मिथिला भाषा रामायण – तेसर अध्याय आ तदोपरान्त

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण 

तेसर अध्याय आ तदोपरान्त

।चौपाइ।

राजा दशरथ बड़ श्रीमान। सत्य-पराक्रम एहन न आन॥
पुरी – अयोध्याधिप अति वीर। सकल – लोक – विश्रुत रणधीर॥
पुत्र – हीन चिन्तातुर चित्त। गुरु – समीप – गत तकर निमित्त॥
कयल सविधि गुरु – चरण प्रणाम। कहलनि पुत्र – हीन धिक धाम॥
गुरु अपनेँ सन राज्य पवित्र। पुत्रहीन की कर्म्म विचित्र॥
कयल जाय गुरु तेहन उपाय। श्री – परमेश्वर होथि सहाय॥
पुत्रहीन केँ राज्यक भोग्य। लुप्त – पिण्ड – क्रिय पुत्र न योग्य॥
लक्षण – लक्षित पुत्र अनेक। हमरा होथि से करू विवेक॥
गुरु वसिष्ठ कहलनि तत्काल। चिन्ता मन जनु करु महिपाल॥
चारि पुत्र अहँकाँ नृप हयत। जनिक सुयश त्रिभुवन मे जयत॥
शान्ता – स्वामी मित्र जमाय। आनू तनिकाँ अपनहि जाय॥
काम – यज्ञ करु विधि सौँ भूप। हमर सब मिलि कर्म्म अनूप॥
अङ्ग देश मे भाग्य विशाल। रोमपाद नामक महिपाल॥
पुत्र न तनिकहुँ गत कत वर्ष। चिन्तातुर मन रहल न हर्ष॥
तनिकाँ कहलनि सनत्कुमार। पुत्र होयत करु एहन विचार॥
शृङ्गीऋषि जौँ एहि थल आव। तनिका सौँ बाढ़य सद्भाव॥
शान्ता कन्या तनिकाँ देब। मनवांछित फल हुनि सौँ लेब॥
शृङ्गी रहता घरहि जमाय। साध्य काय्य पुत्रेष्टि कराय॥
मन्त्री सभ काँ पुछल नरेश। शृङ्गीऋषि आबथि एहि देश॥
मन्त्रीगण भण सुनु महराज। बड़ गड़बड़ सन लगइछ काज॥
ओ वनचर व्यवहार न जान। सभकाँ मानथि एक समान॥
वनिता पुरुष भेद नहि चित्त। जाएत के वन तनिक निमित्त॥
बड़ क्रोधी मुनि तनिकर बाप। अनुचित देखलैँ देथिनि शाप॥
सुमरि – सुमरि तनि पुण्य-प्रताप। हे महिपति जिव थर-थर काप॥
शृङ्गी पिता विभाण्ड स्वभाव। साध्य न मन्त्री देल जबाब॥

।दोबय छन्द।

भूपति तखन वार – वनिता के अपना निकट बजाओल।
अपन निमित्त शृङ्गिऋषि आबथि सब कहि काज शुनाओल॥
मुनि-मन-मोहिनि तोहरि सनि के जौँ ओ मुनि केँ लएबह।
हमर मनोरथ – सिद्धोत्सव मे कोटि कोटि धन पएबह॥
हाथ जोड़ि गणिकागण बाजलि साधक कार्य्य विधाता।
आनब हम ठानब प्रपञ्च बड़ स्वस्थ चित्त रहु दाता॥
तकइत तकइत सभ जनि पहुचलि पाओल तनिक ठेकाना।
रतिपति – वर्द्धन राज अलापय रतिचेष्टा कर नाना॥
सञ्च सञ्च शृङ्गी लग सभ जनि गणिका ओ संप्राप्ता।
तनिसौँ अतिथि-सपर्य्या पाओल तनिक जनक भय-व्याप्ता॥
गाबि गाबि नित गीत मनोहर मिलि मिलि मुनि तन जाथो।
कन्द मूल फल प्रीति सौँ देथि जे मुनिहिक सोझाँ खाथो॥

।सोरठा।

फल हमरो मुनि खाउ, लाइलि छी बड़ि दूर सौँ।
कि कहब आश पुराउ, उचित कहल वेश्योक्ति शुनि॥

