हम आबि रहल छी – मैथिली धारावाहिक भाग १३ आ १४

मैथिली धारावाहिक – हम आबि रहल छी

– रबीन्द्र नारायण मिश्र

हम आबि रहल छी भाग- तेरह/चौदह

13

गंगा आ दीपेंदु चलि जाइत छथि । हम दलानपर ओछाओल पटिआपर ओहिना बैसल रहि जाइत छी । हमर हाथमे दीपेंदुक देल लिफाफा अखनो ओहिना अछि । लिफाफा नीकसँ साटि देल गेल अछि । ओहिमे बेस मोट किछु कागज धएल बुझाइत अछि ।

“एतेक मोट तँ चिट्ठी नहि भए सकैत अछि । जरूर किछु आओर अछि।”

मोनमे तरह-तरहक अंदेसा होइत अछि, डर होइत अछि। लिफाफा खोलबाक साहस नहि होइत अछि । हम पटिआपर ओंघरा जाइत छी । लिफाफाकेँ सिरमामे राखि लेने छी । पटिआपर पड़ले-पड़ल तरह-तरह के बातसभ सोचा रहल अछि । आँखिसँ निरंतर अश्रुपात भए रहल अछि । पटिआ नोरसँ भिजि गेल अछि। हम मोने-मोन सोचैत रहैत छी – “इएह ओ स्थान थिक जतए एकदिन केहन सुरम्य वातावरण रहैत छल। शंकर, हीरा आ हुनकर माए दौरि कए हमर स्वागत करैत छलीह। हम शनिदिन दरभंगाक इसकुलसँ छुट्टी भेलाक बाद गाम अबैत छलहुँ । सोम सँ शनिदिनक यात्राक अंतमे गाम अएबाक एकटा गजबकेँ आनंद मोनमे रहैत छल । शंकरक हेतु लबनचूस, हीराक हेतु अलता, पत्नीक हेतु कहिओ साड़ी, कहिओ चुड़ी, कहिओ किछु लेने अबैत छलहुँ । एकबेर जखन हम हुनका हेतु सोनाक चुड़ी लए गेल रही तखनका दृश्य देखैत बनैत छल । ओना ओ अपना लेल कहिओ किछु नहि मंगलीह, कहिओ किछु नहि कहलीह, कहिओ कोनो उपराग नहि देलीह । तहिओ नहि जहिआ हम हुनकर नैहरमे देल गेल गहनासभ पारिवारिक परिस्थितिक कारण बेचि देने रहिअनि । हम एकबेर इशाराटा केलिअनि आ ओ सभटा गहना देहमे सँ नोचि कए फेकि देने रहथि, सहर्ष ।

“हमर गहना अहाँ छी, हमर गहना शंकर आ हीरा अछि। एहि गहनासभक आगू सभकिछु मलिन अछि । ककरो कोनो महत्व नहि।” – ओ बाजल रहथि ।

हम ओहि गहनाकेँ दरभंगा सहरक नामी गहनाक दोकानपर बेचि देने रही । किएक? हमर भतीजीक बिआह होइतैक। बर अएबे नहि करैक । ओकर पिता अड्डी गारि देलखिन जे जाबत हमरा पूरा टाका नहि भेटि जाएत ताबत हमसभ बिआह करए नहि आएब । आब अहीं कहू, एहनमे की कएल जाइत? पूरा परिवारक प्रतिष्ठा दावपर लागल छल । ततबे नहि हमर भतीजीक जिनगीक सबाल छलैक । बहुत नीक घर-वर भेटि रहल छलैक । हम जखन अपन श्रीमतीजीक गहना बेचि कए भाइकेँ टाका देलिअनि तँ ओ जोरसँ सांस छोड़ने रहथि। कृतज्ञतासँ बड़ीकाल धरि हमरा दिस तकैत रहि गेल रहथि । हमर भतीजी बिआह नीकसँ भए गेल । बरिआतीसभ संतुष्ट भए वापस भेलाह । बर-कनिआ बहुत प्रसन्न रहथि । हुनकासभक आनंद देखि हमरो बहुत प्रसन्नता भेल रहए । हमर श्रीमतीजीक तँ बाते नहि पुछू । ओ तँ दिन-राति एक कए देने रहथि । घरसँ बाहर धरिक काज करैत रहि गेल रहथि। मुदा हुनकर छुच्छ देह देखि हमरा मोनमे बहुत अपराधबोध होइत छल।

