर दिव्य शोभा देखलहुँ । जँ हम भगवती सरस्वती रहितहुँ या शेषनाग रहितहुँ तखनहि ओहि किशोर लोकनिक विशिष्ट सौन्दर्यक वर्णन कय सकितहुँ । भैर संसारक मन केँ हरयवला साँवला आ गोर परम सुन्दर दुइटा किशोर देखाय पड़लाह । यदि पर्वतराजपुत्री गिरिजा अनुकम्पा करथि त राजा जनकक घर मे एहने योग्य जमाय देथि । एहेन न कतहु देखलहुँ, न कतहु सुनलहुँ । प्रत्यक्ष मे प्रमाणक कोन आवश्यकता ! एहि फुलबाड़ी मे तँ ओ दुनू दर्शन योग्य कुमार लोकनि मौजूद छथि, जिनकर छवि सँ कामदेव सेहो पराजित छथि ।” सखीक मुंह सँ ई बात सुनिकय सीता केँ ओ समय याद आबि गेलनि जखन नारद मुनि एहि बारे मे किछु कहि गेल छलाह, यद्यपि मंडली केवल अपन अन्तरंग सखी लोकनिक रहनि, तैयो जानकीक मोन मे लाज भेलनि । अंग सब सँ पसीना निकलय लगलनि । संचारहीनता आबि गेलनि । रोइयाँ सब ठाढ़ भ’ गेलनि । श्रृंगार भाव जागि गेलनि । कंठ-स्वर गदगद भ’ गेलनि । शरीर काँपय लगलनि, देहक रंग बदैल गेलनि, दुनू कमलनयन सँ नोर बहय लगलनि । आर, चेतना जेना हेराइत चलि गेलनि । एहि तरहें आठो सात्विक भाव जागि गेलनि । मानू कामदेव पहिल पाठ पढ़ा देलनि । हुनका सब मे सँ एक सखी जिनकर मन मे गहन विवेचनाक शक्ति छलन्हि, सीताक भाव केँ ताड़ि गेलिह । ओ कहली – ‘हे सखी जानकी! चले, फुलबाड़ी देखी जाहिठाम नील कुरबक (यानि राम) केर गाछ अछि ।’ सीता उत्तर देलिह – ‘सखी! मजाक छोड़, तोहर मोन मे तँ कि-कि कामना सब रहल करैत छौक।’ ओ सखी हँसिकय कहली – “सुने सखी! आँखि पसारिकय उपवन केर शोभा देखे । नव घनश्याम दूर नहि छथि, मुदा ओहि घन के विरह मे मतवाला मयूर बाजि रहल अछि । आइ नव मेघक जे शोभा अछि से कि कहल जाय ! ई सगुन कहि रहल अछि जे तोहर मोनक कामना पूरा हेतौक ।’ फेर ओ वनक बीच एक हँसिनी केँ देखली । चतुर सखीक अन्योक्ति मे ओ कहली – ॥११५-१३७॥
।शिखरिणी छन्द।
अये हंसी चिन्ता चित परिहरू सुस्थिर रहू
वियोगेँ व्यग्रा की विरह दिन धीरा अहँ सहू ॥१३८॥
विशालाक्षी देखू अछि न शिशुता अङ्ग धयले
सुशीला साध्वी छी निकट छथि प्राणेश अयले ॥१३९॥
।बरवा।
नारद मुनि जे कहलनि से दिन ।
आरामक परिशीलन करु तजु लाज ॥१४०॥
कहल राम काँ लक्ष्मण दुअ कर जोड़ि ।
दर्शनीय नृप-उपवन लिअ फुल तोड़ि ॥१४१॥
।बसन्ततिलका।
हे नाथ सार्थ नदिनाथक बालिका मे
श्रीनाथ-मानस-निवास-मरालिका मे ॥१४२॥
राजा-विदेह-दुहिता धरणीसुता मे
की भेद-बुद्धि वर-लक्षण-संयुता मे ॥१४३॥
भावार्थः
हे हंसी! अहाँ अपन मोनक चिन्ता दूर करू । निश्चिन्त रहू । विरह सँ व्याकुल कियैक भ’ रहल छी ? अहाँ धैर्यवती होउ, विरहक गोटेक दिन केँ बर्दाश्त करू । हे विशालाक्षी (विशाल आँखिवाली), आब अहाँक तन मे बालपन केर वास नहि रहल । अहाँ सुशीला आ चरित्रवती छी । अहाँक प्राणनाथ लग आबि गेल छथि । नारद मुनि जे कहने रहथि ओ दिन आइ आबि गेल । लाज केँ दबाकय फुलबाड़ीक अवलोकन करू ।” ॥१३८-१४०॥
ओम्हर लक्ष्मणजी दुनू हाथ जोड़िकय रामचन्द्रजी सँ कहलनि – “राजाक फुलबाड़ी देखय लायक अछि । आब फूल तोड़ल जाय । हे नाथ! एक दिन नदी सभक पति समुद्र केर बेटी लक्ष्मी, जे नारायणक मनरूपी मानस-सरोवरक हंसी छथि, आर दोसर दिश राजा विदेह जनकक पुत्री धरणी-सुता जानकी, जे सबटा शुभ लक्षणवाली छथि, एहि दुनूक बीच भेदभाव केहेन ! अर्थात् जानकी साक्षात् लक्ष्मी जेहेन सोहाइत छथि ।” ॥१४२-१४३॥
।चौपाइ।
राम जानकी मन नहि चयन । उत्कण्ठित दर्शन बिनु नयन ॥१४४॥
लता ओट सौँ राम समक्ष । मनसिज-सुषमा-हारक दक्ष ॥१४५॥
सखी देखाओल अवसर जानि । नारद मुनिक वचन अनुमानि ॥१४६॥
तनि बिनु एहन होएत के आन । राजकुमार विष्णु भगवान ॥१४७॥
चलि नहि सकथि थगित भेल देह । बाढ़ल ततय परस्पर नेह ॥१४८॥
सीता रामचन्द्र-मुख हेरि । अनिमिष आँखि निमिष नहि फेरि ॥१४९॥
प्रेम-विवश बिसरल मन शोच । लोचन त्यागल पल संकोच ॥१५०॥
रामहु काँ नहि चित-चैतन्य । साहस सञ्चर नरवर धन्य ॥१५१॥
रमा विष्णु ओ थिकथि सभाग । उचित निमेष न लोचन लाग ॥१५२॥
अग्रज श्याम गोर छोट भाय । शोभा जनिक कहल नहि जाय ॥१५३॥
नख शिख जनिकर देखल रूप । चित्र लिखित सनि सब जनि चूप ॥१५४॥
एक जनि सखि बड़ साहस कयल । सीता-कर-सरसीरुह धयल ॥१५५॥
अयि सखि सुमुखि स्वस्थ रहु चित्त । मुनिक कहल फल-प्राप्ति निमित्त ॥१५६॥
कत जन उपवन कर सञ्चार । सुचित कि उचित कहत व्यवहार ॥१५७॥
चलु बरु गिरिजा-मन्दिर जाउ । चलब भवन किछु समय जुड़ाउ ॥१५८॥
गिरिजा-चरण पूजलहिँ आस । पूरत हयत चित्त निस्त्रास ॥१५९॥
सखी-वचन हित तखना शूनि । युगल बन्धुकेँ देखल पूनि ॥१६०॥
प्रभु छवि देखि धयल मन ध्यान । तन्मय विश्व वस्तु नहि आन ॥१६१॥
देखि देखि सखि युगल-कुमार । आधि विषाद हृदय विस्तार ॥१६२॥
पण की नृप कएलनि मन जानि । बुझि सुझि लेल न हित ओ हानि ॥१६३॥
भावार्थः
राम आ जानकीक मोन मे चैन नहि रहलनि । दुनू गोटेक आँखि एक-दोसर केँ देखबाक लेल उत्कंठित भ’ गेलनि । सखी अवसर पाबिकय आ नारद मुनिक वचन केँ स्मरण कयकेँ लताक ओट सँ रामक झाँकी सीता केँ देखेलिह जे राम कामदेव केर सौन्दर्य केँ जीतय मे समर्थ छलाह । राम केँ छोड़ि एहेन आर के भ’ सकैत अछि ? राजकुमार साक्षात् विष्णु भगवान् छथि । दुनू (सीता आ राम) चलि नहि सकथि कारण शरीर स्तम्भित भ’ गेल रहनि । ओहिठाम दुनू मे एक-दोसर प्रति प्रेम बढ़ि गेलनि । सीता एकटक रामक मुख निहारय लगलिह, पलको तक नहि फेरथि । प्रेम मे विभोर भ’ मनक सबटा चिन्ता बिसरि गेलिह । आँखि पलक खसेनाय बन्द कय देलकनि । रामक चित्त मे सेहो होश आ हवाश नहि रहलनि । पुरुषश्रेष्ठ रामचन्द्र धन्य छथि जे एहेन अवस्था मे सेहो साहस-पूर्वक चलैत-फिरैत रहलाह । सीता आ राम, जे सर्वांशतः लक्ष्मी आ विष्णु रहथि, दुनूक आँखि मे पलक नहि खसैत छन्हि (पलक नहि खसब देवता लोकनिक लक्षण थिकन्हि) । जे श्यामवर्ण छथि ओ जेठ भाइ छथि आ जे गोर छथि से छोट भाइ । ई दुनू गोटेक शोभा कहल नहि जा सकैछ । हिनक नख-शिख रूप (पैर सँ माथ धरिक सबटा स्वरूप) जे-जे सखी सब देखलिह से तेना अवाक् रहि गेलिह जेना चित्र मे लिखायल होइथ । एकटा सखी बड़ा साहस कयलिह आ सीताक कर-कमल केँ पकड़िकय कहली – “हे सुन्दरी सखी! चित्त केँ स्थिर करू । मुनि जे कहने रहथि ओहि फल केर प्राप्तिक सम्भावना देखा रहल अछि । फुलबाड़ी मे बहुतो लोक सब अबैत-जाइत रहैत छथि । अहाँ जे कय रहल छी तेकरा कि बुझनिहार लोक उचित व्यवहार कहता ? चाहू त चलू गिरिजा-मन्दिर चली । किछु काल नयन तृप्त कय केँ फेर घर चलि जायब । गिरिजाक चरणक पूजा कयले टा सँ कामना पूरा होयत आ मन निश्चिन्त होयत ।” ॥१४४-१५९॥
तखन सखीक हित वचन केँ सुनिकय एक बेर फेर दुनू कुमार केँ देखलिह । रामचन्द्रक छवि निहारिकय हृदय मे हुनकहि ध्यान धय लेलिह । हुनका समूचा संसार राममय देखाय देबय लगलन्हि, आर कोनो वस्तु हुनका नहि सुझाइत छन्हि । फेर एक सखी कहली – “हे सखी, दुनू कुमार लोकनिक दर्शन सँ हृदय मे व्यथा आ विवाद बढ़ैत जा रहल अछि । नहि जानि, राजा जनक कि सोचिकय प्रतिज्ञा कयलनि । ओ अपन हिताहित केर विवेचना नहि कयलनि ॥१६०-१६३॥
।घनाक्षरी।
महाराज जनक उचित पण कैल नहि बुद्धिमान लोक बुद्धिमान कतै कहतैनि ।
महादेव धनुष मनुष बूत टूट कत बल देवासुरक जतय ने निबहतैनि ॥१६४॥
