मिथिलाक नारी कऽ मिथिला लेल विस्मरणीय योगदान

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मिथिलाक नारी
क’ मिथिलाक लेल सक्रिय भूमिका व अविस्मरणीय योगदान —-

सुरुआत एतय सौं करय छी जे स्वतंत्रता आंदोलन सौं ल कऽ एखन धरि नारीक भूमिका सराहनीय अछि। महिला सभ आंदोलनमे आगू बढ़ि-चढ़ि कऽ कन्हा सँ कन्हा मिला कऽ पुरूषक संग देलखिन आ शक्तिस्वरूपा बनि कऽ महत्वपूर्ण कार्य करैत अपन शहादत देलनि। आजादीक लड़ाईमे महिला सभ ने सिर्फ अँग्रेज सँ जमि कऽ लोहा लेलनि बल्कि क्रांतिक जे आगि लगेलखिन ओहि सँ घबरा कऽ अँग्रेज अपन डेग पाछू हटेलक। आदिकाल सँ ही नारी शक्तिक प्रतिष्ठाक वर्णन रहल जखन असुरकेँ नष्ट करयकेँ लेल दैवी शक्तिक आश्रय लेल गेल। गाँधी जी कहने छलखिन कि हमर माय-बहिनक बिना ई संघर्ष संभव नहिं छल। जे सब महिला आजादीक लड़ाईमे अपन साहस सँ धार देलनि, हुनकर जिक्र जरूरी अछि – कस्तूरबा गाँधी, विजयलक्ष्मी पंडित, अरूणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन, कमला नेहरू, मैडम भीकाजी कामा, सुचेता कृपलानी, रानी लक्ष्मीबाई, कनकलता बरूआ अनेको वीरांगना क गाथा भरल अछि ।1857 के विद्रोहमे जतय वीरांगना रानी लक्ष्मीबाईकेँ अद्भुत शौर्यपूर्ण योगदान रहलनि, ओतहि बेगम हजरत महलक साहसिक एवं उल्लेखनीय उदाहरण छलनि। जाहि तरहें आजादीक जंगमे स्त्री आ पुरूषक योगदानमे समानता रहल, ओहि तरहें ई संग्राम कोनो धर्म, जाति या वर्णमे सीमित नहिं छल। जहाँ तक स्त्री सभक सवाल छल, तऽ ओहिमे रानी,बेगम, वीरांगना आदि सँ लऽ कऽ तवायफ, बाँदी सब सम्मिलित छलीह जे की अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित एवं सवर्ण-दलित सभ श्रेणीमे व्याप्त छलीह। रानी लक्ष्मीबाई आ रानी चेनम्मा जेहेन वीरांगना अँग्रेज सँ लड़ैत-लड़ैत अपन जान दऽ देलीह। सरोजिनी नायडू आ लक्ष्मी सहगल जेहेन वीरांगना देशक आजादीक बादो सेवा केलनि।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राममे महाराजगंजक शहीद फुलेना बाबू आ तारा देवीक त्याग आ बलिदान अविस्मरणीय अछि। सन् 1917 ईमे बिहारमे महात्मा गाँधीक पदार्पणक संगहि आंदोलनमे नारीक भूमिका बढ़ि गेल। 1919 तक कस्तुरबा गाँधी, श्रीमती सरला देवी, प्रभावती जी, राजवंशी देवी, सुनीता देवी, राधिका देवी और वीरांगना महिलाक प्रेरणा सँ संपूर्ण बिहारक महिलामे आजादीक प्रति रूझान बढ़ि गेल। 1921ईमे देश बंधु कोषक लेल जखन गाँधी जी बिहारक भ्रमण केलनि तऽ एतयकेँ महिला सभ अपन आभूषण तक दानमे दऽ देलखिन। एहि कार्यमे महात्मा गाँधीक संग श्रीमती प्रभावती देवी( जयप्रकाश नारायणक पत्नी ) के महत्वपूर्ण योगदान छलनि। सन् 1921ईकेँ नमक आंदोलनमे बिहारक महिला सभ बड्ड जोश-खरोसक संग भाग लेलनि। 