चतुर्थीक प्रात हम अपन पुरनका साइकिलपर दरभंगा बिदा भेल रही । अन्हरोखे भात, दालि, तरकारी, दही खुआ कए ओ हमरा बिदा केने रहथि । लोटामे पानि भरि कए ओ हमर शुभयात्राक कामना करैत रहथि । हम साइकिलपर चढ़बा काल हुनकर खाली देह देखि मोने-मोन संकल्प केने रही जे जाबे हुनकर सौंसे देह गहनासँ छारि नहि देब, ताबत चैन नहि लेब । मुदा एहि संकल्पकेँ सफल हेबामे जिनगी बीति गेल । आइ-काल्हि करैत रहलहुँ । हमर दरमाहा बढ़ैत गेल । इसकुलमे पद बढ़ैत गेल । हम आब इसकुलक प्रधानाचार्य भए गेल रही । पर्याप्त दरमाहा भेटि रहल छल । हम कैकबेर हुनका कहबो करिअनि – “चलू, अहाँ लेल गहना लेबाक अछि ।” मुदा ओ टारि देथि । बहुत जोर दिअनि तँ कहि दितथि – “आब कथी अछि जाहिपर गहना पहिरब? सभ काजक समय होइत छैक । जखन मोन रहए तखन से भेल नहि । आब जँ गहना लइओ लेब तँ होएत की? लाकरक शोभा बढ़बैत रहत । फेर समय-सालसे बहुत खराप भए गेल अछि । गहना पहिरि कए बाहर नहि निकलि सकैत छी । कखन के छिनि लेत, विरोध केलापर जान लए लेत तकर कोनो ठेकान नहि । भने देह खाली अछि । मोन निचैन लगैत अछि ।”

हमरा इसकुलमे प्रतिष्ठा नित्यप्रति बढ़ैत गेल । नीक शिक्षकक पुरस्कार राष्ट्रपतिक हाथे भेटल । समाजमे प्रतिष्ठित भए गेलहुँ । शंकर आ हीराकेँ अपने इसकुलक छात्रावासमे राखि  पढ़बए लगलहुँ । दुनू भाइ बहिन बहुत  नीक नंबर आनथि । हमर छाती मजगुत होइत गेल । मैट्रिक परीक्षामे दुनू भाइ-बहिन बिहार भरिमे उच्चस्थान प्राप्त कएलाह । शंकरक नाम पटनाक नामी साइंस कालेजमे लिखाओल गेल । हीराक नाम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे लिखाओल गेल । दुनूगोटेक खर्चा एकहि संगे होइत रहल । तथापि हमसभ बहुत आनंदमे रही। सोची – “दुनूबच्चा पढ़ि-लिखि जाएत तकरबाद कथुक कमी नहि रहि जाएत । जे चाहब सएह होएत ।”

समयक चक्र आगू बढ़ल । हम प्रधानाचार्यक पदसँ सेवानिवृत्त भए गेलहुँ । दुनू बच्चा शिक्षा समाप्त कए नीक-नीक स्थानपर पहुँचि गेलथि । शंकर दिल्लीमे सरकारी अधिकारी भए गेलाह । हीरा कलकत्तामे डाक्टर भए गेलीह । हम दुनूगोटे बहुत प्रसन्न रही । जे सपना छल से पूरा होइत बुझाएल । जीवन भरिक परिश्रम सार्थक भेल लगैत रहए। “आब हम निश्चिंत भए दुनिआसँ जा सकैत छी ।” – हम हुनका कहिअनि ।

“दुर्र जाए दिअ । अहाँकेँ सदिखन उल्टे सोचाइत रहैत अछि । अखन अहाँक की बएस भेल अछि? आबे तँ सुखक समय आएल अछि ।”

हम कहिअनि – “नहि बाजू । अपनो बातक आँखि लागि जाइत छैक । ओ हँसि देथि आ काजमे लागि जाथि । मुदा भेल सएह । समयके हमर सुख नहि देखल गेलैक । ओकर चक्र घुमल। तकरबाद तँ की-की ने भेल । साइते हम ओ सभ सोचने रहल होअब । बाह रे भाग्य! की-की तमासा करैत रहलह?”

हम लिफाफा माथ तरमे धेने पड़ले छलहुँ की ओकील  अएलाह । कोर्टसँ वापस आबिए रहल छलाह । थाकल, झमारल घरमुँहा रहथि । हमरा ओना उदास पड़ल देखि साइकिलकेँ ठामहि ठार कए हमरा लगमे आबैत छथि । हम हुनकर आहट नहि सुनि सकलहुँ । सोचैत-सोचैत आँखि लागि गेल रहए । ओकील  चुपचाप हमरा बगलमे बैसि जाइत छथि । झोरामेसँ पनबट्टी निकालैत छथि । अपनेसँ पान बनबैत छथि आ हमरा उठेबाक प्रयास करैत छथि –

“भैया! पान बनओने छी ।”

पानक नाम सुनितहि हम फुरफुरा कए उठि जाइत छी । माथ तरसँ लिफाफा सरकि जाइत अछि । ओकीलक  दृष्टि ओहि लिफाफापर पड़ैत छनि । हमरा दिस पान बढ़बैत कहैत छथि-

“ई कथी अछि?”

“की जाने गेलिऐक की छैक? दिल्लीसँ शंकर दीपेंदुक हाथे पठओलाह अछि। तखनसँ पड़ले छी । लिफाफा खोलबाक साहस नहि भए रहल अछि ।”

“से किएक? लिफाफामे कोनो बम थोड़े हेतैक?”

