नहि, हमर दुखक अछि ओर…

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विभूति आनन्द

कहियो ‘स्टार प्लस’ पर एक टा सीरियल चलि रहल छलै– ‘सीया के राम’. ओहि मे सीताक ननदि शान्ता कें आनल गेल छलनि. दर्शक कें अजगुत सन लागल छलनि. हमरो. कारण जे तुलसीदासक रामायण मे हुनक चर्चा नहि छलनि. सुनल अछि जे वाल्मीकि रामायणमे चर्चा छै. ओ चारू भाइ सँ पैघ, कौशल्याक कोखि सँ जनमलि छलीह.
मुदा हुनका जनमिते अकाल पड़ि गेलै. राजा दशरथकें बेटी अशुभ लगलनि. ओ हुनका अपन सारि, जे अंगक रानी छलीह, साँठि देलथिन. आ जे पैघ भेला पर शृंगी ऋषि सँ बियाहलि गेलीह.
जखन दशरथ पुत्र-प्राप्तिक लेल पुत्रेष्टि यज्ञ कयलनि तँ आमंत्रण सूची मे शृंगी कें रखलनि, मुदा हुनकर पत्नी कें, अर्थात बेटीक बिदागरी सँ परहेज कैलनि. शृंगी ऋषि यज्ञ मे गेनाइ अस्वीकार क’ देलथिन.
बाद मे शान्ता सेहो ओत’ निमंत्रित भेलीह, आ पति संग यज्ञ मे भाग लेलनि. मुदा यज्ञ-समाप्तिक बादहि पतिक संगहि घुरि अयलीह. पुनि घुरि नैहर नहि गेलीह !
ई प्रसंग बुझलाक बाद हमर मोन मे विश्वास जमल जे रामहि टा स्त्री-विरोधी नहि रहथि, ई हुनक वंश-परंपरा छलनि ! आ तें शान्ताक संग सीताक पीड़िता-रूप हमरा बेसी उद्वेलित कयलक !
किंतु शान्ता तँ प्रचलित राम-कथा मे एक गोट क्षेपक-कथाक रूप सैंति देलि गेलीह, मुदा सीता कें त्राण नहि भेटलनि. भारतीय मानस हुनका अयोनिजा कहि हुनक पीड़ा कें आर घनीभूत क’ देलनि !

लगैत अछि, सभ टा भ्रमक मूल मे अछि ‘अयोनिजा’ वा ‘अयोनिज’ शब्द ! जँ तकरा लोप क’ क’ देखैत छी तँ स्थिति स्पष्ट भ’ जाइत अछि.
सीता अयोनिजा नहि रहथि. हिन्दू धर्म-गुरु लोकनि हुनका एक मिथक रूपमे आनि आ ताहि पर धर्मक लेप लगा, आम जनक तर्क-बुद्धिक बंध्याकरण क’ देलनि.
मैथिलीमे ‘सित्’ शब्दक अर्थ होइत अछि ह’रक फारक अगिला भाग ! ओकरे सँ खेत जोतल जाइत छै. ओहि जोतायल भाग कें सिराउर कहल जाइत छै.
एक आम मान्यता अछि जे एकबेर मिथिला मे बड़ भीषण अकाल पड़ल. जनता त्राहिमाम स्थिति मे आबि गेल. एहना स्थिति मे राजा जनक अकाल सँ उबरबाक आ लोक-हित मे ह’रक लागनि पकड़लनि, ह’र जोतनाइ आरंभ कयलनि. ताही क्रम मे हुनका सिराउर मे एक कन्या अभरलथिन. ओ तकरा उठा लेलनि, आ हर्षातिरेक मे अपन महल मे ल’ अनलनि. ओ तिथि रहै नवमी, बैसाख…
ओ तिथि आइकाल्हि अंग्रेजी तिथि अनुसार प्रतिवर्ष बदलैत रहैत छै. आ से तखन, जखन ‘रामनवमी’ जकाँ ‘जानकी नवमी’ मनयबाक अनुराग जोर पकड़लकै. ई जानकी-अनुराग किछु ठाम ततेक जोर धयलक जे उल्लास मे किछु गोटे सीताक छठियार धरि मनायब शुरू क’ देलनि !
ई हमरा नीक लागल. आ से एहि लेल जे सीता मनुक्ख छलीह. हुनक चरित्र अप्रतिम छलनि. आ तें भरिसक हुनका कालान्तर मे भगवती मानि लेल गेलनि. आइयो मिथिला-क्षेत्र मे धी-बेटी कें लक्ष्मी, भगवती सएह मानल जयबाक परम्परा अछि.