।हरिपद।

मोदक मधुर मनोजविवर्द्धन सुधा – समान विलक्षण।
गणिका देथि बनी नहि जानथि लगला करय सुभक्षण॥
एक वर्ष सहवास नियत छल छल न बुझल दुर्ल्लक्षण।
रतिपति-गति संप्राप्त जानि मुनि लय गेली पुर तत्क्षण॥
बड़ उत्सव महिपाल कयल तत शान्ता कन्या देलनि।
शृङ्गी मुनि जमाय सौँ मख-विधि पूर्ण मनोरथ भेलनि॥
रोमपाद पुत्रोत्सव पाओल ओ नृप अहँकाँ मित्रे।
शान्ता सहित तनिक पति आबथि कार्य्य-सिद्धि की चित्रे॥

गेला रोमपाद नृप देश। श्रीयुत दशरथ विदित नरेश॥
मित्र-भवन रहला किछु काल। कहल प्रयोजन निज महिपाल॥
शान्ता कन्या शृङ्गि जमाय। तनिकाँ दिऔनि अयोध्या जाय॥
कयल लेआओन कन्या जानि। रोमपाद घर सब लेल मानि॥
जाथु अवश्य अपन घर नीक। हिनका गेलेँ निश्चय नीक॥
चलला कन्या – संग जमाय। दशरथ हर्ष कहल नहि जाय॥
पहुँचलाह नृप अपना नगर। भेल हकार नगर मे सगर॥
तनिक चुमाओन उत्सव गीति। सुता जमाइक सन सब रीति॥
सभ रानी मन हर्ष अपार। नित नव कन्या वर व्यवहार॥
दशरथ यज्ञ कयल तत गोट। इन्द्रक विभव देखि पड़ छोट॥
महिमे जतेक महीप छलाह। दशरथ – यज्ञ – समय अयलाह॥
सभहिक कयल परम सन्मान। गुरु वसिष्ठ वसु – मन्त्रि – प्रधान॥
यज्ञारम्भ वसन्त विचारि। सहस्राक्ष मन मानल हारि॥

।हरिपद।

दशरथ नृपति विष्णु मतिसौँ तत शृङ्गी मुनिकेँ अनलनि।
मन्त्रीसहित नृपति अति शुचिसौँ सविधि काम-मख ठनलनि॥
पापरहित चित मुनि श्रुति-पारग बहुत यज्ञमे अयला।
होम अनल सौँ दिव्य पुरुष एक खर्ण-वर्ण बहरयला॥
पायसपूर्ण पात्र कर लेलय कहि गुण नृपकैँ देले।
थोड़हि दिनमे परमेश्वर सुत मन मानू अछि भेले॥
पायस लेल नृपति आनन्दित मुनि-गुरुपद कय वन्दन।
अन्तर्द्धान अग्नि कहि भेला आधि भेल सब खण्डन॥
गुरु वसिष्ठ शृङ्गी ऋषि कहलनि रानी पायस खयती।
की विलम्ब शुभ अवसर नृप अछि पूर्ण-मनोरथ हयती॥
कौशल्या केकयी छली तँह दूइ भाग कय देलनि।
ततय सुमित्रा पाछाँ अयली तनिकाँ नहि किछु भेलनि॥
अपन भागसौँ दुनु जनि रानी अर्द्ध भाग पुनि कयलनि।
देल सुमित्रा काँ तीनू जनि पायस से तहँ खयलनि॥
सभ जनि भेलि सगर्भा तनिकहि छवि सौँ मन्दिर शोभित।
जगन्निवास वास जत कयलनि कोटि भानु शशि क्षोभित॥

।हंसगति छन्द।

भक्तक वश भगवान एहन मति फुरलनि।
दशम मास मधु मास आश प्रभु पुरलनि॥
कौशल्या थिकि धन्य जनिक सुत भेलाह।
ब्रह्मानन्दानन्देँ दोष दुख गेलाह॥
शुक्लपक्ष नवमी शुभ कर्क्क उचित हित।
मध्य दिवस नक्षत्र पुनर्व्वसु अभिजित॥
पञ्चग्रह उच्चस्थ मेषमे दिनकर।
सृष्टि त्रिगुण उतपत्ति शक्ति कर जनिकर॥