धनुष भञ्जन मन काम भूप वीर गन एकहु जनक दाप चापमे न लहतैनि ।
घुरि वीर आगत नगर निज जयताह घर मध्य कन्यका कुमारि कोना रहतैनि ॥१६५॥
पुलकित तन घन आनन्द उचित मन बेरि बेरि मिथिलेश आँगनमे अबितहुँ ।
कन्या वर मङ्गलदायक युवती-समूह गणपति गिरिजा गिरीश गुन गबितहुँ ॥१६६॥
‘चन्द्र’ भन रामचन्द्र पूर्णचन्द्र-मुख देखि अनिमेष लोचन चकोरी केँ बनबितहुँ ।
कोटि काम छवि अभिराम घनश्याम राम जानकीक योग्य जौँ मनोज्ञ वर पबितहुँ ॥१६७॥
।मालिनी छन्द।
सभ जनि पुनि गौरी पूजबा काज ऐली ।
नव नव फुल-माला मालिनी गाँथि लैली ॥१६८॥
सुविधि कयल पूजा जानकी विश्व-धन्या ।
तखन मन प्रसन्ना भेलि शैलेन्द्र-कन्या ॥१६९॥
।गीतिका छन्द।
कहि देल जे मुनि भेल से दिन इष्ट देवि कृपा करू ।
अभिलाष-पूरण-कारिणी जनकार्य्य मे मन दै परू ॥१७०॥
सकलेष्ट-साधन-शक्ति-सकला भूधरेन्द्र-सुता अहाँ ।
कत किङ्करी शरणागता रहिता मनोरथ सौँ कहाँ ॥१७१॥
भावार्थः
महराज जनक उचित प्रण नहि कयलनि । बुझनुक लोक हुनका बुद्धिमान नहि कहतनि । शिवजीक धनुष केँ मनुष्य केना तोड़ि सकत जेतय देवता आ राक्षसहु केर बल सफल नहि भ’ सकत । जे वीर राजा सब धनुष केँ तोड़बाक कामना सँ जुटल छथि ओहि एकहु व्यक्ति केर दर्प एहि शिवजीक धनुष मे सफल नहि होयत । आयल वीरगण त अपन-अपन घर घुरि जेताह, मुदा राजा जनक अपन घर मे कन्या केँ कुमारिये कोना रखताह । तन पुलकित भ’ जाइत अछि, मोन मे घनघोर आनन्द पसैर जाइत अछि, बेर-बेर मिथिलेशक आँग मे अबितहुँ; युवती सभक दल बनाकय कन्या आ वर केर मंगल लेल गिरिजा आ शिवजीक प्रार्थना गीत गबितहुँ; ‘चन्द्र’ कवि कहैत छथि, रामचन्द्रजीक मुखरूपी पूर्णचन्द्र केँ देखैत अपलक आँखिक चकोरी बना लीतहुँ; जँ करोड़ कामदेव केर छवि सँ सेहो बेसी नीक छविवला मेघ-सन साँवला राम केँ जानकीक लेल उपयुक्त वर पाबि सकितहुँ ॥१६४-१६७॥
फेर सब सहेली लोकनि गिरिजाक पूजनक समय मे जुटि गेलिह। मालिन फूलक नव-नव माला गुथिकय लय अनलक । जानकी विधानपूर्वक विश्ववन्द्य गिरिजाक पूजा कयलिह । पूजा पाबिकय पर्वतराजकुमारी गौरी प्रसन्न भेलिह । सीता गिरिजाक स्तुति कयलनि – “मुनि नारद जे कहने रहथि ओ दिन आइ उपस्थित अछि । हे हमर आराध्य देवी गिरिजा, कृपा करू । अहाँ मोनक अभिलाषा पुरबयवाली छी, अपन सेविकाक काज मे ध्यान दयकय पड़ू । अहाँ कामना-पूर्तिक सारा शक्ति सँ युक्त छी आ पर्वतराज हिमालयक पुत्री छी । बहुते रास सेविका लोकनि जे अहाँक शरण मे अयलिह ओ सब अपन मनोरथ सँ कहियो वंचित नहि भेलिह ।” ॥१६८-१७१॥
।चौपाइ।
गौरि पूजि पद कयल प्रणाम । फरकल बेरि बेरि अङ्ग बाम ॥१७२॥
तखन खसल भल फूलक माल । ओ प्रसाद लय राखल भाल ॥१७३॥
पुन प्रसाद से हृदय लगाब । मन कह वाञ्छित होयत आब ॥१७४॥
भूधर – नन्दिनि हर्षित चित्त । कहलनि वैदेहीक निमित्त ॥१७५॥
चिन्ता परिहरु अवनि – कुमारि । नयन सफल करु निकट निहारि ॥१७६॥
सुन्दर श्याम मही – पुरहूत । शिवक धनुष टुट हिनकहि बूत ॥१७७॥
जे वर नारद कहि गेलाह । लोचन – गोचर से भेलाह ॥१७८॥
गिरिजा – वचन शुनल से कान । सकल सखी करु तनि गुनगान ॥१७९॥
भावार्थः
गौरीक पद केर पूजा कय केँ सीता प्रणाम कयलिह । हुनक बाम अंग बेर-बेर फड़कलनि । तखन मूर्तिक उपर सँ फूल केर एकटा माला खसल जे सीता प्रसाद बुझिकय उठा लेलिह आ अपन माथा पर राखि लेलिह । फेर ओहि प्रसाद केँ छाती सँ लगा लेलिह । हृदय कहलकनि, आब वांछित फल अवश्य भेटत । गिरिराजपुत्री पार्वती प्रसन्नचित्त भ’ कय सीताक प्रति कहली – “हे पृथ्वीपुत्री! चिन्ता छोड़ू । लगहि मे जे धरती पर उतरल इन्द्रक समान श्यामवर्ण सुन्दर रामचन्द्रजी छथि हुनका दिश ताकिकय आँखि सफल करू । हुनकहि शक्ति सँ शिवजीक धनुष टुटत । नारदजी जाहि वर केर बारे मे कहि गेल छलथि वैह श्रीराम आइ अहाँक आँखिक सोझाँ छथि ।” ॥१७२-१७९॥
।गीत।
रहू देवि दासी-विषय सहाय ।
जय जय जगदीश्वर-वामाङ्गी जय जय गणपति-माय ॥१८०॥
अतिशय चिन्ता मनमे छल अछि नृपति कठिन पण पाय ।
दरशन देल भेल मन-वाञ्छित चिन्ता गेलि मिटाय ॥१८१॥
सकल सृष्टि-कारिणि जनतारिणि महिमा कहल न जाय ।
जगदम्बा अनुकूला अपनहि हम की देब जनाय ॥१८२॥
रामचन्द्र सुन्दर वर जै विधि होथि महीप-जमाय ।
जय जय जननि सनातनि सुन्दरि तेहन रचब उपाय ॥१८३॥
भावार्थः
गिरिजाक उपर्युक्त वचन सुनिकय सब सखी लोकनि स्तुति करय लगलिह – “हे देवी, अपन सेविकाक प्रति अनुकूल रहू । हे जगदीश्वर शिव केर अर्द्धांगिनी, अहाँक जय हो । हे गणेश्वरीक माता, अहाँक जय हो । राजाक कठिन प्रतिज्ञा देखिकय मोन मे बहुत चिन्ता भ’ गेल छल । अपने दर्शन देलहुँ, हमरा लोकनिक सब अभिलाषा पूरा भ’ गेल आर चिन्ता मेटा गेल । अहीं सम्पूर्ण सृष्टि रचयवाली छी आर सब भक्त केँ तारयवाली छी । अहाँक महिमा अपरम्पार अछि । हे संसार भरिक माता, अहाँ त स्वयं अनुकूल छी, फेर विनती कि करू ! हे सनातन सुन्दरि जननी! अहाँक जय हो । अहाँ एहेन उपाय करू जाहि सँ सुन्दर वर रामचन्द्रजी राजा जनकक जमाइ होएथ ।” ॥१८०-१८३॥
यज्ञ केर अन्त होयब आ राम-लक्ष्मण केर सभामंडप पर पहुँचब
।चौपाइ।
गिरिजा-वचन सकल जनि शूनि । हर्षित चललि भवन सभ पूनि ॥१॥
गुरुक निकट गेला पुन राम । लक्ष्मण-सहित देखि आराम ॥२॥
देखल उपवन हर्ष न थोड़ । लगला जाय गुरू केँ गोड़ ॥३॥
गुरु पुछलनि नृप उपवन केहन । कहल विदेहक होइनि जेहन ॥४॥
गुरुपूजार्थ धयल भल फूल । नन्दन-वन न नृपक वन तूल ॥५॥
चरमाचल चुम्बन कर सूर । कुमुदिनि-कुलक मनोरथ पूर ॥६॥
सरसोरुह-मुह सम्पुट कयल । चटकाली गुरु-भूरुह धयल ॥७॥
समुदित विधु-मुख विधु-वदनाक । दिवस अन्ध खग सञ्चर ताक ॥८॥
सानुज सन्ध्या-वन्दन कयल । गुरुपद-कमल विमल उर धयल ॥९॥
कह रघुवर विधुबिम्ब निहारि । कत विधु कतय विदेह-कुमारि ॥१०॥
तनि मुख समता शशि की पाब । प्रति तिथि व्यतित अतिथि बनि आब ॥११॥
तनि पदसमता वारिज कहब । असमञ्जस अपयश जन सहब ॥१२॥
रजनि विकास न हिमसौँ हानि । जानकि उपमा देब कि जानि ॥१३॥
कन्यारत्न प्रकट महि-फूल । उपमा विधि न रचल निधि-मूल ॥१४॥
जतय जतय भय पड़इछ दृष्टि । ततय ततय सीतामयि सृष्टि ॥१५॥
एहन न अछि एको प्रस्ताव । सीतास्मरण जतय नहि आव ॥१६॥
गुरुप्रसाद अयलहुँ एहि ठाम । शुनतहिं छलछी तिरहुति नाम ॥१७॥
छथि गुरु देव विधाता तूल । काज होइत अछि चित अनुकूल ॥१८॥
टुटि छिड़िआयल तारा-हार । रजनीकाँ शशि सङ्ग विहार ॥१९॥
बीतल रातिक दोसर याम । निद्रा सेवित लक्ष्मण राम ॥२०॥
हृदय कमल मे रमा निवास । विद्रावित निद्रा तैँ त्रास ॥२१॥
चललि रजनि जनि विधु तहि सङ्ग । अरुणित अम्बर कुसुमक रङ्ग ॥२२॥
खग-कल भल भूषण झणकार । समटि लेल तारावलि हार ॥२३॥
पसरल छल जनु कच अंधकार । धूसर विधु विरही व्यवहार ॥२४॥
कुमुदिनि मलिनि कमल वन राज । उदय अस्त दिनकर द्विजराज ॥२५॥
क्लेश कटित भेल कोकवधूक । दिवस-अंध मनधंधित घूक ॥२६॥
कत प्रभात-सूचक खग कूज । मुनि मानस-विधि गुरु केँ पूज ॥२७॥
शिव शिव धुनि शुनि पड़ चहु ओर । स्नान करथि संयमि जन भोर ॥२८॥
घण्टा शंखनाद आनन्द । विकच कमल कैरव मुख बन्द ॥२९॥
प्रेम-बद्ध अलि नलिनी-कोष । भ्रमित भ्रमर मधु पिबि भरि पोष ॥३०॥
गणिका चललि नृतय अवसान । नील नलिन दल नयन समान ॥३१॥
