“मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा आदि कालसँ अत्यंत सशक्त रहल अछि।”

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— कीर्ति नारायण झा।   

मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा आदि कालहि सँ अत्यंत सशक्त रहल अछि मुदा सशक्त केर संग संग लोचपूर्ण परम्परा सेहो रहलैक अछि। अपना सभक ओहिठाम एकटा कहबी छैक जे “रहय तऽ ठांउ कऽ कऽ पाबी नहिं तऽ पबितो जाइ आ पराइतो जाइ” कहवाक तात्पर्य इ जे जेहेन समय रहल तदनुकूल परम्परा में जोड़ैत रहवाक ब्यवस्था सेहो रहलैक अछि। हमरा सभ कें मोन अछि जे उपनयन के बाद रातिम दिन धरि हमरा सभके विना नून के भोजन भेटैत छल तहिना बियाह में सेहो चतुर्थी धरि नून खयबा सँ मना छलैक। ओना इ नियम एखनो छैक मुदा एकर पालन करवाक तरीका भिन्न भऽ गेलैक अछि। आंगन सँ बाहर रहयबला लोक एखनो धरि यएह बुझैत छैथि जे वेएह परम्परा चलि रहल अछि। अर्थात परम्परा के अपना हिसाब सँ संशोधित कऽ देल गेलैक अछि। बियाह में अपना सभक ओहिठाम बरमाला सेहो शुरू भऽ गेलैक अछि संगहि घोघट बला प्रथा सेहो पूर्ववत चलि रहल छैक अर्थात पुरान परम्परा आ आधुनिकताक अनुपम संगम भऽ गेलैक अछि। एक ठाम देखलियै जे परिछन काल मे बर साफा पायजामा खोलि धोती कुर्त्ता पहिरि कऽ बियाह कयलनि अर्थात बरियाती संग आधुनिक वस्त्र में आ बियाह संस्कार के लेल मैथिली संस्कृति के अनुसार वस्त्र। इ सभ आधुनिक आ पौराणिक परम्परा केर अद्भुत सामंजस्य थिकै। पौराणिक परम्परा एकहुटा अपना सभक ओहिठाम बन्द नहिं भेलैक अछि। हँ आधुनिकताक सामंजस्य अवश्य भेलैक अछि। एखनो गाम में लोक भोज भात पल्था मारि कऽ करैत अछि हँ संगहि अपनहिं हाथे लऽ कऽ खाय बला ब्यवस्था सेहो अपना ओहिठाम शुरू भऽ गेलैक अछि आ सर्वमान्य भेल जा रहल छैक। धिया पूता के मुंडन आ उपनयन पहिने जकाँ भऽ रहल छैक, इ अलग बात छियैइ जे उपनयन के पश्चात जनेऊ निपत्ता भऽ जाइत छैक तखन गायत्री सावित्री मंत्र के बाते अलग। मुदा सभ संस्कार अपना सभक ओहिठाम भऽ रहल छैक। एकरे कहैत छैक सामंजस्य बनेनाइ आ एहि मामला मे हमर मिथिला के लोक अद्भुत होइत छैथि।जन्म सँ लऽ कऽ मृत्यु धरि अपना सभक ओहिठाम विधि ब्यवहार होइत छैक आ मिथिलाक लोक कतबो शिक्षित भऽ गेल अछि मुदा ओ अपन पूरान संस्कृति के छोड़ि नहिं सकैत छैथि ।भले मजबूरी सँ ओ गाम में नहिं रहि कऽ शहर में रहैत छैथि जाहि ठाम विधि ब्यवहार केर वस्तु जुटेएवा मे अत्यन्त कठिनाइ केर सामना करय पड़ैत छैक संगहि आधुनिकता के आड़ में एहि पावनि सभक औचित्यता पर प्रश्न उठाओल जाइत छैक। एहि विधि ब्यवहार के फालतू आ समय के बरवादी के रूप में मानल जाइत छैक मुदा हम मिथिलाक लोक शहर मे रहि कऽ आस्था के विशिष्ट पावनि छठि ओहिना मनबैत छी। चौरचन, भरदुतिया , तीज, बट सावित्री इत्यादि पावनि ओहिना मनबैत छी हँ संगहि अहिवातक प्रतीक आधुनिक पावनि करवा चौथ के ब्रत सेहो रखैत छी इ मानि जे अप्पन पावनि के संग संग आन पाबनि के सेहो समन्वय भऽ सकय। अद्भुत अछि अप्पन सभक मिथिलाक संस्कृति जाहि मे पुरान आ नब दुनू संस्कृति के बहुत सुंदर समावेश कयल गेल अछि। कोनो संस्कृति केर निरादर नहिं। सर्व धर्म समभाव।