।चौपाइ।

वारिद वरिसल तखना फूल। जन्म लेल सभ सम्पति मूल॥
नीलोत्पलदल श्यामल राज। चारि सुभुज कनकाम्बर भ्राज॥
अरुण जलज वर सुन्दर नयन। कुण्डल मण्डित शोभा‍-अयन॥
सहस सूर सन सुछवि प्रकास। कुटिल अलक सुमुकुट भल भास॥
नयन करुण रससौँ परिपूर। इन्दीवर शोभा कर दूर॥
श्री श्रीवत्स हार रमणीय। केयुर नूपुर गण कमनीय॥

।दोहा।

कौशल्या देखल सकल, अदभुत बालक भेल।
कहलनि से कर जोड़िकेँ, कनइत हर्षक लेल॥

।चौपाइ।

बार बार हम करिय प्रणाम। हम अबला अज्ञानक धाम॥
वचन बुद्धि मन पहुँच न जतय। तुति हम कि करब फुरय न ततय॥
रचना पालन प्रलय स्वतन्त्र। विश्व चढ़ल भल माया – यन्त्र॥
ब्रह्म अनामय हर्षक मूल। हमरा पर से प्रभु अनुकूल॥
अँहक उदर – वर बस संसार। हमर तनय बनलहुँ व्यवहार॥
कहइत छी प्रभु हम करजोड़ि। रूप अलौकिक ई दिअ छोड़ि॥
एहि रूपक हमरा रह ध्यान। बनल रहय नित ई हित ज्ञान॥
सुन्दर शिशु सरूप अँह धरिय। दिन दिन देव कृतार्थित करिय॥

।रोला छन्द।

तखन कहल श्रीनाथ अम्ब वांछित अछि जेहन।
किछु नहि करब विलम्ब रूप करइत छी तेहन॥
भूमि भार हरणार्थ विधि स्तुति बहुत शुनाओल।
अँह दशरथ तप कयल तकर फल दर्शन पाओल॥
हमर हाथु श्रीनाथ पुत्र पूर्व्वहि मँगलहुँ वर।
दुर्ल्लभ दर्शन हमर लाभ अछि नहि संसृति डर॥
ई संवाद जे पढ़त शुनत सारूप्य हमर से।
दुर्ल्लभ हमरे स्मरण अन्तमे पाओत नर से॥

।चौपाइ।

ई कहि बनला सुन्दर बाल। इन्द्रनील छवि नयन विशाल॥
बाल अरुण तन दिव्य प्रकास। जनिकर माया विश्व विलास॥
पुत्र जन्म शुनि मुदित महीप। सत्वर गेला गुरुक समीप॥
सहित वसिष्ठ देखल नृपतनय। हर्षेँ किछु नहि कहैत बनय॥
जय जय शब्द सकल थल सोर। नृपति नयन बह हर्षक नोर॥
तखन कयल नृप जातक कर्म्म। उत्तम कुलक उचित जे धर्म्म॥
केकयि सौँ उतपति सुत भरत। कमल कि लोचन – समता करत॥
पुत्र सुमित्ताकाँ दुइ गोट। लक्ष्मण ओ शत्रुघन सुछोट॥
देल विप्र काँ गाम हजार। बड़ गोट उत्सव चारि कुमार॥
कनक रत्न पट ओ गोदान। करथि नृपति जेँ हो कल्यान॥

।घनाक्षरी।

मगन महीप मन देखि चायकक गन, देव देव करथि अनन्त रत्न वरषन।
कत रथ चढ़ि कत चढ़ि गजराज पीठ कत वाजिराजि न रहल चित्त धरषन॥
सोहर मनोहर सुगाब किन्नरी नरीक बनलि सुरूप एत जन केओ परखन।
देव-दुन्दुभीक धुनि गगन प्रसून-वृष्टि रामचन्द्र जनम उत्सव की प्रहरषन।