सीता-चित्रक किछु आरेख पूर्वो मे प्रचलित रहल अछि. जेना राजा रवि वर्मा, उपेंद्र महारथी, उदय, आदिक. कलाकार सभहक कूची सँ सीता देवी नहि, मनुक्ख भ’ क’ उभरैत रहलीह.
आइ उक्त तमाम धारणाकें खंडित कएल जयबाक प्रवृत्ति बढ़ल अछि. आ से दुखी करैत अछि. तें कखनो क’ अपनहि अपन कपार पीट’ लेल विवश होब’ लगैत छी…
तथापि, एहि धर्मभीरु समाज मे अपन लौकिक-सोच कें बचा क’ रखबाक लेल आवाहन करैत रहलहुँ, आ से कोनो टा अपराध नहि कयलहुँ.

जेना कि उल्लेख कएलहुँ छल जे जनक कें सिराउर सँ एक गोट कन्यारत्न प्राप्त भेल छलनि. ओ तकरा अपन महल आनि पालन-पोषण कयलनि, आ स्वयं कें पिताक नाम देलनि. आ एहि ठाम आबि क’ हमरा जनकक एक विशाल चरित्र उभरल देखायल अछि !
तें एहि अर्थे हमरा लगैत अछि जे जनक प्रजा-वत्सल राजा छलाह, जे खेत सँ प्राप्त एक टा नवजात कें महल आनि राजसी सम्मान देलनि. तें ओहि ‘सित्’ सँ प्राप्त नवजात, बादमे ‘सीता’ नामे जानलि गेलीह, सुविख्यात भेलीह…
दोसर दिस राजा अवध आ जनिक पुत्र राम ओही पालित-पुत्रीकें अपन पत्नी बना अवध अनलनि. फेर तकर बाद ओहि निश्छलहृदया स्त्रीक की गति भेलनि, सभ कें सभ घटना-कथा ज्ञात अछिये !
हमर तर्कक अनुसार संभव थिक जे ओही समय भूकम्प आयल होइक, आ सीता अपन बिनु बचावक धरतीक अन्दर समा गेलि होथि ! एखनो मिथिलाक क्षेत्र मे भूकम्प सनक स्थिति बनैत रहैत अछि.
आ दोसर, जेना कि कतहु पढ़नहुँ छी जे पृथ्वी पर कतहु एहन कोनो जगह छै, जत’ धरती फटैत आ स्वतः जुटि जाइत छै ! जँ गलत नहि होइ तँ ओ स्थान अछि आइसलैंड ! तें सीताक धरतीमे समा जयबाक लोकश्रुति कें नकारल सेहो नहि जा सकैत अछि.
सीता कें बुझबाक लेल एकमात्र शास्त्रीयटा नहि, लोकश्रुति ओ लोकभाव सँ देखब सेहो जरूरी होइत अछि. सीता कें शास्त्रीय दृष्टिसँ भगवती मानैत, समस्त जन-मन कें सोचक स्तर पर सीमित क’क’ राखि देब थिक.
लोकभावक अंतर्गत सीता एक टा मिथिलानीक रूपमे मुखरित छथि. सीता जखन नैहर सँ सासुर जाइत छथि, आ तखनुक हुनकर मनोभावकें एकगोट लोक गीतक माध्यम सँ अँटकारब, तँ स्वयमेव अनुभव होयत जे कोना-कोना क’ कठोरो हृदयकें ओ गीत पघिल’बैत जाइत छै ! ओ गीत एना अछि :
‘परम पवित्र भूमि मिथिला नगरिया,
से हमरो के कहाँ लेने जाइ छें रे कहरिया…’