“कए बेर शब्द बमोसँ बेसी खतरनाक आ कष्टकर भए जाइत अछि ।”

“मुदा वस्तुस्थितिकेँ झँपलासँ कोनो समाधान तँ होएत नहि। लिफाफा खोलि कए देखिऔक तँ जे ओहिमे अछि की? शंकर की चाहैत अछि? भए सकैत अछि कोनो नीके बात होइक।”

“से बात तँ बुझलहुँ । मुदा हमर मोने संग नहि दए रहल अछि । हम थाकि गेल छी । सौंसे दुनिआसँ तँ पार पाबि सकैत छी मुदा अपन बेटासँ पार पाएब बहुत मोसकिल अछि । एहीसभसँ दुखी भए तोहर भौजी हमरा गंगोत्री लेने चलि गेल रहथि आ ओतए कहि नहि कतए बिला गेलीह ।”

एतेक बात बजैत-बजैत हमर अबाज अवरुद्ध भए गेल। आँखिसँ नोर झहर-झहर खसए लागल । ओकील मोसकिलमे पड़ि गेलाह । लगमे बैसि किछु कहबाक प्रयास करितथि की हम भावनामे लटपटा गेलहुँ। हमर स्थिति देखि कहैत छथि-

“अहाँ परेशान नहि रहू । हम लिफाफा लेने जाइत छी। घर पहुँचि चैनसँ पढ़बैक । तकरबाद अहाँसँ विस्तारसँ गप्प करब। ताबत अहाँ विश्राम करू । परेशान नहि रहू । आइ-काल्हि ई हवे बहि गेलैक अछि । कोनो अहींटा एहि स्थितिमे छी से बात नहि छैक । घरे-घर बूढ़सभ असहाय पड़ल अछि । केओ एकलोटा पानि देनहार नहि छैक । अहाँक लेल तँ कम सँ कम हमसभ हाजिर छी।”

हम बकर-बकर हुनका देखैत रहलहुँ, सुनैत रहलहुँ । ओकील  लिफाफा लए साइकिलपर चढ़ि बिदा भए जाइत छथि। ओ अपन दलानपर पहुछलथि । ताहिसँ पहिनेसँ मुखिआ ओतए पहुँचल रहथि। हुनका देखितहि ओकीलक कान ठाढ़ भए जाइत अछि ।

“बात की छैक? ई मुखिआ तँ घमंडे चूर रहैत छल । बजअलोपर नहि अबैत छल । ककरोसँ कहबा दैत –

“बीडीओ साहेबक ओहिठाम गेल छथिन ।”

एकदिन तँ ओकील ओकरा झूठ बजैत सद्यः पकड़ि लेने रहथि । ओ छल अपने घरमे । ओ जखन ओकरा ओहिठाम गेलाह तँ  ओकर भतीजी कहैत अछि –

“ओ तँ अन्हरोखे कतहु चलि गेलखिन ।”

“मुदा हुनकर साइकिल तँ एतहि छनि ।”

“ककरो संगे मोटर साइकिलपर गेलखिन ।”

एतेक सिखा-पढ़ा कए ओ नान्हिटा नेनाकेँ ओकील  लग पठओने रहए । मुदा ओहो ठहरलाह ओकील । बात सँ बात निकालब हुनकर धंधा छलनि । जेबीसँ चाकलेट निकालि कए ओहि बच्चाकेँ देलखिन कि ओ बच्चा तुरंते बकए लगलैक –

“काका घरेमे छथिन । अहाँकेँ देखितहि हमरा सिखा-पढ़ा कए पठा देलाह ।” ओकील सोझे केबारमे धक्का मारलाह । सामनेमे मुखिआ ठाढ़ तमाकुल चुना रहल छल । ओ ओकीलक तमसाएल मुद्रा देखि अपसियांत भए गेल ।

“की भेल? की भेल?”

“होएत की कपार? तोरासन  झूठ्ठा मुखिआकेँ देखार करब जरुरी बुझाएल । तेँ..”

ओकील एतबे बाजल रहथि कि  ओ पैर पर खसि पड़ल, माफी माङए लागल ।

“की कहैत छी? मुखिआक धंधामे ई सभ करए पड़ैत छैक।”

ओकील  बिना किछु जबाब देनहि ओहिठामसँ चलि गेलाह ।

घर पहुँचि ओकील साइकिल रखैत छथि । चापाकलसँ एकलोटा पानि निकालि पिबैत छथि । पान बनबैत छथि । एकटा पान अपने खाइत छथि आ दोसर खिल्ली मुखिआ दिस बढ़ा दैत छथि ।

“एकर कोन काज छलैक । हम तँ कनीके काल पहिने तमाकुल खेनहि रही ।”

“खा लिअ । मोन बदलि जाएत ।”

मुखिआ पान खाइत छथि । फेर ओकील लग राखल खाली कुर्सीपर बैसि जाइत छथि।

“आइ की बात छैक जे अहाँकेँ स्वयं आबए पड़ल ।”

“ओकील लग तँ ककरा-ककरा नहि आबए पड़ैत छैक । हम की छी?”

“से की भेलैक?”