1941 में महात्मा गाँधी जखन संप्रदायक तत्वकेँ विरोध सत्याग्रह केलनि तऽ ओकर समर्थनमे बिहारक महिला सभ बढ़ि-चढ़ि कऽ हिस्सा लेलनि। वैशालीकेँ श्रीमती विंदा देवी, शहीद फुलेना बाबूक पत्नी तारा देवी, मुंगेरक संपत्तिया देवी, पटनाकेँ सुधा कुमारी शर्मा,मुजफ्फरपुरक भवानी मेहरोत्रा, भागलपुरक रामस्वरूप देवी आदि महिला सभ स्वतंत्रता संग्राममे अद्वितीय योगदान देलखिन। स्वतंत्रता संग्रामक गौरवशाली इतिहासक पन्नामे रानी सत्यवतीक संस्मरणक जिक्र प्रभावशाली अछि। एहि सतत संघर्षमे घर, परिवार, समाज आ स्वयंकेँ लड़ाई सँ सर्वोपरि एहि स्वाधीनता संग्रामकेँ अपन उद्देश्य बना कऽ अपन प्राणक आहुति देलनि, ई महिला सभ अविस्मरणीय एवं अद्भुत साहस देखेलनि। असंख्य महिलाकेँ स्वतंत्रता आंदोलनमे भाग लेबाक कारण सौं आजादीक ई महान आंदोलन सक्रिय व संभव भेल। महिला सभ देशक प्रति प्रेम भावनाक परिचय दैत व ओकरा स्वतंत्र कराबैकेँ लेल सभ तरीका सँ अपन योगदान देलखिन। शांतिप्रिय आंदोलन सँ लऽ कऽ क्रांतिकारी आंदोलनमे महिलाक महत्वपूर्ण भूमिका रहल अछि। हिनका सभकेँ याद कऽ हम अपन माथ गर्व सँ ऊँच राखैत छी, हुनकर त्याग अविस्मरणीय अछि ।
नारी कोनो क्षेत्र , समुदाय व राज्यक सीमा के मोहताज नहि छथि । महिला सदैव हर क्षेत्र वा विधा मे सक्षम एवं अग्रणी छथि । एक एक के नाम लेब संभव नै अछि ।तथापि मिथिला क’ धरोहर मिथिलाक एहि पांचो विख्यात विदुषी क नाम त सब जनैत छी जे मिथिला मे हिनकर स्थान कतेक महत्वपूर्ण अछि —
१ – भारती –
भारतीय धर्म दर्शन के सबसँ शिखर पर पहुंचौनिहार आदि शंकराचार्य एकटा साधारण मुदा बुद्धिमान स्त्रीगण सँ एकटा बहस मे हारी गेल छलखिन। मिथिलाक ओहि स्त्रीगणक नाम छलनी ‘भारती’। महाकवि मंडन मिश्र केर पत्नी भारती मिथिलांचल मे कोसी नदीक कात स्थित एकटा गांव महिषि मे रहैत छलीह।
२२ वर्षक अवस्थे मे भारती चारु वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, सांख्य, न्याय मीमांशा, धर्मशास्त्र और साहित्य के अध्ययन कऽ लेने छलीह।
शंकराचार्य आ भारती के कतेको दिन धैर शास्त्रार्थ होइता रहल। एकटा महिला होबाक पश्चातो ओ शंकराचार्य के सब सवाल के जवाब देलनी। ओ ज्ञानक मामला मे शंकराचार्य सँ कनिको कम नै छलीह, मुदा 21मा दिन भारती के इ लगलनि जे आब ओ शंकराचार्य सँ हाइर जेतिह। 21मा दिन भारती एकटा एहन प्रश्न कऽ देलनी जे, जेकर व्यावहारिक ज्ञानक बिना देल गेल शंकराचार्य केर जवाब अधूरा भुझल जेतनी।
२ – गार्गी वाचक्नवी –
मिथिला के विदुषी गार्गी वाचक्नु ऋषि केर पुत्री छली। अतः हुनक पूरा नाम गार्गी वाचक्नवी छलनी। वेद आ उपनिषद मे उच्चस्तरीय ज्ञान राखयबाली गार्गी अपन समकालीन पुरुष दार्शनिक के समकक्ष या हुनका सँ बेसी ज्ञानवती मानल जाइत छली। गार्गी के मिथिलाक राजदरबार के नवरत्न मे स्थान प्राप्त छलनी। ओ काल मिथिला मे विद्वता के स्वर्णकाल छल। राजा जनक द्वारा जनकपुर मे आयोजित ज्ञान सभा मे गार्गी आ गुरु याज्ञवल्क्य केर संगे भेल शास्त्रार्थ बहुते प्रख्यात अछि।