।चौपाइ।

रमित होअ मुनि – मन जेहि ठाम। तनिकर नाम धएल मुनि राम॥
कारक भरण भरत तैँ नाम। लक्षण युत लक्ष्मण गुण – धाम॥
करता गय शत्रुक संहार। नाम धयल शत्रुघ्न उदार॥
रामक सहल लक्ष्मण रह सतत। शत्रुघ्नो भरतक संग निरत॥
दुइ दुइ जन पायस अनुसार। बाल सुलीला कर सञ्चार॥
बालक वचन सुधाक समान। राजा रानी शुनि शुनि कान॥
मन आनन्द कहल की जाय। वचन मनोहर चारू भाय॥
बाल विभूषण शोभा वेश। से देखि रानी मुदित नरेश॥
नाचथि गाबथि नाना रङ्ग। सम वय बालक लय लय सङ्ग॥
नृपति बजाबथि भोजन बेरि। हँसि पड़ाथि लग जाथि न फेरि॥
कौशल्याकाँ कह तह भूप। पकड़ि लाउ बालककाँ चूप॥
हसइत कहुखन अपनहि आब। कादो माटि हाथ लपटाब॥
किछु किछु नृपतिक रुचि सौँ खाथि। चञ्चल खेड़िक हेतु पड़ाथि॥
बालक कौतुक जे प्रभु कयल। से शिव गिरिजा मानस धयल॥
बरुआ भेला चारु कुमार। उपनयनक गुरु कयल विचार॥
चारू जन विधि सौँ उपनीत। सभ विद्या पढ़ि परम विनीत॥
धनुर्वेद – विद्या – निष्णात। शास्त्र न इक तनिक अज्ञात॥
राम संग लक्ष्मण नित रहथि। आज्ञा करथि राम जे कहथि॥
शत्रुघ्नो भरतक संग तेहन। लक्ष्मण राम रीति मति जेहन॥
अश्व चढ़ल कर धनुष सुबाण। नित्य सिकारक हेतु प्रयाण॥
मेघ्य मेघ्य मृग मारथि जाय। पिता निकट से देथि पठाय॥
उठि सबेरि स्नानदिक कर्म्म। करथि सनातन जे कुल – धर्म्म॥
राज काज कर आलस थोड़। लागथि नित्य पिताकाँ गोड़॥
बन्धु सहित गुरु आज्ञा पाय। भोजन करथि तखन नित जाय॥
धर्मशास्त्र विधि शुनि व्याख्यान। करथि सतत मन उत्तम ज्ञान॥

।दोहा।

मानव – लीला करथि प्रभु, निर्गुण रहित विकार।
जानथि ब्रह्मा प्रभृति नहि, विभु माया विस्तार॥

।चौपाइ।

कौशिक रामक दर्शन काज। गेला दशरथ नृपति समाज॥
दशरथ कयल तनिक सन्मान। मुनि वसिष्ठ सन गुरु मतिमान॥
अपनेक सदृश जाथि जन जतय। संपति सकल पहुँच सब ततय॥
बहुत कृतार्थ कएल मुनि आज। अभ्यागत सत हमर समाज॥
कोन हेतु गुरु मुनि संचार। कहल जाय करु तकर विचार॥
शुनि मुनि कहल सुनिय महिपाल। कार्य्य उपस्थित ई एहि काल॥
यज्ञारम्भ करो हम जखन। अबइत अछि राक्षस-गण तखन॥
नाम सुबाहु तथा मारीच। दुहु प्रधान अज्ञानी नीच॥
यज्ञ – विघ्न – कारक अवतार। मरत ककर सक कयल विचार॥
लक्ष्मण राम ततय जौँ जाथि। हिनक त्रास सौँ दुष्ट पड़ाथि॥
देल जाय होयत कल्यान। रक्षा करत कहू के आन॥
गुरु वसिष्ठ सौँ करू विचार। अनुमति सुजस होयत संसार॥
हँ की नहि नहि बजला भूप। हुनि मुनि आगाँ रहला चूप॥
नृप एकान्त कहल निज आधि। मुनि – कृत बाढ़ल बहुत उपाधि॥
गुरु कहु करब कि देब न तनय। क्रोधी मुनि मनता नहि विनय॥
राम बिना नहि जीवन रहत। नहि जौँ देब लोक की कहत॥
बहुत सहस गत भै गेल वर्ष। चारि तनय विधि देल सहर्ष॥
सभ जन से छथि अमर समान। रामचन्द्र छथि हमरा प्राण॥
जौँ नहि देब देता मुनि शाप। हृदय हमर गुरु थर थर काँप॥
कहु कर्त्तव्य उचित हो कर्म्म। हम सपनहु नहि करब अधर्म्म॥
कहल वसिष्ठ सुनू महिपाल। कि कहब अपनैँक भाग्य विशाल॥
ई वृत्तान्त कतहु नहि कहब। पुछलहु उतर सु-मौने रहब॥
हरण हेतु भूमिक सभ भार। विधि – प्रार्थित नर – वर अवतार॥
नारायण छथि जानब राम। चिन्मय सकल विश्व – विश्राम॥
अँह कश्यप तप कयल अपार। अदिति थिकथि कौशल्या दार॥
भेला प्रसन्न देल वर – दान । पुत्र अहाँक भेला भगवान॥
तनिकर माया सीता भेलि। मान्य मही मिथिला मे गेलि॥
रामक होएत ततय विवाह। कौशिक तेहि कारण अयलाह॥
ई वक्तव्य कतहु नहि थीक। होयत नृपवर अहँइक नीक॥
कौशिक पूजन करु दय चित्त। आएल छथि मुनि जनिक निमित्त॥
लक्ष्मण सहित रामकाँ देब। सुयश विश्व भरि भूपति लेब॥
कहल वसिष्ठ शुनल महिपाल। कृत – सुकृत्य आनन्द विशाल॥
लक्ष्मण राम काँ भूप बजाय। बार बार उर कण्ठ लगाय॥
सजल नयन नृप दूनू भाय। कौशिक मुनि केँ देल सुमुझाय॥

