“पग-पग पोखरि माछ मखान, सरस बोली मुस्की मुख पान”

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— कीर्ति नारायण झा।     

पग पग पोखरि माछ मखान, सरस बोलि मुस्की मुख पान
विद्या वैभव शान्तिक प्रतीक, ललित नगर दरिभङ्गा थिक।
मिथिला आ पोखरिक घनिष्ठ सम्बन्ध अछि कारण एहि ठामक दू टा प्रसिद्ध वस्तु पोखरिक माध्यम सँ भेटैत छैक, एकटा मखान आ दोसर माछ। माछ आ मिथिला सेहो एक दोसर के पूरक थिक। मिथिलाक लोक माछ के मात्र खयवाक वस्तु नहिं बुझैत छैथि, एकरा शुभ संकेत के रूप में सेहो उपयोग कयल जाइत छैक। माछ देखि कऽ यात्रा मिथिलावासी अत्यंत शुभ मानैत छैथि। एहि ठाम बिवाह करवा लेल बर जखन आंगन सँ निकलैत छैथि तऽ हुनका आगू में जीवैत माछ के देखाओल जाइत अछि आ ओकरा देखि कऽ शुभ मानैत बिवाह करवाक लेल जाइत छैथि। मिथिलाक पेंटिंग आ चित्रकला में माछ के बहुत बेसी महत्व देल जाइत छैक। कोहवर घर में सेहो माछक चित्र बनाओल जाइत अछि। मिथिलाक स्त्रीगण सामा चकेबा के पावनि में सेहो माटिक माछ बनबैत छैथि। शुभ संकेत के रूप में माछ के मानल जाइत छैक समस्त मिथिला में।. हरि हऔ जन्म कियए देल? रौहु माछक कुटिया जखन कंठ तर नै गेल? मैथिली भाषाक प्रख्यात कथाकार स्वर्गीय हरिमोहन झा के खटर कक्काक तरंग में मिथिला आ माछक अन्योन्याश्रय सम्बन्ध के देखाओल गेल अछि जाहिमे पात्र खटर कक्का के कियो माछक नओत देबय अबैत छैन्ह तऽ ओ कहैत छथिन्ह जे नेबो अछि की बाड़ी सँ लऽ कऽ चलू? एकर अतिरिक्त हुनक अद्भुत विचार जे जाहि दिन माछ खाइ ओहि दिन पूर्णिमा आ जाहि दिन नहिं खाइ ओहि दिन अमावास्या। सौभाग्यवश हमहुँ ओहने परिवार सँ अबैत छी जिनकर पिता के तीन टा पोखरि, एक टा में मखान आ दू टा माछ पोसल जाइत अछि। हमरा सभक ओहिठाम माछ के बड्ड प्रचलन। एखन साओन भादव में हमरा सभक ओहिठाम उजाहि के माछ खूब भेटैत छैक।अपने मिथिला सँ बाहर रहैत छी आ एहि ठाम कहल जाइत छैक जे साओन मासमे माछ नहिं खयवाक चाही मुदा मिथिला में सभ सँ बेसी माछ एही मास मे भेटैत छैक कारण बरखा में पोखरि सभ में पाइन भरैत छैक आ पोखरिक माछ ओहि पानिक प्रवाह में पोखरि सँ बाहर निकलवाक प्रयास करैत अछि आ मलाह लोकनि ओकरा पकड़ि लैत छैथि। मिथिला मे रंग विरंग के माछ पाओल जाइत छैक। साफ पाइन में रौह, भाकुर, नैनी, पोठी, मारा इत्यादि आ कारी पानि में अर्थात मखान बला पोखरि मे कबैइ, गरैइ, बुआरी, सिंगही, मांगुर टेंगरा इत्यादि भेटैत छैक।मिथिलाक लोक माछ बनेबा मे अत्यंत पटु होइत छैथि कारण आ बच्चे सँ अपन घर में माछ बनेवाक विधि देखैत देखैत प्रशिक्षित भऽ जाइत छैथि। एखन मिथिला में मखान केर संग संग माछक व्यापार मिथिलावासी के लेल जीवनक आधार छैक। माछक बजार सेहो दिनानुदिन पैघ भेल जा रहल छैक। दरभंगा सँ लऽ कऽ पटना धरि माछक एतेक खपत छैक जे सभटा माछ छुहुका जकाँ बिका जाइत छैक। मिथिला मे माछ के काज आदमी के मुइला के पश्चात सेहो श्राद्ध स्थली पर पितर के निमित्त देल जाइत छैक। माछ सँ एतेक बेसी लगाव जे एक आदमी नओत देबय अयलखिन बीचे जजात दऽ कऽ कि पंडित जी कहलखिन जे एह। सुझैत नहिं छऽ जे खेत में खेरही बाउग कयल गेल छैक? ओ आदमी जबाब दैत छथिन्ह जे बाबा। माछक नओत देबऽ अहाँ के आबि रहल छी तऽ पंडित जी कहैत छथिन्ह जे अच्छा। कोनो बात नहिं, अहाँ बीचे खेत दऽ कऽ आउ… एतेक प्रेम मिथिलावासी के माछ सँ….