रामचरितमानस मोतीः काकभुशुण्डि द्वारा अपन पूर्व जन्म कथा आ कलि महिमा वर्णन

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोती

काकभुशुण्डि द्वारा अपन पूर्व जन्म कथा आ कलि महिमा वर्णन

१. हे पक्षीराज गरुड़जी! श्री रघुनाथजीक प्रभुता सुनल जाउ। हम अपना बुद्धिक मुताबिक ओ सोहनगर कथा कहैत छी। हे प्रभो! हमरा जाहि प्रकारें मोह भेल, ओ सबटा कथा अपने केँ सुनबैत छी। हे तात! अहाँ श्री रामजीक कृपा पात्र छी। श्री हरिक गुण मे अहाँक बहुते प्रीति अछि, तेँ अपने हमरा बहुत सुख दयवला छी। एहि सँ हम अहाँ सँ किछुओ नुकबैत नहि छी आर अत्यन्त रहस्यक बात सब सेहो अहाँ केँ गाबिकय सुनबैत छी।

२. श्री रामचंद्रजीक सहज स्वभाव सुनल जाउ। ओ भक्त मे अभिमान कहियो नहि रहय दैत छथि, कियैक तँ अभिमान जन्म-मरण रूपी संसारक मूल थिक आ अनेकों प्रकारक क्लेश सब आ समस्त शोक सब दयवला थिक। ताहि सँ कृपानिधि ओकरा दूर कय दैत छथि, कियैक तँ सेवक पर हुनक अत्यधिक ममता रहैत छन्हि। हे गोसाईं! जेना बच्चाक शरीर मे फोड़ा भ’ जाइत छैक त माय ओकरा कठोर हृदय जेकाँ चिरा मारिकय (पीज) बहा दैत छैक। यद्यपि बच्चा पहिने (फोड़ा चिरबैत समय) दुःख पबैत अछि आ अधीर भ’ कय कानय लगैत अछि, तैयो माय रोगक नाश हेतु बच्चाक ओहि पीड़ा केँ कनिको परवाह कएने बिना फोड़ा केँ चिर देल करैत अछि। तहिना श्री रघुनाथजी अपन दास केर अभिमान ओकरहि हित वास्ते हरि लेल करैत छथि। तुलसीदासजी कहैत छथि जे एहेन प्रभु केँ भ्रम त्यागिकय कियैक नहि भजैत छी।

३. हे गरुड़जी! श्री रामजीक कृपा आ अपन जड़ता (मूर्खता) केर बात कहैत छी, मोन लगाकय सुनल जाउ। जखन-जखन श्री रामचंद्रजी मनुष्य शरीर धारण करैत छथि आ भक्त सभक लेल बहुते तरहक लीला सब करैत छथि, तखन-तखन हम अयोध्यापुरी जाइत छी आ हुनकर बाललीला देखिकय हर्षित होइत छी। ओतय जाय हम जन्म महोत्सव देखैत छी, भगवानक शिशुलीला मे लोभायल पाँच वर्ष धरि ओहिठाम रहैत छी।

४. बालक रूप श्री रामचंद्रजी हमर इष्टदेव छथि, जिनकर शरीर मे अरबों कामदेव केर शोभा छन्हि। हे गरुड़जी! अपन प्रभुक मुख देखि-देखि हम अपन नेत्र केँ सफल करैत छी। छोट सन कौआक शरीर धयकय आ भगवान् केर संग-संग घुमि-फिरिकय हम हुनक भाँति-भाँतिक बाल चरित्र सब देखल करैत छी। लड़कपन मे ओ जेतय-जेतय घुमैत-फिरैत छथि, ओतय-ओतय हम संगे-संगे उड़ैत रहैत छी आ आँगन मे हुनकर आँइठ-कुइठ पड़ल रहैत अछि, वैह उठाकय खाइत छी।

५. एक बेर श्री रघुवीर सब चरित्र बड़ा अधिकता सँ कयलन्हि। प्रभुक ओहि लीला केँ स्मरण करितहि काकभुशुण्डिजीक शरीर (प्रेमानन्दवश) पुलकित भ’ गेलनि। भुशुण्डिजी कहय लगलाह – हे पक्षीराज! सुनल जाउ, श्री रामजीक चरित्र सेवक लोकनि केँ सुख दयवला अछि। अयोध्याक राजमहल सब प्रकार सँ सुन्दर अछि। सोनाक महल मे नाना प्रकारक रत्न जड़ित अछि। सुन्दर आँगनक वर्णन नहि कयल जा सकैछ, जेतय चारू भाइ नित्य खेलाइत रहैत छथि। माता केँ सुख दयवला बालविनोद करैत श्री रघुनाथजी आँगन मे विचरि रहल छथि।

६. मरकत मणिक समान हरिताभ श्याम आ कोमल शरीर छन्हि। अंग-अंग मे बहुते रास कामदेवक शोभा निखरल छन्हि। नवीन (लाल) कमल केर समान लाल-लाल कोमल चरण छन्हि। सुन्दर आँगुर आ नह अपन ज्योति सँ चन्द्रमाक कान्ति केँ हरयवला छन्हि। तलबा मे वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा आ कमल) केर चारि गोट सुन्दर चिह्न छन्हि, चरण मे मधुर शब्द करयवला सुन्दर नूपुर छन्हि, मणि, रत्न सब सँ जड़ित सोनाक बनल सुन्दर करधनीक शब्द सोहनगर लागि रहल छन्हि। उदर पर सुन्दर तीन रेखा (त्रिवली) छन्हि, नाभि सुन्दर आ गहींर छन्हि। विशाल वक्षःस्थल पर अनेकों प्रकारक बच्चाक आभूषण आ वस्त्र सुशोभित छन्हि। लाल-लाल हथेली, नह आ आँगुर सब मन केँ हरयवला अछि आर विशाल भुजा पर सुन्दर आभूषण अछि। बालसिंह (सिंहक बच्चा) जेहेन कंधा आ शंख केर समान (तीन रेखा सँ युक्त) गला छन्हि। सुन्दर ठुड्डी छन्हि आ मुख (अनुहार) त छविक सीमे छन्हि। कलबल (तोतला) वचन छन्हि, लाल-लाल ठोर छन्हि। उज्ज्वल, सुन्दर आ छोट-छोट (उपर आ नीचाँ) दुइ-दुइ दंतुली छन्हि। सुन्दर गाल, मनोहर नासिका आर सब सुख दयवाली चन्द्रमाक (अथवा सुख दयवाली समस्त कला सँ पूर्ण चन्द्रमाक) किरणक समान मधुर मुस्कान छन्हि। नीलकमल केर समान नेत्र जन्म-मृत्यु (केर बन्धन) सँ छोड़ाबयवला छन्हि। ललाट पर गोरोचन केर तिलक सुशोभित छन्हि। भौंह टेढ़ छन्हि, कान सम आ सुन्दर छन्हि, कारी आ घुँघराला केशक छबि छजि रहल छन्हि। पीयर आ महीन झँगुली शरीर पर शोभा दय रहल छन्हि।

७. हुनकर किलकारी आ चितवन हमरा बड प्रिय लगैत अछि। राजा दशरथजीक आँगन मे विहार करयवला रूप केर राशि श्री रामचंद्रजी अपन परछाहीं देखिकय नाचैत छथि, आर हमरा सँ बहुते प्रकारक खेल करैत छथि, जाहि सभक वर्णन करैत हमरा लाज लागि रहल अछि! किलकारी मारिते ओ हमरा पकड़य लेल दौड़ैत छथि आ हम भागि जाइत छी, त हमरा पूआ देखबैत छथि। हमरा नजदीक एला पर प्रभु हँसैत छथि आ भागि गेला पर कनैत छथि। जखन हमर हुनक चरण स्पर्श करय लेल नजदीक जाइत छी, त ओ पाछू ताकि-ताकि हमरा दिश देखैत भागि जाइत छथि। साधारण बच्चा जेकाँ लीला सब देखिकय हमरा मोह (शंका) भेल जे सच्चिदानंदघन प्रभु ई कोन (महत्त्वक) चरित्र (लीला) कय रहल छथि।