।रोला छन्द।

आनन्दित मुनि भेल नृपतिकाँ आशिष देलनि।
राम सुमित्रा – पुत्र दुनू जन संग कैँ लेलनि॥
धनुष बाण तूणीर जुगल भ्राता करेँ धयलनि।
मुनि-मण्डलि महि जाय सकल आनन्दित कयलनि॥

।हरिपद।

चलइत बाट ताटका दौड़लि कौशिक देल चिन्हाय।
रघुवर शर मारल एक तनिकाँ जे मुनि-जनक बलाय॥
बड़ पापिनि मुनि-प्राणक सापिनि छलि करुणा सौँ रहिता।
सिद्धाश्रमक सङ्कटा मुइलेँ मुनि-मंडलि सुख – सहिता॥

।अनुष्टुप्-छन्द।

बला अतिबला विद्या देव – निर्म्मित देल से।
क्षुधा – तृष्णादि – शान्त्यर्थ राम सानन्द लेल से॥

।छन्द मलिका।

कण्ठ अङ्कमे लगाब। कौशिकादि सौख्य पाब॥
धन्य धन्य भूप-बाल। दुष्ट राक्षसीक काल॥

।पादाकुल दोहा।

विश्वामित्र चरित्र राम-कृत देखल प्रमुदित चित्त।
मन्त्र सहित सर्व्वास्त्र राम काँ देलनि समर निमित्त॥

।चौपाइ।

मुनि – संकुल कामाश्रम राम। एक राति कयलनि विश्राम॥
उठि प्रभात गेला मुनि सङ्ग। सिद्धाश्रम देखल भल रंग॥
सब सौँ कहलनि विश्वामित्र। अतिथि एहन के आन पवित्र॥
हिनकर पूजन मन दय करिअ। दुष्ट – निशाचर – भय सौँ तरिअ॥
विश्वामित्र कहल मुनि जेहन। रामक कयल से पूजा तेहन॥
रामचन्द्र कौशिक आवेश। कहलनि दिक्षा करू प्रवेश॥
राक्षस दुहु काँ दिअओ देखाय। सावधान हम दूनू भाय॥
तेहन कयल तत मुनि-समुदाय। यज्ञारम्भ कयल मुनि जाय॥
काम – रूप राक्षस दुहु फेरि। खल आयल मध्यान्हे बेरि॥
तनिकाँ ज्ञात न दोसर सृष्टि। शोणित हाड़ कयल खल वृष्टि॥
रामचन्द्र दुइ शर सन्धानि। मारल दुष्ट निशाचर जानि॥

