“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”

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— कीर्ति नारायण झा।     

हम दुर्गा शक्ति स्वरुपा छी, विष्णु घर लक्ष्मी रूपा छी, हम ब्रम्हा के ब्रम्हाणी छी आ शिव घर गिरिजा रूपा छी, हम मनुख के संरक्षक क्यारी छी, हम नारी छी – हम नारी छी, इ पांती पढबा सुनवा में बड्ड नीक लगैत छैक मुदा वास्तविकता एहि सँ सर्वथा भिन्न छैक जेना हिन्दी के पंक्ति “औरत तेरी यही कहानी आंचल मे दूध और आँख में पानी… लिखनिहार आँख में पानी के बहुत सम्वेदनशीलता सँ लिखने छैथि जे स्त्री के भूमिका के यथोचित स्थान नहि भेटवाक स्पष्ट संकेत दैत अछि। परिवार में कोनो धिया पूता जँ नीक काज करैत छैक तऽ एकर श्रेय ओकर पिता के जाइत छैक जे फलामा बाबू के धिया पूता आइ ए एस, डाक्टर आ इन्जीनियर बनलखिन मुदा जँ एकर बिपरीत परिस्थिति भेलैक तऽ परिवारक स्वर परिवर्तित भऽ जाइत छैक जे फलां बाबू की करथिन हुनका तऽ कार्यालय सँ फूरसतिये नहिं भेटैत छैन्ह मुदा हुनकर कनियाँ तऽ भरि दिन घरे में रहैत छथिन्ह ओ की केलखिन? ओ जँ एको रत्ती ध्यान देने रहितथिन तऽ धिया पूता एहेन नहिं होइतनि.. इ बिडम्बना छैक परिवार के समाज के आ एकर कारण रहल अछि अपन सभक मिथिलाक पुरूष प्रधान समाज जखन कि मिथिला सँ बाहर के समाज में एहि तरहक स्थिति नहिं छैक अथवा बहुत कम छैक। अपना सभक ओहिठाम स्त्री शिक्षा के अनिवार्यता नहिं बूझल जाइत छलैक आ जकर परिणामस्वरूप स्त्रीगण के भोगय पड़ैत छलैन्ह ओकरा झूठमूठ के घरक लक्ष्मी, घरक मलकाइन कहि कहि कऽ जन – हरबाह सँ बेसी काज कराओल जाइत छलैक आ ओहो में बिना बोइन के आ बदला मे सुनय पड़ैत छलैक जे अहाँ भरि दिन घर में बैसि कऽ करिते की छी? समस्त घर के सम्हारि कऽ समय पर सभके सभ सुविधा उपलब्ध कराओला के उपरान्तो नीक शब्द सुननाइ दूभर भऽ जाइत छलैक। आब परिस्थिति मे परिवर्तन भेलैक अछि। लोक स्त्री शिक्षा के महत्व के बूझय लगलाह अछि आ तदनुकूल परिवार आ समाज मे स्त्रीगण के महत्व आब आस्ते आस्ते बढल जा रहल अछि जे पारिवारिक आ सामाजिक विकास के लेल नीक संकेत अछि मुदा मानसिकता में परिवर्तन एखनहुं धरि नीक जकाँ नहिं भऽ रहल अछि। समाजक दुष्प्रथा दहेज जकर बृद्धि एहि आधार पर भेलैक जे बेटी पढल लिखल नहिं छैथि आ हुनकर सर्वांगीन विकास नहिं भेल छैन्ह तें ओकर भरपाइ के लेल मौद्रिक लेन देन प्रारंभ भऽ गेलैक जे दहेज रूपी दानव के रूप लऽ लेलक जे समाज के कतेको गरीब आ लाचार बेटी के जिनगी के समाप्त कऽ देलक। जँ स्त्री के समान अधिकार प्राप्त रहितैक तऽ एहि दहैज रूपी दानव अपन समाज सँ भस्म भऽ गेल रहैत। नारी के अधिकार आ ओकर महत्व में आशानुरूप बृद्धि नहिं होयवाक कारणे जानकी नवमी मनेवाक विषय पर आक्रोश भेनाइ स्वभाविक मुदा हमर इ ब्यक्तिगत राय अछि जे जखन एकटा कमजोर रस्सी पाथर के रगड़ि सकैत अछि तखन नारी रूपी शक्ति एहि समाजक पुरुषार्थरूपी अहंकार के कियए नहिं समाप्त कऽ सकैत अछि? आ दोसर जे जानकी जीवन भरि संघर्ष करैत रहलीह कखनहु अपन अस्मिता बचएबाक लेल तऽ कखनहु अपन पिता, पति, सासु ससूर के मान रखवाक लेल।गर्भावस्था में परिवार सँ दूर जंगल में मुनि के कुटिया में अपन बच्चा के जन्म देवय बाली जानकी आदर्श छैथि समस्त स्त्रीगण समाज के लेल जकरा मिथिला वासी कोना बिसरि सकैत अछि?एतेक संघर्ष के उपरांत जगत जननी के पद प्राप्त करवाक क्षमता मात्र मिथिलाक नारी में संभव अछि तें सकारात्मक भेनाइ आवश्यक अछि आ अंततः ओ पाँती हमरा बेर बेर मोन पड़ैत अछि जे “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” तें नारी के परिवार में समाज में सदैव सम्मान होयवाक चाही एकटा बेटी, बहिन, पत्नी, माँ, दादी, नानी इत्यादि के रूप में आ तखने अपन परिवार आ समाज के सम्मान बढत……