८. हे पक्षीराज! मोन मे एतबी (शंका) अनितहि श्री रघुनाथजीक द्वारा प्रेरित माया हमरा पर प्रभाव कय गेल, लेकिन ओ माया नहि त हमरा दुःख दयवला भेल आ न दोसर जीव जेकाँ संसार मे ठेलयवला भेल। हे नाथ! एतय किछु दोसरे बात भेल। हे भगवान्‌ केर वाहन गरुड़जी! ओहो बात सावधान भ’ कय सुनल जाउ।

९. एक सीतापति श्री रामजी मात्र अखंड मानवस्वरूप छथि आ जड़-चेतन सब जीव मायाक वश अछि। यदि जीव सब केँ एकरस (अखंड) ज्ञान रहय, त कहू, फेर ईश्वर आर जीव मे भेदे केहेन? अभिमानी जीव मायाक वश अछि आर ओ सत्त्व, रज, तम एहि तीनू गुण सभक खान माया ईश्वर केर वश मे अछि। जीव परतंत्र अछि, भगवान्‌ स्वतंत्र छथि, जीव अनेक अछि, श्री पति भगवान्‌ एक छथि।

१०. यद्यपि मायाक कयल गेल ई भेद असत् अछि तथापि ओ भगवान् केर भजन बिना करोड़ों उपाय कयलाक बादो नहि जा सकैत अछि। श्री रामचंद्रजीक भजन बिना जे मोक्ष पद चाहैत अछि, से मनुष्य ज्ञानवान्‌ भेलोपर बिना पूँछ आ सींग केर पशु थिक। समस्त तारागणक संग सोलहो कला सँ पूर्ण चन्द्रमा उदय हो आ जतेक पर्वत अछि ओहि सब मे दावाग्नि लगा देल जाय, तैयो सूर्यक उदय भेने बिना रात्रिक अन्त नहि भ’ सकैत अछि। हे पक्षीराज! ताहि प्रकार सँ श्री हरिक भजन बिना जीव केर क्लेश नहि मेटाइत छैक।

११. श्री हरिक सेवक केँ अविद्या नहि व्यापैत (प्रभाव करैत) छैक। प्रभुक प्रेरणा सँ ओकरा विद्या व्यापैत अछि। हे पक्षीश्रेष्ठ! एहि सँ दास केर नाश नहि होइत अछि आ भेद भक्ति बढ़बैत अछि।

१२. श्री रामजी हमरा जखन भ्रम सँ चकित देखलनि, तखन ओ हँसलाह। ओहो विशेष चरित्र सुनल जाउ। ओहि खेलक मर्म कियो नहि जनलक, न छोट भाइ लोकनि आ न माते-पिता। ओ श्याम शरीर आ लाल-लाल हथेली व चरणतल वला बालरूप श्री रामजी ठेहुन आ हाथक बले हमरा पकड़य लेल दौड़लाह। हे सर्पक शत्रु गरुड़जी! तखन हम भागय लगलहुँ। श्री रामजी हमरा पकड़बाक लेल हाथ पसारलनि। हम जेना-जेना आकाश मे दूर उड़ैत जाय, तेना-तेना ओतय धरि श्री हरिक भुजा केँ अपनहि पाछू देखैत रही।

१३. हम ब्रह्मलोक तक गेलहुँ आ जखन उड़िते हम पाछू दिश तकलहुँ त हे तात! श्री रामजीक भुजा मे आ हमरा मे मात्र दुइ आंगुरक दूरी छल। सातो आवरण केँ भेदिकय जहाँ धरि हमर गति छल ओतय धरि हम गेलहुँ, मुदा ओतहु प्रभुक भुजा केँ अपनहि पाछू देखिकय हम व्याकुल भ’ गेलहुँ। जखन हम भयभीत भ’ गेलहुँ, तखन हम आँखि मुन्दि लेलहुँ। फेर आँखि खोलिकय देखैत छी त अवधपुरी मे पहुँच गेल रही।

१४. हमरा देखिकय श्री रामजी विहुँसय लगलाह। हुनका विहुँसिते हम तुरन्त हुनक मुख मे समा गेलहुँ। हे पक्षीराज! सुनू, हम हुनकर पेट मे बहुते रास ब्रह्माण्डक समूह देखलहुँ। ओहि ब्रह्माण्ड सब मे अनेकों विचित्र लोक सब छल, जेकर रचना एक सँ बढ़िकय एक रहय। करोड़ों ब्रह्माजी आर शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य आर चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम आ काल, अनगिनत विशाल पर्वत आ भूमि, असंख्य समुद्र, नदी, तालाब आर वन तथा आरो नाना प्रकारक सृष्टिक विस्तार देखलहुँ। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारू प्रकारक जड़ आ चेतन जीव देखलहुँ।

१५. जे कहियो नहि देखने रही, नहिये सुनने रही आ जे मनहु मे नहि आबि सकल छल, जेकर कल्पनो तक नहि कय सकल छलहुँ, तेहेन-तेहेन अद्भुत सृष्टि हम देखलहुँ। फेर ओहि सब बातक केना वर्णन कय सकब!

१६. हम एक-एकटा ब्रह्माण्ड मे एक-एक सौ वर्ष तक रहैत छी। एहि प्रकारे हम अनेकों ब्रह्माण्ड देखैत फिरैत छी। प्रत्येक लोक मे भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गंधर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प, तथा नाना जातिक देवता एवं दैत्यगण रहथि। सब जीव ओहिठाम दोसरे तरहक छल। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत आ सब सृष्टि ओहिठाम दोसरे-दोसरे प्रकारक छल।

१७. प्रत्येक ब्रह्माण्ड मे हम अपन रूप देखी आ आरो अनेकों अनुपम वस्तु सब देखलहुँ। प्रत्येक भुवन मे न्यारा अवधपुरी, भिन्ने सरयूजी आर भिन्न प्रकारक नर-नारी छल। हे तात! सुनल जाउ! दशरथजी, कौसल्याजी आर भरतजी आदि भाइ लोकनि सेहो भिन्न-भिन्न रूप केर रहथि। हम प्रत्येक ब्रह्माण्ड मे रामावतार आर हुनक अपार बाल लीला सब देखैत फिरैत रही। हे हरिवाहन! हम सब किछु भिन्न-भिन्न आर अत्यन्त विचित्र देखलहुँ। हम अनगिनत ब्रह्माण्ड सब मे घुमलहुँ-फिरलहुँ, मुदा प्रभु श्री रामचंद्रजी केँ हम दोसर तरहक कतहु नहि देखलहुँ। सर्वत्र वैह शिशुपन, वैह शोभा आर वैह कृपालु श्री रघुवीर!