वन्दी विरुद रटथि नृप-द्वार । भैरव राज सरस सञ्चार ॥३२॥
वाद्य विविध धुनि मृदुल मृदङ्ग । शयित अवनिपति निद्रा भङ्ग ॥३३॥
अगनित महिपति जनक-समाज । आगत शिव-धनु-भञ्जन काज ॥३४॥
यथा यथा भूपति जन आव । तथा जनक सौँ आदर पाव ॥३५॥
रथ तुरङ्ग गज पथ नहि सूझ । अर्थी दिन रजनी नहि बूझ ॥३६॥
यज्ञभूमि मे थल निर्म्माण । कयल मनोहर जनक-प्रधान ॥३७॥
प्रातःकृत्य स्नान कय राम । गुरु-पद-पङ्कज कयल प्रणाम ॥३८॥
आशिष दय गुरु कहलनि आज । सत्वर चलु जत नृपति विराज ॥३९॥
मञ्च अनेक बनल छल बेश । तेहि पर बैसथि जाय नरेश ॥४०॥
सकल मञ्च मे एक प्रधान । बैसल कौशिक सह भगवान ॥४१॥
नृपति सुमति तति तत बैसलाह । जनक-प्रधान कहय लगलाह ॥४२॥
शतानन्द मुनि गौतम-तनय । कहल सभा मे जनकक विनय ॥४३॥
कन्या रमा-समा मिथिलेश । तप-बल पाओल तिरहुति देश ॥४४॥
धरणी-तनया अति सुकुमारि । छविमयि रती-विजयि अवतारि ॥४५॥
त्रिभुवन देखल शुनल नहि कान । वनिताजन विरचल विधि आन ॥४६॥
आगत नृपवर जनक-समाज । जनकक कहल शुनल हो काज ॥४७॥
शिवक धनुष भञ्जन कर जैह । वैदेही वर होयता(ह) सैह ॥४८॥
शुनि तनि कथा हर्ष नृप-चित्त । आएल छी एत सैह निमित्त ॥४९॥
तोड़ब धनुष हमहि अगुआय । पाछाँ रहब मरब पछताय ॥५०॥
बड़ बड़ बलगर गलगर जाथि । टूट न धनुष मनुष पछताथि ॥५१॥
एहि गत कत कत नृप गत-गर्व्व । धनुष न टार हार मन सर्व्व ॥५२॥
परिचित बलक हजार हजार । शङ्कर धनुष समुख मन हार ॥५३॥
धनुष निकट माचल महाघोल । सभ जन पाओल माथक मोल ॥५४॥
भावार्थः
सब सखी लोकनि गिरिजाक वाणी सुनिकय हर्षक संग घर घुरि गेलिह । फेर लक्ष्मण सहित रामजी फुलबाड़ी देखि गुरु लग घुरलाह । उपवन देखलनि । अपार हर्ष भेलनि । जाकय गुरु केँ प्रणाम कयलनि । गुरु पुछलखिन – ‘उपवन केहेन छल?” रामजी उत्तर देलखिन – “राजा विदेहक जेहेन हेबाक चाही ।” फेर आनल फूल गुरु केँ पूजा लेल राखि देलनि । राजा जनकक फुलबाड़ीक तुलना नन्दनवनो सँ नहि कयल जा सकैत अछि । सूर्य अस्तांचलक शीर्ष पर पहुँचलथि । कुमुदिनीक मनोरथ पूरा भेलैक (कियैक तँ कुमुदिनी सूरज अस्त भेलाक बादे फुलाइत अछि ) । कमल अपन मुंह बन्द कयलक । पंछी सब बड़का-बड़का गाछ पर बनेने अपन खोंता मे घुरल । चन्द्रमुखी सुन्दरी सभक मुखकमल सेहो फुला गेल (कियैक तँ प्रिय-मिलन केर समय निकट आबि गेल) । जे पंछी दिन मे आन्हर भ’ जाइत अछि ओ सब आँखि मे ज्योति पाबिकय विचरण लेल तैयार भ’ गेल । लक्ष्मण सहित रामजी सन्ध्या-वन्दन कयलनि । गुरुक निर्मल चरण कमल केर ध्यान कयलनि । रामचन्द्रजी चन्द्रमंडल निहारिकय बजलाह – “कतय चाँद आ कतय जानकीक मुखमंडल ! हुनकर मुंहक तुलना यदि कमल सँ कयल जाय त लोक सब अनुचित कहत आ अपयश सहय पड़त । जे राति मे सेहो फुलायल रहैत अछि आ जाड़ मे जे गलैत तक नहि अछि, एहेन चरणक उपमा कमल सँ केना देल जा सकैत अछि । जे कन्यारत्न धरती सँ फूल जेकाँ प्रकट भेली, सबटा निधिक आश्रय हुनका लेल ब्रह्मा कोनो उपमा नहि बनौलनि । जेतय-जेतय हमर नजरि जाइत अछि, भरि संसार हमरा सीते-सीता देखाइत अछि । एहेन कोनो प्रसंग नहि छैक जे सीताक याद नहि दियाबए । गुरु विश्वामित्रक कृपा सँ हम एतय अयलहुँ । हम त तिरहुतक खाली नाम टा सुनैत रही । गुरु, देवता आ विधाता (भाग्य) तीनू संग छथि, ताहि लेल मनोनुकूल काज होइत जा रहल अछि ।” ॥१-१८॥
रात्रिरूपी नायिका चन्द्ररूपी नायकक संग रतिविहार कयलक । नायिकाक गलाक तारारूपी हार टुटि खसल आर ओकर दाना छिरिया गेल ।रातिक दोसर पहर बीति गेल । राम आ लक्ष्मण निद्रित भ’ गेलाह । रामक हृदय रूपी कमल मे लक्ष्मी विराजमान छलिह, से देखिकय सौतक डर सँ निद्रादेवी भागि गेलिह । चानक संग छोड़िकय रजनी चलि गेलि । कुसुम रंग मे राँगल ओकर लाल अम्बर (वस्त्र आर आकाश) देखाय लागल । चिड़ै-चुनमुनीक चहचहेनाय मानू ओकर अंगक गहना सभक खनकब थिक । ओ ताराक हार समेटि लेलक । ओकर केशरूपी अन्हार जे पसरल छल से समाप्त भ’ गेल । रजनीक विरह सँ चानक रंग फीका पड़ि गेल । कुमुदिनी म्लान भ’ गेलि (मुँदा गेलि) आर कमलवन प्रसन्न भ’ उठल (फुला गेल) । सूरज आ चान क्रमशः उदयाचल आ अस्ताचल पर पहुँचि गेल । चकवीक विरह-वेदना दूर भ’ गेल । दिन केँ आन्हर भ’ जायवला उल्लूक मोन मे चिन्ता समा गेलैक । प्रातःकालक सूचना दैत कतेको चिड़ियाँ सब कूजय लागल । मुनि लोकनि मानसविधि सँ (मने-मन) अपन-अपन गुरु केँ पूजय लगलाह । चारू दिश ‘शिव-शिव’ शब्द सुनाय लागल । नियम-संयम वला लोक सब प्रातःस्नान करय लागल । घड़ी-घंटा आर शंखक शब्द आनन्द दियए लागल । कमलक मुख खुजि गेल आ कुमुदक बन्द भ’ गेल । भौंरा कमलक कोरा मे प्रेमवश कैद भ’ गेल । किछु भौंरा सब मोन भरि कमल-मधु पिबिकय मंडराय लागल । नाच खत्म कय केँ वनिता सब सेहो चलि गेलिह । हुनका लोकनिक आँखि कमलक पात जेकाँ नील रंगक भ’ गेलनि । भाट सब राजाक द्वार पर स्तुतिपाठ करय लगलाह । प्रातःकालीन भैरवराग अलापल जाय लागल । मधुर मृदंग केर आवाजक संग तरह-तरह केर बाजा सभक शब्द सँ सुतल राजा जनकक नींद टुटलनि ॥१९-३३॥
धनुर्भंग
राजा जनकक दरबार मे शिवजीक धनुष केँ तोड़बाक लेल अनगिनत राजा सब आबय लगलाह । जेना-जेना राजा सब अबैत गेलाह, तेना-तेना जनक सँ आदर पबैत गेलाह । एतेक रथ, घोड़ा आ हाथी चारूदिश पसैर गेल जे रास्ता पर्यन्त नहि सुझाइत अछि । गर्जमन्द लोक दिन छी कि राति तेकरो परवाह नहि करैछ । राजा जनकक अधिकारी सब यज्ञ-भूमि मे सभा-स्थल (पंडाल) बनेने रहथि । रामचन्द्रजी स्नान कय केँ प्रातःकृत्य कयलनि आ गुरु विश्वामित्रक चरण-वन्दना कयलनि । आशीर्वाद दय गुरु कहलखिन – “आइ जल्दिये ओतय चलू जेतय राजा दरबार लगौने छथि ।” राजा सब केँ बैसबाक लेल अनेकों मंच (ऊँच आसन) बनायल गेल छल । राजा सब ओहि पर जा-जा बैसय लगलाह । सब मंच मे जे एकटा मुख्य स्थान छल ताहि पर विश्वामित्रक संग रामचन्द्रजी बैसलाह । बड़का-बड़का बुद्धिमान राजा-महाराजा ओतय बैसलाह । जनकक अधिकारी लोकनिक विनय-वचन सँ सभक सत्कार करय लगलाह । गौतमक पुत्र मुनि शतानन्दजी जनकजीक दिश सँ विनय-पूर्वक निवेदन कयलनि – “मिथिलेश राजा जनक तिरहुत देश मे अपन पुण्यक प्रताप सँ एक कन्या प्राप्त कयलनि जे लक्ष्मी समान सुन्दरी छथि । ओ धरती सँ उत्पन्न भेली । अत्यन्त सुकुमारि (कोमलांगी) छथि, शोभामयि छथि । मानू सौन्दर्य मे रती (कामदेवक स्त्री) केँ जीतबाक लेल अवतीर्ण भेल होइथ । तीनू लोक मे न आँखि सँ देखल आ न कान सँ सुनल जे एहेन नारी ब्रह्मा कोनो दोसरो बनेने छथि । जनकक दरबार मे आयल अपने समस्ता राजा लोकनि, राजा जनकक प्रतिज्ञा सुनि लेल जाउ आ तदनुसार आगू काज करय जाउ । जे कियो शिवजीक धनुष केँ तोड़ब वैह सीताक पति होयब ।” ॥३४-४८॥
शतानन्दजीक बात सुनिकय राजा सभक मोन हर्षित भेलनि आ एकटा राजा बजलाह – “एहि लेल त हम एतय आयल छी । हमहीं आगू भ’ कय धनुष केँ तोड़ब । जौँ पाछू पड़ब त पश्चाताप सँ मरि जायब ।” बड़का-बड़का बलवान् आ वीरताक दम्भ करनिहार (गाल बजेनिहार) राजा सब धनुष तोड़य जाइत छथि, मुदा हुनका सब सँ धनुष नहि टुटैत छन्हि आ ओ सब पछताय लगैत छथि । एहि तरहें कतेको राजा सभक घमन्ड टुटि गेल, मुदा धनुष केँ टारियो नहि सकलाह । सभ मन सँ हारि गेलाह । विख्यात बलशाली हजार-हजार राजा शिवजीक धनुषक सोझाँ हारि मानि गेलाह । धनुषक पास एकदम कोलाहल मचि गेल । सब अपन-अपन माथाक मोल पाबि लेलनि ॥४९-५४॥