।हरिपद।

रामचन्द्र – कर – धनुष – मुक्त – शर – परवश खल मारीच।
शत योजन घुमि मृतक सदृश जुमि खसला जलनिधि बीच॥
ठामहि वीर सुबाहु भस्म भेल रघुवर मख रखबार।
अति अद्भुत नर-वर रण-लीला अविकल सकल निहार॥

।बरबा।

तदनुयायि अततायिकँ हनिहनि तीर।
सभकेँ लक्ष्मण मारल बड़ रणधीर॥

।रोला।

पुष्प – वृष्टि सुर कयल देव दुन्दुभी बजाओल।
जय जय ध्वनि उच्चार सिद्ध-चरण गुण गाओल॥
हर्षित विश्वामित्र ततय पूजा विधि कयलनि।
सानुज श्रीरघुनाथ भक्ति सौँ हृदय लगओलनि॥

।चौपाइ।

तिन दिन प्रभु रहला ओ देश। कन्द मूल फल भोजन वेश॥
कहलनि कौशिक कथा पुराण। पुरुष पुराण सहज सब जान॥
चारिम दिन कहलनि औ राम। नव उत्सव मिथिलाधिप – धाम॥
तिरहुति सन नहि दोसर देश। विज्ञानी मानी मिथिलेश॥
थापित शंकर धनु तहि ठाम। अपनेहु काँ देखक थिक राम॥
देखब तनि मर्य्यादा जाय। जनक नृपति सौँ पूजा पाय॥
शुनि मुनि संग चलि लक्ष्मण राम। गंगा उतरि विदेहा नाम॥
दिव्य फूल फल भल तरु पाँति। खग मृग रहित भेल दिन राति॥
मुनि केँ पुछलनि से देखि राम। एहि आश्रमक कहू की नाम॥
अति आह्लादित करइछ चित्त। पुण्याश्रम की एहन निमित्त॥
विश्वामित्र कहल से शूनि। आश्रम छल छथि गौतम मूनि॥
तप – बल सौँ तेजस्वी भेल। कन्या तनिकाँ ब्रह्मा देल॥
नाम अहल्या तेहनि न आन। कयलनि विधि वनिता निर्म्मान॥

।रूपक दण्डक।

न्याय – सूत्र – कर्त्ता गौतम मुनि, ब्रह्मचर्य्य – व्रतधारी, बड़ भारी।
कोनहु लोक एहनि के सुन्दरि, तनिक अहल्या नारी, सुकुमारी।
वासव काम – विवश रस-लम्पट, रूप तनिक मन धारी, छलकारी।
गौतम आश्रम राति रहथि नहि, तिय पातिव्रत टारी, अब भारी।

।तीरभुक्ति-सङ्गीतानुसारेण स्मरसन्दीपन कोडार छन्दः।

धाता लिखल जेहन भाल।
से फल भेलैँ से पथ गेलैँ क्रमहिँ कालेँ काल॥
गमहि गमहि गौतम जखन गेहक निकट धाओल।
परक कारन नरक परक तरक तेहन पाओल॥
देखल चरित बुझल दुरित दारक मारक दोषे।
शान्तिक पटल सकल हटल सटल अटल रोषे॥

।रूपक दण्डक।

अति-अनर्थ-कर्त्ता कह के तोँ, शून्याश्रम – सञ्चारी, हठकारी।
क्षणमे दुष्ट भस्म हम कय देब, हमर रूप की धारी, छल भारी॥
कहल इन्द्र अपराध कयल हम, कामक भेलहुँ दासे, मति नाशे।
विधिक पुत्र! करु क्षमा इन्द्र हम, सकल लोकमे हासे, अति त्रासे॥

।हरिपद।
इन्द्रक वचन शुनल जेहि खन मुनि कोप लाल बड़ आँखि।
भग हजार टा तनमे होयतहु उठला गौतम भाखि॥
आश्रम जाय अहल्या देखल कपइत जोड़ल हाथ।
मिथ्यालाप शाप डर कयल न रहल उपाय न लाथ॥