१८. एहि प्रकारे मोहरूपी पवन केर प्रेरणा सँ हम भुवन-भुवन मे देखैत-घुमैत रहलहुँ। अनेकों ब्रह्माण्ड मे भटकैत हमरा बुझू जे एक सौ कल्प बीति गेल। घुमैत‍-घुमैत हम अपन आश्रम मे अयलहुँ आ किछु समय ओतय रहिकय बितेलहुँ। फेर जखन अपन प्रभुक अवधपुरी मे जन्म (अवतार) केर बात सुनलहुँ, तखन प्रेम सँ परिपूर्ण भ’ हम हर्षपूर्वक उठि दौड़लहुँ। जाकय हम जन्म महोत्सव देखलहुँ, जाहि प्रकारे पहिने वर्णन कय चुकल छी।

१९. श्री रामचंद्रजीक पेट मे हम बहुते रास जगत्‌ देखलहुँ, जे सब देखिते बनैत छल, वर्णन नहि कयल जा सकैछ। ओतय फेर हम सुजान मायाक स्वामी कृपालु भगवान् श्री राम केँ देखलहुँ। हम बेर-बेर विचार करैत रही। हमर बुद्धि मोहरूपी थाल (कीचड़) सँ भरल (व्याप्त) छल। ई सबटा बात हम मात्र दुइये घड़ी मे देखने रही। मोन मे विशेष मोह भेलाक कारण हम थाकि गेलहुँ। हमरा व्याकुल देखि कृपालु श्री रघुवीर हँसि देलनि। हे धीर बुद्धि गरुड़जी! सुनू, हुनका हँसिते देरी हम मुँह सँ बाहर आबि गेलहुँ।

२०. श्री रामचंद्रजी हमरा संगे फेर वैह लड़कपन करय लगलाह। हम करोड़ों (असंख्य) प्रकार सँ मोन केँ बुझबैत रही, मुदा ओ शान्ति नहि पबैत छल। ई (बाल) चरित्र देखिकय आ पेटक भीतर देखल ओहि प्रभुता केँ स्मरण कय हम शरीरक सुइध बिसरि गेलहुँ आ हे आर्तजन केर रक्षक! रक्षा करू, रक्षा करू, गोहारिते पृथ्वी पर खसि पड़लहुँ। मुख सँ बोलियो नहि निकलैत छल! तदनन्तर प्रभु हमरा प्रेमविह्वल देखि अपन मायाक प्रभुता (प्रभाव) केँ रोकि लेलनि।

२१. प्रभु अपन करकमल हमर माथ पर रखलनि। दीनदयालु हमर संपूर्ण दुःख हरि लेलनि। सेवक सबकेँ सुख दयवला, कृपाक समूह (कृपामय) श्री रामजी हमरा मोह सँ सर्वथा रहित कय देलनि। हुनक पहिने वला प्रभुता केँ विचारि-विचारि (याद कय-कयकेँ) हमर मोन मे बड़ा भारी हर्ष भेल। प्रभुक भक्तवत्सलता देखिकय हमर हृदय मे बहुते प्रेम उत्पन्न भ’ गेल। फेर हम आनंद सँ नेत्र मे जल भरि, पुलकित भ’ कय आ हाथ जोड़िकय बहुते प्रकार सँ विनती कयलहुँ।

२२. हमर प्रेमयुक्त वाणी सुनिकय आ अपन दास केँ दीन देखिकय रमानिवास श्री रामजी सुखदायक, गंभीर आर कोमल वचन बजलाह – हे काकभुशुण्डि! तूँ हमरा खुब प्रसन्न बुझैत वर माँगे। अणिमा आदि अष्ट सिद्धि, दोसर ऋद्धि तथा सम्पूर्ण सुख केर खान मोक्ष, ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, तत्त्वज्ञान आर ओ सब अनेकों गुण जे जगत्‌ मे मुनियहुं सभक वास्ते दुर्लभ अछि, से सबटा हम आइ तोरा देब, एहि मे सन्देह नहि। जे तोरा मन केँ भावय, से माँगि ले।

२३. प्रभुक वचन सुनिकय हम बहुते प्रेम मे भरि गेलहुँ। तखन मोन मे अनुमान करय लगलहुँ जे प्रभु सब सुख देबाक बात कहलनि, ई त सत्य अछि, मुदा अपन भक्ति देबाक बात नहि कहलनि। भक्ति सँ रहित सब गुण आर सब सुख ओहिना ब्यर्थ (फीका) अछि जेना नून बिना बहुते प्रकारक भोजन पदार्थ। भजन सँ रहित सुख कोन काजक? हे पक्षीराज! एना विचार कय केँ हम कहलियनि – हे प्रभो! यदि अपने प्रसन्न भ’ कय हमरा वर दैत छी आ हमरा पर कृपा आ स्नेह करैत छी, त हे स्वामी! हम अपन मनभावन वर माँगैत छी। अपने उदार छी आ हृदयक भीतर के बात जननिहार छी। अपनेक जाहि अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्ति केँ श्रुति आ पुराण गबैत अछि, जेकरा योगीश्वर मुनि लोकनि तकैत रहैत छथि आ प्रभुक कृपा सँ कियो विरले जे पबैत अछि। हे भक्त सभक (मन इच्छित फल दयवला) कल्पवृक्ष! हे शरणागत केर हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्री रामजी! दया कयकेँ हमरा अपन वैह भक्ति दिअ।

२४. ‘एवमस्तु’ (एहिना हो) कहिकय रघुवंश केर स्वामी परम सुख दयवला एना कहलाह

हे काक! सुन, तूँ स्वभावहि सँ बुद्धिमान्‌ छँ। एहेन वरदान केना नहि मँगितेँ! तूँ सब सुख केर खान भक्ति माँगि लेलें! जगत्‌ मे तोरा समान बड़भागी कियो नहि अछि।

ओ मुनि सब जे जप आ योग केर अग्नि सँ शरीर जरबैत रहैत छथि, करोड़ों यत्न कयकेँ पर्यन्त जे (भक्ति) नहि पबैत छथि, वैह भक्ति तूँ मँगलें। तोहर चतुरता देखिकय हम रीझि गेलहुँ। ई चतुरता हमरा बहुते नीक लागल।

हे पक्षी! सुन, हमर कृपा सँ आब समस्त शुभ गुण तोहर हृदय मे बसतौक।

भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, हमर लीला आर ओकर रहस्य तथा विभाग – एहि सभक भेद केँ तूँ हमर कृपा मात्र जानि जेमें। तोरा साधन-साधनाक कष्ट नहि हेतौक। माया सँ उत्पन्न सबटा भ्रम आब तोरा नहि प्रभावित करतौक।

हमरा अनादि, अजन्मा, अगुण (प्रकृतिक गुण सब सँ रहित) आ गुणातीत दिव्य गुण सभक खान ब्रह्म जनिहें। हे काक! सुने, हमरा भक्त निरन्तर प्रिय अछि, एना विचारिकय शरीर, वचन आर मन सँ हमर चरण मे अटल प्रेम करिहें।

आब हमर सत्य, सुगम, वेदादिक द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन। हम तोरा ई ‘निज सिद्धांत’ सुनबैत छी। सुनिकय मोन मे धारण करे आ सब तजिकय हमर भजन करे।

ई सारा संसार हमर माया सँ उत्पन्न अछि। एहि मे अनेकों प्रकारक चराचर जीव सब अछि। ओ सब हमरा प्रिय अछि, कियैक तँ सब हमरहि सँ उत्पन्न भेल अछि। मुदा मनुष्य हमरा सब सँ बेसी नीक लगैत अछि। ओहि मनुष्यहु मे द्विज, द्विजहु मे वेद केँ (कंठ मे) धारण करयवला, ओकरहु मे वेदोक्त धर्म पर चलयवला, फेर ओकरहु मे विरक्त (वैराग्यवान्‌) हमरा प्रिय अछि। वैराग्यवानहु मे फेर ज्ञानी आर ज्ञानियहु सँ बेसी प्रिय विज्ञानी अछि। विज्ञानियहु सँ बेसी प्रिय हमरा अपन दास अछि, जेकरा हमरहि टा गति (आश्रय) छैक, कोनो दोसरक आशा नहि छैक।

हम तोरा बेर-बेर सत्य (‘निज सिद्धांत’) कहैत छी जे हमरा अपन सेवक केर समान दोसर कियो प्रिय नहि अछि। भक्तिहीन ब्रह्मे कियैक नहि होइथ, ओ हमरा सब जीवहि समान प्रिय छथि, परन्तु भक्तिमान्‌ अत्यन्त नीचो प्राणी हमरा प्राणक समान प्रिय अछि, ई हमर घोषणा छी।