।सोरठा।
आब न रहल उपाय, वनिता-गण मन विकल कह ।
भूपति-पण अन्याय, कतय शम्भु-धनु मनुष कत ॥५५॥
कन्या रहलि कुमारि, अनुचित एहन न भेल छल ।
सभ बैसलि मन हारि, नृपति सकल बल बुझि पड़ल ॥५६॥
शतानन्द बजलाह, अहह आह निर्वीर महि ।
भल करइत अधलाह, होमय न बूझ विदेह काँ ॥५७॥
।घनाक्षरी।
टुटल न धनुष विमुख तुष नृपगण,
साहस सौँ सहस सहस छल लटकल ।
वीर सौँ विहीन भेलि अवनी से ज्ञात भेल,
गेल जाओ वीरवृन्द व्यर्थ छी अटकल ॥५८॥
विधिक लिखल कन्या रहली कुमारी मान्या,
जनकक उक्ति शतानन्द सभा फटकल ।
लछमन कुमर सकोप शुनि बजलाह
आकृति जनिक देखि सभ जन सटकल ॥५९॥
भावार्थः
महिला सब विकल भ’ कहय लगलीह – “आब कोन उपाय होयत ? राजा जनक गलत प्रतिज्ञा कयलनि । कतय शिवजीक धनुष आ कतय मनुष्यक बल ! बेटी कुमारिये रहि गेलिह । एहेन अनर्थ त कहियो नहि भेल छल ।” सब महिला लोकनि निराश भ’ बैसि रहलि । सबटा राजा सभक बलक भंडाफोड़ भ’ गेल । शतानन्द बजलाह – “अहा! आइ एहि संसार मे कियो वीर पुरुष नहि रहल । राजा जनक केँ एकटा नीक काज करैत एहेन खराब परिणाम नहि भेटबाक चाही । धनुष नहि टुटल । भूँसा बराबर राजा सब विमुख भ’ चलि गेलाह । साहसक संग हजार-हजार राजा लागल रहथि । आइ पता चलल जे धरती वीर सब सँ खाली अछि । हे वीर लोकनि, अहाँ सब जाउ । नाहक मे कियैत अटकल छी ? विधिक एहने लिखल छल । श्रेष्ठ कन्या कुमारि रहि गेलि ।” ॥५५-५८॥
राजा जनकक दिश सँ शतानन्द ई बात राजा सभक मंडली मे घोषणा कयलनि । कुमार लक्ष्मण सुनिते देरी क्रोधित भ’ कय बाजय लगलाह, हुनकर चेहरा देखि सब कियो सटैक गेल ॥५९॥
।झूलना छन्द।
देव-रघुनाथ-पद-वारिरुह-दास हम सर्व्वदा भ्रातृ-आज्ञानुसारी ।
मेरु उद्दण्ड भुजदण्ड तट गण्य नहि जीर्ण शिव-चाप कहु कोन भारी ॥६०॥
पाबि रुचि चाप धय देब कय खण्ड कय रहित भय सञ्चरब वीर मानी ।
कोप मन बाढ़ जनकोक्ति कटु गाढ़ शुनि विश्व के ठाढ़ संग्राम प्राणी ॥६१॥
भावार्थः
“हम प्रभु रामचन्द्र केर चरण-कमलक सेवक छी आर सदैव भ्राताक आज्ञा मानयवला छी । हमर भुजदंडक आगाँ प्रचंड मेरु पर्वतहु केर गिनती नहि, फेर बताउ जे हमरा लेल जीर्ण-शीर्ण पुरना शिव-धनुष कतबा भारी होयत । यदि रामचन्द्रक इच्छा होइन्ह त हम धनुष केँ उठाकय खंड-खंड कय देब आ मनस्वी वीर जेकाँ निर्भय भ’ कय विचरण करब । जनकजीक अत्यन्त तीख बात सुनिकय हमरा मोन मे क्रोध जागि गेल अछि हमरा सामने संसारक कोन प्राणी लड़ाइ मे ठाढ़ भ’ सकत ।” ॥६०-६१॥
।बरबा।
स्मित-मुख राम न बजला, अनुज निहारि ।
चेष्टहि कयल निवारण, समय विचारि ॥६२॥
कौशिक कहलनि रघुवर धनुष उठाउ ।
पूरिअ जनक-मनोरथ आधि मिटाउ ॥६३॥
(धनुर्ब्बन्ध, २० पत्र कमलबन्ध, १० दल कमलबन्ध, चामरबन्ध, करमुष्टिकबन्ध, गो-मूत्रिका-बन्ध इत्यादि)
।दोहा।
राम राम छम काम-सम मसम मसम सम धाम ।
रोम रोम भ्रम सोम हिम सुमम महिम सम नाम ॥६४॥
।मालाबन्ध घनाक्षरी।
कत कत जत तत जन मन मन भन बड़ गड़बड़ पड़ गोपचाप भूपकाँ ।
गाम धाम धाम राम-गीति अतिप्रीति रीति बर गर हार धर जप तप रूपकाँ ॥६५॥
सुर नर पुर दार सकलक एक टक आँखि भाखि भाखि सखि भल भेल भलकाँ ।
भल फल भेल देल सिधि विधि निधि सुधि गेल चल चल बल शाल भेल खलकाँ ॥६६॥
भावार्थः
छोट भाइक रंग देखिकय रामजी मात्र मुस्कुराइत रहला, मुख सँ किछु नहि बजलाह । समय अनुसार हुनका मात्र इशारा सँ रोकलाह । तखन विश्वामित्र कहलखिन – ‘हे राम, अपने धनुष उठाउ आ राजा जनकक चिन्ता दूर कय हुनकर मनोरथ पूरा करू ।” ॥६२-६३॥
राम जिनक छवि करोड़ों कामदेव केँ जीतयवला छल, जे सम्पूर्ण सृष्टिक मानसपटल मे धाम समान छथि, जिनकर रोम-रोम सँ हिमखंड पर पड़ि रहल चन्द्रमा अमृतमयी प्रकाशक छिटकब समान अभैर रहल अछि तथा जिनक नामक महिमा अपरम्पार अछि – ओ धनुष तोड़बाक लेल उठलाह । आब जहाँ-तहाँ कतेको लोक मनहि-मन कहय लागल जे ई शिवधनुष भंग करबाक राजाक संकल्प बहुत गड़बड़ मचबयवला नहि भ’ जाय, एतेक बड़का-बड़का गोप (राजा) सब जाहि धनुष केँ नहि हिला सकलाह से एहि बालरूप राजकुमार सँ केना टूटत । सम्पूर्ण धामक स्वामी राम प्रति अत्यन्त प्रीति भरल हुनकहि गला मे वरमाला पहिरेबाक रूप जानकीजी आँखि मुन्दिकय देखि रहल छथि । समस्त सुर लोकनि संग जनकसभा मे उपस्थित समस्त लोकसमाज एकटक आँखि सँ यैह बाजि रहल छथि जे आब सब किछु भला भेल, सखी लोकनि जानकीक भाग्यक सराहना करैत हुनका उचित वर भेटबाक बात बाजि रहल छथि । जानकी केँ नीक फल भेटबाक बात एक दिश आ दोसर दिश खल (दुष्ट) केँ ई बात अखड़य लागल छल ॥६४-६६॥
।चौपाइ।
जनक कयल कौशिक काँ विनय । खण्डन धनुष करथु नृपतनय ॥६७॥
कौशिक कहल कहल नृप वेश । धनु भञ्जन नहि एक नरेश ॥६८॥
अँहक मनोरथ पुरता राम । अयले छथि धनु-खण्डन-काम ॥६९॥
रमानाथ पुरुषोत्तम शूर । करिय विदेह-मनोरथ पूर ॥७०॥
गुरुक वचन शुनि कहि प्रभु नीक । कञ्जबन्धु-कुल कृति हित थीक ॥७१॥
परिकर बाँधल दृढ़तर राम । राखल धनुष बाण तहिठाम ॥७२॥
मञ्चक उपर सहज प्रभु ठाढ़ । अतिशय हरष जनक मन बाढ़ ॥७३॥
रानि मनाबथि देव बहूत । धनु भञ्जन हो हिनकहि बूत ॥७४॥
जनिक दृष्टि पड़ युगल कुमार । विबुध विलोचन सम व्यवहार ॥७५॥
घण्टाशत-युत मणि ओ वस्त्र । स्थापित छल त्रिपुरारिक अस्त्र ॥७६॥
देव सकल छल भल नर वेष । रघुवर शोभा टक टक देख ॥७७॥
इन्द्राणी-गण गायिनि सर्व्व । रमा-रमेशक परिणय पर्व्व ॥७८॥
लक्ष्मण तत्क्षण रक्षण काज । कहल आबिकैँ धनुषसमाज ॥७९॥
राम वामकर धनु धरताह । जन देखइत कौतुक करताह ॥८०॥
श्रमकर नृपवर छल छथि व्यर्थ । देखथु रामक कर-सामर्थ्य ॥८१॥
गुरु देथि आशिष पढ़ि शत बेरि । कौतुक ततय देखल जन ढेरि ॥८२॥
भावार्थः
राजा जनक विश्वामित्र सँ आग्रह कयलनि जे राजा दशरथक पुत्र रामजी शिवजीक धनुष तोड़थि । विश्वामित्र हुनका उत्तर देलखिन्ह – “हे महाराज! अपने बड नीक कहलहुँ । कोनो राजा धनुष नहि तोड़ि सकलाह । आब श्रीराम अपनेक कामना पुरा करताह । ओ तँ धनुष तोड़बाक लेल आयले छथि ।” फेर ओ राम सँ कहलखिन्ह – “हे रमानाथ! हे पुरुषोत्तम वीरवर! अपने राजा जनक केर कामना पूरा करू ।” ॥६७-७०॥
गुरुक बात सुनिकय राम कहलनि – “अच्छा! सूर्यवंशक प्रतिष्ठा कायम रखबाक लेल ई करब उचित होयत ।” राम कसिकय फाँर्ह बन्हलन्हि आ ओतय अपन तीर-धनुष राखि देलनि । फेर सहजभाव सँ मंचक उपर ठाढ़ भ’ गेलाह । जनकक मोन मे हर्षक लहरि दौड़ि पड़ल । रानी सब देवता लोकनि केँ गोहराबय लगलिह जे धनुष-भंग हिनकहि ताकति सँ हो । जिनकर किनको नजरि एहि दुइ कुमार लोकनि पर पड़ैत छल हुनकर नजरि ओहिना अपलक (पलक झपकनाय छोड़ैत) भ’ जाइत छल जेना देवता लोकनिक आँखि अपलक भेल करैत अछि ॥७१-७५॥
शिवजीक धनुष सौ-सौ घंटी, विविध रत्न आर वस्त्र सँ सुशोभित कय केँ राखल गेल छल । मनुष्यक रूप धारण कएने देवता लोकनि सेहो ओतय जुटि गेल छलाह तथा रामचन्द्रक शोभा सब कियो अपलक देखि रहल छलाह । इन्द्र पत्नी सेहो गीतगायिनी बनिकय नारीक रूप मे एहि रमा (लक्ष्मी) आर रमेश (नारायण) केर विवाहक उत्सव मे उपस्थित छलिह । लक्ष्मणजी धनुष-यज्ञ मे जुटल जनसमुदाय सँ सम्बोधित भ’ रक्षार्थ बजलाह – “आब रामजी बामा हाथ सँ धनुष उठौता आर अपने सभक लेल अद्भुत लीला करताह । मेहनत करयवला राजा लोकनि बेकारे बैसल छी । आब ओ सब रामजीक बाहु-बल केँ देखी ।” गुरु विश्वामित्र सौ-सौ बेर मंत्र पढ़िकय आशीर्वाद दैत आ दर्शकवृन्द सब ई सारा तमाशा देखैत रहलाह ॥७६-८२॥