“अहाँकेँ तँ सभबात बुझले अछि तथापि अंठओने छी । उल्टे हमरेसँ पुछैत छी जे की बात छैक?”

“जखन ओकील लग अएलहुँ अछि तखन तँ साफ-साफ बात करू । बुझौअलि नहि बुझाउ ।”

“रे ओ शंकर, अहींक भातिज सभकेँ फँसा कए चलि गेल। हमरासँ दस लाख अगाउ सेहो लए लेलक । जखन बात आगू बढ़ि गेलैक तँ आब तरह-तरहक फसाद सुनि रहल छी ।”

“एतेक चलाक नहि बनू । जखन अहाँ ओकरा अगाउ देबए लगलिऐक तखन हमरासँ पुछलहुँ? हे हमरा छोड़ू, हुनकर पितासँ तँ पुछि लितिअनि। तखन तँ भेल जे उगह चान की लपकह पूआ । आब जखन झंझटि बढ़ि गेल तँ हम मोन पड़लहुँ अछि । एकटा बात कान खोलि कए सुनि लिअ।”

“की?”

“ई हमर परिवारक संपत्ति थिक । एहिमे शंकरक कोनो योगदान नहि छनि । ककर मजाल छैक जे हमरा जीबैत ओहिपर पैर दए सकत । हमर आ मनोहरक खून एक अछि । हम एक छी। जँ केओ ओहि बीचमे पड़त तँ भोगत, चाहे ओ केओ होअए।”

मुखिआक सीटीपीटी गुम्म रहए । किछु बाजले नहि होनि। बहुत प्रयास कए जेबीसँ दस हजारक नोटक गड्डी निकालि कए आगू राखि देलखिन । ओकील  ओकरा चट दए जेबीमे रखैत छथि। पनबट्टी खोलैत छथि । पान लगबैत मुखिआकेँ कहैत छथिन –

“देखू । ओकीली फराक छैक आ समाजिकता दोसर बात छैक । अहाँ अपन लोक छी । हमर बात सुनि लिअ । एहीमे अहाँक कल्याण अछि ।”

“की?”

“अहाँ हमर पारिवारिक मामिलामे टांग नहि अड़ाउ ।”

“हद भए गेल । हम तँ टाका दए हुनकर जमीन कीनि रहल छलहुँ । कोनो मंगनी थोड़े ठगि रहल छिअनि ।”

“जे चीज शंकरक छनिहे नहि से ओ कोना बेचि सकैत छथि? परिवारक संपत्ति बाहर चलि जाएत आ हम देखैत रहि जाएब? ई संभव नहि थिक, हम एहि लेल गरदनि कटा लेब, मुदा एक बीत जमीन ककरो छुबए नहि देबैक ।”

“तखन?”

“तखन की? अपन घरमे चैनसँ रहू ।”

“आ जे दसलाख अगाउ देलिऐक से?”

“पहिने ने पुछितहुँ । आब की होएत? तथापि अपन कागज देने जाउ । हम ओकरा पढ़ब । तकरबादे गप्प करब।”

मुखिआ एकटा संचिका ओकीलकेँ दैत कहैत छथि –

“हमरा इच्छा छल जे दुनूगोटे मिलि कए एकरा निपटा लितहुँ ।”

“कहक माने जे अहाँकेँ अपन चीज हम लेबए दितहुँ। ई सभ बिसरि जाउ । बहुत महग पड़त । अहाँ सन-सन कतेको मुखिआकेँ कहि नहि कतए पहुँचा देलहुँ ।”

मुखिआ फेर एकटा लिफाफा ओकील केँ दैत कहैत छथि-

“ई लगा कए बीस हजार भेल । आगूओ जे कहब से हेतैक। मुदा हमरा कम सँ कम अगाउ तँ वापस करा दिअ।”

“हमरा कागज देखए दिअ । तखने गप्प करब ।”

मुखिआ चलि जाइत छथि । ओकील बहुत प्रसन्न मुद्रामे छथि ।

“आइ तँ घरे बैसल आमदनी भए गेल । दिनभरि ओहिना छलहुँ ।” – ओ मोनेमोन सोचैत छथि ।

14

ओकील क्रमशः सभटा कागजकेँ पढ़लनि । फेर एकटा मुस्कीक संग मोछपर हाथ फेरलनि।

 “ई मुखीआ बहुत घमंडमे रहैत छल। आब पता लगतैक असलिअत । कागजसँ साफ झलकैत अछि जे भैयाक दस्तखत नकली छनि । ओ किन्नहु एहन काज कइए नहि सकैत छथि । ने हुनकर एहि काजमे सहमति छनि । से बात तँ ओ कैकबेर स्पष्ट कए चुकल अछि । दोसर बात जे सभटा जमीन-जायदाद भैयाक नामे छनि । अखन धरि शंकरकेँ ओहि संपत्तिकेँ एमहर-ओमहर करबाक कोनो अधिकार नहि छनि । तखन जे ई मुखिआ एहि काजमे कुदल से गलती केलक । आब भोगओ ओकर फल । हम तँ किन्नहु छोड़बैक नहि । सभटा ओलि चुका कए रहबैक । असलमे ई आदमी अछिए दूनंबरी । ने तँ एहन काज करितए किएक? चुपचाप शंकरसँ हिसाब-किताब करए लागल । कोनो बात नहि, आब एकरो समय लगीच लगैत छैक।”