पवित्र, सुशील आर सुन्दर बुद्धिवला सेवक, बता, केकरा प्रिय नहि लगतैक! वेद आ पुराण यैह नीति कहैत अछि। हे काक! सावधान भ’ कय सुन।

एक पिताक बहुते रास पुत्र पृथक-पृथक्‌ गुण, स्वभाव व आचरणवला होइत अछि। कियो पंडित होइत अछि, कियो तपस्वी, कियो ज्ञानी, कियो धनी, कियो शूरवीर, कियो दानी, कियो सर्वज्ञ आ कियो धर्मपरायण होइत अछि। पिताक प्रेम एहि सब पर समान रहैत छैक, मुदा एहि मे सँ जँ कियो मन, वचन आ कर्म सँ पिताक भक्त होइत अछि, सपनहुँ मे दोसर धर्म नहि जनैत अछि, ओ पुत्र पिता केँ प्राणक समान प्रिय होइत अछि, चाहे ओ सब प्रकार सँ अज्ञान (मूर्खे) कियैक न हो।

एहि प्रकारे तिर्यक्‌ (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य आर असुर समेत जतेको चेतन आ जड़ जीव अछि, ओकरा सब सँ भरल ई सम्पूर्ण विश्व हमरे जन्म देल अछि। अतः सब पर हमर बराबर दया अछि, लेकिन एहि मे सँ जे मद आ माया छोड़िकय मन, वचन आ शरीर सँ हमरा भजैत अछि, ओ पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोनो जीव हो, कपट छोड़िकय जे कियो सर्वभाव सँ हमरा भजैत अछि, वैह हमरा परम प्रिय अछि।

हे पक्षी! हम तोरा सँ सत्य कहैत छी, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक हमरा प्राणक समान प्यारा अछि। एना विचारिकय सब आशा-भरोसा छोड़िकय हमरहि भजन कर। तोरा कालो किछु नहि करतौक। निरन्तर हमर स्मरण आ भजन करैत रहिहें।

२५. प्रभुक वचनामृत सुनिकय हम तृप्त नहि होइत छलहुँ… हमर शरीर पुलकित छल आ मोन मे हम अत्यन्ते हर्षित भ’ रहल छलहुँ। ओ सुख मोन आ काने टा बुझैत अछि। जिह्वा सँ ओकर बखान नहि कयल जा सकैछ। प्रभुक शोभा केर ओ सुख आँखिये टा जनैत अछि, ओ कहि कोना सकत? ओकर त बोली छैक नहि!

२६. हमरा बहुते प्रकार सँ नीक जेकाँ बुझा-सुझाकय, सुख दयकय प्रभु फेर ओहिना बालकक खेल सब करय लगलाह। नेत्र मे जल भरिकय आ कननमुंह बनाकय ओ माय दिश ताकय लगलाह – मानू बुझा रहल होइथ जे बड भूख लागल छन्हि। ई देखिते माय तुरन्ते दौड़ि अयलीह आ कोमल वचन कहैत श्री रामजी केँ छाती सँ लगा लेलीह। कोरा मे लयकय हुनका दूध पियाबय लगलीह आ श्री रघुनाथजीक ललित लीला सब गाबय लगलीह।

२७. जाहि सुख लेल सबकेँ सुख दयवला कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजी अशुभ वेष धारण कयलनि, ओहि सुख मे अवधपुरीक नर-नारी निरन्तर निमग्न रहैत छथि। ओहि सुख केर लवलेशमात्र जे एक बेर सपनहुँ मे टा पाबि गेल, हे पक्षीराज! ओ सुन्दर बुद्धिवला सज्जन पुरुष ओकरा सोझाँ ब्रह्मसुख केँ सेहो कनिको गिनती नहि करैत अछि।

२८. हम आरो किछु दिन धरि अवधपुरिये मे रहलहुँ आ श्री रामजीक रसदार बाललीला सब देखैत रहलहुँ। श्री रामजीक कृपा सँ भक्तिक वरदान पाबि गेलहुँ। तदनन्तर प्रभुक चरणक वन्दना कय अपन आश्रम घुरि गेलहुँ। एहि प्रकारे जहिया सँ श्री रघुनाथजी हमरा अपनौलनि, तहिया सँ हमरा माया कहियो नहि व्यापलक (प्रभावित कयलक)। श्री हरिक माया हमरा जेना नचौने छल, ओ सब गुप्त चरित्र हम अपने केँ सुनेलहुँ।

२९. हे पक्षीराज गरुड़! आब हम अहाँ सँ अपन निजी अनुभव कहैत छी। ओ ई अछि जे भगवान् केर भजन बिना क्लेश दूर नहि होइछ। हे पक्षीराज! सुनू! श्री रामजीक कृपा बिना श्री रामजीक प्रभुता नहि जानल जाइछ, प्रभुता जनने बिना हुनका उपर विश्वास नहि जमैत अछि, विश्वासक बिना प्रीति नहि होइछ आ प्रीति बिना भक्ति ओहिना दृढ़ नहि होइत अछि जेना हे पक्षीराज! जलक चिकनाहट हरदम बरकरार नहि रहि पबैछ।

 

३०. गुरु बिना कतहु ज्ञान भ’ सकैत अछि? अथवा वैराग्य बिना कतहु ज्ञान भ’ सकैत अछि? तहिना वेद आ पुराण कहैत अछि जे श्री हरिक भक्ति बिना कि सुख भेटि सकैत अछि? हे तात! स्वाभाविक संतोष केर बिना कि कियो शान्ति पाबि सकैत अछि? चाहे करोड़ों उपाय कयकेँ पचि-पचि मरय, तैयो कि कहियो जल बिना नाव चलि सकैत अछि? संतोष के बिना कामनाक नाश नहि होइत छैक आ कामना सब रहैत सपनहुँ मे सुख नहि भ’ सकैत अछि आ श्री राम केर भजन बिना कि कामना कहियो मेटा सकैत अछि? बिना धरती केर कतहु कि गाछ-वृक्ष उगि सकैत अछि? विज्ञान (तत्त्वज्ञान) केर बिना कि समभाव आबि सकैत अछि? आकाश केर बिना कि कियो अवकाश (पोल) पाबि सकैत अछि? श्रद्धा केर बिना धर्म केर आचरण नहि होइत छैक। कि पृथ्वी तत्त्वक बिना कियो गन्ध पाबि सकैत अछि? तप केर बिना कि तेज पसैर सकैत छैक? जल-तत्त्वक बिना संसार मे कतहु कि रस भ’ सकैत अछि? पंडितजनक सेवा बिना कि शील (सदाचार) प्राप्त भ’ सकैत अछि? हे गोसाईं! जेना बिना तेज (अग्नि-तत्त्व) केँ रूप नहि भेटैछ, निज-सुख (आत्मानंद) केर बिना कि मन स्थिर भ’ सकैत अछि? वायु-तत्त्व केर बिना कि स्पर्श भ’ सकैत अछि? कि विश्वासक बिना कोनो या केहनो सिद्धि भ’ सकैत अछि? ताहि प्रकारे श्री हरिक भजन बिना जन्म-मृत्युक भय केर नाश नहि होइत अछि। बिना विश्वास केर भक्ति नहि होइछ, भक्तिक बिना श्री रामजी नहि ढरैत छथि आ श्री रामजीक कृपा बिना जीव सपनहुँ मे शान्ति नहि पबैत अछि। हे धीरबुद्धि! एना विचारिकय सम्पूर्ण कुतर्क व सन्देह सब छोड़िकय करुणाक खान सुन्दर आ सुख दयवला श्री रघुवीर केर भजन कयल जाउ।

३१. हे पक्षीराज! हे नाथ! हम अपन बुद्धि अनुसार प्रभुक प्रताप आ महिमा केर गान कयलहुँ। हम एहि मे कोनो बात युक्ति सँ बढ़ाकय नहि कहलहुँ अछि। ई सब अपन आँखिक देखल कहलहुँ अछि। श्री रघुनाथजीक महिमा, नाम, रूप आ गुण सभक कथा सब अपार आ अनन्त छन्हि तथा श्री रघुनाथजी स्वयं सेहो अनन्त छथि। मुनिगण अपना-अपना बुद्धिक अनुसार श्री हरिक गुण गबैत छथि। वेद, शेष व शिवजी सेहो हुनकर पार नहि पबैत छथि।

३२. अहाँ सँ लयकय मच्छर पर्यन्त – सब छोट-पैघ जीव आकाश मे उड़ैत अछि, लेकिन आकाशक अन्त कियो नहि पबैत अछि। तेनाही हे तात! श्री रघुनाजीक महिमा सेहो अथाह छन्हि। कि कहियो कियो ओकरो थाह पाबि सकैत अछि?