।अमृतध्वनि।
अँह धरणी धीरा रहब सहब धरणि-धर भार ।
दलन हेतु शङ्कर-धनुष उद्यत राम उदार ॥८३॥
दार-सहित जयकार करथि सुर भार अवनि हर ।
वर्ष सुमन मन हर्ष बहुत प्रभु कर्ष धनुष कर ॥८४॥
भङ्ग धनुष रव चङ्ग भुवन सब रङ्ग अवनि पुनि ।
चाप टुटल परिताप छुटल कहल लोक अमृतधुनि ॥८५॥
भावार्थः
हे धरणी, अपने स्थिर रहब । हे पर्वत लोकनि, अपने सब भार थम्हने रहब । आब शिवजीक धनुष तोड़बाक लेल उदार रामजी तैयार छथि । अपन-अपन पत्नी सहित देवता लोकनि जयध्वनि कय रहल छथि । धरतीक भार केर हरण भ’ रहल छल । फूल बरैस रहल छल । मोन मे अपार हर्ष भरि रहल छल । प्रभु रामचन्द्र हाथ सँ धनुष खींचि रहल छथि । धनुष टुटल । चिन्ता दूर भ’ गेल । लोक आनन्दक बात करय लगलाह ॥८३-८५॥
।चौपाइ।
प्रभु कर परस धनुष टुटि गेल । शब्द प्रचण्ड भुवन भरि गेल ॥८६॥
फणिपति-फण फट फट कय फाट । कच्छप कछमछ मानस आँट ॥८७॥
कलमलाय उठलाह वराह । कसमस कयल दशन निर्वाह ॥८८॥
दिग्गजचय कयलन्हि चितकार । सहि नहि शक महि दुर्भर भार ॥८९॥
डगमग अवनी अदभुत लाग । सात समुद्र रहित मर्य्याद ॥९०॥
दिनकर-रथ-हय त्यागल बाट । जय जय कर मिथिलेश्वर-भाट ॥९१॥
मैथिल मानव उठला भाखि । विधि मर्य्यादा लेलनि राखि ॥९२॥
मनहुँक संशय-चय भेल दूर । कयल मनोरथ ईश्वर पूर ॥९३॥
जनकक लोचन हरषक नोर । राम धनुष तोड़ल भेल सोर ॥९४॥
अति चिन्ता चिन्तामणि पाय । जनक कनकमणि देथि लुटाय ॥९५॥
जनकक-पण निवहल भल हूब । रङ्क न एक महघ मणि छूब ॥९६॥
राजा मिलल राम भरि अङ्क । वत्स छोड़ाओल हमर कलङ्क ॥९७॥
रानी हर्ष कहल नहि जाय । अन्तःपुर धन रहलि लुटाय ॥९८॥
कयल जानकिक दिव्य शिङ्गार । दक्षिण कर देलनि वर हार ॥९९॥
भावार्थः
रामचन्द्रक हाथक स्पर्श होइते देरी धनुष टुटि गेलैक । प्रचंड शब्द सँ सारा संसार भरि गेल । धक्का लगला सँ शेषनागक फन फटफट आवाजक संग फाटय लागलनि । धरती केँ पीठ पर राखयवला कच्छप छटपटाय लगलाह । हुनक मन व्याकुल भ’ गेलनि । पृथ्वी केँ दाँत पर राखयवला वराह छटपटा उठलाह । कोनाहु अपन दाँत केँ बचा सकलाह । दिशाक पालन करनिहार ऐरावत आदि दिग्गज सब चिंघारय (चिकरय) लगलाह । धरती अपन बेसम्हार भार केँ सम्हारय सँ असमर्थ भ’ गेलिह । धरतीक डगमग डोलब अजीब लागि रहल छल । सूर्यक रथ केर घोड़ा सब आतंकवश (भड़किकय) रस्ता छोड़ि एम्हर-ओम्हर भटकय लागल । मिथिलेश जनकक वन्दी लोकनि जय-जयकार करय लगलाह । मिथिलावासी बाजि उठलाह – “विधाता हमरा लोकनिक प्रतिष्ठा बचा लेलनि । मोनक सबटा आशंका दूर भेल । ईश्वर हमरा सभक कामना पूरा कयलनि । राजा जनकक आँखि सँ हर्षक नोर बहय लागल । चारूकात हल्ला पसरि गेल जे रामजी धनुष तोड़ि देलनि । राजा सोना आ रत्न सब लुटाबय लगलाह जाहि सँ सब लोक केँ मनमाना धन प्राप्त भेल, जाहि सँ चिन्तोमणि केँ चिन्ता होमय लगलनि जे जनकक आगाँ हुनकहु महिमा जाइत रहलनि । जनकक प्रतिज्ञा अत्यन्त प्रतिष्ठाक संग पूरा भेलनि । एक रंको एतबा धनिक भ’ गेल जे मूल्यवान् रत्न तक केँ ओ नहि छुबैछ । राजा राम संग गला भरिकय मिलन कयलनि आ बजलाह – “हे वत्स! अपने हमर कलंक छोड़ेलहुँ ।” रानी सभक हर्ष कहल नहि जाइछ । ओ सब रनिवास मे धन लुटाबय लगलिह । फेर ओ सब जानकी केँ विवाहोचित शृंगार कयलिह आ हुनकर दहिना हाथ मे वरमाला देलिह ॥८६-९९॥
।गीत-कमल-छन्द।
कुशल जगदम्बिका करथु घनश्याम काँ ।
जनक-पण-पूर्त्तिमे प्रबल-बल-धाम काँ ॥१००॥
कहथि तिरहुति मे सकल जन राम काँ ।
कयल अहाँ विश्व मे अचल निज नाम काँ ॥१०१॥
कमल-वर-लोचना जनक-सुकुमारिका ।
कहथि सखि लोक की हृदय-दुख-धारिका ॥१०२॥
कयल विधि सिद्धिओ मनक अभिलाष काँ ।
अहँक वर देखि केँ नयन-सुख लाख काँ ॥१०३॥
दिवस-पति-वंश मे एहन सखि आन के ।
त्रिपुर-हर-चाप काँ दलन भगवान के ॥१०४॥
।लक्ष्मीधर स्त्रग्विणी छन्द।
जानकी हाथमे माल लक्ष्मी धरू । श्रीघनश्यामकाँ देखि चिन्ता हरू ॥१०५॥
जे धनुर्भङ्गकर्त्ता ततै सञ्चरू । ऐ महानन्दसौँ स्वान्तकेँ सम्भरू ॥१०६॥
भावार्थः
भगवती जगदम्बा मेघ जेहेन श्यामल राम केँ कुशल राखथि, जे जनक केर प्रतिज्ञा केँ पूरा करय मे समर्थ बलशाली छथि । तिरहुतक सारा लोक रामजी सँ कहय लगलाह – “अपने संसार भरि मे अपन नाम अचल बनेलहुँ ।” श्रेष्ठ कमल जेहेन आँखिवाली जनक-किशोरी सीता सँ हुनक सखी सब कहली – “तूँ बेकारे हृदय मे चिन्ता करैत छलें, विधाता तोहर मोनक अभिलाषा पूरा कय देलथुन । तोहर दूल्हा केँ देखिकय लाखों लोकक आँखि तृप्त भेल । हे सखी, सूर्यवंश मे एहेन आर के अछि जे शिवजीक धनुष केँ तोड़य ?” ॥१००-१०४॥
जानकी अपन हाथ मे सुन्दर वरमाला लेलनि । रामचन्द्र केँ देखिते हुनकर चिन्ता दूर भ’ गेलनि । धनुष तोड़बाक लेल जे सब ओतय जुटल रहथि सेहो सब ओहि भारी आनन्द मे मगन भ’ गेलाह ॥१०५-१०६॥
।चौपाइ।
स्मितमुख सखि सङ्ग बाढ़ल लाज । बड़ उत्सव बड़ लोक समाज ॥१०७॥
रामक उपर देल से माल । त्रिदश-दुन्दुभी बाज विशाल ॥१०८॥
सकल नगर-जनि जनकक दार । वार वार वर कुमर निहार ॥१०९॥
जनक कहल कौशिक काँ न्याय । दशरथ ओतय निमन्त्रण जाय ॥११०॥
रानी-सुत-युत नृप अओताह । जाति बराति बहुत लओताह ॥१११॥
पत्र सहित तत पहुँचल दूत । जतय अयोध्याधिप पुरहूत ॥११२॥
दशरथ बुझल राम-करत चरित । जेहन सुखायल तरु हो हरित ॥११३॥
मिथिलेशक जे आयल दूत । तनिकाँ देलनि वित्त बहूत ॥११४॥
हरषि हरषि अपनहिँ कर काज । बजबाओल सभ मन्त्रि समाज ॥११५॥
बाँचि शुनाओल सभ काँ पत्र । जाएब तत सुत सहित कलत्र ॥११६॥
जनक समधि निरवधि सुख थीक । एहि सौँ कार्य्य होएत की नीक ॥११७॥
गज तुरङ्ग-वर वर-रथ पत्ति । महती सेना बड़ सम्पत्ति ॥११८॥
अग्नि सहित गुरु चलला अग्र । हमरा हर्षहिँ मन भेल व्यग्र ॥११९॥
हुनि संग चलली रामक माय । हम रथ चढ़ि जाएब अगुआय ॥१२०॥
प्राप्त जनकपुर दशरथ भूप । अयला जनक समधि अनुरूप ॥१२१॥
आनल दूरहि सौँ अड़िआति । जे व्यवहार विहित छल जाति ॥१२२॥
शतानन्द गौतम-मुनि-बाल । अति सत्कार कयल तत्काल ॥१२३॥
उत्तम भवन देल नृप वास । सुरपति-सदन समान सुभास ॥१२४॥
लक्ष्मण सहित आबि तत राम । पिता चरणमे कयल प्रणाम ॥१२५॥
उत्कण्ठित छल चित्त बहूत । युगल कमल-मुख देखल पूत ॥१२६॥
।सोरठा।
गुरुक अनुग्रह तात, कार्य्य सकल सम्पन्न अछि ।
अपनै छलछी कात, बालक प्रति-पालक सुमुनि ॥१२७॥
दशरथ हृदय लगाब, लक्ष्मणयुत रघुनाथ काँ ।
अनिर्व्वचन सुख पाब, ब्रह्मानन्दक प्राप्त जनु ॥१२८॥
भावार्थः
सखी सभक बीच मे सीता विहुँसि पड़ली, लाज होबय लगलनि । उत्सव बहुत पैघ छल । बहुते लोक जुटल रहथि । श्रीराम उपर माला खसय लागल आर चारूदिश दुन्दुभि बाजा सब बाजय लागल । नगरक सब नारी समाज आ जनक स्त्री लोकनि बेर बेर दूल्हा केँ देखि रहल छलथि ॥१०७-१०९॥
राजा जनक विश्वामित्र सँ कहला – “आब राजा दशरथ ओतय निमंत्रण जेबाक चाही । रानी एवं बेटा सभक संग राजा दशरथ अओता आ अपना संग-संग जात-विरादरक लोकक भारी बरियाती सजाकय अनता ।” ॥११०-१११॥
