“लोकगाथा के लोक साहित्यक महाकाव्य कहल जा सकैत अछि।”

1420

— कीर्ति नारायण झा।   

“छाती तोहर देखियौ भैया, बज्जर रे केवाड़। पीठ तोहर लागौ भैया, धौलगिरी पहाड़। मोंछ तोहर अइंठल भैया, बहिंगा सन सन ठाढ। तोरा दिस जे ताकइ छी तऽ, लगइ छै अन्हार……” मिथिलाक प्रसिद्ध लोकगाथा लोरिक इ पांती मिथिलाक गाम – गाम में गुंजैत वीर रस सँ ओतप्रोत मिथिलाक सांस्कृतिक धरोहर के जगबैत अपन पताका फहरा रहल अछि। मिथिलाक गुआर जातिक पराक्रमी योद्धा के रूप में लोरिक के लोकगाथा मिथिला, नेपाल आ बुंदेलखंड में खूब प्रेम सँ गाओल आ सुनल जाइत अछि। कोनो साहित्य में जे स्थान महाकाव्य के होइत छैक स्थान आ महत्व लोकगाथा के होइत छैक। वास्तव में लोकगाथा के लोक साहित्यक महाकाव्य कहल जा सकैत अछि। महाकाव्य में नायक उच्च कुल के आ लोकगाथा में सामान्य कुल के होइत छैथि। कोनो सामान्य व्यक्ति अपन शौर्य, पराक्रम, त्याग आ बलिदान सँ गाथाक नायक बनि जाइत छैथि। मैथिली लोक साहित्य में प्रचलित लोकगाथा लोरिक के अतिरिक्त, सलहेस, दीनाभद्री, नैका – बनिजारा, सती विहुला, गरभू बाबा कमला- कोयला, शीतवसंत इत्यादि प्रमुख अछि। लोरिक गाथा मे तत्कालीन अन्यायी, अत्याचारी, दुराचारी सामंत योद्धा सभके अपन पराक्रम सँ लोरिक युद्ध करैत वीरतापूर्वक पराजित करैत छैथि तकर बृहत रूप सँ ब्याख्या कयल गेल अछि। तहिना राजा सलहेस के विषय में सेहो अछि। सलहेस दुसाध जातिक योद्धा के रूप में विख्यात छलाह जे दलित आ दुखित सभक कल्याण हेतु सदैव संघर्ष करैत रहलाह। दीनाभद्री सेहो बिहार आ नेपालक सीमांत प्रांत में मुसहर जातिक गाथा अछि। एहि प्रकारे समस्त लोकगाथा कोनो सामान्य जाति केर संघर्ष केर गाथा अछि जे पूर्व मे मिथिलाक गाम गाम मे मंच के द्वारा अथवा गहवर अथवा गामक भवन सँ गाओल जाइत छल। अपना सभक ओहिठाम पहिले सभ जाति एक दोसर के संग मिलि जुलि कऽ रहैत छल।जाति सँ बेसी गामक लोक ओकरा मानल जाइत छलैक। सभ एक दोसराक दुख आ सुख में भागीदार रहैत छल। कोनो लोकगाथा के आयोजन होइत छलैक तऽ गाम समाजक सभ सदस्य ओहि मे मोन सँ हिस्सा लैत छलाह। जातियता के जहर जहिया सँ राजनैतिक फायदा के वास्ते आरम्भ भेल ताहि दिन सँ लोकगाथा के स्थिति आस्ते आस्ते खराब होइत गेलैक ।समाज के जातियता के आधार पर बांटि देल गेलैक संगहि गाम सँ पलायन के कारण लोकगाथा पर बहुत खराब प्रभाव पड़लैक। आब आस्ते आस्ते लोक लोकगाथा के बिसरि रहल अछि। लोकगाथा गाबय बला के सेहो आब कमी भेल जा रहल छैक। आ आब जे पहिले उत्सव जकाँ वातावरण रहैत छलैक ओहो में आस्ते आस्ते कमी देखल जा रहल छैक।