पान एलैये मखान एलैये केरा के बड्ड रास भार एलैये

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  • मिथिलाक लोकप्रिय गीत “पान एलैये मखान एलैये धिया के बियाह के समान एलैये” एहि गीत में एकटा पंक्ति अछि जे “भार एलैये, कुम्हार एलैये, गहना गुड़िया बनबै लेऽ सोनार एलैये” अर्थात भार आ भरिया केर सम्बन्ध मिथिलाक मांगलिक काज सँ जोड़ल जा सकैत अछि। भरिया केर शाब्दिक अर्थ होइत अछि जे भार अर्थात सामान लऽ जाइथ। पहिले केर जमाना मे जखन यातायात केर साधनक अभाव रहैत छलैक तऽ लोक दस – पन्द्रह किलोमीटर धरि पएरे चलि जाइत छल, ई हम सभ अपन आँखि सँ देखने छी जे हमरा गामक बरैई लोकनि पानक पात लऽ कऽ मधुबनी धरि पन्द्रह किलोमीटर भोरे चारि बजे जाइत छलाह आ संध्या काल धरि ओहिठाम सँ पानक पात बेचि कऽ आबि जाइत छलाह। ओहि समय मे लोक अपन सम्बन्धी केर ओहिठाम कोनो शुभ काज में यथा मुंडन, उपनयन, बियाह, द्विरागमन, पंचमी, मधुश्रावणी इत्यादि में सामान लऽ कऽ भरिया के पठवैत छलाह। मिथिला में भार आ भरिया केर प्रथा आदि काल सँ आबि रहल छल जे आब प्रायः पूर्ण रूपसँ समाप्त भ चुकल अछि। हमरा मोन अछि जे अपना ओहिठाम भरिया केर बड्ड सम्मान कयल जाइत छलैक। ओना सम्मान त मिथिला केर खूने में रमल आ बसल अछि तथापि बौआ केर सासुर सँ भरिया अएलाह अछि अथवा बुच्ची कए सासुर सँ भार लऽ क भरिया एलखिन्हें एकर एकटा अलग सम्मान होइत छलैक। भरिया के खुएवाक लेल सचार लगाओल जाइत छल कारण जे भरिया अपन गाम जा कऽ भोजन केर भरि पेट बड़ाई करैत छलाह। आब समयाभावक कारणे अथवा अन्य साधन के उपलब्ध होयवाक कारणे संगहि गाम में लोक केर अभाव सेहो एकटा एकर कारण भ सकैत अछि। हमर गाम बला भाई एकर पाछू एकटा अप्पन तर्क जोड़ि क कहलाह जे आब लोक पहिने केर अपेक्षा बेटी के सामान बेसी दैत छैक से भार पर पठौनाइ संभव नहिं छैक तेँ भरियाक आवश्यकता नहिं होइत छैक। मुदा हमरा ई तर्क बहुत युक्ति संगत नहिं लागल। एकटा ग्रामीण केर तर्क छलैन्ह जे आब अपना ओहि ठाम द्विरागमनक प्रथा लगभग समाप्त जकाँ भ गेल अछि तेँ भारक व्यवहार समाप्त भ गेल। पहिले उपनयन मे बरुआ, बरुआक माय बाप जे उपनयन में कपड़ा पहिरथिन से मामा गाम सँ अबैत छलैक, कपड़ाक संग दही, चूड़ा, खाजा, लड्डू आ केराक भार बरुआक मामा गाम सँ अबैत छलैक। शरद पूर्णिमा के राति में चन्द्रमा अपन सोलहो कला ल क उगैत छैथि। एहन मान्यता अछि जे शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा केर किरण सँ अमृत केर बूंद खसैत अछि। पूर्णिमा के राति क चांदनी में खीर बना क खूजल आकाश मे राखल जाइत अछि कारण चन्द्रमा केर अमृत युक्त किरण ओहि खीर पर पड़त आ खीर अमृतक गुण सँ परिपूर्ण भ जाएत। जकरा खेला सँ स्वास्थ्य के लेल अत्यंत लाभप्रद होयत। शरद पूर्णिमा के दिन द्वापर युग में श्रीकृष्ण गोपी सभक संग महारासलीला रचाओने रहैथि। शरद पूर्णिमा के राति में महालक्ष्मी केर पूजाक महत्व मानल जाइत अछि। पौराणिक मान्यता केर अनुसार शरद पूर्णिमा के राति में महालक्ष्मी माता भरि राति विचरण करैत छैथि। जे व्यक्ति एहि राति में महालक्ष्मी केर पूजा करैत छैथि आ अपन घर में आमंत्रित करैत छैथि हुनका ओहिठाम साल भरि धन वैभव केर कोनो कमी नहिं रहैत अछि। मिथिला में नव दम्पत्ति एहि दिन महालक्ष्मी केर पूजा करैत छैथि आ भरि राति जागि क चन्द्रमा केर रौशनी रूपी अमृत केर पान करैत अछि।

— कीर्ति नारायण झा