दूत पत्र लय ओतय पहुँचल जेतय अयोध्याक राजा दशरथ इन्द्र समान विराजमान रहथि । जखन दशरथ रामजीक कृत्य सुनलनि त ओ प्रसन्न भ’ उठलाह मानू सुखायल पड़ल गाछ फेर हरियर भ’ उठल हो । मिथिलेश जनकक ओतय सँ जे दूत आयल ओकरा राजा दशरथ बहुते रास धन सब देलनि । ओ हर्ष सँ भरिकय अपनहि सबटा काज करय लगलाह । मंत्री लोकनिक मंडली केँ बजबौलनि । सब केँ पत्र पढ़िकय सुनौलनि जे “हम रानी लोकनि आ राजकुमार लोकनि सहित ओतय जायब । जनक समधि हेताह, ई बहुत आनन्दक बात भेल । एहि सँ बढ़िकय आर हित कि होयत !” ॥११२-११७॥
हाथी, घोड़ा, रथ आ पैदल – चारू अंगवाली विशाल सेना आ भारी सम्पत्ति सब संग लयकय अग्नि-सहित गुरु वसिष्ठ केँ आगू कयकेँ राजा दशरथ चललाह आ कहला – “हमर मन हर्ष सँ विभोर भ’ गेल अछि ।” ॥११८-११९॥
हुनका संग रामजीक माता कौशल्या चललिह आ कहलिह – “हम रथ पर चढ़िकय आगुए पहुँचब ।” राजा दशरथ जनकपुर पहुँचलथि । हुनकहि अनुरूप समधि राजा जनक हुनका लग अयलाह, आ दूरे सँ अगुवानी कयकेँ हुनका अपना ओतय लय गेलाह । यैह रीति हुनक जाति-विरादरी मे प्रचलित छल । गौतम मुनिक पुत्र शतानन्दजी तुरन्ते सब गोटेक बहुते नीक सँ सत्कार कयलनि । सुन्दरो सँ सुन्दर भवन मे राजा दशरथ केँ आवास देल गेलनि जे इन्द्रभवन समान शोभा पाबि रहल छल । ओतय लक्ष्मण-सहित राम अयलाह आ पिता केँ प्रणाम कयलाह । राजा दशरथक चित्त बड़ा उत्कंठित छल । ओ दुनू पुत्र केर कमल-मुख देखलनि । ओ कहलनि – “हे वत्स! गुरुक कृपा सँ सबटा काज पूरा भेल अछि । हम स्वयं त दूर रही, मुदा दुनू कुमार लोकनिक प्रतिपालन करयवला मुनिवर विश्वामित्र रहथि ।” दशरथ लक्ष्मण आ राम केँ गला सँ लगा लेलनि आर एहेन अनिर्वचनीय आनन्द पेलनि जेना ब्रह्म संग साक्षात्कार कयला सँ भेटैत अछि ॥१२०-१२८॥
सीताक विवाह
।चौपाइ।
वास अयोध्याधिप आगार । राजकुमर वर दशरथ-दार ॥१॥
जनक मुदित मन देल निवास । यथायोग्य काँ स्थल विन्यास ॥२॥
सामग्रीक बूझ के थाह । लक्ष्मी-नारायणक विवाह ॥३॥
विधि समान मुनि विश्वामित्र । विदित भुवन भरि जनिक चरित्र ॥४॥
दशरथ नृपति निकट अयलाह । घटना शतानन्द लयलाह ॥५॥
हे नृप-वर एत नृपति विचार । राजकुमर सभ होथु सदार ॥६॥
जनकात्मजा उर्म्मिला नाम । लक्ष्मण परिणय विधि तहिठाम ॥७॥
जनक-भ्रातृ-कन्या दुइ गोटि । जेठि श्रुतिकीर्ति माण्डवी छोटि ॥८॥
भरत तथा शत्रुघ्न जमाय । यथासंख्य होमहि बुझ न्याय ॥९॥
से शुनि कहल अयोध्याधीश । अघटन घटना कर जगदीश ॥१०॥
जे अनुमति रति नृपति विदेह । हमरो अनुमति निस्सन्देह ॥११॥
कहल पुरोहित नृपकाँ जाय । चारू कन्या वृत्त जमाय ॥१२॥
शुभ सिद्धान्त नगर भेल ख्यात । हर्षयँ पड़य न पृथिवी लात ॥१३॥
आयल सुदिन सुलग्न सुयोग । हलचल सकल चलल उद्योग ॥१४॥
जनि कर परिछनि गबइत गीति । विधि कर विधिकरि तिरहुति रीति ॥१५॥
बहुत सुवासिनि नगर हकार । जनक कयल भल कुल-व्यवहार ॥१६॥
भेरी दुन्दुभि घन निर्घोष । गीत नृत्य नृपपुर भरि पोष ॥१७॥
मण्डप अतिशय शोभित देश । मुक्ता-पुष्प-फलान्वित वेश ॥१८॥
रत्नस्तम्भ बहुत बड़ गोट । वर वितान तोरण नहि छोट ॥१९॥
रत्नाञ्चित वर आसन कनक । बैसक देल राम काँ जनक ॥२०॥
गुरु वसिष्ठ कौशिक सत्कार । शतानन्द कयलनि व्यवहार ॥२१॥
रामक निकटहिँ बैसक देल । बहुत गीत हो हर्षक लेल ॥२२॥
अग्निस्थापन विहित विवाह । मण्डप सीता काँ लयलाह ॥२३॥
नाना-रत्न-विभूषित काय । सीता शोभा कहल न जाय ॥२४॥
रानी-सहित जनक महराज । बैसला कन्या-दानक काज ॥२५॥
भावार्थः
अयोध्याक राजा दशरथ केर अयलापर दुनू राजकुमार आ रानी लोकनि केँ ओहि भवन मे ठहरायल गेलनि जाहि मे राजा दशरथ ठहरल छलथि । राजा जनक प्रसन्न मोन सँ यथोचित जगह केर व्यवस्था कय केँ सब केँ ठहरौलनि । जेतय लक्ष्मी आ नारायणस्वरूप सीता ओ राम केर विवाह होयबला अछि ओतय जुटायल गेल सामान सभक पार के पाओत ? मुनि विश्वामित्र तँ ब्रह्माक बराबरी करयवला छथि (कियैक तँ ई एकटा अलग सृष्टि कएने रहथि) । हिनकर कीर्तिगाथा संसार भरि मे विख्यात अछि । विवाहक कथा लयकय शतानन्द राजा दशरथजी लग पहुँचलाह आ बजलाह – ‘हे महाराज! हमरा सभक राजा जनक केर कामना छन्हि जे सब राजकुमार लोकनि विवाह करथि । जनकक पुत्री जे उर्मिला नामक छथि हुनका संग लक्ष्मणजीक विवाह करायल जाय । जनकजीक भाइ केर दुइ गोट कन्या छन्हि – बड़की श्रुतिकीर्ति आर छोटकी मांडवी । हिनका दुनूक विवाह क्रमशः भरत आर शत्रुघ्न संग होयब परम अनुरूप होयत ।’ ॥१-९॥
ई सुनिकय अयोध्याक राजा दशरथ बजलाह – “ईश्वरक कृपा सँ सब किछु सम्भव अछि । राजा विदेह केर जे राय छन्हि, निस्सन्देह ओहि मे हमरहु सहमति अछि ।” तखन पुरोहित शतानन्द ओतय सँ घुरिकय राजा जनक सँ कहलनि – “चारू कन्या लोकनि लेल दूल्हा भेटि गेलाह ।” भरि नगर मे ई बात पसरि गेल जे विवाहक शुभ सिद्धान्त (अन्तिम निर्णय) भ’ गेल अछि । विवाह लेल निर्धारित शुभ दिन – शुभ लग्न – शुभ योग आबि गेल । सर्वत्र हलचल मचि गेल । उद्योग (इन्तजाम) शुरू भ’ गेल । स्त्रीगण सब विवाह सम्बन्धी गीत गबैत ‘परिछन’ करय लगलिह । विधिकरी तिरहुत मे प्रचलित रीति सँ विधि सब करय लगलिह । भरि नगरक लड़की सब केँ नोत पड़ल । जनक अपन कुल केर रीति सँ नीक जेकाँ सबटा व्यवहार कयलनि । ढाक (ढोलक) आर डंकाक आवाज मेघक गर्जन जेकाँ होबय लागल । राजधानी मे जमिकय नाच-गान भेल । विवाह मंडप खुब नीक सँ सजायल गेल छल, खुब सुन्दर-सुन्दर मोती, फूल आ फल सब लगायल गेल छल । मंडप मे कतेको रास पैघ-पैघ रत्नमय खम्भा लागल छल । सुन्दर-सुन्दर झुम्मर सब सेहो लागल छल । बड़का-बड़का स्वागत (वन्दन) द्वार सब बनायल गेल छल । रत्न सँ खाँचल सोनाक एकटा आसन लगायल गेल छल । राजा जनक ओहि उपर श्री रामचन्द्रजी केँ बैसौलनि । शतानन्द गुरु वसिष्ठ आर विश्वामित्र केर यथोचित आदर-सत्कार कयलनि । हुनका लोकनि केँ सेहो श्रीरामजी लग आसन देलनि । हर्ष सँ भरिकय गीतनाद सब निरन्तर चलैत रहल । विवाह मे विहित रीति सँ राम अग्निक स्थापना कयलनि आर सीता केँ विवाह मंडप पर आनल गेलनि । सीताक अंग-अंग मे भाँति-भाँति केर रत्नाभूषण सब अलंकृत छलन्हि । दूल्हिन सीताक शोभा कतय धरि कहल जाय ! रानी सहित राजा जनक कन्यादान करबाक लेल मंडप पर बैसलाह ॥१०-२५॥
।दोहा।
पङ्कज-लोचन-राम-पद, लेलनि जनक धोआय ।
बिधिवत से जल भक्ति सौँ, माथा लेल चढ़ाय ॥२६॥
।सोरठा।
जे जल गौरीनाथ, मुनिजन-सहित विरञ्चिगण ।
मुदित चढ़ाओल माथ, हमरहु प्राप्ति से भाग्यवश ॥२७॥
।चौपाइ-मणिगण।
नरवर-वर-सुत-कर-जलरुह पर । नरवर धरणि-सुजनि-कर-वर धर ॥२८॥
अछत उदक धर श्रुति विधि अनुसर । तनि अरपल भल वर रघुवर-कर ॥२९॥
।रूपक घनाक्षरी।
जनक कहल न रहल अभिलाष मन ज्ञान ध्यान मध्य देल दिवस गमाय ।
मन्दिरमे इन्दिरा कहाय बालिका छलीह आज भगवान विष्णु पाओल जमाय ॥३०॥
दशरथ समधि विदित निरवधि यश जगतक जननीक जनक कहाय ।
कहु भगवान की ग्रहण करु मैथिलीक हम भाग्यवान् तिरहुति राज्य पाय ॥३१॥
भावार्थः