३३. श्री रामजीक अरबों कामदेव केर समान सुन्दर शरीर छन्हि। ओ अनन्त कोटि दुर्गा केर समान शत्रुनाशक छथि। अरबों इंद्र केर समान हुनकर विलास (ऐश्वर्य) छन्हि। अरबों आकाश केर समान हुनका मे अनन्त अवकाश (स्थान) छन्हि। अरबों पवन केर समान हुनका मे महान्‌ बल छन्हि आ अरबों सूर्य केर समान प्रकाश छन्हि। अरबों चंद्रमा केर समान ओ शीतल आर संसार केर समस्त भय केँ नाश करयवला छथि। अरबों काल केर समान ओ अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम आर दुरन्त छथि। ओ भगवान्‌ अरबों धूमकेतु (पुच्छल तारा) केर समान अत्यन्त प्रबल छथि। अरबों पाताल केर समान प्रभु अथाह छथि। अरबों यमराज केर समान भयानक छथि। अनन्तकोटि तीर्थ केर समान ओ पवित्र करयवला छथि। हुनकर नाम सम्पूर्ण पापसमूह केँ नाश करयवला अछि। श्री रघुवीर करो़ड़ों हिमालय केर समान अचल (स्थिर) छथि आ अरबों समुद्र केर समान गहींर छथि। भगवान्‌ अरबों कामधेनु केर समान सब कामना (इच्छित पदार्थ सब) केँ दयवला छथि। हुनका मे अनन्तकोटि सरस्वती केर समान चतुरता छन्हि। अरबों ब्रह्मा केर समान सृष्टि रचनाक निपुणता छन्हि। ओ करोड़ों विष्णु केर समान पालन करयवला आ अरबों रुद्र केर समान संहार करयवला छथि। ओ अरबों कुबेर केर समान धनवान्‌ आर करोड़ों माया केर समान सृष्टिक खजाना छथि। बोझ उठाबय मे ओ अरबों शेष केर समान छथि। बेसी की! जगदीश्वर प्रभु श्री रामजी सब बात मे सीमारहित आर उपमारहित छथि।

३४. छंद :
निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।
जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥
एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।
प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥

श्री रामजी उपमारहित छथि, हुनकर कोनो दोसर उपमा छन्हिये नहि। श्री राम केर समान श्री रामहि टा छथि, एना वेद कहैत अछि। जेना अरबों भगजोगनीक समान कहला सँ सूर्य प्रशंसित नहि वरन् अत्यन्त लघुता मात्र केँ प्राप्त होइत छथि, तहिना अपन-अपन बुद्धिक विकास मुताबिक मुनीश्वर लोकनि श्री हरिक वर्णन करैत छथि। मुदा प्रभु भक्त सभक भावमात्र केँ ग्रहण करयवला आ अत्यन्त कृपालु छथि। ओ ताहि वर्णन केँ प्रेमसहित सुनिकय सुख मानैत छथि।

३५. श्री रामजी अपार गुणक समुद्र छथि, कि हुनकर कियो थाह पाबि सकैत अछि? सन्त सब सँ हम जे किछु सुनने रही, वैह अहाँ केँ सुनेलहुँ अछि। सुख केर भंडार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) केर वश छथि। अतएव ममता, मद आ मान केँ छोड़ि सदा श्री जानकीनाथजीक भजन टा करबाक चाही।

३६. भुशुण्डिजीक सुन्दर वचन सुनिकय पक्षीराज हर्षित भ’ कय अपन पाँखि फुलौलनि। हुनकर नेत्र मे प्रेमानन्दक नोर वला जल भरि गेलनि आ मन अत्यन्त हर्षित भ’ गेलनि। ओ श्री रघुनाथजीक प्रताप हृदय मे धारण कयलनि। ओ अपन पिछला मोह केँ याद कयकेँ पछताबा करय लगलाह जे हम अनादि ब्रह्म केँ मनुष्य कयकेँ मानलहुँ। गरुड़जी बेर-बेर काकभुशुण्डिजीक चरण मे सिर नमौलनि आ हुनका श्री रामजीये समान जानिकय प्रेम बढ़ौलनि।

३७. गुरुक बिना कियो भवसागर नहि तरि सकैत अछि, चाहे ओ ब्रह्माजी आ शंकरजीक समाने कियैक नहि हुए। गरुड़जी कहलखिन – हे तात! हमरा सन्देहरूपी साँप काटि लेने छल आ साँपक कटला सँ जेना विष चढ़बाक लहरि अबैत अछि, तहिना बहुते रास कुतर्करूपी दुःख दयवाली लहरि आबि रहल छल। अहाँक स्वरूपरूपी गारुड़ी (साँपक विष उतारयवला) द्वारा भक्त सबकेँ सुख दयवला श्री रघुनाथजी हमरा जिया लेलनि। अहाँक कृपा सँ हमर मोह नाश भ’ गेल आ हम श्री रामजीक अनुपम रहस्य जानि गेलहुँ।

३८. काकभुशुण्डिजीक बहुते प्रकार सँ प्रशंसा कयकेँ, सिर नमाकय आ हाथ जोड़िकय पुनः गरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र आ कोमल वचन बजलाह –

“हे प्रभो! हे स्वामी! हम अपन अविवेक केर कारण अपने सँ पुछैत छी। हे कृपाक समुद्र! हमरा अपन ‘निज दास’ जानि आदरपूर्वक (विचारपूर्वक) हमर प्रश्नक उत्तर कहू।

अहाँ सब किछु जानयवला छी, तत्त्व केर ज्ञाता छी, अंधकार (माया) सँ परे, उत्तम बुद्धि सँ युक्त, सुशील, सरल आचरणवला, ज्ञान, वैराग्य आर विज्ञान केर धाम तथा श्री रघुनाथजीक प्रिय दास छी।

अहाँ ई काक शरीर केना (कोन कारण) सँ पेलहुँ? हे तात! सब बात बुझाकय हमरा कहू।

हे स्वामी! हे आकाशगामी! ई सुन्दर रामचरितमानस अपने कतय पेलहुँ, से कहू।

हे नाथ! हम शिवजी सँ एना सुनलहुँ अछि जे महाप्रलय मे पर्यन्त अहाँक नास नहि होइत अछि आ ईश्वर (शिवजी) कहियो मिथ्या वचन नहि कहैत छथि। ईहो हमरा मोन मे सन्देह अछि। कियैक तँ, हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा ई सारा जगत्‌ काल केर कलेवा अछि। असंख्य ब्रह्मांड केर नाश करयवला काल सदैव बहुते अनिवार्य अछि। एहेन ओ अत्यन्त भयंकर काल अहाँ केँ नहि व्यापैत अछि (अहाँ पर प्रभाव नहि देखबैत अछि), एकर कि कारण छैक?