।चौपाइ।

गौतम कहल रहह गय जाय। पापिनि पाथर भितर समाय॥
जल जनु पीबह अन्न न खाह। आश्रम छोड़ि कतहु जनु जाह॥
जन्तु मात्र सँ आश्रम हीन। होएतहु यावत पातक क्षीण॥
दिवारात्र तप करह सहिष्णु। हृदय ध्यान परमेश्वर विष्णु॥
राम राम मन मन से कहब। बहुत सहस वत्सर एत रहब॥
जखन होयत राम अवतार। हरण हेतु अवनिक सभ भार॥
सानुज से एहि आश्रम आबि। तोर भल करता ई अछि भावि॥
पाथर परसहि रामक चरण। तोहरा अभय दुरितचय – हरण॥
तनिकर पूजन भक्ति प्रणाम। लोचन – गोचर प्रभुवर राम॥
सेवा हमर पूर्व्व सम करब। कोक समान संग सञ्चरब॥
ई कहि गेला मुनि हिमवान। आश्रम भै गेल आनक आन॥
गेलथिनि गौतम एतहि राखि। हिनका दोसर देखथि न आँखि॥
अपनैक चरणक चाहैथि धूरि। हिनकर दुःख – निकर करु दूरि॥
कौशिक रामक धय लेल हाथ। करु उद्धार देव रघुनाथ॥
विधि-तनयाक विपति-तति – हरण। परस भेल तेहि पाथर चरण॥
अपन रूप पाओल तहि ठाम। तनिकर राम कयल परनाम॥
दशरथ – तनय राम थिक नाम। ब्रह्म – पुत्रि अयलहुँ एहिठाम॥
से देखल पीताम्बर वीर। लक्ष्मण सहित हाथ धनु तीर॥
स्मित मुख-पंकज पंकज-नयन। श्रीवत्सांकित शोभा – अयन॥
वर – माणिक्य – कान्ति श्रीराम। देखि अहल्या आनन्द ‍- धाम॥
हर्ष लेल लोचन बड़ गोट। तन रोमाञ्च प्रपञ्च न छोट॥
मन पड़ि आएल गौतम कहल। कर लगली परमेश्वर टहल॥
कहइत बाढ़ विपुल खर – भंग। हर्ष न अटय अहल्या अंग॥

।गीत।

हमर गति अपनैँ सौँ के आन।
करुणागार दीन-प्रति-पालक रामचन्द्र भगवान।
पिता विधाता घुरि नहि तकलनि पति-मति भेलहुँ पषान॥
सुरपति कुमति विदित भेल कतए न हम अबला की ज्ञान।
जन्तु मात्र सौँ वर्ज्जित आश्रम नहि भोजन जल पान॥
वरष हजार बहुत एत गत भेल रामचरण मे ध्यान।
सगुन ब्रह्म अपनैकाँ देखल निर्ग्गुन मन अनुमान॥
चन्द्र सुकवि भन लाभ एहन सन त्रिभुवन शुनल न कान॥

।गीत पुनः।

हमर सनि भाग्यवन्ति के नारि।
निर्ग्गुण ब्रह्म सगुण बनि अएलहुँ अपनहि सौँ असुरारि॥
अपनैक चरण सरोज सौँ सुरसरि उतपति पावन बारि।
सकलो तीर्थक मूल चरण से देखल आँखि पसारि॥
जे चरणक धूली लय धन्धित रहथि देव त्रिपुरारि।
से धूलीक प्रकट फल पाओल कर्म्म शुभाशुभ जारि॥
रामचन्द्र कहलनि सुनु शुभमति अहँक हाथ फल चारि।
हमर भक्ति अहँकाँ से होएत सकल सिद्धि देनिहारि॥

।सङ्गीते सूहव नाम छन्दः।

श्रीमन्नारायण विष्णो।
शापादुद्धर शापादुद्धर दुद्धर दनुज विष्णो॥
विधेर्व्विधे दयानिधे विधेरहं कन्या।
तपस्विनी मनस्विनी यशस्विनी धन्या॥
आसं दैवाद्दुराचारा मारद्वारा जाता।
कष्टस्थाने भवानेन प्रभो विभो त्राता॥

इति श्री मैथिल चन्द्र-कवि विरचिते मिथिला-भाषा-रामायणे पञ्चमोऽध्यायः॥

हरिः हरः!!