राजा जनक कमलनयन रामजीक चरण पखारलनि आर ताहि जल केँ भक्तिपूर्वक अपन माथा पर लेलनि । फेर ओ बजलाह – ‘जे जल गौरीपति शिव एवं मुनिगण सहित ब्रह्मा अपन माथ पर प्रसन्नतापूर्वक रखैत छथि, सौभाग्यक बात अछि जे वैह जल हमरो आइ प्राप्त भेल । नरश्रेष्ठ राजा दशरथक पुत्र रामचन्द्रजीक करकमल पर नरश्रेष्ठ राजा जनक धरती सँ उत्पन्न भेली सीताक हाथ रखलनि । वेद मे कहल गेल रीति अनुसार अक्षत आर जल हाथ मे लय केँ अपन बेटी सीता श्रेष्ठ दुल्हा रघुवर केर हाथ मे अर्पित कयलनि । जनक बजलाह – ‘हमर मोन मे आर कोनो अभिलाषा बाकी नहि अछि । हम अपन पूरा समय ज्ञान आ ध्यान (दार्शनिक चिन्तन) मे बितेलहुँ । घर मे बालिका सीता लक्ष्मी कहाइत छलिह आर हुनकहि अनुरूप विष्णु हमरा जमाय भेटि गेलाह । दशरथ जेहेन समैध भेटलाह जिनक सुयश केर कतहु अन्त नहि अछि । हमरा स्वयं सेहो जगज्जननी जानकीक पिता हेबाक गौरव प्राप्त भेल । हे भगवान् ! हम कि कहू ? मैथिली केँ ग्रहण कयल जाउ । हम तिरहुत केर राजा होयब अपन सौभाग्य बुझैत छी ।” ॥२६-३१॥
।चौपाइ।
सीता अरपल रामक हाथ । रमा जलधि जक जनक सनाथ ॥३२॥
लक्ष्मणकाँ निज कन्या देल । नाम उर्मिला हर्षित भेल ॥३३॥
विख्याता श्रुतिकीर्त्ति कुमारि । देल भरत काँ जनक विचारि ॥३४॥
माण्डवि प्रस्थित कयल जमाय । श्रीशत्रुघ्न समय शुभ पाय ॥३५॥
चारु कुमार दार-सम्पन्न । लोकपाल सन लोक प्रसन्न ॥३६॥
जनक कहल हरषित तहिठाम । सीता लाभ जना एहि धाम ॥३७॥
शुनु वसिष्ठ मुनि विश्वामित्र । कहइत छी कन्याक चरित्र ॥३८॥
भूमि-विशुद्धि यज्ञ करबाक । नृपतिहुँ काँ भेल हर धरबाक ॥३९॥
देखल तत हम जोतइत भूमि । बहराइलि कन्या काँ घूमि ॥४०॥
चारि वरष वयसक परमान । कन्या एहनि देखल नहिं आन ॥४१॥
के ई थिकथि कोना के जान । हृत भेल ज्ञान हिनक लेल ध्यान ॥४२॥
आनल घरमे पुत्री भाव । उपमा हिनक आन के पाव ॥४३॥
एक समय नारद सञ्चार । भ्रमइत अयला हमरा द्वार ॥४४॥
करइत महती वीणा गान । अनुरत भगवानक गुणगान ॥४५॥
पूजन कयल जे होमय बूझ । पूछल अपनेकाँ सभ सूझ ॥४६॥
उतपति कन्या धरणी फोड़ि । के थिकि कहु दिय संशय तोड़ि ॥४७॥
शुनि मुनि कहलनि शुनु मिथिलेश । गोपनीय कहइत छी वेश ॥४८॥
नारायण लेल नर अवतार । रावण मारि महिक हर भार ॥४९॥
चारि रूप मे दशरथ गेह। सम्प्रति छथि से निस्सन्देह ॥५०॥
भावार्थः
जेना समुद्र अमृत-मथनक बाद नारायण केँ लक्ष्मी अर्पित कयने रहथि, तहिना जनक सीता केँ रामक हाथ मे अर्पित कय कृत्-कृत्य भ’ गेलाह । फेर उर्मिला नामक अपन कन्या केँ हर्षपूर्वक लक्ष्मणजी केँ अर्पित कयलनि । श्रुतिकीर्ति नामक कन्याक अनुरूप बुझिकय भरत केँ देलनि । शुभ अवसर पाबिकय माण्डवी नामक कन्या सँ शत्रुघ्न केँ जमाय बनौलनि । जखन चारू कुमार लोकनिक विवाह भ’ गेलनि तखन ओ सब लोकपाल जेहेन भ’ गेलाह आर लोक सब खुब प्रसन्न भेल । एहि अवसर पर हर्षित भ’ कय जनकजी सुनौलनि जे एहि घर मे पुत्रीक रूप मे सीता केना प्राप्त भेलिह । “हे मुनि वसिष्ठ एवं विश्वामित्रजी, सुनल जाउ । हम अपन कन्या सीताक वृत्तान्त सुनबैत छी । हमरा भूमि विशुद्धि नामक यज्ञ करबाक छल जाहि मे राजा केँ सेहो ह’र जोतय पड़ैत छन्हि । ताहि सँ ह’र जोतैत हम मुड़िकय देखलहुँ जे ओहि सँ एकटा कन्या अवतरित भेलिह अछि । हुनक उम्र लगभग चारि वर्षक छलन्हि । एहेन कन्या त आर कोनो देखनहि नहि रही । ई कन्या के थिकीह ? केना ओतय अयलिह ? – ई सब के जानय । हमर ज्ञाने हरण भ’ गेल । हमरा एहि कन्या मे ध्यान लागि गेल । बेटी बनाकय हिनका घर आनि लेलहुँ । हिनकर उपमा आर के पाबि सकैत अछि । एक समय नारद ऋषि भ्रमणार्थ निकललाह आ हमर दरबज्जा पर पधारलाह । ओ महती नामक अपन बीणा पर गीत गबैत भगवानक गुणगान मे लीन छलाह । हम जेना करबाक चाही तेना हुनकर सत्कार कयलहुँ आ पुछलहुँ – “अपने केँ तँ सब किछु सुझाइत अछि । एहि कन्याक जन्म धरती फाड़िकय भेलन्हि । ई के थिकीह, से बताकय हमर शंका दूर करू ।” से सुनिकय मुनि नारद कहलनि – “हे मिथिलेश! सुनल जाउ । हम ई परम गोपनीय बात अपने सँ कहैत छी । रावण नामक राक्षस केँ मारिकय धरतीक भार दूर करबाक लेल भगवान् नारायण मनुष्यक अवतार लेलनि अछि । ओ एखन राजा दशरथ केर घर मे चारि स्वरूप मे विराजमान छथि, एहि मे सन्देह नहि करब ॥३२-५०॥
।रूपमाला।
योगमाया थिकथि सीता राम विभु भगवान ।
देब तनिकहि हिनक पति ओ थिकथि सत्य न आन ॥५१॥
ई कथा ओ कन्यका गुण कहल नारद मूनि ।
ताहि दिन सौँ रमा मानल भेल चरित जे पूनि ॥५२॥
भावार्थः
सीता योगमाया स्वरूपा थिकीह, आर राम विष्णु भगवान् थिकाह । सीता वैह राम केँ देबनि । वैह सीताक पति छथि, आर कियो नहि ।” नारद ई कथा कहलनि आर कन्याक गुण सब वर्णन कयलन्हि । ओहि दिन सँ हम हिनका साक्षात् लक्ष्मी बुझलहुँ ॥५१-५२॥
।चौपाइ।
कोन परि हयता राम जमाय । दिन दिन चिन्ता बाढ़लि जाय ॥५३॥
चिन्तातुर मन कयल विचार । सभ महिपति आबथि जैँ द्वार ॥५४॥
स्मरहर त्रिपुर समर मे मारि । धनुष धयल की चित्त विचारि ॥५५॥
हमर पितामह घर छल धयल । विद्यमान फल पण जे कयल ॥५६॥
सभहिक होइत मानक हानि । सकल निबाहल देवि भवानि ॥५७॥
लयलहुँ पङ्कज-लोचन राम । अपनैँ मुनिवर हमरा गाम ॥५८॥
सुफलित हमर मनोरथ गोट । सुयश भुवन भरि भेल न छोट ॥५९॥
भावार्थः
तेकर बाद जे किछु भेल से सुनू । आब दिन-दिन हमरा मोन मे ई चिन्ता बढ़ैत गेल जे कोन ढंग सँ राम केँ जमाय बनायल जाय । चिन्तातुर मोन सँ सोचलहुँ जे एहेन काज कयल जाय जाहि सँ सब राजा लोकनि दरबाजा पर आबथि । शिवजी लड़ाइ मे त्रिपुरासुर केँ मारिकय अपन धनुष केँ नहि जाइन चित्त मे कि विचारिकय एतय राखि देलनि । ई धनुष हमर पितामहक घर मे राखल पड़ल छल । एहि बारे मे जे हम प्रतिज्ञा कयलहुँ तेकर फल आइ प्रत्यक्ष अछि । सभक प्रतिष्ठा माटि मे मिलि जइतनि, मुदा भगवती गिरिजा सब किछु निभा देलिह । हे मुनिवर! अपने कमलनयन रामचन्द्र केँ हमर घर लयकय अयलहुँ । हमर कामना नीक सँ पूरा भेल आ तीनू भुवन मे हमर सुयश पसरि गेल ॥५२-५९॥
।गति तिरहुति-प्लवङ्गम छन्द।
श्रीपति रविकुल-तिलक जानकीनाथ हे ।
लोचन शोच न एक चरण धय माथ हे ॥६०॥
कोन सुधन हम देब रमापति रामकाँ ।
की करु हम गुणगान सदानन्द धामकाँ ॥६१॥
के अपन सौँ आन अधिक संसार मे ।
भानु इन्दु वर नयन ज्ञानि अवतार मे ॥६२॥
श्रीनारायण देव देखि छवि लेब हे ।
विश्वम्भर विभु एक देव-वर देव हे ॥६३॥
।सोरठा।
जौतुक देवक थीक, पुत्रिक उचित द्विरागमन ।
सम्मति सभ मुनिहीक, विष्णु जमाय सुता रमा ॥६४॥
।दोहा।
शत सहस्र देल अश्वरथ, अश्व नियुत पुन देल ।
दश सहस्र गज राम काँ, देलनि हर्षक लेल ॥६५॥
दासी देलनि तीनि शय, एक लक्ष देल पत्ति ।
दिव्याम्बर वरहार पुन, लक्ष्मी काँ सम्पत्ति ॥६६॥
भावार्थः
हे लक्ष्मीपति! सूर्यकुलभूषण जानकीनाथ राम! जखन अपनेक चरण मे माथ टेकि देलहुँ तहन आब हमरा कोनो चिन्ता नहि देखाय पड़ैत अछि । जे लक्ष्मीक स्वामी छथि, हुनका हम कोन धन दी । जे निर्विच्छिन्न आनन्दक खजाना छथि तिनकर स्तुति हम कि करू ? अपने सँ बढ़िकय एहि संसार दोसर कियो कहाँ अछि ? अपने ज्ञानी अवतार थिकहुँ । सूर्य आ चन्द्रमा दुनू अपनेक आँखि थिक । हे देव! अपनेक लक्ष्मीनारायण छवि हम एक बेरि देखि ली, हे विश्वम्भर प्रभु! एकमात्र यैह वरदान हमरा देल जाउ । पुत्रीक विदाइ मे उचित दान देबाक अछि । सब मुनिजन कहल करैत छथि जे बेटी लक्ष्मी होइत छथि आ जमाय भगवान् विष्णु होइत छथि ।”॥६०-६४॥
