“शिक्षा के अर्थ भेल सिखब आर सिखाएब।”

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— रिंकू झा।     

शिक्षा के अर्थ भेल सिखब आर सिखाएब । शिक्षा मनुष्य के पृथ्वी पर एक टा चतुर प्राणी बना क दोसर जीवित प्राणी स अलग पहचान दै छै, चुनौती स भरल जीवन के कुशलता स सामना करब सिखावै छै । शिक्षा के अभाव में मनुष्य एक टा पशु के समान बनी जाय छै । जेना हर सिक्का के दु टा पहलु होई छै तहीना हर चीज के नीक आर खराब दु टा पक्ष होई छै ,ई मनुष्य पर निर्भर करै छै कि ओ कोन पक्ष के चुनाव करै छैथ ।निक पक्ष के चुनाव उँचाई पर पहुंँचाबै छै आर खराब पक्ष के चुनाव मैट में मिला दै छै।
आजुक समय में याह देखै में आबैया की भावि पीढ़ी के युवा सब नैतिक ज्ञान आर अपन संस्कृति, रीति रिवाज सब बिसराए रहल छैथ। आधुनिकता के चकाचौंध, नैतिकता के अभाव आर
पश्चिमी सभ्यता के अपनावै के होड़ में अपन संस्कार, सभ्यता आर संस्कृति के ताख पर रखने जाई छैथ।हमर कहब ई बिल्कुल नहीं अछि की युवा पीढ़ी सब संस्कार विहीन छैथ, बल्कि हम ई कहै चाही रहल छी जे केवल नव पीढ़ी पर दोष लगेला स हमर आंहा के जिम्मेदारी खतम भ जाईया,?कि हम आंहा पुर्ण रुपे हुनका सब के प्रति अपन कर्तव्य निभा रहल छी ? हमरा एहन नहीं बुझा रहल अछि कारण हुनका सब में अगर संस्कार के कमी भय रहल अछि त ओकर वजह कतहुं ने कतौह हमहु अहां छी ,हम आंहा ओ समय , परिवार, संस्कार आर ज्ञान नहीं द पावी रहल छी।ई हमरा आंहा के कमजोरी अछि , कारण पहिले लोक संयुक्त परिवार में रहै छलैथ जतै बच्चा सब के वर -बुजुर्ग आर सर-कुटुम्ब के लाड़ प्यार भेटै छलै , दादी -नानी स निक -निक कथा कहानी सुनै लेल भेटै छलै ,भाई -बहिन सब मिलि -जुली एकै साथे रहै छलैथ जतय खेल -खेल मे त्याग, सहनशीलता, माफी आर कर्तव्य के शिक्षा भेट जाय छलैन , पारिवारिक माहौल में धर्म, समाज आर रीति रिवाज के पाठ पैर्ह लै छलैथ ,। गुरुकुल शिक्षा पद्धति छल जाहि मे गुरु शिष्य के धार्मिक, नैतिक, शारीरिक आर बौद्धीक समस्त ज्ञान प्राप्त करबै छलैथ, ब्रह्मचर्य के पालन करबै छलैथ, गुरु के दर्जा भगवान स पहिले देल जाय छलै।आब आधुनिक शिक्षा पद्धति में बच्चा सब अही सब चीज स वंचित रहै छैथ कारण माय-बाप दुनु मिली नौकरी करै छैथ ,एकल परिवार के कारण वर -बुजुर्ग के नाम पर मेड भेटत बच्चा सब अकेले घर पर टेलीविजन आर मोबाइल में ढुकल रहै छैथ , नैतिक ज्ञान के जगह कामिक्स, गेम्स, फिल्मी गीत आदि ल चुकल अछि , कहावत छै कि बच्चा के दिमाग बिल्कुल शुन्य रहै छै ओहि मे जे भरवै से भरा जाएत , ताहि हेतु बच्चे स हुनका अन्दर संस्कार आर ज्ञान के बढावा देबाक चाहि। वर्तमान शिक्षा पद्धति में प्रशासन आर वयव्साय के हस्तक्षेप के कारण शिक्षा जगत के दशा आर दिशा दुनू प्राचीन शिक्षा स अलग छै आधुनिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्य अक्षर ज्ञान स शुरू भय क जीविकापार्जन के साधन तक सीमित भ चुकल छै , । माता -पिता बच्चा के स्कूल में दाखिला करा क निश्चिंत भय अपना दुनिया में लिप्त भय जाय छैथ, हुनका बस नम्बर स मतलब रही जाय छैन, बाकी आर किछु नही,।जाहि कारण मनुष्य के सर्वांगीण विकास नहीं भ पावै छै आर ओकर परिणाम स्वरूप समाज में बिभिन्न प्रकार के कुंठा आर वैर के अंकुरण भ जाय छै ,जे आगु चली क एक टा वृहत समस्या के रूप धारण क लै छै , जेना भेदभाव, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार आदि युवा पीढ़ी मे शिष्टाचार के कमी भेटै छै,ओ स्वतंत्र रहै चाहै छैथ,एकर सब स बेशी असर वैवाहिक जीवन पर परै छै ।आर अही सब के बढावा देवय में सोसल मीडिया,अहम भूमिका अदा करै छैथ ।
युवा पीढ़ी सब प्रेम विवाह के बिशेष महत्व दै छथीन, प्रेम विवाह के ओ सब एकटा स्वतंत्र बंधन मानै छथीन। पहिले माता -पिता विवाह ठीक करै छलैथ , लड़का -लड़की स बिचार नहीं पुछल जाय छल ,ओ विवाह एक टा सामाजिक व पारिवारिक माहौल में होय छल , जाहि मे बहुत रास रीति रिवाज के अपनावैत हर्षोल्लास होय छल , आर कैक दीन तक विवाहक रस्म चलै छल । ओहि मे दु टा अन्जान व्यक्ति के साथ -साथ दु टा परिवार के मिलन होय छल ।आब लड़का -लड़की आपस में सब ठीक क लै छैथ ,मेल-मीलाप सब भ जाय छै , माता -पिता के की पुछत , ने कोनो गोत्र,मुल, सिद्धांत के काज ने समाजक लाज ,होटल मे विवाह होय छै , शानो शौकत के सजावट ,आणन-फाणन में विवाह सम्पन्न भ जाय छै । प्रेम विवाह के विचार धारा के निक मानैत लीभ ईन रिलेशनशिप में रहब के उत्कऋर्न बुझै छथीन। विवाह स पहीले संग रहय लागै छैथ जाहि के परिणामस्वरूप कतेको मासुम के हत्या निर्मम रुप स भय जाईया आर माता -पिता के पतो नहीं चलै छैन ।एक दोशर में लिप्त परिवार के संग में रहब बेलाए बुझाई छैन । पुर्ण रुपे अपना पैर पर ठाड़ भय तखन विवाह के सोचै छैथ चाहे उम्र पैंतीस के पाड़ कीया नहीं चली जाय, जाहि स संतान प्राप्ति में दिक्कत सेहो होई छैन , किछु त जानी बुझी क छोट परिवार के सोच आर स्वतंत्र रहै के आड़ में गर्भनिरोधक तरीका सब अपनावै छैथ।अन्तर्जातिय विवाह के सेह़ोबढावा भेट रहल अछि। पहिले अहि सब चीज पर समाजक दृष्टि छल ,आव ओ समय नहीं रही गेल कानून व्यवस्था याह छै , स्वतंत्रता छै सब के कखनो-कखनो अन्य धर्म में विवाह से देखल जा रहल अछि। लड़का -लड़की दुनू काज करै छैथ ,समान अधिकार के कारण एक दोशर के सम्मान कम आर ईगो स बेशी देखै छैथ ,आपस में रोक -टोक पशंद नहीं करै छैथ,आये दीन आपस मे बहश करै छैथ ।ज्ञान आर सहनशीलता के अभाव में आपस मे लड़ैत रहै छैथ , संविधान में छूट आर तलाक के कानून के कारण बात तलाक तक पहुंच जाय छै अहि में कनियो झिझक नहीं होय छैन , दिखावा के होड़ में शिक्षीत समाज में दहेज प्रथा से एक टा वर्चस्व बनी रहल अछि। । युवा पीढ़ी सब नशा के सेवन से करै मे कनीयो पछा नहीं छैथ , बहुत लोक आजन्म अविवाहित रहब पशंद करै छैथ बिन विवाहे सब सुख भेट जाय छैन आसानी स , संयुक्त परिवार में रहब मुर्खता बुझै छथीन।हम दो हमारे दो मे परिवार सीमित छैन , एक दोशर स अगा बढै के होर आर भोग विलास के लालसा में अपनही मार्ग में कांटा बिछा लय छैथ,जीद आर ब्यबहारिक ज्ञान के अभाव में अपन कर्तव्य पथ स बिमुख भ जाय छैथ , वास्तविक जीवन स बहुत दुर सपना के दुनिया में हमेशा विचरण करै छैथ ।भारत आ खास क मिथिलांचल त हमेशा स सभ्यता आर संस्कृति के गुरु कहावैया आर कहावैत रहत ,ई राम आर सीता के धरती छी पर अहि लेल किछु सराहनीय कदम उठावै परत । सब स पहीले त शिक्षा के पद्धति में बदलाव हेबाक चाही आर संग -संग अभिभावक सब के अपन जिम्मेदारी के एहसास होबाक चाहि, वर -बुजुर्ग के छाया सिर पर रहबाक चाहि, ब्यबहारिक ज्ञान के बोद्ध होबाक चाहि बच्चा में।
जय मिथिला जय मैथिली 🙏🏽
✍️ रिंकु झा, ग्रेटर नोएडा