३ – मैत्रेयी –
मिथिला के राजा जनक केर दरबार मे मैत्री नमक एकटा मंत्री छलैथ जिनकर पुत्री मैत्रेयी ज्ञान पिपासु छलनी। हुनका भौतिक संपत्ति मे कुनो रूचि नै छलनी। ओ एकटा सुविख्यात ब्रह्मवादिनी स्त्री छलीह। ओ ब्रह्मवाह केर पुत्र याज्ञवल्क्य महर्षि केर पत्नी छलीह ।
महर्षि सँ उपदेशित भ के ओ नारी सँ नारायणी के श्रेणी मे आबि गेली और श्रेस्ट नारीक रूप मे विख्यात भेलीह। ओ अमरत्व प्राप्त क ब्रह्मवादिनी बनी कऽ अनंत ब्रह्माण्ड मे स्थान प्राप्त कऽ सब गोटे के लेल आदर्श बनी गेलीह।मैत्रेयी एकटा मैत्रेयी उपनिषद लिखलनि। मैत्रेयी उपनिषद मे ओ लिखै छथि – तपस्या सँ मनुष्य अच्छाइ के प्राप्त करैत अछि अच्छाई सँ मस्तिष्क पर पकड़ बनैत अछि मस्तिष्क सँ स्वयं के साक्षात्कार होइत अछि और स्वयं सँ साक्षात्कार मुक्ति।
४ – लखिमा देवी –
लखिमा देवी (ललिमादेई) मिथिला के एकटा पराक्रमी राजा शिवसिंह केर पटरानी छलीह। अपन पति केर युद्ध मे मृत्यक उपरांत ओ १५१३ ई० धैर मिथिला पर शासन केने छलीह। इतिहासकारक मत अछि जे लखिमा रानी के पश्चात ओईनवार वंश नेतृत्वविहीन भऽ गेल। रानी लखिमा देवी कठिन प्रश्नक उत्तर बुझबाक हेतु समय – समय पर पंडित के महासभा आयोजित करैत छलीह। अहि परम विदुषी नारी के न्याय और धर्म शास्त्र मे पांडित्य प्राप्त छलनी।
ओ ‘पदार्थ चन्द्र’ , ‘विचार चन्द्र’ एवं ‘मिथक्षरा वाख्यान’ नामक पुस्तक के रचना केलनि। महाकवि विद्यापति द्वारा रचित लगभग २५० गीत मे हुनक वर्णन अछि। महाकवि विद्यापति शिवसिंह केर देहांतक उपरांत बहुते दिन धैर ओ लखिमा देवी के संग राजबनौली मे रहल छलैथ।
५ – विद्योत्तमा –
कालिदास केर महाकवि बनोनिहार ‘विद्योत्तमा’ उज्जयिनीक राजा शारदानन्द के पुत्री छलीह। ओ परम सुंदरी और विदुषी नारी छलीह। बड़का बड़का पंडित के हरोनिहार विद्योतामा के किछु धूर्त पंडित सब षड्यंत्र सँ मौन शास्त्रार्थ द्वारा कुंठित विद्वान सब काली दास जे कि एकटा महामुर्ख छलथि हुनका संगे करा देलनी।
कालिदास द्वारा रचित ‘कुमार संभव‘ के अपूर्ण अंश के विद्योत्तमा बाद मे पूर्ण केलनि। संस्कृतक एकटा और महाकाव्य ‘रघुवंश’ के सेहो पूरा केलनि ।
पद्मश्री राजकुमारी देवी ( किसान चाची
दुलारी देवी , बौआ देवी
जगदंबा देवी
सीता देवी , महासुंदरी देवी
दुलारी पुष्पा
माल्वीकाराज
महालक्ष्मी
ई सब कियो अपन परिश्रम आ प्रतिभा सौं कला के क्षेत्र मे पुरुस्कार पाबि मिथिला के गौरव प्रदान केने छथि ।
मिथिला आदिकाल सँ अपन विद्या वैभव आ कलाक क्षेत्र में विशिष्टता स्थापित कएने रहल अछि। मिथिलाक धरती पर एक सौं एक गुणवान सिया अवतार लेलीह अछि जे अपन अलौकिक प्रकाश पूंज सं जग के चमत्कृत करैत रहली अछि एहन दिव्यजन सं प्राप्त गरिमामय विरासत के सम्हारि रखबाक जे मुल होईछ ओ थिक भाषा साहित्यक सृजनशीलता । जाही मे मैथिल नारी के योगदान सर्वोपरि अछि ।वास्तविक समाजिक परिदृश्यके साहित्यिक सृजनशीलता जखन गायन वादन नृत्य के माध्यमे आम जन मानस के चेतना केँ झंकृत करय लगैत छैक त ओ लोक परंपरा बनि पिढ़ी दर पिढ़ी लोक गीत , लोकनृत्य रूपे संवाद प्रेषित करैत छैक।