एहि तरहें राजा जनक हर्षित भ’ कय रामचन्द्रजी केँ एक लाख घोड़ावला रथ देलनि, दस लाख घोड़ा आ दस हजार हाथी देलनि । तीन सौ दासी देलनि । एक लाख पैदल सैनिक देलनि । अपूर्व-अपूर्व वस्त्र आ कीमती हार सब लक्ष्मीरूपा पुत्री केँ सम्पत्तिक रूप मे देलनि ॥६५-६६॥
।चौपाइ।
मणिचय परखि परखि नृप लेथि । शय शय प्रति गहना पुनि देथि ॥६७॥
वसिष्ठादि मुनि जन सत्कार । जनक कयल उत्तम व्यवहार ॥६८॥
लक्ष्मण भरत कुमर जे सर्व्व । तनिकहु धन देल खर्व्व निखर्व्व ॥६९॥
सकल कन्यका कयल बिदाय । जनकक नयन नोर बढि आय ॥७०॥
।माधवीय वराड़ी छन्द।
तुअ बिनु आजु भवन भेल रे, घन बिपिन समान ।
जनु ऋधि सिधिक गरुअ गेल रे, मन होइछ भान ॥७१॥
परमेश्वरि महिमा तुअ रे, शिव बिधि नहि जान ।
मोर अपराध छमब सब रे, नहि याचब आन ॥७२॥
जगत जनति काँ जग कह रे, जन जानकि नाम ।
नगर नेह नियत नित रे, रह मिथिला धाम ॥७३॥
शुभमयि शुभ शुभ सभ दिन रे, थिर पति अनुराग।
तुअ सेबि पुरल मनोरथ रे, हम सुखित सभाग॥७४॥
भावार्थः
राजा खुब बढियाँ सँ परखि-परखिकय मणि (हीरा-जवाहरात) सब लैत रहथि आ सौ-सौ प्रति गहनाक संग दैत रहथि । जनक वसिष्ठ आदि ऋषि-मुनि लोकनि केँ उत्तम रीति सँ सत्कार कयलनि । लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न – हिनको सब केँ खरब केर खरब धन देलनि । सब कन्याक विदाइ कयल गेल । जनकक आँखि मे नोरक बाढ़ि आबि गेलनि । जनक कहलाह – अहाँ सब बिना आइ हमर घर घोर अरण्य समान बनि गेल अछि । मन मे एना लगैत अछि जेना हमर ऋद्धि आ सिद्धि सब चलि गेलिह । हे परमेश्वरी! अहाँ सभक महिमा शिव आ ब्रह्मो नहि जनैत छथि । हमरा सँ जे अपराध भेल तेकरा क्षमा कय देब – एकर सिवाय हम आर किछु याचना नहि करब । जे संसार जननी छथि लोक हुनका जनकक बेटी कहैत छथि । ताहि लेल अपन नैहर मिथिलापुरी मे अहाँ सभक स्नेह अवश्य सब दिन बनल रहत । हे शुभमयी! हर दिन अहाँ सभक शुभमय हुए आ पतिक प्रति प्रेम स्थिर रहय । अहाँ लोकनिक सेवा कय केँ हमर मनोरथ पूरा भेल । आइ हम सुखी छी आ भाग्यवान् छी ॥६७-७४॥
।चौपाइ।
सजल-नयन जानकि मिलु माय । लोचन जल बह रहल न जाय ॥७५॥
देखब कोन परि पुत्रि जमाय । कहुखन नोर न आँखि शुखाय ॥७६॥
समदाउनि गायिनि-गण गाब । ककरा नयन नोर नहि आब ॥७७॥
शाशु श्वशुर पद सेवन करब । पतिव्रत मे तन मन अहँ धरब ॥७८॥
जानकि केँ रानी करू चूप । कहि परबोध सुवचन अनूप ॥७९॥
वरष दूइ छल अहँ सहवास । अहँ बिनु जानकि भवन उदास ॥८०॥
चलल सबारी डंका बाज । सहित बराति चलल महराज ॥८१॥
उचिति विनति कति सहित सनेह । दशरथ समधि समान विदेह ॥८२॥
।सोरठा।
नाना बाजन बाज, नभ सुरराज-समाज मे ।
जय जय जय महाराज, बन्दी मागध लोक कह ॥८३॥
भावार्थः
नोर बहैत आँखि सँ माता अपन बेटी सीता संग मिलि रहल छथि । आँखि सँ धाराप्रवाह नोर बहि रहल छन्हि । तेकरा ओ रोकि नहि पबैत छलिह । ओ कहैत रहथि – “आँखि मे नोर कखनहुँ सुखाइत नहि अछि, बेटी आ जमाय केँ कोन तरहें देखि पायब ?” महिला लोकनि सब समदाउनि गबैत छथि । किनकर आँखि मे नोर नहि अछि ! कानि रहलि सीता केँ रानी अमूल्य प्रबोधन-वचन कहि-कहिकय सान्त्वना दैत छथि – ‘सासु-ससुरक सेवा करब । सदैव तन आ मन सँ पातिव्रत्य धर्मक पालन करब । मात्र दुइ वर्ष अहाँक संग रहल । आब हे जानकी ! अहाँ बिना ई घर उदास भ’ गेल ।” डंका बाजि उठल । सवारी चलि देलक । बरियातीक संग महाराज दशरथ विदाह भ’ गेलाह । दशरथ आर जनक दुनू समान समैध बीच प्रेम-पूर्वक परस्पर अनुनय-विनय केर बात भेल । आकाश मे जुटल देवता लोकनिक मंडली मे सेहो तरह-तरह केर बाजा सब बाजय लागल । बन्दी आ मागध लोकनि महाराजाक जय-जयकार करय लगलाह ॥७५-८३॥
परशुरामक क्रोधित होयब आ झुकब
।चौपाइ।
मिथिलापुर सौँ योजन तीन । पहुँचलाह उत्साह नवीन ॥१॥
कयल वसिष्ठक नृपति प्रणाम । घोर निमित्त देखि तहि ठाम ॥२॥
असकुन गुनि मन चिन्ता आब । कहु गुरु शान्ति अनिष्ट प्रभाव ॥३॥
अछि किछु भयक योग तत्काल । अचिरहि हो सुख हे महिपाल ॥४॥
हरिण अनेक प्रदक्षिण जाय । एहि सौँ संकट विकट मेटाय ॥५॥
एहि विचार मे उठल बसात । सहित मूल तरु रहल न पात ॥६॥
धूरा उड़ ककरहु नहि सूझ । उतपातक गति के जन बूझ ॥७॥
देखल किछु दुरि आगाँ जाय । कोटि सूर्य सम भासित काय ॥८॥
नील जलद सन जटा विशाल । दशरथ आगु ठाढ की काल ॥९॥
दशरथ मन कह हे भगवान । धर्म्महि धाधर शुनल न कान ॥१०॥
तनिकर पूजा बहुविधि कयल । चिन्हल दण्डवत पद-युग धयल ॥११॥
त्राहि त्राहि कहि जोड़ल हाथ । अभय प्रदान करिअ भृगुनाथ ॥१२॥
राम हमर छथि प्राणाधार । मन नहि थिर कर देखि कुठार ॥१३॥
धर्म्मक कथा कोप कत मान । नृप कह आन कहथि मुनि आन ॥१४॥
भावार्थः
राजा दशरथ नव उमंगक संग मिथिलापुरी सँ तीन योजन आगू बढ़ले छलाह आ कि ओतय किछु अपशकुन देखाय देलकनि । ओ गुरु वसिष्ठ केँ प्रणाम कयलनि आ कहलनि – “अपशकुन देखला सँ मोन मे चिन्ता भ’ गेल अछि । एहि अनिष्ट फल केर शान्तिक उपाय बताउ ।” गुरु वसिष्ठ कहलखिन – “हे राजा! तत्काल किछु भय केर योग अछि, मुदा ओकर समाधान शीघ्रे भ’ जायत । देखू, अनेक हरिण अपनेक बाम भाग सँ दाहिना भाग चक्कर लगाकय गेल हँ । एहि शुभ शकुन सँ बड़का-बड़का संकट कटि जाइत छैक ।” एना विचार चलिए रहल छल कि बड़ा भारी आँधी उठल । जैड़-सहित गाछ सब खसि पड़ल आ पत्तो धरि नहि बचल । एतबे धुरा उड़ल जे कियो केकरो देखियो नहि पाबय । के जानय, एहि उत्पताक कि परिणाम होयत । राजा कनिकबे दूर आगू बढ़िकय देखलनि – एक करोड़ सूर्यक समान तेजोमय शरीर, नील मेघ-समान, कारी-कारी लम्बा जटा, मानू दशरथक सोझाँ स्वयं काल ठाढ़ भेल छलथि । दशरथ मनहि-मन कहलनि – हे ईश्वर, धर्मो करय सँ अनिष्ट होइत अछि एहेन बात त कहियो नहि सुनने रही । फेर ओहि तेजस्वी पुरुष केर खुब नीक सँ सत्कार कयलनि । हुनका चिन्हलनि आ पैर छुबिकय प्रणाम कयलनि । फेर त्राहि-त्राहि कय केँ हाथ जोड़िकय बजलाह – “हे भृगुनाथ परशुराम, हमरा सब केँ अभयदान दिअ’ । राम हमर प्राणक आधार छथि । अपनेक हाथ मे कुठार देखिकय हमर कलेजा थरथरा रहल अछि ।” जेतय क्रोध जागल हो ओतय धर्मक बात कतय धरि सुनल जायत ! राजा किछु आरे कहैत छथि आ मुनि परशुराम किछु आरे बजैत जा रहल छथि ॥१-१४॥
।घनाक्षरी।
अस्त्र चोष कोष अछि मन महारोष अछि बल भरि पोष अछि रीति अनुसरबे ।
नाम भृगुराम अछि समर न साम अछि गति सभ ठाम अछि अरि चोर धरबे ॥१५॥
एहन के वीर अछि धनुष सतीर अछि कुलिश शरीर अछि हरि अरि गरबे ।
विदित संसार अछि क्षत्रिय संहार अछि करमे कुठार अछि घोर मारि करबे ॥१६॥
भावार्थः
“देखू, म्यान मे तेज अस्त्र अछि । मन मे तेज रोष अछि । शरीर मे भरपूर शक्ति अछि । हम त अपन रीति पर टा चलब । हमर नाम परशुराम अछि । लड़ाइ मे हम साम (शान्ति समझौता) नहि जनैत छी । हमरा कियो कतहु रोकियो नहि सकैत अछि । शत्रुरूपी चोर केँ हम पकड़बे टा करब । हमरा जेहेन वीर के अछि ? धनुष आ बाण मौजूद अछि । हमर शरीर वज्र-सन कठोर अछि । हम शत्रुक घमन्ड केँ पस्त करैत छी । संसार भरि मे प्रसिद्ध अछि जे हम क्षत्रिय सभक संहार करयवला छी । हमर हाथ मे कुठार (कुरहैर) अछि । चोर केँ मारबे टा करब ।” ॥१५-१६॥

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