“मधुश्रावणी पाबनि”

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— अखिलेश कुमार मिश्र।   

सभ सँ पहिने मधुश्रावणी शब्दक अर्थ बुझु। मधुश्रावणी दू शब्दक जोड़ सँ बनल अछि। मधु मतलब शहद आ श्रावणी अर्थात साओन में। सभ मिला कs इ बात भेल जे, जे काज या त्यौहार साओन में हो या मधु जेकाँ मीठ अर्थात मधु जेकाँ प्रिय हो, ओ भेल मधुश्रावणी। होबाको चाही। सभ सँ बेसी बिरह तs ऐह दू मास में सतबैत अछि, चाहे ओ मधुमास (वसंत) हो या साओन हो। मिथिलाक जे भौगोलिक स्थिति अछि ताहि में साओन बेसी पीड़ादायक अछि (बिरह कें दृष्टिकोण सँ)। तs अपनसभक पूर्वज एहि स्थिति सँ निपटै के लेल साओन में एक त्यौहार एहेन कs देलैथि जाहि में नवदम्पति चौदह पंद्रह दिन के लेल साथ में रहथि। हमरा हिसाबे तs इ व्यवहारिक दृष्टिकोण भेल। आब एकर धार्मिक महत्ता बुझल जाव।
मधुश्रावणी त्यौहार साओन महिनाक शुक्लपक्षक तृतीया तिथि कs मनाओल जाइत अछि। मुदा नवदम्पति के लेल एहि पूजाक शुरू साओन के कृष्णपक्षक पंचमी सँ शुरू भs जाइत अछि। मिला जुला कs कुल चौदह दिनक इ पूजा होइत अछि। कुनो कुनो बेर तेरह वा कुनो बेर पन्द्रह दिनक सेहो भs जाइत अछि। मुदा चौदह दिनक चौदह अलग कथा कें प्रावधान अछि, तैं चौदह दिन मानू। ओना मालेमासक कारण सं एहि बेर इ पुजा ढेढ महिनाक भेल अछि। पूजा जे पंचमी दिन सँ शुरू होइत अछि ओहि में गौरी, गणेश, शंकर आ विषहरि के पूजा होइत अछि। विषहरि मतलब पाँच नागिन कें रूप छैन्ह जिनका मिथिला में माता गौरी के पुत्री मानल गेल अछि। इ पूजा विशेष एहि लs कs जे मिथिलांचल में साओन में सौँसे पानि भरि जाइत तs सर्प आ सर्पदंशक प्रकोप सेहो बढ़ि जाइत अछि। तैं हुनकर पूजाक अलग महत्व।
एहि त्यौहार कें मनेबाक परम्परा लेल एक अलग कथा प्रचलित अछि। जाहि में एक श्रीकर नामक राजा रहथि। हुनक पुत्रीक (राजकुमारी) लग्न बढिया नै रहनि। हुनकर कुंडली में अपनसौतिन कें पोखड़ि में सँ माँटि कोरब लिखक रहैन्ह। राजा बड़ चिंतित भेलाह जे पुत्री एहेन कष्ट, एक तs सौतिन आ ऊपर सँ ओक्कर पोखड़ि सँ माटि निकालनाइ, कोना सहती। सोचैत सोचैत राजा बीमार भs कs स्वर्गलोक सिधारि गेलाह। हुनकर पुत्र चन्द्रकर जेखन इ बात बुझलक तs अपन बहिनक लेल जंगल मे सुरंग बनबा देलथि जेतय कियो नै जा सकै आ भोजन तथा दासी सभ कें सेहो व्यवस्था कs देलैथि। लेकिन लिखलाहा कतौ टलै छै। एक राजा सुवर्ण नामक, शिकार खेलाइत रास्ता भटकि गेलाह। बड़ प्यास लगलैन्ह तs पानि के खोज में रहथि। चुट्टी सभ कें मुंह में अन्न देखि ओहि धारी सँग पहुंच गेलाह सुरंग में जतय ओ राजकुमारी रहैत रहथि। हुनका देखि दुनू में प्रेम अंकुरित भेलैन्ह आ दुनू विवाह कs लेलथि। किछु दिनक बाद राजा सुवर्ण अपनराज काज लेल वापस आबि गेलाह आ संगहि राजकुमारी कें वचन देलथिन्ह जे हम अहाँ लेल सभ किछु भेजि देब। किछु एहेन संयोग जे राजा राज काज में बड़ व्यस्त भ गेलाह। मुदा छोटकी कनियाँ लेल वस्त्र आदि पूजा सामग्री सभ एक कौवा द्वारा भेजि देलाह। बीच मे जेखन हुनकर बड़की कनियाँ के इ पता लगलैन्ह जे किछु उपहार छोटकी लेल भेजल जा रहल अछि तs ओहि चुनरीक ऊपर पैर के निशान बना लिखि देलथि आ “झोंटा हाथ, पीठी लात” लिखि देलथि। मतलब अगर एतय एलै तs एहने व्यवस्था रहतौ। आ तकर बाद चुनरी बढिया सँ मोड़ि देलथि जाहि सँ इ लिखावट राजा नै देखथि। खैर, कौवा रास्ता में भोज देखि ओतय आंठि खाइ लेल चलि गेल आ सँभ किछु बिसरि गेल। एतय राज कुमारी कें किछु नै भेटलैन्ह तs कहुना कs मधुश्रावणी में माँ गौरी कें पूजन केलथि आ वरदान लेलथि जे अगर राजा सुवर्ण सँ भेंट होइत तs हम बौक भs जाइ। ओमहर विवाहक पता चलला के बाद हुनकर भाइ चन्द्रकर खूब क्रोधित भेल जे भोजन आ वस्त्र सभ भेजनाइ बन्द क देलक। अंत मे एहेन भेल जे खाइ पर आफ़द। अंत मे नै रहल भेलनहि तs अपन खबासिन सँग बगल में जतय एक पोखड़ि खुनाइत छल, ताहि में मजुरी लेल गेलीह आ पोखड़ि सँ माटि निकालs लागलीह। इ पोखड़ि हुनके सौतिन के छलैन्ह। संयोग एहेन जे ओहि दिन राजा सुवर्ण सेहो पोखड़ि देखs ऐलाह। तहन ओ राजकुमारी कें माटि निकालैत देखि चिन्हि गेलाह आ अपन राजमहल लs गेलाह। कौवा के बजा कs पुरनका संदेश ढूंढ़लाह। ओहि में चुनरी पर लिखल सन्देश देखि आगि बबूला। सभ बात जाइन बड़की रानी कें मृत्युदंड देलथि। मुदा छोटकी तs बौक। फेर अगिलका साल इ नीक सँ मधुश्रावणी में गौरी पूजा केलथि तs हुनकर आवाज फेर सं आबि गेलैन्ह। ताहि दिन सँ एहि व्रत पूजाक महत्व बढ़ि गेल।
साओन के पंचमी दिन सँ शुरू पूजा में नव विवाहिता भोर में गौरी आ अन्य सभ कें पूजा करै छथि आ दिन में कथा सुनलाक बाद सजि-संवरि कs सखी सभ संगे फूल लोढ़s लेल जाइ छथि। वैह बसिया फूल पात सभ सँ अगिला दिन पूजा होइत अछि। एहि बीच में सभ दिनक भोजन पूर्णतया सासुर के अन्न सं होइत अछि आ वस्त्र सेहो सासुर के रहैत अछि। इ चौदह पंद्रह दिन पूजा में नवविवाहिता (मतलब जिनकर विवाहक प्रथम वर्ष छैन्ह) अपन नैहर में रहैत छथि। प्रत्येक दिन गीत, हास परिहास सँग पूजा, सभ दिनक कथा अलग अलग अलग होइत अछि। गौरीक पूजन मुख्यतया माटिक बनल हाथी के ऊपर कैल जाइत अछि जे अत्यंत शुभकारी मानल गेल अछि जे पति कें ज्यादा उम्र के लेल होइत अछि।
अन्तिम दिन अर्थात मधुश्रावणी दिन नवकनियाँ अपन वर आ विधिकरी सँग पूजा करै छथि। विवाह, चतुर्थी के बाद वर के द्वारा पुनः एक बेर सिंदूरदान होइत अछि। एकर बादे विवाह कें पूर्ण मानल गेल अछि। तदुपरान्त कनियाँ कें ठेहुन के ऊपर पानक पात राखि ऊपर सँ दीपक टेमी सँ हुनका तीन बेर दागल जाइत अछि। जे कनि कष्टकर तs अछि मुदा नवकनियाँ अपन उमंग में कष्ट साफे बिसरल रहैत छथि। मान्यता तs इ अछि जे, जेकर फोंका जतेक पैघ तिनका वर ओहिना बेसी मानथिन्ह। दिन-राति अनुने भोजन कैल जाइत अछि। एहि दिनक पूजा में वरक सिर्फ सहभागिता मात्र रहैत अछि। सभ विधि खाली कनियाँ टा करै छैथि। एहि दिन नवकनियाँक अतिरिक्त जे सधवा स्त्री छथि सेहो अनुना राखै छथि आ गौरीक पूजन करै छथि। पंचमी आ मधुश्रावणी में वर ओतय सँ कनियाँ ओतय भारs सेहो आबैत अछि खास कs मधुश्रावणीक भार में तs कनियाँ पक्षक नजदीकक सम्बन्धी तक लेल कपड़ा (सिर्फ स्त्रीगण लेल) सेहो आबैत अछि।
एहि त्यौहारक तs खासियत ऐह अछि जे एक संदर्भ सँ बुझु। हमरा विवाह वर्ष नव नौकरी के चलते छुट्टी के कमी रहै। स्थिति एहेन रहै जे जदी मधुश्रावणी में दिल्ली सँ गाम जायब तs कोजागरा में गाम गेनाइ मुश्किल। तs हम एहि बारे में अपन बड़का भाइजी सँ पुछलौं जे की करी। ओ कहला जे बेशक अहाँ कोजागरा में गाम नै जैब तs कुनो बात नै, मुदा मधुश्रावणी में अवश्य जाउ। बाद में हम छुट्टीक व्यवस्था कs कs मधुश्रावणी आ कोजागरा दुनू में गाम गेलौं। मुदा एक शौख पूरा नै भेल जे पंचमी सँ मधुश्रावणी धरि लगातार पंद्रह दिन तक कनियाँ सँग रहितौ । वर कें सासुर में जे आतिथ्य होइत छैन्ह जाहि में कनियाँक सखी आ गामक अन्य स्त्री संगक हास परिहासक संग उत्तम भोजन सेहो भेटैत छैन्ह। बरसात में बिना किछु मिहनत कें सासुरक भोजनक आ गप्प सप्प संगे हास्य विनोद, पूर्णतया वंचित रहलौं ।