एहि गीतकें सूनल-गूनल जा सकैत अछि. एहि सम्पूर्ण गीत मे सीताक अपन सकल संबंध सँ बिछोह, गहना-गुड़िया, धेनु-गाय आदिक उल्लेख करैत जननी सँ करेज पाथर आ बाबा सँ हीया हारि बैसि जयबाक विकल याचना करैत छथि.
आ एही मनोदशा मे जीबैत सीताक पियासे कंठ सुखाय लगैत छनि, आ तें ओ अगिला कहरिया सँ निवेदन करैत छथि जे कनी महफा रोकू आ हमरा पियास मेटब’ दिअ !
आ से परंपरा एखनो जीबैत अछि, तथा जकर उल्लेख, दृष्टान्तक संग आगू कएल अछि, एत’ तँ ई उल्लेख कर’ चाहैत छी जे उक्त लोकगीत आत्मीयता सँ भरल, आ जकर अन्त होइत-होइत भावुकताक हिलोर मे कठोरो हृदयकें मोम बना देब’मे समर्थ अछि. तें मूल गप ई अछि जे एखनो ओ गीत अथवा ओहि तरहक आनो-आन गीत सभ (समदाउन)मे आधार रूप मे ओ अपन माटिक धीया भेलि स्मारित होइत रहैत छथि.

एत’ ई प्रश्न सेहो उठि सकैत अछि जे जखन सीताक लौकिक प्रसंगमे एतेक रास पारंपरिक गीत उपलब्ध अछि, तखन सभ ‘सीता सोहर’क अनुपलब्धताक की कारण भ’ सकैत अछि ! एतहु हमर स्पष्ट मत अछि जे हमरा समाज मे बेटी-जन्म कोनो परिवार लेल उत्सव-रूप मे नहि मनाओल जाइत छल. कमोबेश ई भाव एखनो छै. तें रामक सोहर, कृष्णक सोहर आदि उपलब्ध अछि मुदा सीता अर्थात बेटीक जन्मोत्सवक गीत नहि अछि. आ जँ रहितै, तँ आइ सीता लेल ई विमर्शे नहि होइत !…

असल मे सीताक मनुष्य-रूप कें बुझबाक लेल, आइयो ओहि संस्कृति आ संस्कार कें बुझ’ पड़त ! तुलसीदास सेहो एहि भाव सँ लाख बँचबाक चेष्टा करितो ओहि सँ असम्पृक्त नहि रहि सकल छथि. ओ सेहो मानि रहल छथि जे रामक विवाह मैथिल-रीतिसँ भेलनि. सीता संग आत्मीय भेलाक बादो विवाह सँ पूर्व हुनक परिछनि भेल छलनि आ जे मिथिला-क्षेत्रमे एखनो कमोबेश प्रचलित छै. एहि बिध मे राम कें सीताक सखी हेमा द्वारा सत्ताइस तरह सँ परीक्षण ( परिछनि ) कएल गेल छलनि ! ओना आब सत्ताइसो रूप शेष नहि रहलै, तथापि किछु-ने-किछु एखनो शेष अछि, जेना– ठक-बक, भालरि, बेसन, मूजक क’र, पान-सुपारी, काछुक खपलोइया मे जरैत अखंड दीप, गोबर आ पिठारक मुठरा, चँगेरा मे राखल अछिंजल सँ सिक्त दूभि-धान, आदि…

एत’ एक आर विषयक उल्लेख कर’ चाहब जे सीता-जन्मस्थली, ध्यातव्य जे मंदिर आगू प्राकट्यस्थली नहि लिखल अछि, ‘पुनौरा’ सँ पहिने ‘पंथ-पाकड़ि’ नाम सँ एक स्थान अछि, जत’ लोक-मान्यताक अनुसार जनकपुर सँ द्विरागमन भ’ अवध जाइत सीताक महफा बिलमल छलनि, आ जत’ हुनका अपन नैहरक पानिक घोंट पियाओल गेल छलनि. ई पानि पिएबाक प्रथा मिथिला-क्षेत्रमे एखनो जीवंत अछि.
ई स्थल लगभग दू-तीन एकड़ मे पसरल अछि आ जत’ हजारो साल पुरान पाकड़िक अनेक गाछ चतरल अछि. पूर्व मे ई भूभाग कहल जाइछ जे पूर्ण रूप सँ जंगल रहय. एखनो ओ परिसर प्राचीनता, प्राकृतिक छटा ओ निज भव्यताक अद्भुत आ मनोहारी दृश्यक संग आमलोकक स्वागत करैत सन अभरि जाइत अछि. तें आजुक सोचमे कहि सकैत छी जे ई स्थल हमरा लोकनिकें प्रकृति-पूजाक शिक्षा दैत सन सेहो लगैत अछि.

मान्यता ईहो अछि जे पंथ-पाकड़ि जनकपुर सँ तीन योजन, अर्थात बारह कोस दूर पर स्थित अछि. आ कतोक युग बीति गेलाक बादो ओ अपन निजता संग वर्तमान अछि. एत’ पहुँचिते सीता-रंगक बोध होइछ, ठीक ओहिना जेना वाल्मिकी आश्रममे घुमैत सीताक दुखी-भावक बोध होइछ. ई फर्क, आ से बोध होयब दूनू ठाम गेलाक बादे संभव अछि. अभिप्राय ई जे सीता-सह-स्त्री-विमर्शक क्रममे हमरा एहि सभ तरहक अभिज्ञान होइत गेल अछि.
पंथ-पाकड़िक भ्रमणक क्रममे एक अलग तरहक जनतब भेल जे सीतादाइक जखन एत’ महफा बिलमलनि, प्रथमतः ओ दातमनि कयलनि ! फेर ओकरा फेकि देलनि. लोक-आस्थाक अनुसार वएह बाद मे पाकड़िक गाछ भ’ सगरो चतरि गेल.
तकर बाद सीता कूड़ुर कयलनि,जे पश्चात वएह पोखरिक रूप मे विकसित भेल. उक्त दूनू रूप एखनो वर्तमान अछि.
तहिना पहिल-पहिल ओहि क्षेत्र मे पाकड़िक गाछमे जटा लतरल देखल ! ब’रक गाछ मे तँ जटा कें लटकल रहरहाँ देखल जाइत अछि.
‘पंथ-पाकड़ि’ परिसरक सेवकक गप-सप कें जँ मानि लेल जाय तॅं ओहि सम्पूर्ण परिसरमे पाकड़िक मूलतः एकहि टा गाछ अछि ! ओकरे सोर सँ अनेक गाछ उत्पन्न भेल अछि. संगहि जेना-जेना गाछ, आ गाछक ठाढ़ि सभ पुरान होइत जाइत अछि, ओहि मूल सँ नव-नव जटा बनैत अछि आ ओ मूलक ऊपर आवेष्टित होइत जाइत अछि. फेर धीर-धीरे ओ एहि रूप मे आबि जाइत अछि जे मूल गाछ ओही मध्य अलोपित होइत, अंततः नवता संग जीवंत होइत रहैत अछि…
प्रायः प्रचलित लोकोक्ति– ‘पंथक पाकड़ि’, एही स्थलक कारणें कालान्तर मे बनि गेल हो, से संभव ! ओना एकटा गीत सेहो प्रचलित अछि, जे सीताक पति-प्रेम कें देखबैत अछि :
‘आहे, तोहें पिया होइह पंथ-पाकड़ि ना
हम धनि बैसब जुड़ि छाहरि ना…’

सीता-जीवन सँ संबंधित एक आर स्थान अछि चकिया. चकिया प्रखंड (पूर्वी चंपारण) अछि. एतहि एक टा गाम अछि पिपरा, जत’ सँ प्रायः एक-डेढ़ किलोमीटर उत्तरमे एक आर गाम अछि– ‘सीताकुड़’ ! लोकआस्थाक अनुसार सीता जखन नैहर सँ द्विरागमन भ’ सासुर जा रहलि छलीह, उक्त स्थान पर अबैत-अबैत चारि दिन पुड़ि गेलनि. अस्तु, हुनक ‘चतुर्थी’ ओतहि भेलनि. रीतिक अनुसार बर-कनियाँ जाहि जलाशयमे स्नान कयलनि, ओ कालांतरमे ‘सीताकुड़’ नामे प्रसिद्ध भेल.
ओतुक्का लोकक कहब छनि जे जाहि कुड़ (कुण्ड)मे सीता स्नान कयलनि, ओत’ हुनक पहुँचामे बान्हल कंकन (डोर) सँ आमक पात खसि पड़लनि. बाद मे ओत’ एक आमक गाछ जनमल, जकर पात सभ कंगन जकाँ टेढ़-मेढ़ होइत गेल. ओ गाछ हाल-हाल धरि अस्तित्व मे छल. आइ सेहो ओत’ रामनवमी-मेला लगैत अछि. ओत’ खोधाइ मे किछु शिलालेख एवं मुद्रा आदि सेहो भेटल छलै, आ जे सूचनानुसार पटना संग्रहालय मे सुरक्षित अछि.
एहने सन लोकआस्था सँ सम्बन्ध रखैत मुंगेरक ‘सीताचरण’ ओ ‘सीताकुण्ड’ अछि. सीताचरण गंगाक दीयरि मे अछि, जत’ एक शिलापर पएरक आरेख अछि, जे लोक-मान्यता अनुसार वस्तुतः सीताक छनि, आ जे ओत’ छठि कएने रहथि.
एहिना ‘सीताकुण्ड’क संदर्भमे सेहो लोककथा प्रचलित अछि जे सीता दाइक अग्निपरीक्षा एतहि लेल गेल छलनि ! उक्त कुण्डक पानि एखनो धीपल अछि. ओकर अतिरिक्तो ओत’ आर कुण्ड सभ अछि, आ जकर पानि ठण्ढा रहैत छै !

खैर, एतेक रास लोक-विश्वास सँ जुड़ल स्थानक उल्लेख करबाक पाछू हमर मूलदृष्टि इएह रहल जे सीता वस्तुतः अवतरित नहि, जन्म लेने रहथि, आ सेहो मिथिलाक माटिपानि संग. फेर सीता दाइ किनकर बेटी छलीह, तँ ताहू प्रसंग अनेक कथा-कथानक प्रचलित अछि. मुदा एखन एत’ ताहि पर विमर्श करब हमर अभिप्रेत नहि अछि.
मुदा एहि ठाम अपना कें एक बेर आर टोक’ चाहैत छी जे अंधविश्वास एवं आस्थाक मध्य बड़ बेसी दूरी नहि अछि, आ से सएह स्थिति हमरा जनैत शास्त्रीय ओ धार्मिकताक संग सेहो लागू होइछ !

एक विषय आर जे सीता कें अपन भाषा सँ अत्यधिक अनुराग छलनि. ओ मिथिला सँ बाहर बियाहलि गेलीह. मुदा तें अपन भाषा नहि छोड़लनि. वाल्मीकिक रामायण मे सीताक भाषाक प्रसंग आयल अछि. अर्थात जहिया ओ अपहृत भ’ क’ महापंडित रावणक अधीन छलीह, आ ताहि क्रममे जखन हनुमान हुनका सँ भेंट कर’ गेल रहथि तँ सीता हुनका सँ अपनहि भाषा मे बतिअयलीह. आ लेखक जकरा ‘मानुषी भाषा’ कहि अविहित कयलनि. अपन भाषाक प्रति एहन अनुराग आइ मुदा क्षरित भ’ रहल अछि. आजुक सीता अपन लव-कुश समेत निज भाषा छोड़ने जा रहलीह अछि.

आइ समाज छद्मबुद्धिजीवी सभक गछाड़ मे अछि, आ हम भीड़ बनल आम मैथिल ओहने बुद्धिजीवी सभक अनुशरण आ धड़फड़ीमे तमाम नीककें धकिआबैत, ठहाका लगयबाक असफल चेष्टा क’ रहल छी. ई पतनोन्मुखी समाजक लक्षण थिक. एहिसँ मुक्त होयब आवश्यक अछि. ई धर्म समाज कें तोड़ि रहल अछि.
एहि कालखंड मे ई धार्मिक आस्था बेसी बढ़ल अछि. मनुष्य जेना-जेना अंदर सँ कमजोर होइत जायत, धार्मिक आस्था बढ़त. मनुष्य कें कमजोर बनयबाक एक माध्यम थिक अंध आ छद्म धार्मिकता…
धर्म सभ दिन सँ यथास्थितिक पोषक रहल अछि. से चाहे कोनो धर्म हो ! एहि भू-खंडपर जत’-जत’ धार्मिक आस्था कमल अछि, तर्क बढ़ल अछि. तर्क बढ़ल अछि तँ विकास भेल अछि. तर्केक दोसर नाम विज्ञान सेहो थिक. आ ई विज्ञाने तँ विकासक सूत्र-सेतु थिक !
धर्म, तर्कक प्रबल विरोधी अछि. तें रहरहाँ कहलो जाइत रहल अछि जे धर्म मे तर्क नहि करी !…

आ हमरा सन लोक जँ एहि ढंग सँ सोचैत अछि तँ विधर्मी कहबैत अछि. तैयो हम अपन ओहि सीता नामक मैथिल कन्याक हृदय सँ श्रद्धा निवेदित करैत छी आ जे सहनशीलताक बानगी बनलि, आ पतिक द्वारा कुलारल गेलाक बादो जंगल मे रहि दू-दू टा पुत्र कें जन्म देलनि. फेर जारनि-काठी बीछैत आ कन्द-मूल खाइत-खुअबैत अपन दूनू बाल-गोपालकें पोसलनि आ ओकरा सभ कें जीवन-युद्ध लड़बा योग्य बनौलनि…

मुदा अंततः ओ हारि गेलीह. हारब एक तात्कालिक विवशता सेहो रहल छल होयत. मुदा ताहू हारि मे सीतादाइक जीत भरल छलनि. ओहुना सत्य सेहो सएह जे राजा सदा सँ जीतैत आयल अछि, प्रजा तँ पराजित होइते रहलय ! आ से राजतंत्र मे तँ निश्चिते, प्रजातंत्र मे सेहो…
मुदा सीताक ओ पराजय ओहन दुखद नहि छल, जेहन आइ हमरा लोकनि हुनका भगवती-रूप मे आनि पराजित क’ रहल छी !

ई जीवन की थिक ! भोर ऊठब, दिन भरि बेचैन-अपस्याँत रहब. फेर राति क’ हारल-थाकल घूरब आ सूति रहब !
एहि जीवनक अर्थ की छै ! भोरहि उठि क’ दिन भरि अर्थार्जनक लेल आनक पीड़ा कें अपन सुखक लेल अबडेरब ! आ राति-बिराति घुरैत, सम्बन्ध-बन्धसँ अलग, काल्हुक भूख लेल मानसिक युद्ध लड़ैत नितुआन भ’ जायब ! फेर बीच-बीच मे चेहा-चेहा ऊठब ! की इएह थिक जीवन !
इएह सभ नहि जानि किएक, हमर अवचेतनकें दिक कएने रहैत अछि. आइ पति कें पत्नी संँ, पत्नी कें पति संँ, आ दुनू कें अपन संतति संँ गप-सप करबाक नहि तँ पलखति छै आ नहि प्रयोजन. घर-घरमे सभ अपना-आप मे एकाकी अछि !
ओना एकाकी अछियो आ नहियों अछि. बच्चा सँ वयस्क धरि सभहक हाथ मे मोबाइल छै. ओहिमे फेसबुक छै. ओहि फेसबुक मे हजारक हजार मित्र-मित्रानी छै. मुदा तैयो सभ एसगर अछि, तैयो सभ असामाजिक अछि. सभक सभ समटल अछि अपन-अपन ‘चैटिंग’मे, लाइक आ कमेंट, ‘वीडियो-टॉक’ धरि मे…
एही लाइक, कमेंट, चैट, वीडियोक कारण बेसीकाल अभद्रताक पराकाष्ठा भ’ जाइत अछि. ‘ब्लॉक’ आ ‘अनफ्रेंड’क क्रम चल’ लगैत अछि. तनाव बढ़ैत अछि. ओ असहिष्णु बनि जाइत अछि. से नब-पुरान दुनू !
एही ‘स्पेस’मे प्रेमक एकटा निर्घिन रूप सेहो बनैत अछि. भोरक रौद सनक खिच्चा मोन, एहि वायवीय रूप, रंग आ स्वादक बीच घेराइत अछि, अपने अन्दर अपने सँ गिजाइत अछि.

ई सभटा हमरा सभक सम्बन्ध मे ढिलै देबाक कारण सँ आयल अछि, वएह मूल कारको बनल अछि. हम सभ एहि दिशा मे नहि तकैत छी. उचित सेहो नहि बुझैत छी.
से ई जे जीवन-सघर्ष मे अपस्याँत, स्वनिरीक्षण सँ निरपेक्ष जीवन-धारा अछि, हमरा हमरे सँ अलग क’ रहल अछि, सुखा रहल अछि तकर स्रोत…
आइ हमर जे समाज अछि, ओकर जे रूप अछि, ओ विखण्डनक सीमान्तपर पहुँचि चुकल अछि. सामाजिकता नामक तत्व रूइक फाहा जकाँ उड़ि रहल अछि. हम गुलमोहर जकाँ दहकि रहल छी.
एकरा सँ कोना बँचल / बचाओल जाय, ई यक्षप्रश्न बनल अछि. साहित्य जे लिखल जा रहल अछि, ताहि सॅं सहृदयता निपत्ता भेल जा रहल अछि. एक टा खास फ्रेम मे साहित्य टँगा रहल अछि. तें लेखन समाजक रहितो समाजसॅं कटल जा रहल अछि. ओहुना, साहित्य सँ आमलोकक आपकता, अल्पे रहलैक अछि.
तखन ?
चतुर्दिक अन्हार पसरल अछि. आ एहि अन्हार मे हम सभ टोइया-टापर दैत, खसैत-उठैत चलि रहल छी. विलुप्त अछि अगर-गंध. सगरो मनमे जेना चिराइन-गंध पसरल अछि. हम परमाणुपर नवचिंतनक’ रहल छी. इजोत सँ श्मशानक बोध बहरा रहल अछि.

तथापि हमर कलम एही ठाम जिद पकड़ने गतिशील भेटैत अछि. से अपनहि स्तर पर सही, मुदा समाजक संग शब्दक अनिवार्यता पर चिंतनशील, अपन निज समाजक साहित्य तकैत अछि. नहि छै तँ तकर औचित्य कें स्पर्श करैत घुरा अनबा लेल अनथक चेष्टा करैत रहैत अछि. अपन काल्हुक पदचापक सम्बन्ध कें अकानैत, सृजनशील ओ चिंतनशील रहैत अछि– ‘चरैवेति चरैवेति’ मुद्रा मे टुटैत संबंध कें जोड़बाक हूबा लेने, अपन शिल्प मे, अपन ढंग सँ, सतत… निरंतर…

एही सभ चिंतन-मननक बीच हम अपन सीताकें देखैत छी, ओहि मिथककें फरिच्छ क’ क’ सहरजमीन पर अनैत छी. तें मुदा हम ओत्तहि नहि अँटकैत छी. हम ओ सीता नहि, ओहि परंपराकें सेहो देखैत छी. आ जे अपना मे ओहि सीता-मोन सँ फराक, निज मोनक संग सक्रिय देखाइत अछि.
कारण समय बदलल अछि. लोक सभक सोच बदलल अछि. तें भिन्न-भिन्न भाषा मे लिखल गेल रामायण कें एकत्र करैत पढ़ल-गुनल जा रहल अछि. फेर ओहि कथा सभ पर पुनर्चिंतन चलि रहल अछि. अथवा एना कही जे रामकथाक पुनर्पाठ संग पुनर्चिंतन चलि रहल अछि.
सएह कारण अछि जे बहुत बेसी नहि तँ बहुत कम सेहो नहि, नवकी पीढ़ी अपन नवल चिंतनक संग सीताक प्रसंग लैत अपना मादे की-की सोचैत अछि. ओ रामक मादे सेहो सोचैत अछि. एना कही जे मिथिला आ अवधक सोचक मादे सेहो सोचैत अछि. फेर ओहि दिशा मे डेग सेहो उठा रहल अछि…
आइ साहित्य मे नारी-विमर्श अपन निष्कर्ष जीबि रहल अछि. विभिन्न भाषामे सीताविषयक अनेक पुस्तक सभ आयल अछि, आबि रहल अछि. सीता कें अबला नहि, सबला रूपें देखल जा रहल अछि.

एही संदर्भ मे आन भाषा सभ सँ अलग मैथिली मे सेहो नव ढंगे विमर्श शुरू भेल अछि. आजुक स्त्री, सीता सन भाग्य नहि चाहैत अछि. ओ अकारण पराजित भ’ क’ मृत्यु स्वीकारबाक लेल कथमपि तैयार नहि अछि.
तें रहरहाँ देखल जा रहल अछि जे आइ स्त्री-मोन अपन जीवनक अनेक क्षेत्र मे अनेक स्तरपर संघर्षरत अछि आ जकर अपेक्षित परिणाम सेहो अपना अधीन आनि रहल अछि !
परंपरित सीता सनक आधुनिक सीताक मोन दूर-दूर धरि कत्तौ नहि अछि. ओ मर’ सँ पहिने लड़’ चाहैत अछि. आ से मनोयोगपूर्वक लड़ैत अछि. ओहि मोन सभ कें बूझल छै जे ओकरे एक सखी आ एही मिथिला-माटिक सरोकारी, भावना कंठ छै, जे आइ फाइटर विमान उड़बैत छै !
मृत्यु तँ निश्चित छै. मुदा से सीता सन नहि. परंपरा ठीक छै. मुदा अनुकरण नीक परंपराक होयबाक चाही… ●