हे कृपालु हमरा कहू, ई ज्ञान केर प्रभाव छी या योग केर बल छी? हे प्रभो! अपनेक आश्रम मे अबिते देरी हमर मोह आ भ्रम भागि गेल। एकर कि कारण छैक? हे नाथ! ई सब बात प्रेम सहित कहू।”

३९. शिवजी कहैत छथि – हे उमा! गरुड़जीक वाणी सुनिकय काकभुशुण्डिजी हर्षित भेलाह आ परम प्रेम सँ बजलाह –

“हे सर्प सभक शत्रु! अहाँक बुद्धि धन्य अछि, धन्य अछि! अहाँक प्रश्न हमरा बड नीक लागल। अहाँक प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनिकय हमरा अपन बहुते रास जन्म सब मोन पड़ि गेल। हम अपन सबटा कथा विस्तार सँ कहैत छी। हे तात! अपने आदर सहित मोन लगाकय सुनल जाउ।”

४०. “अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मन केँ रोकबाक क्रिया), दम (इंद्रिय केँ रोकबाक क्रिया), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सभक फल श्री रघुनाथजीक चरण मे प्रेम होयब थिक। एकर बिना कियो कल्याण नहि पाबि सकैत अछि। हम एहि शरीर सँ श्री रामजीक भक्ति प्राप्त कयलहुँ अछि। ताहि सँ एकरा उपर हमर ममता बड बेसी अछि।”

४१. “जेकरा सँ अपन किछु स्वार्थ रहैत अछि, ओकरा सँ सब कियो प्रेम करैत अछि। हे गरुड़जी! वेद मे मानल गेल एहेन नीति अछि आ सज्जन लोकनि सेहो कहैत छथि जे अपन परम हित जानिकय अत्यन्त नीच लोक सँ सेहो प्रेम करबाक चाही। रेशम कीड़ा सँ होइत छैक, ओहि सँ सुन्दर रेशमी वस्त्र बनैत छैक। एहि सँ ओहि परम अपवित्र कीड़ा केँ सेहो सब कियो प्राणक समान पोसैत अछि।”

४२. “जीव लेल सच्चा स्वार्थ यैह छैक जे मन, वचन आ कर्म सँ श्री रामजीक चरण मे प्रेम होइ। वैह शरीर पवित्र आर सुन्दर छैक जाहि शरीर केँ पाबिकय श्री रघुवीर केर भजन कयल जाय। जे श्री रामजी सँ विमुख अछि ओ यदि ब्रह्माजी समान शरीर पाबि जाय तैयो कवि आ पंडित ओकर प्रशंसा नहि करैत छथि। एहि शरीर सँ हमर हृदय मे रामभक्ति उत्पन्न भेल। ताहि सँ हे स्वामी, यैह हमरा परम प्रिय अछि। हमर मरण अपना इच्छा पर अछि, लेकिन तैयो हम ई शरीर नहि छोड़ैत छी, कियैक तँ वेद वर्णन कयलक अछि कि शरीरक बिना भजन नहि होइत छैक।”

४३. “पहिल मोह त हमर बहुत दुर्दशा कयलक, श्री रामजी सँ विमुख भ’ कय हम कहियो सुख सँ नहि सुतलहुँ। अनेकों जन्म मे हम अनेकों प्रकारक योग, जप, तप, यज्ञ आर दान आदि कर्म कयलहुँ। हे गरुड़जी! जगत्‌ मे एहेन कोन योनि अछि, जाहि मे हम बेर-बेर घुमि-फिरि जन्म नहि लेने होइ! हे गोसाईं! हम सब कर्म कयकेँ देखि लेलहुँ, मुदा आब एहि जन्म जेकाँ हम कहियो सुखी नहि भेल रही। हे नाथ! हमरा बहुतो रास जन्म याद अछि, कियैक तँ श्री शिवजीक कृपा सँ हमर बुद्धि केँ मोह नहि घेरलक।”

४४. हे पक्षीराज! सुनू, आब हम अपन प्रथम जन्म केर चरित्र कहैत छी, जे सुनिकय प्रभुक चरण मे प्रीति उत्पन्न होइत अछि, जाहि सँ सबटा क्लेश मेटा जाइत अछि। हे प्रभो! पूर्व केर एक कल्प मे पापक मूल युग कलियुग छल, जाहि मे पुरुष आ स्त्री सब अधर्मपारायण आर वेद केर विरोधी रहथि। ओहि कलियुग मे हम अयोध्यापुरी मे जाकय शूद्र केर शरीर पाबिकय जन्म लेलहुँ।

४५. हम मन, वचन आ कर्म सँ शिवजीक सेवक आर दोसर देवता सभक निन्दा करयवला अभिमानी रही। हम धन केर मद सँ मतवाला, बहुते बकवादी आर उग्रबुद्धि वला रही, हमर हृदय मे बड़ा भारी दम्भ छल। यद्यपि हम श्री रघुनाथजीक राजधानी मे रहैत छलहुँ, तथापि हम ताहि समय हुनकर महिमा किछुओ नहि जनलहुँ। आब हम अवध केर प्रभाव जनलहुँ।

४६. वेद, शास्त्र आर पुराण एना गेलक अछि जे कोनो जन्म मे जँ कियो अयोध्या मे बसि जाइत अछि, ओ अवश्य टा श्री रामजीक परायण भ’ जायत। अवध केर प्रभाव जीव तखनहि जनैत अछि, जखन हाथ मे धनुष धारण करनिहार श्री रामजी ओकर हृदय मे निवास करैत छथि।

४७. हे गरुड़जी! ओ कलिकाल बड़ा कठिन छल। ओहि मे सब नर-नारी पापपरायण (पाप मे लिप्त) रहय। कलियुग केर पाप सबटा धर्म केँ ग्रास बना लेलक, सद्‌ग्रन्थ सब लुप्त भ’ गेल, दम्भी सब अपन बुद्धि सँ कल्पना कय-कयकेँ बहुते रास पन्थ सब प्रकट कय देलक।

४८. सब लोक मोह केर वश भ’ गेल। शुभ कर्म सब केँ लोभ हड़पि लेलक। हे ज्ञान केर भंडार! हे श्री हरि केर वाहन! सुनू, आब हम कलि केर किछु धर्म कहैत छी –

कलियुग मे न वर्णधर्म रहैत अछि, नहिये चारू आश्रम रहैत अछि। सब पुरुष-स्त्री वेद केर विरोध मे लागल रहैत अछि। ब्राह्मण वेद केँ बेचयवला आ राजा प्रजा केँ खायवला होइत अछि।

वेदक आज्ञा कियो नहि मानैत अछि। जेकरा जे नीक लागि जाय, वैह मार्ग भ’ जाइछ। जे डींग मारैत अछि, वैह पंडित भ’ जाइछ।

जे मिथ्या आरम्भ करैछ (आडंबर रचैछ) आर जे दम्भ मे रत अछि, ओकरे सब कियो सन्त कहैत अछि। जे जाहि कोनो ढंग सँ दोसरक धन हरण कय लियए, वैह बुद्धिमान कहाइत अछि।

जे दम्भ करैत अछि, वैह बड़ा आचारी कहाइत अछि। जे झूठ बजैत अछि आर हँसी-दिल्लगी करब जनैत अछि, कलियुग मे वैह गुणवान कहल जाइत अछि।

जे आचारहीन अछि आर वेदमार्ग केँ छोड़ि देने अछि, कलियुग मे वैह ज्ञानी आ वैह वैराग्यवान् कहाइछ। जेकर बड़का-बड़का नह आ लम्बा-लम्बा जटा (केश) छैक, वैह कलियुग मे प्रसिद्ध तपस्वी कहाइत अछि।