जहां तक देखल जाए त गायन वादन आ नृत्यक संतुलित संगम संगीत कहाएत छैक ।संगीत के पांचों विधा अपना आप में महत्वपूर्ण आ उत्कृष्ट छैक मुदा एहि बीच लोकगीत के भांति भांति डारि पसरि संपूर्ण संसार में अपन स्थान बनेबा में सफल रहल ।जेकर मुख्य कारण छैक जन जन के बोली मे व्याप्त लयबद्ध पाँति। सांगितिक विधा सं अन्हचिन्हार , अक्षरज्ञान सं दूर ठेठ सं ठेंठ देहाती परिवेश में रहनिहारि सेहो सुख दुख , मिलन- बिछुड़न, हर्ष -विस्मय के गीत गाबी उठैत छथि । जाहि मे शब्द आ भाषा जौ बुझना य़ोग नहियो होएत मुदा गायन स्वर सँ मूल भाव केँ बुझ’ मे आबि जाएत । ई गीत मूल रूप सं ग्रामिण क्षेत्र में प्रचलीत छैक।एहि गीतक राग भाष सर्वमान्य छैक । सभ गीतक स्थिति परिस्थिति आधारित स्वर होएत छैक जेना एहि गीत में आदिकाल सं अबैत परंपरा रीति-रिवाज के छांह देखबा में भेटैत छैक जेना जन्म , मुंडन , उपनयन , विवाह के अवसर पर गबै बला गीत । चैतावर , बरहमाशा , बटगबनी , विरहा , पराति, सोहर समदाऊन सभक गायकीक भास आ कंठ सँ नीकसैत स्वर सं बुझा जाएत जे कोन अवसर पर उत्सव आयोजित छैक।यानी की लोक संस्कृतिक प्रतीक ई लोक गीत कोनो भी समाजक जीवंत सभ्यताक आईना छैक।
एहन स्थित में जौ मिथिला के पारंपरिक गायन पर नजरि देल जाए त घर घर में य़दी लोक गीत जीबैत छैक त ओ मैथिल नारि के उत्साह उमंग पर । मिथिला सतत उत्साह जीवि रहल अछि।समाज में रिति रिवाज आ परंपरा के अक्षुण्ण बना रखबा में पुरूषक संग सतत महिला के बढ़ि चढ़ि वा ई कहि जे प्राथमिकता रहैत छैक त अतिशयोक्ति नहि होएत । प्रयोजन कोनो भी हो मुदा ओहि मे श्रम विभाजन होएतै छैक मुदा जाहि विधा के विभाजन हम बुझैत रूचि आधारित रहल जाहि मे स्त्रीगण बाजी मारलन्हि। जहन गीतनादक बात हो त कोनो भी आयोजनक किछु दिन पूर्वहि सं आ किछु दिन बाद तक रंग बिरंगक उत्सव कृत्य आधारित लोक गायन में बढ़ि चढ़ि हिस्सा लेती। संगहि टोल पड़ोस के हकारि देव पितर आ उत्सव आधारित रंग रभस युक्त लोकगीत त होएते छैक। आदिकाल सं एहि विधा के समाज में प्राथमिकता द नारिक शिक्षा आ संस्कारक प्रथम पाठ में जोड़ल जाएत रहल अछि। मिथिला में लूरि व्यवहार आ गीत नाद के नारिक आभूषण कहल गेल छैक। पारंपरिक लोकगीत के माध्यमें नारि के धर्म कर्म लज्जा , सहनशीलता, समर्पण आ श्रद्धाक समाजिक शिक्षा देल जाएत छल । गीत बोल गबैत गबैत उम्र संग स्वयं नारि आ पुरुष अपन मर्यादाक सिमा तय करबा में सक्षम भ जाएत छली। लोक संगीत त एहि रूपे मैथिल नारि के रोम रोम में रचल बसल रहैत छल जेना कहि जे हिनका लोकनिक एकाधिकार हो।एहि माध्यमे लोकगीत बिना संग्रह केनै मैथिल नारि के कंठस्थ भ पिढ़ी दर पिढ़ी अपन कथ्यक उद्देश्य प्राप्त करैत जीवंत रहल आ समाज के दिशा आ दशा प्रदान करैत आबि रहल अछि।