तकर बाद ओ हमर बला लिफाफाकेँ खोलैत अछि । ओहूमे ओही एकरारनामाक दोसरप्रति रहैक । संगे हमर नामे शंकरक लिखल चिट्ठी रहैक । ओकील  सौंसे चिट्ठी पढ़ि गेलाह । फेर एकटा पान लगओलनि । मोछपर हाथ फेरलनि आ हमरा ओहिठाम बिदा भेलाह । भोरक आठ बजैत छलैक । हम अपन कोठरीमे पड़ल छलहुँ । काजबाली चाह बना कए दए गेल छलि। जलखैक ओरिआन कए रहल छलि । ओही समयमे ओकील  हमरा लग पहुँचलाह ।

“भैया! भैया!” ओ कैकबेर  चिकरलाह। हम किछु सोचि रहल छलहुँ । नहि सुनि सकलिअनि । ओ हमरा सामनेमे ठाढ़ भए जाइत छथि ।

“एतेक नहि सोचू। हम कखनसँ अहाँकेँ अबाज दए रहल छी ।”

“ऐँ!”

जेना हुनकर भक्क टुटलनि । कहैत छथि-

“की कहिअह? दिन-राति मोन शंकरेपर लागल रहैत अछि। ओकर माए बेरि-बेरि कहि गेल छथि जे शंकरक ध्यान रखबैक । ओकरा दुनिआदारीक ओतेक ज्ञान नहि छैक । ओकरा बातपर नहि तमसाएब । आखिर अपनासभक ओएहटा बेटा अछि। चिन्नीक लड्डू टेढ़ो मिठ्ठे होइत छैक । आब जखन ओहो नहि छथि,हुनकर कहल एक-एकटा बात हमरा मोनमे ऊपर होइत रहैत अछि । हम एकदम असमर्थ अनुभव कए रहल छी । ई बुझितो जे शंकर गलत कए रहल छथि, हम किछु प्रतिकार नहि कए पाबि रहल छी, नहि कए सकैत छी । हमरा लगैत रहैत अछि जेना शंकरक माए हमर सामनेमे ठाढ़ि छथि, निहोरा कए रहल छथि –

“हमर बेटाकेँ बकसि देब। ओ हमर हृदय अछि । ओकरा बिना हमर मुक्ति संभव नहि अछि ।”

 इएह कारण रहैक जे ओहनो हालतिमे हम शंकरक बात मानि पहिल बेर ओकर डेरापर दिल्ली चलि गेल रही । चलि तँ गेलहुँ मुदा रहि नहि सकलहुँ। परिस्थितिक आगू विवश भए गेलहुँ।

“इएह थिकैक मोह । अहाँक दुखक कारणे बेटाक प्रतिए अंधमोह थिक । धृतराष्ट्र कोनो महाभारतेमे भेल से नहि । ओ तँ एकटा उदाहरण छल । आब एहन उदाहरण तँ घरे-घर भेटि जाएत। पुत्रमोहमे अंध भेल पिताक अंतहीन दुर्दशा देखि-देखि समाज पाथर भए गेल अछि ।”

“मुदा कएल की जाए?”

“से कोनो अहाँकेँ बूझल नहि अछि । सभबात अहाँ जनैत छी । मुदा किछु कए नहि सकैत छी । तखन दोसर-तेसर की कए सकत? किएक अपन जीवनकेँ अहाँक चलते अशांत करत?”

हम ओकीलक मुँह देखैत रहि जाइत छी ।

“की कोनो गलत बात कहलहुँ? हमर बेटा सभदिनसँ योग्य अछि, विद्वान अछि, अहाँक प्रतिए श्रद्धावान अछि । मुदा टाकाक अभावमे ओ एम.एस.सी नहि कए सकल, इंजिनीयरिंगमे नाम नहि लिखा सकल । अहाँकेँ ओकर परेशानी बूझल रहए । मुदा कहाँ कहिओ साहस भेल जे कहतिऐक – “कोनो बात नहि भातिज । हम तोरा लेल ठाढ़ छी । तूँ जतेक पढ़बह से पढ़ह । हम मदति करबह। बहुत मोसकिलसँ ओकरा सरकारी नौकरी भेटि गेलैक जे अखनो जान बाँचल छैक। हमहूँसभ इज्जतिसँ जीबि रहल छी ।”

“आब एहिसभक की हिसाब अछि?”

“बातो सही छैक । जे हेबाक छल से भए चुकल । मुदा जखन बात उठैत छैक तखन तँ बजाइते छैक । सत्य कखनो-ने-कखनो मुँहपर आबिए जाइत छैक।”

ओकीलक बात सुनि कए हम आओर दुखी भए गेलहुँ । ओ ई बात बुझलक । ताबत काजबाली दू कप चाह लेने आएलि। दुनूगोटे चाह पिबैत छी ।

“लिफाफामे की रहैक?”

“शंकर अहाँक नामे चिठ्ठी लिखलनि अछि आ संगे एकटा एकरारनामा से छैक जाहिपर अहूँक दस्तखत अछि ।”

चाह खतम भए जाइत अछि । हम जिज्ञासासँ ओकील  दिस देखैत छी । हम किछु पुछितिऐक ताहिसँ पहिने ओ बजैत अछि-

“हम शंकरक चिट्ठीकेँ पढ़लहुँ । पढ़क नहि चाहैत छल। पिता-पुत्रक बीचमे हमर उपस्थिति उचित नहि । मुदा हमहूँ कोनो आन तँ छी ने । कतेको दिन हुनकर नेकरम केने छी । कोरामे खेलओने छी । इसकुलमे नामो लिखाबए अहाँ हमरे पठा देने रही। फेर ओहि लिफाफाकेँ देखबाक, पढ़बाक भार अहाँ हमरा देने रही।”

“सोझे कहह ने जे ओ की लिखलक अछि?”

“हम अहाँकेँ चिठ्ठी पढ़िए दैत छी ।” – से कहि ओकील चिठ्ठी पढ़नाइ शुरु करैत छथि ।

“पूज्य बाबू, सादर प्रणाम । हम बहुत मोसकिलसँ अहाँकेँ दिल्ली अनने रही । ओना तँ अहाँ कहिओ हमर बात ने बुझलहुँ ने मानलहुँ, मुदा एहि बेर जखन माए गंगामे बहि गेलीह तखन अहाँ सुन्न भए गेल रही । संभवतः माएक स्मृतिमे अहाँ परेशान भए गेल रही । अहाँकेँ नीकसँ बूझल अछि जे माए हमरा बिना शांत नहि भए सकैत अछि । मरिओ कए ओ हमरे लग भटकैत रहि जाएत । तेँ एहिबेर हमर बात अहाँ नहि टारि सकलहुँ। हमर डेरापर दिल्ली अएलहुँ । एहि बातसँ हम बहुत प्रसन्न भेल रही । सोचने रही जे आब अहाँकेँ सभदिन अपने संगे राखब । ताहि लेल बड़का मकान किनबाक योजना बना लेने रही । ओतेक टाका एकबेर हम कतएसँ अनितहुँ? तेँ सोचलहुँ जे गामपर व्यर्थ पड़ल जमीनकेँ खसका कए ई काज आसानीसँ भए सकैत अछि । हमरा नीकसँ बूझल अछि जे अहाँकेँ गामसँ, गामक चीज-वस्तुसँ बहुत भावुक लगाओ अछि। अहाँ किन्नहुँ ई प्रस्ताव नहि मानब। मुदा दोसर कोनो रस्तो नहि छल। तेँ हम गाम जा कए मुखिआसँ गामक जमीन-जायदादकेँ बेचबाक चर्च केलहुँ । पहिने तँ ओ असमंजसमे रहथि। मुदा अंततोगत्वा, ओ मानि गेलाह । दिल्ली आबि कए हमरा दस लाख टाका दए गेलाह । हम हुनका संगे एकरारनामाक कागजपर दस्तखत कए चुकल छी । अहूँक बदलामे हमही दस्तखत कए देने छिऐक । अहाँक दस्तखतक हम नेनेसँ नीकसँ नकल कए लैत छी। कैकबेर अहाँ हमरा मनो केलहुँ । मुदा हम एकर अभ्यास करैत रहलहुँ । आब तँ केओ नहि कहत जे ओहि कागजपर कएल गेल दस्तखत अहाँक नहि अछि । तइओ जँ अहाँ से करब तँ हम जहल जाएब, से तँ अहाँ कदापि नहि चाहब । तेँ मुखिआ मानि गेलाह । एकरारनामा तैयार भए गेल । हम अगाउ टाका लए लेने छिऐक । आब एहि मामिलामे कोनो लज्जति नहि छैक । सभक कल्याण एहीमे अछि जे ओहि काजकेँ अंतिम रूप देल जाए, समय निकालि कए पंजीकरण कए देल जाए । अहाँ दिल्ली हमरा संगे रहब । जे मोन होएत से करब, जेना मोन होएत तेना रहब । हम जेहन छी, जे छी मुदा छी तँ अहींक । तेँ आपसमे मिलि कए रहबेमे कल्याण थिक ।