जे अमंगल वेष आ अमंगल भूषण धारण करैत अछि आर भक्ष्य-अभक्ष्य (खाय योग्य आ नहि खाय योग्य) सब किछु खा लैत अछि, वैह योगी, वैह सिद्ध आ वैह मनुष्य कलियुग मे पूज्य भ’ जाइत अछि।

जेकर आचरण दोसरक अपकार (अहित) करयवला छैक, ओकरे खुब गौरव होइत छैक आर वैह सम्मानक योग्य होइत अछि।

जे मन, वचन आ कर्म सँ लब्बर (झूठ बकबक कयनिहार) अछि, वैह कलियुग मे वक्ता मानल जाइत अछि।

हे गोसाईं! सब मनुष्य स्त्रीक विशेष वश मे होइछ आ बाजीगर केर बानर जेकाँ स्त्रीक नचेला सँ नाचैत रहैत अछि।

ब्राह्मण केँ शूद्र ज्ञानोपदेश करैत अछि आ गला मे जनेउ पहिरि कुत्सित दान लेल करैत अछि।

सब पुरुष काम आर लोभ मे तत्पर आ क्रोधी भेल करैत अछि। देवता, ब्राह्मण, वेद आर सन्त लोकनिक विरोधी होइत अछि।

अभागिनी स्त्री गुणक धाम सुन्दर पति केँ छोड़िकय परपुरुष केर सेवन करैत अछि। सोहागिन स्त्री तँ आभूषण सँ रहित होइत अछि, मुदा विधवा (पति सँ दूर) नित्य नव श्रृंगार करैत अछि।

शिष्य आ गुरु मे बहीर आ आन्हर वला हिसार रहैत छैक। एक शिष्य गुरु केर उपदेश केँ सुनैत नहि अछि, एक गुरु देखैत नहि अछि जे शिष्य केँ ज्ञानदृष्टि प्राप्त भेलैक वा नहि।

जे गुरु शिष्यक धन हरण करैत अछि, लेकिन शोक नहि हरण करैछ, ओ घोर नरक मे पड़ैत अछि।

माता-पिता बालक सब केँ बजाकय वैह धर्म सिखबैत छथि जाहि सँ पेट भरय।

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान केर सिवा दोसर बाते नहि करैछ, मुदा ओ सब लोभवश कौड़ीक दाम (बहुत कम लाभ) लेल ब्राह्मण आ गुरुक हत्या तक कय देल करैछ। शूद्र ब्राह्मण सँ विवाद करैत अछि आ कहैत अछि हम कि तोरा सँ कनिको कम छी? जे ब्रह्म केँ जनैत अछि वैह श्रेष्ठ ब्राह्मण थिक। एना कहिकय ओ सब डाँटिकय आँखि देखायल करैत अछि।

जे पराया स्त्री मे आसक्त, कपट करय मे चतुर आ मोह, द्रोह व ममता मे लेपटायल रहैछ, वैह मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म आ जीव केँ एक बतेनिहार) ज्ञानी होइछ।

४९. हम ओहि कलियुग केर यैह चरित्र सब देखलहुँ। ओ स्वयं तँ नष्ट भेले रहैछ, जे कियो कतहु सन्मार्गक प्रतिपालन करैत अछि, ओकरो सब केँ ओ सब नष्ट कय देल करैत अछि। जे तर्क कयकेँ वेदक निन्दा करैत अछि, ओहेन लोक कल्प-कल्प भरि एक-एक नरक मे पड़ल रहैत अछि।

५०. तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल आर कलवार आदि जे वर्ण मे नीचाँ अछि, स्त्रीक मरला पर अथवा घरक संपत्ति नष्ट भ’ गेला पर केश कटाकय संन्यासी भ’ गेल करैत अछि। ओ सब अपना केँ ब्राह्मण सँ पुजबाबैत अछि आ अपनहि हाथे दुनू लोक नष्ट कय लेल करैत अछि।

५१. ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख आर नीचाँ जातिक व्यभिचारिणी स्त्रीक स्वामी भेल करैत अछि। शूद्र नाना प्रकारक जप, तप आ व्रत करैत अछि तथा ऊँच आसन (व्यास गद्दी) पर बैसिकय पुराण कहैत अछि। सब मनुष्य मनमाना आचरण करैत अछि।

५२. अपार अनीति केर वर्णन नहि कयल जा सकैछ। कलियुग मे सब लोक वर्णसंकर आर मर्यादा सँ च्युत भ’ गेल। ओ पाप करैत अछि आ तेकर फलस्वरूप दुःख, भय, रोग, शोक आ प्रिय वस्तुक वियोग पबैत अछि। वेद सम्मत तथा वैराग्य आ ज्ञान सँ युक्त जे हरिभक्तिक मार्ग अछि, मोहवश मनुष्य ताहि पर नहि चलैछ आ अनेकों नव-नव पन्थ सभक कल्पना करैत रहैत अछि।

५३. संन्यासी बहुते धन लगाकय घर सजबैत अछि। ओकरा सब मे वैराग्य नहि रहि गेल, ओकरा विषय सब हरि लेलक। तपस्वी धनवान भ’ गेल आ गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुगक लीला किछु कहल नहि जाइत अछि। कुलवती आ सती स्त्री केँ पुरुष घर सँ निकालि दैत अछि आर नीक चालि छोड़िकय घर मे दासी केँ आनिकय राखि लैत अछि।

५४. पुत्र अपन माता-पिता केँ ताबते धरि मानैत अछि, जाबत धरि स्त्रीक मुँह नहि देखाय पड़लैक। जहिया सँ सासुर प्रिय लागय लगलैक, तहिया सँ कुटुम्बी शत्रुरूप भ’ गेलैक।

५५. राजा सब पाप परायण भ’ गेल, ओकरा सब मे धर्म नहि रहि गेलैक। ओ प्रजा केँ नित्यहु बिना अपराधक दण्ड दयकय ओकर विडम्बना (दुर्दशा) कयय करैत अछि।

५६. धनी लोक मलिन (नीच जाति केर) हेबाक बादो कुलीन मानल जाइत अछि। द्विजक चिह्न जनेउ मात्र रहि गेलैक आ नंगा शरीर रखनाय तपस्वी केर। जे वेद आ पुराण केँ नहि मानैछ, कलियुग मे वैह हरिभक्त आ सच्चा सन्त कहाइत अछि।

५७. कवि सभक त झुंडे भ’ गेल अछि, मुदा दुनिया मे उदार (कवि सभक आश्रयदाता) कतहु सुनाइयो नहि पड़ैत अछि। गुण मे दोष लगेनिहार बहुत अछि, मुदा गुणी कियो नहि।

५८. कलियुग मे बेर-बेर अकाल पड़ैत अछि। अन्न केर बिना सब कियो दुःखी भ’ कय मरैत अछि। हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनू! कलियुग मे कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह आर काम आदि (अर्थात्‌ काम, क्रोध आ लोभ) तथा मद ब्रह्माण्ड भरि मे पसरि गेल छैक। मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत आर दान आदि धर्म तामसी भाव सँ करय लागल। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहि बरसाबैत छैक आ रोपल बिया अन्न नहि उगबैत अछि।

५९. स्त्री सभक केशे भूषण थिक, बाकी ओकरा लोकनिक शरीर पर कोनो आभूषण नहि रहि गेल अछि आर ओकरा सब केँ भूख सेहो बड़ा जल्दी-जल्दी लगैत छैक, अर्थात् ओ सब सदिखन अतृप्ते रहैत अछि। ओ धनहीन आर बहुते प्रकारक ममता हेबाक कारण दुःखी रहैत अछि। ओ मूर्ख सुख चाहैत अछि, लेकिन धर्म मे ओकरा प्रेम नहि छैक। बुद्धि थोड़बे छैक आ सेहो बहुते कठोर छैक, ओहिमे कोमलताक भारी अभाव छैक।