ताहि हेतु समस्त मातृशक्ति के आभार जे अपन पारंपरिक थाति के अपन संतति तक पहुंचा क मिथिलाक धरोहर अक्षुण्ण राखि रहल छथि ।पारंपरिक लोक गीत के भाव में दाम्पत्य जीवनक सार , पारिवारिक समरसता के भाव आ समाजिक सरोकार कर्तव्य छुपल रहैत छनि ।
मिथिलांचल के नारी झकझोरि कऽ राखि देने छैथि। अपन पेंटिंग के कलम चला कऽ मिथिलाक जितवारपुर मधुबनी के सीता देवी एहि संसार के देखा देलखिन्ह जे हुनक कलम में कतेक ताकत छैन्ह। मिथिला पेटिंग जाहि पर मुख्य रूप सँ स्त्रीगणकेँ आधिपत्य छैन्ह आ समस्त संसार में अपन एकटा विशिष्ट स्थान बनाओने अछि आ अत्यन्त गर्व सँ मिथिलाक संग संग भारत के नाम उज्वल कयने अछि। आइ आन देश मे भारत केर चर्चा मिथिला पेंटिंग के कारण कला आ संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करवा में महत्वपूर्ण योगदान देने अछि।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नारी शक्ति केर भूमिका के चर्चा साहित्य में सीमित रूप सँ कयल गेल अछि। संघर्ष में घायल सेनानी के घर में समुचित सेवा कऽ कऽ पुनः संघर्ष के लेल तैयार करैत स्त्री शक्ति पर लिखनिहार के ध्यान नहिं गेलैन्ह। स्त्री समाज अपन सभ सख मनोरथ के त्यागि स्वतंत्रता सेनानी के लेल समर्पित भाव के चर्चा साहित्य में स्थान प्राप्त करवा में असफल रहल। साहित्य केर प्रभाव एतेक पड़ैत छैक जे ओहि में जाहि चीज केर चर्चा कयल जेतैक आम आदमी के संज्ञान में वेएह तथ्य अबैत छैक।भारत के पहिल प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ओ प्रसिद्ध वाक्य जे “लोक के जगेबाक लेल स्त्रीगण के जागृत भेनाइ जरूरी अछि”। हिंदी साहित्य मे नारी मुक्ति के लऽ कऽ विमर्श 1960 ई. में पश्चिमी भारत में शुभारम्भ भेल छल आ जेकर कर्ता धर्ता उषा प्रियंवदा, कृष्णा सोबती, मनु भंडारी आ शिवानी छलीह। इ चारू स्त्रीगण के अन्तर्मन में नुकाएल शक्ति के चिन्हलनि आ हुनकर दिशाहीनता, दुविधाग्रस्तता, कुण्ठा इत्यादि के साहित्य में विश्लेषण कयलनि। स्त्री विमर्श पर सभ सँ कटुतापूर्ण शब्द केर उपयोग सेमाओन द वेउवोर आ डोरोथी पार्कर द्वारा कयल गेल छल जाहि मे ओ स्पष्ट लिखने छैथि जे स्त्री के स्त्री रूप में देखल जाए। स्त्रीगण आ पुरूष समान रूप सँ अपन अपन स्थान एहि समाज में प्राप्त करवा में सफल भेलीह। आब प्रत्येक क्षेत्र मे आ राष्ट्र के निर्माण में दुनू कंधा सँ कंधा मिला कऽ आगू बढैत राष्ट्रीय विकास में बरावर के भागीदार बनि आगू बढि रहल छैथि।
मैथिलक सपना साकार करय लेल महिला क भागीदारी सुनिश्चित करु । महिला आ पुरुष समान रुपे जखनहि प्रयास आरंभ करब सफल हैब सुनिश्चित अछि ।
