“आस्थाक शाब्दिक अर्थ त’ मूलत: विश्वास आ निष्ठा होइत छैक।”

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— उग्रनाथ झा।         

आस्था के शाब्दिक अर्थ त मुलत: विश्वास आ निष्ठा होईत छैक , मुदा जौ एकर भावार्थ पर दृष्टिपात करब त गुढ़ रहस्य नुकाएल भेटत । बिना कोनों विशिष्ट ज्ञानक आधार के कोनो लौकिक वा अलौकिक परिकल्पना के सत्त मानि लेनाए । यानि ओहि परिकल्पना संग अपन आत्म विश्वासक संग सशक्त भऽ ठा’र भेना’ए ।
जखन की आडंम्बर ओहि आस्था के बाह्य प्रदर्शन लेल कएल जा रहल सिमा रहीत गतिविधी के रूप में जानल जाएल छैक।
बहुधा देखल जाएत छैक जे हमरा लोकनि लौकिक आस्था के प्रति त देर सवेर प्रमाणीकरण पर माथा लगाबैत छि आ सत्य वा असत्य पर जाकय निश्चितता भेटैत छैक । लेकिन अलौकिक धारणा पर जे आस्थाक बिहनि रोपण होईछ ओ दिनो दिन प्रगाढ़ताके शिखर छुबैत चली जाएत छैक । जेना धार्मिक आस्था चाहे ओ कोनो भी धर्म सं जुड़ल हो व्यक्ति भावनामे उत्तरोत्तर प्रबलता अबैत रहैत छैक । जाहि के लेल लोक आस्थावान बनि अपन अंत:करण’क सुचिता के प्रबल करबाक स्थानापन्न अपन समकक्ष समाजमे अपन विशिष्टताक प्रदर्शन में लागि जाएत छथि। एहि विशेष प्रदर्शन के समाजमे आडम्बर के संज्ञा देल गेल अछि। जे कोनो भी मान्यता , कोनो अटुट विश्वास के मार्गक विशिष्टताके भ्रष्ट करबाक प्रमुख कारण होईछ , वा कहि जे ई आडम्बरपूर्ण कृत्य ओहि आस्था के मौलिकता पर प्रश्न चिन्ह आ श्रद्धाक प्रति विवेचन उत्पन्न करैछ।
उदाहरण स्वरूप यदि धार्मिक दृष्टांत के उद्धृत करब त पाएब जे आदिकाल सं ऋषी मुनि तपस्वी जन एकांत जंगल में मनोयोग सं साधना लीन रहैत छलाह । सादगीपूर्ण आचरण संग सविध पूजा अर्चन सं अलौकिक शक्ति आ बल प्राप्त करैत छलाह ।कोनो देखाबा नहि । बस स्वयं के लेल आचरण अचरैत छलाह । इएह हाल लगभग सभ मतावलंबी के छलन्हि । मुदा वर्तमान में बढ़ैत आडम्बरपूर्ण गतिविधि के कारण आई पूजाक विधि विधान एकोर लागि गेल आ भौतिकवादी तामझाम सुरसा जेना देह पसारि रहल छैक । आई चाहे सत्यनारायण भगवान के पूजा हो वा मस्जिदक अजान बिना ध्वनि विस्तारक के सोभा नै दै छै के मान्यता सं ग्रसित छैक । जेकर फलाफल आस्थावादिता के दौर में सभ आपस में टकरा रहल छैक। आस्थावानक आस्था भटकि रहल छैक । मुल उद्देश्य थकुचा क सकचुन्न भय रहल छै । आस्थाक मौलिक स्तर छुटल जा रहल छैक।
जतय अंत:करणक सुचिता प्रस्फुटित होएबाक चाहि ओतय अंत:करण दूषित विचारक जमघट भऽ रहल छैक । जतय भजन किर्तन संग सात्विक साधना सं मन: स्थिति सात्विक होएबाक चाहि। ओतय आडम्बरी अंधानुकरण सं तन , मन विषाक्त भ रहल छैक । जे समाज आ देश में निर्मल ,निश्छल भाव के प्रगति के स्थानापन्न विकृत मानसिकता आ पाखंड के सृजन करैछ।
आडम्बरक एहि चकविदोरमे निश्छल आस्थावान सेहो ओझराक रहि जाएत छथि । जेकर फलाफल मूढ़ मन मस्तिष्क के स्वामी अपना के निष्ठावान , आस्थावान साबित करैत छथि जे अंततः समाजक लोटिया पार क दैत छथि, आ सुच्चा आस्थावान अपन मुंह नुकौने फिरै छथि। परिणामत: समाजमे धार्मिक विद्वेषक जन्म होईछ । किएक त आस्था ओ रस्सी थिक जेकरा जतेक सख्त भ बा’टब ओ ओतेक मजगुत होएत।
तै आस्थावान लोकनि के चाहिऐन जे अपन आस्थाक आचरणमे सात्विक आ मौलिकता कायम राखैत जे शास्त्र पुराण बाट देखाबैत छैक । आडम्बरक पछोर धरबा सं बचल रहि।जे निश्चय उत्थानक मार्ग प्रशस्त करत।जे खंड- खंड होइत आस्था के एकिकृत करैत समाजिक आ धार्मिक सद्भाव के अक्षुण्ण राखत।
अन्यथा आडंम्बरक दौड़ैत रथ समाजिक , धार्मिक संरचना के एकरूप सामंजस्य के , पुरातन सांस्कृतिक विरासत के मटियामेट क देत ।
सभ मुंह तकैत रहि जाएब।