रहल अहाँक पुतहुक बात से हम साफे खोलि कए कहि दैत छी । हमर हुनकर अखन धरि विधिवत बिआह नहि भेल अछि । हमसभ सालभरिसँ संगे रहैत छी । एक-दोसरकेँ लगीचसँ बुझबाक प्रयासमे लागल छी । सभ किछु अनुकूल रहल तँ कानूनी तरीकासँ बिआह हेतैक । तखने ओ अहाँक पुतहु हेतीह । ओ केरलक क्रिश्चन परिवारक छथि । हुनकर पिता दिल्लीमे उच्च सरकारी अधिकारी छथि । ओहोसभ हमरासँ प्रभावित छथि । एकदिन भेंट भेल तँ कहए लगलाह- “अहाँ दुनूगोटे वयस्क छी । जे उचित बुझाए से करू।” हम हुनकर वैचारिक उदारतासँ आश्चर्य चकित रही । एकटा अहाँसभ छी। ई हेबाक चाही ओ नहि हेबाक चाही । एही गुनधुनमे जिनगी बीति गेल । दरभंगा-मधुबनीसँ आगा सोचबाक काजे नहि बुझाएल । दुनिआ कतए सँ कतए चलि गेल । मुदा अपना ओहिठामक लोकसभक माथा जस के तस छैक । मुदा ई बेसी दिन चलतैक नहि, कतौ चलैक? लोक बाहर भेल, चारूकात भए रहल परिवर्तनसँ मुखापेक्षी भेल । सुंदर-सुंदर  वर-कनिआसभ देखबामे अएलैक । तखन ओ जँ आगू बढ़िए गेल तँ कोन आश्चर्य?

ओहि राति अहाँ चुपचाप हमर डेरासँ कतहु निकलि गेलहुँ। रातिक तीन बजे हमरा एकर अंदाज भेल । हम लघुशंका करए उठल रही । बाहरबला केबार  खुजल बुझाएल । कोठरीसँ अहाँ नदारद रही । सौंसे देह थर-थर काँपए लागल । रातिमे अहाँ कतए कोना होएब से सोचि देहक रोइआँ ढाढ़ भए गेल । निशाकेँ उठेलिऐक । ओ थोड़बे काल पहिने सुतल छलि। किन्नहु उठबाक हेतु तैयार नहि भेलि । दीपेंदुकेँ फोन केलिऐक। जे बात छैक ओ एतेक रातिमे दौड़ल हमरा लग आबि गेल । मुदा ओहो की करितए? ओतेक राति कए दिल्ली सन महानगरमे अहाँकेँ कतए ताकैत फिरैत? दुनूगोटे गप्प-सप्प करैत भोर कए देलहुँ । ओ कैकठाम फोन केलाह। मुदा अहाँक कोनो थाह नहि चलि सकल । हम एहि मामिलाकेँ थानामे नहि देबए चाहलहुँ । कारण परिवारक बात सड़कपर आनब कोनो नीक बात नहि होइत? तेसर दिन दीपेंदु फोन केलक –

“चिंता नहि करू । बूढ़ा सुरक्षित छथि आ अपन गाम पहुँचि रहल छथि ।” तकर बादे हमरा चैन भेल । जे-से । आब जखन अहाँ गाम फेरसँ पहुँचिए गेल छी तँ मामिलाकेँ फेरसँ ओझराएब नहि । मुखिआक कोनो दोष नहि छैक । जँ केओ दोषी थिक तँ ओ हम छी । हमरा जहल पठाइए देब तँ अहाँकेँ की भेटत? सोचिऔक – माएक आत्मा कतेक कुही हेतैक? ओ मरिओक आशांत भए जाएत । तेँ अहाँ अपन स्वार्थसँ ऊपर उठि एहि समस्याक समाधान होमए दिऔक । जँ से नहि भेलैक  तखन जे हेबाक से हेतैक । भावी प्रवल….।

अहाँक पुत्र

शंकर ”

ओकील  तँ चिठ्ठी पड़बामे लागल रहए । कहि नहि कखन हमर आँखि मुना गेल । हम पटिआपर बामा मुँहे लोटि गेलहुँ । चिठ्ठी समाप्त भेलापर ओकीलक ध्यान हमरापर गेलैक। ओ हमरा किछु कहबाक प्रयास करैत अछि । हम जबाब नहि दैत छिऐक । ओ हमरा दिस ध्यानसँ देखैत अछि ।

“ई तँ बेहोस भए गेलथि ।”

ओ आङन दौड़ल । चापाकलपरसँ लोटामे ठंढा पानि आनि हमर मुँहपर छिटलक । ठंढा पानि पड़लासँ हमरा कनेक उसास होइत अछि। हम आँखि खोलैत छी । ओकील केँ जान मे जान अबैत छैक । ओ जोरसँ हाक देलक-

“दौड़ैत जाउ …।”

ओकील  हमरा उठा-पुठा कए ओसारापर लए जाइत छथि। हमर चिकरब सुनि कए गामक कतेको लोक ओतए आबि जाइत छथि । मुखिआ सेहो आबि जाइत छथि । लोकसभ आपसमे  फुसफुसाइत अछि-

“एहि कांडमे मुखिएजीक हाथ छैक । ओ शंकरसँ फरजी कागज बना कए हुनका अपन संपत्तिसँ बेदखल कए देलकनि अछि।”

“ई कोना भए सकैत अछि?  ई घर तँ मनोहर अपने बनओने छथि । दसकठ्ठा पुस्तैनी जमीन छोड़ि कए सभटा हुनकर अपन अर्जित छनि । तखन शंकर ओकरा कोना ककरो लिखि सकैत छथि?” -एकटा ग्रामीण बाजल ।

“कहाँदनि मनोहरक फरजी दस्तखत कए देने छैक?” – दोसर ग्रामीण बाजल।

“के?” – तेसर ग्रामीण पुछलक।

“आओर के एहन काज कए सकैत अछि?” – चारिम ग्रामीण बाजल ।

एहि तरहेँ सौंसे गाम ई बात सभ पसरि गेल । शंकरक प्रति सभक मोनमे आक्रोश छल । मुदा ओ सभ कइए की सकैत छल? जखन शंकरकेँ गाममे रहबेक नहि छनि तखन कोनो ग्रामीण किछु कहथु, किछु सोचथु ताहिसँ ओकरा की फर्क होअए बला थिक?