। जहिया मिथिला मैथिली के ध्वज वाहक के रूप में ओ प्रखर नेतृत्व कर्ता महिला व पुरुष क भेद केने विना प्राप्त होएत जे जन समर्थन के विश्वास जीत सकै तौ निश्चय मिथिला के मन सम्मान पद प्रतिष्ठा के गौरव शाली इतिहास घुमि क आओत ।इतिहास अहाके बाट जोही रहल अछी । तहीना जनसमर्थन स आग्रह जे सूझी बुझी क नेतृत्व कर्ता के चयन करु आ पूर्ण आत्मीय सहयोग स मैथिलीत्व के झंडा बुलंद करु आ मैथिलक सपना साकार क जीवन सफल करु ।
नेतृत्व क्षमता अनिवार्य रूप सँ व्यवहार अथवा कौशल के कहल जाइत छैक जे एकटा प्रभावशाली नेतृत्व केर परिभाषित करैत अछि। नेतृत्व क्षमता एकटा मानवीय गुण होइत छैक जे कम आदमी मे पाओल जाइत अछि जे आदमी के दिमागक भाषा के बुझैत अछि। नेतृत्व मुख्य रूप सँ नेता शब्द सँ अबैत छैक मुदा इ शब्द अपन सभक समाज में एतेक नकारात्मक रूप लऽ लेने अछि जे हमरा लोकनि एकर नाम सँ दूर रहय चाहैत छी मुदा इ अर्थ संकीर्ण अछि. नेतृत्व मात्र राजनैतिक रूप सँ नहिं बल्कि सामाजिक, आध्यात्मिक, आर्थिक आ सांस्कृतिक क्षेत्र में सेहो होइत अछि। किछु महान दार्शनिक आ सफल व्यक्ति केर किछु कथन के एहिठाम चर्चा कऽ रहल छी – “एकटा सफल नेता वेएह होइत छैथि जे स्वयं रस्ता जनैत छैथि, ओहि रस्ता पर चलैत छैथि आ वएह रस्ता दोसर के देखवैत छैथि।” “जे लोक सँ इ नहिं कहैथि जे काज कोना करवाक अछि, मात्र इ कहबाक अछि जे काज करवाक अछि।एकटा सफल नेता वेएह भऽ सकैत छैथि जिनका मे आत्मविश्वास कूटि कुटि कऽ भरल होअय आ जे साहसिक निर्णय लेबा में सक्षम होइथ आ दोसरक आवश्यकता के जानवाक क्षमता हुनका मे होइन। ” एकटा दार्शनिक बहुत सुंदर पंक्ति लिखने छैथि जे जँ अहाँ उड़ि नहिं सकैत छी तऽ दौड़ू, दौड़ि नहिं सकैत छी त चलू आ जँ चलियो नहिं सकैत छी त कम सँ कम रेंगू अवश्य। सदैव आगू बढवाक प्रयास करैत रहू। आ ई गुण बुझु ईश्वर प्रदत महिला मे जन्मजात पाओल जैत अछि । कोनो काज ठानि लेथि ते अवश्य पूरा करबे करती , ताहु मे जौं पुरुखक सहयोग भेटनि तहन ते पताका फ़हराबै से कियो नहि रोकि सकय छनि ।
साहित्य समाजक दर्पण कहल जाएत छैक जाही विधा मे सेहो अनेक मैथिल नारी क नामे दर्ज छनि । जाही सौं समाज सभ दिन सुव्यवस्थित , सुसंस्कृत वा सुदृढ़ रहल अछि । अहि बात के अनदेखा नै कैल जा सकैत अछि ।
लोकगीत मे स्थानीय संस्कृति मुखरित होइत छैक आ लोक कला व अपन संस्कृति के बढ़ावा सेहो भेटय छै । जाही लेल विंध्यवासिनी देवी ,शारदा सिन्हा , रंजना झा आ मैथिली ठाकुर सन अनेको नाम अछि जे मिथिलाक मान बढ़बइ लेल अविस्मरणीय योगदान देने छथि ।
मैथिली साहित्यक चर्चा करिते अनेको नाम अबैत अछि जाही मे लिली रे ,सुधा अरोड़ा, उषा किरण ख़ान ,शेफालिका वर्मा आदि अनेक लेखिका अविस्मरणीय योगदान देने छथि । संगहि अनेको नब रचनाकार साहित्य निर्माण मे अपन दायित्वक निर्वाह मे लागल छथि ।
—-मंजूषा झा — (दिल्ली )