६०. मनुष्य रोग सबसँ पीड़ित अछि, भोग (सुख) कतहु नहि छैक। बिना कारणे अभिमान आर विरोध करैत रहैत अछि। दस-पाँच वर्षक कनि टा’क जीवन छैक, मुदा घमंड एहेन छैक मानू कल्पान्त (प्रलय) होयबा धरि ओकर नाश नहि हेतैक। कलिकाल मनुष्य केँ बेहाल (अस्त-व्यस्त) कय देलक। कियो बहिनो-बेटी तक केर विचार नहि करैछ। लोक मे नहिये संतोष छैक, नहि विवेक छैक आ न शीतलते छैक। जाति, कुजाति सब कियो भीख माँगयवला भ’ गेल अछि। ईर्ष्या (डाह), कडुआ बोल आ लालच भरपूर भ’ रहल छैक, समता हेरा गेल छैक। सब लोक वियोग आ विशेष शोक सँ मरल पड़ल अछि। वर्णाश्रम धर्म केर आचरण नष्ट भ’ गेल छैक। इंद्रिय केर दमन, दान, दया आ समझदारी केकरहु मे नहि रहि गेलैक। मूर्खता आ दोसर केँ ठकनाय, यैह बहुत बेसी बढ़ि गेल छैक। स्त्री-पुरुष सब शरीरहि केर पालन-पोषण मे लागल रहैत अछि। जे पराया निन्दा करयवला अछि, पूरे संसार मे वैह पसरल अछि।

६१. हे सर्प केर शत्रु गरुड़जी! सुनू, कलिकाल पाप आ अवगुण सभक घर थिक, लेकिन कलियुग मे एकटा गुण बड पैघ छैक जे एहि मे बिना परिश्रमहि केँ भवबंधन सँ छुटकारा भेटि जाइत छैक।

६२. सत्ययुग, त्रेता आ द्वापर मे जे गति पूजा, यज्ञ व योग सँ प्राप्त होइत छैक, वैह गति कलियुग मे लोक केवल भगवान्‌ केर नाम सँ पाबि जाइत अछि। सत्ययुग मे सब योगी आ विज्ञानी होइत अछि। हरि केर ध्यान कयकेँ सब प्राणी भवसागर सँ तरि जाइत अछि। त्रेता मे मनुष्य अनेक प्रकारक यज्ञ करैत अछि आर सब कर्म केँ प्रभु केँ समर्पण कयकेँ भवसागर सँ पार भ’ जाइत अछि। द्वापर मे श्री रघुनाथजीक चरणक पूजा कयकेँ मनुष्य संसार सँ तरि जाइत अछि, दोसर कोनो उपाय नहि रहैत छैक। आ, कलियुग मे तँ केवल श्री हरिक गुणगाथा सभक गान कयले टा सँ मनुष्य भवसागरक थाह पाबि जाइत अछि। कलियुग मे नहि तँ योग आ यज्ञ छैक आ न ज्ञाने छैक। श्री रामजीक गुणगान टा एकमात्र आधार छैक। अतएव सबटा भरोसा त्यागिकय जे श्री रामजी केँ भजैत अछि आर प्रेमसहित हुनक गुणसमूह केँ गबैत अछि, वैह भवसागर सँ तरि जाइत अछि, एहि मे कनिकबो सन्देह नहि।

६३. नाम केर प्रताप कलियुग मे प्रत्यक्ष अछि। कलियुगक एक पवित्र प्रताप (महिमा) छैक जे मानसिक पुण्य तँ होइत छैक लेकिन मानसिक पाप नहि होइत छैक। यदि मनुष्य विश्वास करय तँ कलियुग समान दोसर युग नहि छैक, कियैक तँ एहि युग मे श्री रामजीक निर्मल गुणसमूह सब केँ गाबि-गाबिकय मनुष्य बिना परिश्रमहि केँ संसाररूपी समुद्र सँ तरि जाइत अछि।

६४. धर्म केर चारि चरण (सत्य, दया, तप आ दान) प्रसिद्ध अछि, जाहि मे सँ कलि मे एकटा दानरूपी चरण मात्र प्रधान अछि। जाहि कोनो प्रकार सँ दान कयला सँ कल्याण सुनिश्चित होइत छैक।

६५. श्री रामजीक माया सँ प्रेरित भ’ कय सभक हृदय मे सब युगक धर्म नित्य होइत रहैत छैक। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान आ मोनक प्रसन्न भेनाय, एकरा सत्ययुग केर प्रभाव जानी। सत्त्वगुण अधिक हो, किछुए रजोगुण हो, कर्म सबमे प्रीति हो, सब प्रकार सँ सुख हो, ई त्रेताक धर्म थिक। रजोगुण बहुते हो, सत्त्वगुण बहुत कम हो, किछु तमोगुण हो, मोन मे हर्ष आ भय हो, ई द्वापर केर धर्म थिक। तमोगुण बहुते हो, रजोगुण कम हो, चारू दिश वैर-विरोध हो, ई कलियुग केर प्रभाव थिक।

६६. पंडित लोकनि युग केर धर्म केँ मोन मे ज्ञान (चिन्हि) कय, अधर्म छोड़िकय धर्म मे प्रीति करैत अछि। जेकर श्री रघुनाथजीक चरण मे बहुते प्रेम छैक, ओकरा कालधर्म (युगधर्म) नहि व्यापैत (प्रभाव करैत) छैक। हे पक्षीराज! नट (बाजीगर) केर कयल गेल कपट चरित्र (इंद्रजाल) देखयवला लेल बड़ा विकट (दुर्गम) भेल करैत छैक, लेकिन नट केर सेवक (जम्भूरा) केँ ओकर माया नहि व्यापैत छैक।

६७. श्री हरि केर मायाक रचल दोष आ गुण श्री हरिक भजन बिना नहि जाइछ। मोन मे एना विचारिकय, सब कामना सब छोड़िकय (निष्काम भाव सँ) श्री रामजीक भजन करबाक चाही।

६८. हे पक्षीराज! वैह कलिकाल मे हम बहुते वर्ष धरि अयोध्या मे रहलहुँ। एक बेर ओतय अकाल पड़ि गेल, तखन हम विपत्तिक मारल विदेश चलि गेलहुँ। हे सर्प केर शत्रु गरुड़जी! सुनू, हम दीन, मलिन (उदास), दरिद्र आ दुःखी भ’ कय उज्जैन गेलहुँ। किछु काल बीति गेलाक बाद किछु संपत्ति पाबिकय फेर हम ओतय भगवान्‌ शंकर केर आराधना करय लगलहुँ।

६९. एक ब्राह्मण वेदविधि सँ सदा शिवजीक पूजा करथि, हुनकर दोसर कोनो काज नहि छलन्हि। ओ परम साधु आ परमार्थक ज्ञाता रहथि, ओ शंभु केर उपासक रहथि लेकिन श्री हरिक निन्दा करयवला एकदम नहि रहथि। हम कपटपूर्वक हुनकर सेवा करैत रही। ब्राह्मण बड़ा दयालु आर नीति केर घर छलाह। हे स्वामी! बाहर सँ नम्र देखिकय ब्राह्मण हमरा पुत्र समान मानिकय पढ़बैत रहथि। वैह ब्राह्मण श्रेष्ठ हमरा शिवजीक मंत्र देलनि आ अनेकों प्रकारक शुभ उपदेश कयलनि।

७०. हम शिवजीक मंदिर मे जाकय मंत्र जपैत छलहुँ। हमर हृदय मे दम्भ आ अहंकार बढ़ि गेल। हम दुष्ट, नीच जाति आ पापमयी मलिन बुद्धिक लोक मोहवश श्री हरिक भक्त आर द्विज सब केँ देखिते देरी जरि उठी आ विष्णु भगवान् सँ द्रोह करैत रही।

क्रमशः ऐगला अध्याय मे….

हरिः हरः!!