“आधुनिकता आ परम्पराक बीच सामंजस्य बैसबैत मैथिल समाज”

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— मनीषा झा।       

जाहि तरहे ज़िन्दगी मे आगु बढै के लेल समय के संग चलबाक अनिवार्य होइत अछि ओहिना अपना संग अपन आगु आबैय वाला पिढीं के अपन संस्कृति आ अपन परम्परा संँ जोड़ि के रखनैय हमर पहिल कर्तव्य |
अखुनका समय मे मैथिल पूर्ण रुपेण अहि मे लागल छैथ |जहिना आधुनिकता अपनाक सभ क्षेत्र मे अपन परचम फहरा रहल छैथ ओहिना अपन नेना-भूटका के अपन संस्कृति सँ अवगत आ ओकर पूर्ण ज्ञान के यथासंभव प्रयासरत रहैत छथि कारण जे बेसी परिवार रोजी-रोटी के कारण प्रदेश बसल छथि जतैय अपन समाज आउर संस्कृति सँ भिन्न परिवेश मे जीवन- यापन होयत छनि | अंत: अपन संस्कृति आ परम्परा के अपूर्ण ज्ञान भेनाइ सेहो स्वाभाविक परण्च अखन मैथिल अपन बच्चा सभ के आधुनिकता संग-संग परम्परा सँ पूर्ण अवगत करै लेल भरसक प्रयासरत रहैत छथि | परम्परा संँ अनभिज्ञ मनुख आधुनिकतो पूर्ण रुपेण नहि आत्मसात् कऽ सकैत अछि||
परंपरा आऊर आधुनिकता एगो सिक्का के दुहि गोट पहलू अछि|, आधुनिकता यदि सपना मे पंख लगबैत अछि त परम्परा ओकरा जमीन सँ जोड़ि के राखैत अछि ई मैथिल पूर्ण रुपेण अवगत छथि ताहि कारण सभ पाबैन तिहार अपन संस्कृति के अनुरूप जतैय रहैत छथि ओहि ठाम खूब नीक सँ मनबैत छथि ||
आब बेसी सँ बेसी मैथिल जे परदेश रहैत छथि ओ सभ अपना घर -द्वार मे अपन भाषा मे वार्तालाप करैत छथि || अहि क्रम मे हुनकर नेना सभ के अपन परंपरा के बुझबाक जिज्ञासा उत्पन्न होयत छनि आ ओ आधुनिकताक संग संग परंपरा के मध्य यथासंभव सामंजस्य बैसाबैय मे सफल भऽ रहल छथि |