“ई भटकल समाज विश्वासकेँ जगह चमत्कारसँ भगवानकेँ चिन्हैकेँ गलती करैत अछि।”

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— आभा झा।     

” धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्यिको लोकदम्भकः।
बैडालवृत्ति को जेयो हिस्त्रः सर्वा भिसन्धकः।।
मनुस्मृतिमे आडंबर रचयवालाकेँ बारेमे कहल गेल अछि, अपन कीर्ति पाबयकेँ इच्छा पूर्ति करयकेँ लेल झूठक आचरण करय वाला तथा सदैव दोसरक धनकेँ हरण करय वाला, ढोंग रचय वाला, हिंसक प्रवृत्ति वाला तथा सदैव दोसरकेँ भड़काबै वाला ‘ बिडाल वृत्ति ‘ के कहल जाइत अछि। भारतमे धर्मक नाम पर आडंबर-प्रदर्शन करय वाला लोक पहिने सेहो छलाह आ आइयो छथि। प्लूटार्क केँ कहल अनुसार- ” अधिकांश मनुष्य प्रदर्शन-प्रिय होइत अछि, कियैकि सद्गुणशीलताक दिव्यताकेँ हुनका ने ज्ञान छैन्ह ने अनुभव।” सिर्फ आइ काल्हि टा नहिं बल्कि प्राचीन काल सँ ही धर्म आ समाजमे आडंबर आ प्रदर्शन देखयमे आबि रहल अछि। समाज धार्मिक रीति-रिवाज आ नियम पर टिकल अछि। एहि आधुनिक युगमे तऽ आस्था आ आडंबरक प्रदर्शनक बारेमे पूछू जूनि, जतय देखू ओहिठाम मंदिरमे पैघ-पैघ पूजा-कर्म, यज्ञ भऽ रहल अछि। कतेको पाइ आ भोजनक बर्बादी होइत अछि। धर्मक नाम पर पैघ-पैघ भवन निर्माण भऽ रहल अछि, देवालय, सभाभवनक निर्माण भऽ रहल अछि। दोसर दिस सामान्य जनता, भिखारी खुजल आसमान आ रौद-बरखाक चपेटमे अपन जान गवां रहल अछि। मुदा ओकर चिंता के करैत अछि, लोककेँ तऽ सिर्फ धर्म,भगवान या आडंबरक जीवनकेँ पड़ल छैक। धर्मक नाम पर पाखंड केनाइ, धर्मक नाम पर लोककेँ फंसेनाइ ई सब गलत बात छैक। सभ महान संत सब आडंबरकेँविरोध केने छथि। मुदा ई आडंबर सामाजिक अनुष्ठानमे एहि कदर बढ़ि गेल अछि कि विवाहक अवसर पर आबय वाला बरियाती कोनो रणविजयक जश्न सँ कम नहिं लगैत अछि। धार्मिक आयोजनक नाम पर मनमाना ढंग सँ लाउडस्पीकर लगा कऽ शोर मचाओल जाइत अछि जे गलत अछि। मंदिर या मस्जिदमे लाउडस्पीकर लगेनाइ कोनो संस्कृतिकेँ हिस्सा नहिं अछि और धर्ममे तऽ एकर कोनो मतलबे नहिं उठैत अछि। खालि आडंबर आ प्रपंचक चलते लोक एहेन काज करैत छथि। बेसीतर सामाजिक समारोह, फेर चाहे ओ धार्मिक हो या परंपरागत सब धन कुबेर सभक गिरफ्तमे अछि। उत्सव आ शादी-ब्याहमे लोक पाइ पइन जेकां बहबैत अछि। हालेमे कतेक पाबनि-तिहार संपन्न भेल, अनुष्ठान आयोजित कएल गेल। पूरा साल चलय वाला एहेन अनेक आयोजन लगभग हर गाम या शहरक गली-मुहल्लामे होइत अछि। जगह-जगह रस्ता बंद करि कऽ लगाओल गेल पंडालमे कर्णभेदी स्वरमे बजय वाला लाउडस्पीकर सँ सामान्य जन-जीवन पूरा तरहें अस्त-व्यस्त भऽ जाइत अछि। रोगीकेँ समस्या, बच्चाक पढ़ाईमे समस्या तथा फेरी लगा कऽ व्यापार करय वालाकेँ समस्या। आयोजन समाप्तिक बाद मूर्ति विसर्जनक नाम पर पैघ-पैघ जुलूस निकालैकेँ सेहो परंपरा बनि गेल अछि। एकर कारण लगय वाला जाम सँ आम आदमीक रोजमर्राक जिंदगी प्रभावित भेनाइ स्वाभाविक अछि। कियो अस्पताल जा रहल अछि, ककरो ट्रेन पकड़नाइ अछि तऽ ककरो बड्ड जरूरी काज छैक। मुदा घंटो-घंटा जाममे फंसि कऽ परेशान भऽ जाइत अछि। धार्मिक आस्था जखन उन्मादक रूप लऽ लैत अछि, तखन ओहि पर अंकुश लगा पेनाइ असंभव तऽ नहिं मुदा मुश्किल अवश्य होइत अछि। भारतमे सड़क सँ लऽ कऽ आलीशान आश्रममे आस्थाकेँ अपन-अपन ढंग सँ बेचल आ कीनल जा रहल अछि। आइ काल्हि किछ ढोंगी बाबा आ संतक प्रति लोकक आस्था बढ़ल जा रहल अछि। चमत्कारी बाबा द्वारा महिलाक शोषणक बात हमेशा सँ प्रकाशमे अबैत रहल अछि। एकर दोषी केवल ई बाबा नहिं बल्कि हमर ई भटकल समाज अछि जे विश्वास केँ जगह चमत्कार सँ भगवानकेँ चिन्हैकेँ गलती करैत अछि। धर्म आ ईश्वरक नाम पर लूटनाइ आ नारी अस्मिताक संग खेलाइ वाला एहेन तथाकथित बाबा सभक लेल कठोर सँ कठोर दंडक प्रावधान भेनाइ आवश्यक अछि।
जय मिथिला, जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद