“साहित्य समाजक दर्पण अछि”

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— कीर्ति नारायण झा।       

साहित्य समाजक दर्पण अछि, जिनगी के सभ पक्ष केर अर्पण अछि, किछु ओझरायल पक्ष के भेद खोलैत अछि, समाज में जे देखैत अछि वेएह बजैत अछि, ओ साहित्य जे मनुख के समस्त आशा आ आकांक्षाक सफलता आ असफलता के हमरा सभक समक्ष आनि दैत अछि, वास्तव में असली साहित्य वेएह होइत अछि। डाक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपरोक्त विचार साहित्य आ समाज में एक दोसर सँ गूंथल सम्बन्ध के परिभाषित करैत अछि। कोनो समाज, कोनो राज्य अथवा कोनो प्रदेशक स्थिति केहेन अछि ओकरा जनवाक लेल ओहि ठाम केर साहित्य के अध्ययन कयला सँ पता चलि जाइत अछि। साहित्य के कर्तव्य मात्र ज्ञान देनाइ नहिं अपितु नव वातावरण देनाइ सेहो होइत अछि आ ओहि वातावरण सँ नव समाज केर निर्माण होइत छैक जे सर्वथा अनुशासित, परोपकारी आ मधुर सम्बन्ध सँ ओत प्रोत होइत छैक बशर्ते साहित्य सम्वेदनशील होअय अन्यथा एकर विपरीत सेहो होइत छैक जँ साहित्य असंवेदनशील होअय। साहित्य के अध्ययन सँ आदि काल में मिथिलाक समस्त विभव के विषय में स्पष्ट जानकारी भेटैत अछि।भारतीय स्वाधीनता संग्राम में साहित्य के महत्व बहुत बेसी छलैक तहिना समाज में एक दोसर के संग सम्बन्ध, सामाज के प्रति उत्तरदायित्व, सामाजिक सद्भावना आ पथ प्रदर्शन समस्त भाव के शिक्षा ओहि ठाम के साहित्यकार द्वारा साहित्य के माध्यम सँ पसरल जाइत छैक। जँ साहित्य एक दोसर सँ जातीय विद्वेष आ भेदभाव के उजागर करवाक लेल लिखल जाइत छैक तऽ ओकर परिणाम सेहो ओहने होइत छैक। साहित्य जेहेन परसैत अछि समाज ओहने ओकरा स्वीकार करैत अछि। साहित्य जँ आस्था के संचार करैत अछि तऽ समाज आस्थावान होइत अछि आ जँ साहित्य फूहरवाजी भाव के वर्णन करैत अछि तऽ समाज तदनुकूल ओकरा स्वीकार करैत अछि। अपना सभक साहित्य में अयाची मिश्र के विषय में लिखल छैन्ह जे ओ कहियो किनको सँ याचना नहि कएलन्हि। विद्वान के बीच दीर्घ काल धरि शास्त्रार्थ होइत छलैन्ह। सौराठ सभा के विषय में लिखल गेल छैक जे ओहि सभा में पहिले पैघ पैघ विद्वान सभ उपस्थित होइत छलाह आ सभक बीच शास्त्रार्थ होइत छलैक आ ओहि में जे विद्वान लोकनि चूनल जाइत छलाह हुनका लोक अपन जमाय के रूप में स्वीकार करैत छलाह आ एहि कारणे सौराठ सभा के महत्व मिथिला में बहुत बेसी छलैक मुदा बाद मे साहित्यकार द्वारा ओहिठाम मौद्रिक लेन देन के बात लिखल गेल तकर प्रभाव एहि सभा में स्पष्ट रूप सँ देखल जा सकैत अछि। साहित्य पर समाज शत प्रतिशत विश्वास करैत छैथि तें साहित्य में जे उचित अनुचित लिखल रहैत अछि समाज के चरित्र निर्माण तदनुसार होइत छैक। अश्लील साहित्य समाज के गर्क में मिला दैत छैक तें समाज मे सद्भाव पूर्ण वातावरण के निर्माण करवाक वास्ते स्वच्छ आ विवेकपूर्ण साहित्य के लिखनाइ परमावश्यक अछि। घर में एक दोसर सदस्य केर संग कोन तरहक सम्बन्ध होयवाक चाही ई सभटा साहित्य सीखवैत छैक तेँ जँ साहित्य के समाजक दर्पण कही तऽ कोनो अतिशयोक्ति नहि हेएत।