जेहेन खायब अन्न तेहेन होयत मनः संस्कृति पर भोजनक प्रभाव

विचार

– संजय कुमार झा

संस्कृति पर भोजनक प्रभाव
मिथिला संस्कार आ संस्कृति लेल विश्वव्यापी आ सुप्रसिद्ध अछि। मिथिलाक भोजनक सहचार आर पहुनाय सेहो कम लोकप्रिय नहि छैक। मुदा आजुक सांस्कृतिक अपक्षरण भोजनक व्यवस्था केँ कोना प्रभावित कय रहल अछि? एहि पर एकटा विमर्श के जरूरत बुझि ई लेख राखि रहल छी।
वर्तमान समाज मे शिक्षाक समृद्धि संग आर्थिक समृद्धि सेहो खूब बढ़ि गेल अछि। एखुनका आर्थिक समृद्धि उपरोक्त संस्कार-संस्कृति केँ कोना प्रभावित कय रहल अछि ताहि पर कनी ध्यान देबय।
बच्चाक जन्म देनिहाइर पढ़ल-लिखल माय बच्चा केँ स्तनपान करेला स अप्पन सुन्दरता आर खूबसूरती चलि जेबाक भय सँ स्तनपान नहि कराबय चाहैत छथि। मायक दूध बच्चा लेल सर्वथा सुरक्षित अछि। कोनो संक्रमण नय, मिलावट नय, तापक कोनो चिन्ता नय। हर तरहेक विटामिन आर प्रोटीन सँ भरपूर मायक दूध इम्यूनिटी (रोगनिरोधी क्षमता) लेल सबसँ महत्वपूर्ण होइछ। वात्सल्यभाव आर वात्सल्य स्नेह संगे ममत्व लेल ब्रेस्ट फीडिंग अति महत्वपूर्ण अछि। तथ्य अछि, स्तनपान करेला सँ ब्रेस्ट कैंसर सँ सुरक्षा सेहो भेटैत छैक। स्तनपानक अवधि मे गर्भधारण के चिन्ता सेहो नहि रहैछ।
विविध प्रकार के दूध आर कृत्रिम भोजन बच्चाक सेहत संग संस्कार सेहो कम करैत छैक। आइ-काल्हि लैक्टोजीन, सेरेलेक आदिक अंधाधुंध उपयोग मानव परिवार आर संतति सभक भविष्य लेल एकटा थ्रेट (जोखिन) अछि। तेँ, भविष्य केर सुरक्षा लेल बेटी-बहिन सबमे जागरूकता आवश्यक अछि।
यैह भोजन हमरा लोकनिक आगामी पीढ़ी (संतति) केर स्वास्थ्य आर संस्कार दुनू केँ दुष्प्रभावित कय रहल छैक। शारीरिक श्रम सँ बचबाक चक्कर मे सेहो हम सब भविष्य केँ खराब कय रहल छी। आब घर मे भनसा घर नै होइछ। से कोना? कनी विचार करब।
शिक्षाक विकास संगे चाकरी आर परिणामस्वरूप आर्थिक समृद्धिक बढ़नाय, निश्चित स्वागत योग्य सुधार थिक। बेटा सँ कनिको कम बेटी नहि अछि। जेतबा नीक पद ओतबे नीक पाय। बेटी सब बेटा सँ बराबरीक स्तर पर पहुंचि गेल अछि। मान-सम्मान, पाय, पद आ प्रतिष्ठा – सब स्तर पर दुनू गोटे बराबर। विवाह के बाद दुनूक व्यस्तता एक्के समान। पाययो बराबर। तेँ हरेक काज मे समान भागीदारी। एहि मानसिकता के विकास बहुत तेजी सँ बढि रहल छैक। पहिले माय-दाय सब भोरे-भोर नहा-धो के भनसा घर मे भजन-नचारी सब गबैत भोजन बनबैत छलीह। तेँ लौकिक आर अलौकिक दुनू संस्कार घुलल भोजन बच्चा सब केँ प्रखर, धार्मिक, सांस्कारिक बनबैत छल। भोजन सुन्दर, स्वास्थ्यवर्धक, संस्कार आ संस्कृति केर जीवन्त आधार होइत छल। आब देर राति धरि काज, सूर्योदय दर्शन सेहो दुर्लभ – दुनू गोटे देर सँ जागैत कोना आध्यात्मिक-धार्मिक विचार ओ चेतना केँ सबलता देता? दुनू गोटे एकदोसरक मुंह देखैत रहैत छथि जे के चाह बनौता! आब शारीरिक थकान आर आलस देखैत दुनू निर्णय करैत छथि, छोड़ू न! फ्रेश होउ आ स्वीगी, जोमैटो आदि सब छहिये न! आर्डर कय दियौक। सुनू न! जलपान के सेहो आर्डर कइये दियौक। कतय टाइम अछि? दिनका भोजन आफिसे मे करब। रातिक भोजन थकान दुआरे सेहो बाहरे सँ अनलाइन डिलीवरी मंगाकय खायब। समय बचाकय किट्टी पार्टी, वीकेंड्स, बर्थ-डे पार्टी, मैरिज एनिवर्सरी, आदि नहि जानि कतेको तरहक उत्सव सब मनबैत हँसी-खुशी जीवन जियब। आब ई पते नहि चलल जे कहिया होटल आर रेस्टोरेंट के भोजन करैत ओबेसिटी, बीपी, शुगर आदिक शिकार भ’ गेलहुँ! स्वास्थ्य धीरे-धीरे गुम भ’ रहल अछि। मनुष्यक मृत्यु सेहो अकाल आ अल्पायु मे बढ़ि जेबाक कारण यैह भोजन थिक।
रेस्टोरेंट केर भोजन में शुचिता, शुद्धता, पावनता आर प्रेम किंचित नहि भेटि रहल अछि। पेट आ मोन त भरैत अछि मुदा सांस्कृतिक, पारिवारिक, लौकिक आर अलौकिक प्रेम गायब भ’ गेल अछि। आगत पीढ़ी लेल बड्ड खतरनाक साबित भ’ रहल छैक ई जोमैटो, स्वीगी आदि। अपने सब फास्ट फूड, जंक फूड्स के प्रचलन आर दुष्प्रभाव सँ परिचित छी। मुदा आइ-काल्हि तथाकथित रूप सँ बड़का लोक बनय के क्रम मे आर्थिक समृद्धि आर शिक्षा जहर बनि रहल अछि। जखन संस्कारयुक्त पारिवारिक भोजन नहि, तँ कोना मिथिलाक गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत जिवन्त रहत? हमर निजी विचार विमर्श लेल पटल पर परोसल अछि। जय मिथिला, जय मैथिली!!