जाबे ओ सभ रहल तरह-तरहक बात उठैत रहल । मुदा ओहिसभसँ किछु समाधान तँ होमए बला छल नहि । तेँ ओकील कहलखिन –

“अखन अहाँसभ अपन-अपन घर जाउ । बेसीगोटेकेँ देखि हुनकर मोन घबड़ाइत छनि । हिनका आरामक जरूरति छनि । हम तँ छीहे । जँ किछु दिक्कति हेतैक तँ हम अहाँसभकेँ बजा लेब ।” हुनकर बात सुनि कए लोकसभ क्रमश: ससरैत गेल।

“अहाँ एतेक नहि सोचू । शंकरक जे विचार छैक से ओ अपनापर लागू करओ । अहाँ अपन घरमे छी । अपन अर्जित संपत्तिपर छी । एहिमे ओ की कए सकैत अछि? बेसी सिदति करत तँ भोगत । कानून अपन काज करत ।”

“ई कहनाइ आसान अछि । बेटाक आगू कानूनो फेल भए जाइत अछि । ओ केहनो अछि मुदा हमरा तँ विचारबाक अछि की नहि? आ की हमहूँ ओकरे सन भए जाउ?”

“अहाँकेँ जे नीक बुझाए सएह करू? जेँ अहाँक एहन बुद्धि अछि तेँ ने अपने बनाओल घरसँ बेदखल भए गेल छी ।”

“से तोरा के कहलकह? हम तँ केहन बढ़िआँ अपन घरमे छी ।”

“ई अहाँक भ्रम अछि । शंकर अहाँक फरजी दस्तखत कए सभटा चीज-वस्तु मुखिआक नामे कए देलकैक अछि?”

“एना कोना भए सकैत अछि? हम तँ ककरो नहि लिखलिऐक अछि ।”

“तकर काजे कोन छैक? अहाँक फरजी दस्तखत कएल गेल अछि । जँ कानूनी रूपसँ ई बात सिद्ध भए गेल तखन शंकर जहल जाएत । से अहाँकेँ बरदास्त होएत? किन्नहु नहि होएत । ओ ई बात बुझैत अछि? तेँ तँ अहाँके फुसला कए दिल्ली अनलक जे एतए आरामसँ काज भए जाएत ।”

ओकीलक बात सुनि कए हम अबाक रहि जाइत छी । लगैत अछि जेना धरती हिलि रहल अछि । चारूकात प्रलयक दृश्य उपस्थित भए गेल अछि । जेना उनचासो हबा बहि रहल हो । हमर स्वप्नक महल धू-धू कए जरि रहल छल । शंकर जकरा हम दुनूगोटे  जी-जान लगा कए पालन-पोषण केने रही ,आइ शत्रु बनि कए ठाढ़ भए गेल अछि । जकरा-तकरा संगे बिना बिआहकेँ रहि रहल अछि। कहैत अछि जे ओ बादमे ओकरेसँ बिआह करत । पहिने दिल्लीमे घरक जोगार करत । हमरो ओही घरमे राखत । अहीं कहू-एहन माहौलमे हम कोना रहि सकब ? एहिसँ अपना घरमे रहैत अपन माटि-पानिमे मिलि जाएब बेसी नीक । आब हमरा की राखल अछि? हम ककरा बले जिअब ?”

“आ बेटीकेँ तँ संतानमे मोजरे नहि?”

“सेहो कहीं भेलैक अछि । जे पार लागल से ओकरो ओहिना केलिऐक जेना शंकरकेँ केलिअनि । मुदा ओकरो मजबुरी छैक । कलकत्तामे डाक्टरी करैत अछि । दिन-राति ओहीमे लागल रहैत अछि ।”

“अहाँ कतहु नहि जाएब। ककरो अपन दुख नहि कहबैक। जे अहाँकेँ मदति कए सकैत अछि तकरा सटए नहि देबैक । किएक तँ कहीं अहाँक संपत्तिए ने हरपि लिअए । तखन तँ जे हेबाक अछि से होएत ।”

“तँ तूँ की कहैत छह?”

“हम तँ सभदिन एतबे कहलहुँ जे अहाँ हमर जेठ छी । हम सपरिवार अहाँक सेवा करब । अहाँक भातिज सेहो संयोगसँ लगीचेमे अछि । मुदा अहाँ हमर बात सुनब तखन ने।”